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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

सुन्दरकाण्ड - सर्ग १: हनुमान्‌जीका समुद्रोलङ्घन और लंका-प्रवेश

ॐ

अध्यात्मरामायण

सुन्दरकाण्ड

प्रथम सर्ग

हनुमान्जीका समुद्रोल्लङ्घन और लंका-प्रवेश।


श्रीमहादेव उवाच

शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं मकरालयम्।
लिलङ्घयिषुरानन्दसन्दोहो मारुतात्मजः ॥ १ ॥
ध्यात्वा रामं परात्मानमिदं वचनमब्रवीत्।
पश्यन्तु वानराः सर्वे गच्छन्तं मां विहायसा ॥ २ ॥
अमोघं रामनिर्मुक्तं महाबाणमिवाखिलाः।
पश्याम्यद्यैव रामस्य पत्नीं जनकनन्दिनीम् ॥ ३ ॥

श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! आनन्दघन श्रीहनुमान्‌जी सौ योजनतक फैले हुए और मकरादि दुष्ट जल-जन्तुओंसे पूर्ण समुद्रको लाँघनेके लिये उद्यत हो परमात्मा रामका स्मरण कर इस प्रकार बोले—"हे वानरगण ! तुम सब इस ओर देखो। मैं भगवान् रामके छोड़े हुए अमोघ बाणके समान आकाश-मार्गसे जाता हूँ। मैं आज ही रामप्रिया जनकनन्दिनी श्रीसीताजीको देखूँगा ॥ १–३ ॥

कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं पुनः पश्यामि राघवम्।
प्राणप्रयाणसमये यस्य नाम सकृत्स्मरन् ॥ ४ ॥
नरस्तीर्त्वा भवाम्भोधिमपारं याति तत्पदम्।
किं पुनस्तस्य दूतोऽहं तदङ्गाङ्गुलिमुद्रिकः ॥ ५ ॥
तमेव हृदये ध्यात्वा लङ्घयिष्याल्पवारिधिम्।
इत्युक्त्वा हनुमान्बाहु प्रसार्रायतवालधिः ॥ ६ ॥
ऋजुग्रीवोर्ध्वदृष्टिः सन्नाकुञ्चितपदद्वयः।
दक्षिणाभिमुखस्तूर्णं पुप्लुवेऽनिलविक्रमः ॥ ७ ॥

निश्चय ही, अब मैं कृतकार्य होकर ही पुनः श्रीरघुनाथजीका दर्शन करूँगा। प्राण-प्रयाणके समय जिनके नामका एक वार स्मरण करनेसे ही मनुष्य अपार संसार-सागरको पार कर उनके परमधामको चला जाता है, फिर मैं उन्हींका दूत उनके अवयव-रूप अँगुलिकी अँगूठी लिये हुए अपने हृदयमें उन्हीं-का ध्यान करता हुआ इस तुच्छ समुद्रको लाँघ जाऊँ तो इसमें कौन बड़ी बात है?" ऐसा कह श्रीहनुमान्‌जीने अपनी बाँहें फैलायीं और पूँछको सीधा किया तथा तुरन्त ही गरदनको सीधा एवं दृष्टिको ऊपरकी ओर कर पाँव सिकोड़ लिये और दक्षिणकी ओर मुख करके वायु-वेगसे उड़ान लगायी ॥ ४–७ ॥

आकाशाच्चरितं देवैर्वीक्ष्यमाणो जगाम सः।
दृष्ट्वाऽनिलसुतं देवा गच्छन्तं वायुवेगतः ॥ ८ ॥
परीक्षणार्थं सत्त्वस्य वानरस्येदमब्रुवन्।
गच्छत्येष महासत्त्वो वानरो वायुविक्रमः ॥ ९ ॥

उस समय वे देवताओंके देखते-देखते आकाश-मार्गसे बड़े तीव्र वेगसे जा रहे थे। पवनपुत्र हनुमान्‌जीको इस प्रकार वायु-वेगसे जाते देख देवताओंने उनकी सामर्थ्यकी परीक्षाके लिये आपसमें इस प्रकार कहा—"यह महाशक्तिशाली वानर वायुके समान तीव्र वेगसे जा रहा है ॥ ८-९ ॥ किन्तु पता

