अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
युद्धकाण्ड - सर्ग ६: लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमान्जीका ओषधि लेने जाना...
| २५६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५ |
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मानवं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम् ।<br>समर्थं मन्यसे केन हीनं पित्रा मुनिप्रियम् ॥३८॥<br>रामेण प्रेषितो नूनं भाषसे त्वमनर्गलम् ।<br>गच्छ वृद्धोऽसि बन्धुस्त्वं सोढं सर्वं त्वयोदितम् ३९<br>इतो मत्कर्णपदवीं दहेत्येतद्वचस्तव ।<br>इत्युक्त्वा सर्वसचिवैः सहितः प्रस्थितस्तदा ॥४०॥<br>प्रासादाग्रे समासीनः पश्यन्वानरसैनिकान् ।<br>युद