२०४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

लङ्कां प्रवेष्टुं शक्तो वा न वा जानीमहे बलम् ।<br>एवं विचार्य नागानां मातरं सुरसाभिधाम् ॥१०॥<br>अब्रवीद्देवतावृन्दः कौतूहलसमन्वितः ।<br>गच्छ त्वं वानरेन्द्रस्य किञ्चिद्विघ्नं समाचर ॥११॥<br>ज्ञात्वा तस्य बलं बुद्धिं पुनरेहि त्वरान्विता ।<br>इत्युक्ता सा ययौ शीघ्रं हनुमद्विघ्नकारणात् ॥१२॥<br>आवृत्य मार्ग पुरतः स्थित्वा वानरमब्रवीत् ।<br>एहि मे वदनं शीघ्रं प्रविशस्व महामते ॥१३॥<br>देवैस्त्वं कल्पितो भक्ष्यः क्षुधासम्पीडितात्मनः ।<br>तामाह हनुमान्मातरहं रामस्य शासनात् ॥१४॥<br>गच्छामि जानकीं द्रष्टुं पुनरागम्य सत्वरः ।<br>रामाय कुशलं तस्याः कथयित्वा त्वदाननम् ॥१५॥<br>प्रवेक्ष्ये देहि मे मार्गं सुरसायै नमोऽस्तु ते ।<br>इत्युक्ता पुनरेवाह सुरसा क्षुधितास्म्यहम् ॥१६॥<br>प्रविश्य गच्छ मे वक्त्रं नो चेत्त्वां भक्षयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो हनुमानाह मुखं शीघ्रं विदारय ॥१७॥<br>प्रविश्य वदनं तेऽद्य गच्छामि त्वरान्वितः ।<br>इत्युक्त्वा योजनायामदेहो भूत्वा पुरः स्थितः ॥१८॥ | नहीं यह लंकामें घुस सकेगा या नहीं । अतः इसके बलका पता लगाना चाहिये।” परस्पर ऐसा विचारकर उन्होंने कुतूहलवश नागमाता सुरसासे कहा— “सुरसे ! तुम अभी जाकर इस वानरश्रेष्ठके मार्गमें कुछ विघ्न खड़ा करो और इसकी बल-बुद्धिका पता लगाकर तुरन्त लौट आओ ।” देवताओंके इस प्रकार कहनेपर वह तुरन्त ही हनुमान्‌जीको विघ्न उपस्थित करनेके लिये गयी ॥१०–१२॥ वह उनके मार्गको सामनेसे रोककर खड़ी हो गयी और बोली—“हे महामते ! आओ, शीघ्र ही मेरे मुखमें प्रवेश करो; मैं भूखसे अत्यन्त व्याकुल थी, अतः देवताओंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बनाया है ।” तब हनुमान्‌जीने उससे कहा—“हे मातः ! मैं श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे जानकीजीको देखनेके लिये जा रहा हूँ । वहाँसे शीघ्र ही लौटकर श्रीरघुनाथजीको उनका कुशल-समाचार सुनाकर फिर मैं तेरे मुखमें प्रवेश करूँगा । हे सुरसे ! मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, तू मेरा मार्ग छोड़ दे ।” इसपर सुरसाने फिर कहा—“मुझे बड़ी भूख लगी है । अतः एक बार मेरे मुखमें प्रवेश करके फिर चले जाना, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊँगी ।” तब हनुमान्‌जीने कहा— “अच्छा तो शीघ्र ही अपना मुख खोल । मैं अभी तेरे मुखमें घुसकर तुरन्त ही लंकाको चला जाऊँगा ।” ऐसा कह हनुमान्‌जी अपना शरीर एक योजन लम्बा-चौड़ा बनाकर सामने खड़े हो गये ॥ १३–१८ ॥
दृष्ट्वा हनुमतो रूपं सुरसा पञ्चयोजनम् ।<br>मुखं चकार हनुमान् द्विगुणं रूपमादधत् ॥१९॥<br>ततश्चकार सुरसा योजनानां च विंशतिम् ।<br>वक्त्रं चकार हनुमान्त्रिंशद्योजनसम्मितम् ॥२०॥<br>ततश्चकार सुरसा पञ्चाशद्योजनायतम् ।<br>वक्त्रं तदा हनूमांस्तु बभूवाङ्गुष्ठसन्निभः ॥२१॥<br>प्रविश्य वदनं तस्याः पुनरेत्य पुरः स्थितः ।<br>प्रविष्टो निर्गतोऽहं ते वदनं देवि ते नमः ॥२२॥<br>एवं वदन्तं दृष्ट्वा सा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।<br>गच्छ साधय रामस्य कार्यं बुद्धिमतां वर ॥२३॥ | हनुमान्‌जीका वह रूप देखकर सुरसाने अपना मुख पाँच योजन फैलाया; तब हनुमान्‌जीने अपना शरीर उससे दूना कर लिया ॥ १९ ॥ फिर सुरसाने अपना मुख बीस योजन किया तो हनुमान्‌जीने अपना देह तीस योजनका कर लिया ॥ २० ॥ इसपर जब सुरसाने अपना मुख पचास योजन फैलाया तो हनुमान्‌जी अँगूठेके समान छोटे-से आकारके हो गये और चट उसके मुखमें जाकर बाहर निकल आये तथा उसके सामने खड़े होकर बोले—‘हे देवि ! मैं तुम्हारे मुखमें जाकर फिर निकल आया हूँ, अब तुम्हें नमस्कार है” ॥ २१-२२ ॥ हनुमान्‌जीको इस प्रकार कहते देख सुरसा बोली—“हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ! जाओ, श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करो । हे वानर ! देवता-लोग तुम्हारा बल जानना चाहते थे अतः उन्होंने मुझे

सर्ग १ ] | सुन्दरकाण्ड | २०५

देवैः सम्प्रेषिताऽहं ते बलं जिज्ञासुभिः कपे ।
दृष्ट्वा सीतां पुनर्गत्वा रामं द्रक्ष्यसि गच्छ भोः ॥२४॥

इत्युक्त्वा सा ययौ देवलोकं वायुसुतः पुनः ।
जगाम वायुमार्गेण गरुत्मानिव पक्षिराट् ॥२५॥

समुद्रोऽप्याह मैनाकं मणिकाञ्चनपर्वतम् ।
गच्छत्येष महासत्त्वो हनूमान्मारुतात्मजः ॥२६॥

रामस्य कार्यसिद्ध्यर्थं तस्य त्वं सचिवो भव ।
सगरैर्वर्धितो यस्मात्पुराऽहं सागरोऽभवम् ॥२७॥

तस्यान्वये बभूवासौ रामो दाशरथिः प्रभुः ।
तस्य कार्यार्थसिद्ध्यर्थं गच्छत्येष महाकपिः ॥२८॥

त्वमुत्तिष्ठ जलात्तूर्णं त्वयि विश्रम्य गच्छतु ।
स तथेति प्रादुरभूज्जलमध्यान्महोन्नतः ॥२९॥

नानामणिमयैः शृङ्गैस्तस्योपरि नराकृतिः ।
प्राह यान्तं हनूमन्तं मैनाकोऽहं महाकपे ॥३०॥

समुद्रेण समादिष्टस्त्वद्विश्रामाय मारुते ।
आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि मे ॥३१॥

विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् ।
एवमुक्तोऽथ तं प्राह हनूमान्मारुतात्मजः ॥३२॥

गच्छतो रामकार्यार्थं भक्षणं मे कथं भवेत् ।
विश्रामो वा कथं मे स्याद्गन्तव्यं त्वरितं मया ॥३३॥

इत्युक्त्वा स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः ।
किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥३४॥

सिंहिका नाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता सदा ।
आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षयेत् ॥३५॥

तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् ।
केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ॥३६॥


तुम्हारे पास भेजा था । मुझे निश्चय है कि तुम सीताजीको देखकर फिर शीघ्र ही रघुनाथजीसे मिलोगे । अब तुम जाओ” ॥ २३-२४ ॥

ऐसा कहकर सुरसा देवलोकको चली गयी और श्रीहनुमान्‌जी फिर आकाश-मार्गसे पक्षिराज गरुड़के समान चलने लगे ॥ २५ ॥ इसी समय समुद्रने भी सुवर्ण और मणियोंसे युक्त मैनाक पर्वतसे कहा— “देखो, ये महाशक्तिशाली पवनपुत्र हनुमान्‌जी राम-कार्यके लिये जा रहे हैं; तुम उनकी सहायता करो । पूर्वकालमें मुझे सगर-पुत्रोंने बढ़ाया था, इसीसे मैं सागर कहलाता हूँ ॥ २६-२७ ॥ ये दशरथनन्दन भगवान् राम उन्हींके वंशमें प्रकट हुए हैं और ये कपिराज उन्हींका कार्य सिद्ध करनेके लिये जा रहे हैं ॥ २८ ॥ तुम तुरन्त ही जलसे ऊपर उठ जाओ, जिससे ये तुम्हारे ऊपर कुछ देर विश्राम लेकर आगे जायँ ।” तब मैनाक पर्वत ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त अपने अनेक मणिमय शिखरोंसे पानीसे ऊपर बहुत ऊँचा निकल आया । और उन शृङ्गोंके ऊपर मनुष्याकारसे स्थित होकर उसने जाते हुए हनुमान्‌जीसे कहा— “हे महाकपे ! मैं मैनाक हूँ । हे मारुते ! समुद्रने मुझे तुम्हें विश्राम देनेके लिये आज्ञा दी है । आओ, मेरे ये अमृत-तुल्य फल खाओ ॥ २९-३१ ॥ कुछ देर यहाँ विश्राम करके फिर आनन्दपूर्वक चले जाना ।” मैनाकके इस प्रकार कहनेपर पवनपुत्र हनुमान्‌जी बोले—॥ ३२ ॥ “राम-कार्यके लिये जाते हुए मैं भोजनादि कैसे कर सकता हूँ ? और मुझे जल्दी ही जाना है, अतः विश्रामका अवकाश भी कहाँ है ?”॥ ३३॥

ऐसा कह कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जी (मैनाकका मान रखनेके लिये) उसके शिखरको केवल अँगुल़ीसे छूकर आगे चल दिये । वे कुछ ही आगे बढ़े थे कि उनकी छायाको एक छायाग्रहने पकड़ लिया ॥ ३४ ॥ वह सिंहिका नामकी एक घोर राक्षसी थी जो सदा जलमें रहकर आकाशमें जाते हुए जीवोंकी छाया पकड़कर उन्हें खींच लेती थी और खा जाया करती थी ॥ ३५ ॥ उससे पकड़े जानेपर महापराक्रमी श्रीहनुमान्‌जी सोचने लगे—‘यह ऐसा कौन विघ्न-कारक है जिसने मेरा वेग रोक लिया ? दिखायी

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२०६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १

दृश्यते नैव कोऽप्यत्र विस्मयो मे प्रजायते । तो यहाँ कोई देता नहीं, इससे मुझे बड़ा आश्चर्य
एवं विचिन्त्य हनूमानधो दृष्टिं प्रसारयत् ॥३७॥ हो रहा है।' ऐसे सोचते-सोचते उन्होंने अपनी दृष्टि
नीचेकी ओर की तो उन्हें वहाँ बड़े विकराल रूप और
तत्र दृष्ट्वा महाकायां सिंहिकां घोररूपिणीम् । स्थूल शरीरवाली सिंहिका राक्षसी दिखलायी दी । उसे
पपात सलिले तूर्णं पद्भ्यामेवाहनद्रुषा ॥३८॥ देखते ही वे तुरन्त जलमें कूद पड़े और बड़े क्रोधसे
उसे लातोंसे ही मार डाला ॥३६-३८॥ इसके पश्चात्
पुनरुत्प्लुत्य हनुमान्दक्षिणाभिमुखो ययौ । हनुमान्जी फिर उछलकर दक्षिणकी ओर चलने लगे,
ततो दक्षिणमासाद्य कूलं नानाफलद्रुमम् ॥३९॥ और समुद्रके दक्षिण-तटपर पहुँच गये, जहाँ नाना
प्रकारके फलवाले वृक्ष लगे हुए थे ॥३९॥ और तरह-
नानापक्षिमृगाकीर्णं नानापुष्पलतावृतम् । तरहके पक्षियों और मृगोंसे पूर्ण तथा विविध भाँतिकी
ततो ददर्श नगरं त्रिकूटाचलमूर्धनि ॥४०॥ पुष्पलताओंस आवृत था । वहाँ पहुँचकर उन्होंने
त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बसी हुई लंकापुरी देखी
प्राकारैर्बहुभिर्युक्तं परिखाभिश्च सर्वतः । जो सब ओरसे अनेकों परकोटों और खाइयोंसे
प्रवेक्ष्यामि कथं लङ्कामिति चिन्तापरोऽभवत्॥४१॥ घिरी हुई थी। उसे देखकर वे सोचने लगे कि मुझे किस
प्रकार इस नगरमें जाना चाहिये ॥४०-४१॥ फिर निश्चय
रात्रौ वेक्ष्यामि सूक्ष्मोऽहं लङ्कां रावणपालिताम् । किया कि मैं रात्रिके समय सूक्ष्म शरीर धारणकर इस
एवं विचिन्त्य तत्रैव स्थित्वा लङ्कां जगाम सः॥४२॥ रावणप्रतिपालित लंकापुरीमें प्रवेश करूँगा । यह
विचारकर वे वहीं ठहर गये और फिर (रात्रि
होनेपर) लंकाकी ओर चले ॥ ४२ ॥

धृत्वा सूक्ष्मं वपुर्द्वारं प्रविवेश प्रतापवान् । जिस समय महाप्रतापी श्रीहनुमान्जीने सूक्ष्म शरीर
तत्र लङ्कापुरी साक्षाद्राक्षसीवेषधारिणी ॥४३॥ धारण कर नगरके द्वारमें प्रवेश किया उस समय वहाँ
साक्षात् लंकापुरी राक्षसीका रूप धारण किये खड़ी थी
प्रविशन्तं हनूमन्तं दृष्ट्वा लङ्का न्यतर्जयत् । ॥ ४३ ॥ उसने हनुमान्जीको नगरमें जाते देख डाँटा
कस्त्वं वानररूपेण मामनादृत्य लङ्किनीम् ॥४४॥ और पूछा—"तू कौन है जो इस रात्रिके समय मुझ
लंकिनीका अनादर कर चोरके समान वानररूपसे
प्रविश्य चोरवद्रात्रौ किं भवान्कर्तुमिच्छति । नगरमें जा रहा है ? और (यहाँ) तू क्या करना
इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षी पादेनाभिजघान तम्॥४५॥ चाहता है ?" ऐसा कह उसने क्रोधसे आँखें लाल
कर उनके लात मारी ॥ ४४-४५ ॥ तब हनुमान्जीने
हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽवज्ञयाऽहनत् । उसकी अवज्ञा करते हुए उसे बायें हाथका घूँसा मारा,
तदैव पतिता भूमौ रक्तमुद्वमती भृशम् ॥४६॥ जिससे वह बहुत-सा रुधिर वमन करती हुई पृथिवी-
पर गिर पड़ी ॥ ४६ ॥ फिर कुछ देर पीछे लंकिनीने
उत्थाय प्राह सा लङ्का हनूमन्तं महाबलम् । उठकर महाबली हनुमान्जीसे कहा—"हे हनुमन् !
हनूमन् गच्छ भद्रं ते जिता लङ्का त्वयाऽनघ ॥४७॥ जाओ, तुम्हारा कल्याण हो; हे अनघ ! तुम लंकापुरी-
को जीत चुके ॥ ४७ ॥ पूर्वकालमें मुझसे श्रीब्रह्माजीने
पुराऽहं ब्रह्मणा प्रोक्ता ह्यष्टाविंशतिपर्यये । कहा था कि 'अट्ठाईसवें चतुर्युगके त्रेतायुगमें
त्रेतायुगे दाशरथी रामो नारायणोऽव्ययः ॥४८॥ अविनाशी नारायणदेव दशरथकुमार रामरूपसे अवतीर्ण
होंगे और उनकी योगमाया महाराज जनकके घरमें
जनिष्यते योगमाया सीता जनकवेश्मनि । सीताजी होकर प्रकट होंगी, क्योंकि मैंने पहले कभी
भूभारहरणार्थाय प्रार्थितोऽयं मया क्वचित् ॥४९॥ उनसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये प्रार्थना की थी

सर्ग १ ] सुन्दरकाण्ड २०७


सभार्यो राघवो भ्रात्रा गमिष्यति महावनम् ।<br>तत्र सीतां महामायां रावणोऽपहरिष्यति ॥५०॥<br>पश्चाद्रामेण साचिव्यं सुग्रीवस्य भविष्यति ।<br>सुग्रीवो जानकीं द्रष्टुं वानरान्प्रेषयिष्यति ॥५१॥<br>तत्रैको वानरो रात्रावागमिष्यति तेऽन्तिकम् ।<br>त्वया च भर्त्सितः सोऽपि त्वां हनिष्यति मुष्टिना ५२<br>तेनाहता त्वं व्यथिता भविष्यसि यदानघे ।<br>तदैव रावणस्यान्तो भविष्यति न संशयः ॥५३॥<br>तस्मात्त्वया जिता लङ्का जितं सर्वं त्वयाऽनघ ।<br>रावणान्तःपुरवरे क्रीडाकाननमुत्तमम् ॥५४॥<br>तन्मध्येऽशोकवनिका दिव्यपादपसङ्कुला ।<br>अस्ति तस्यां महावृक्षः शिंशपानाम मध्यगः ॥५५॥<br>तत्रास्ते जानकी घोरराक्षसीभिः सुरक्षिता ।<br>दृष्ट्वैव गच्छ त्वरितं राघवाय निवेदय ॥५६॥<br>धन्याऽहमप्यद्य चिराय राघव-<br>स्मृतिर्ममासीद्भवपाशमोचिनी ।<br>तद्भक्तसङ्गोऽप्यतिदुर्लभो मम<br>प्रसीदतां दाशरथिः सदा हृदि ॥५७॥<br>उल्लङ्घितेऽम्बुधौ पवनात्मजेन<br>धरासुतायाश्च दशाननस्य ।<br>पुस्फोर वामाक्षि भुजश्च तीव्रं<br>रामस्य दक्षाङ्गमतीन्द्रियस्य ॥५८॥॥ ४८-४९ ॥ वे श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित महावन (दण्डकारण्य) में जायेंगे। वहाँ महामायारूपिणी श्रीसीताजीको रावण हर ले जायगा ॥५०॥ तदनन्तर रामके साथ सुग्रीवकी मित्रता होगी और सुग्रीव जानकीजीकी खोजके लिये वानरोंको भेजेगा ॥ ५१ ॥ उनमेंसे एक वानर रात्रिके समय तेरे पास आयेगा । वह तुझसे तिरस्कृत होनेपर तेरे मुक्का मारेगा ॥ ५२ ॥ हे अनघे ! जिस समय तू उसके प्रहारसे व्याकुल हो जायगी उसी समय रावणका अन्त होगा—इसमें सन्देह नहीं ॥ ५३ ॥ अतः हे निष्पाप हनुमन् ! तुमने (मुझ) लंकाको जीत लिया तो सभीको जीत लिया । रावणके अन्तःपुरमें एक अत्युत्तम क्रीडावन है ॥ ५४ ॥ उसमें दिव्य वृक्षोंसे सम्पन्न एक अशोकवाटिका है । उसके बीचों-बीचमें एक अति विशाल शिंशपा (सीसमका) वृक्ष है ॥ ५५ ॥ श्रीजानकीजी वहींपर भयंकर राक्षसियों-के पहरेमें रहती हैं । तुम उनका दर्शन कर शीघ्र ही श्रीरघुनाथजीको उनका समाचार सुनाओ ॥ ५६ ॥ आज बहुत दिनोंमें मुझे श्रीरामचन्द्रजीकी संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाली स्मृति हुई है और उनके भक्तका अति दुर्लभ सङ्ग प्राप्त हुआ है । अतः आज मैं धन्य हूँ । मेरे हृदयमें विराजमान वे दशरथनन्दन राम मुझपर सदा प्रसन्न रहें ॥ ५७ ॥<br>पवननन्दन हनुमान्जीके समुद्र लाँघते ही पृथिवी-पुत्री श्रीसीताजी और रावणकी बाँयीं भुजा और बाँये नेत्र तथा इन्द्रियातीत श्रीरामचन्द्रजीके दाँये अंग बड़े जोरसे फड़कने लगे ॥ ५८ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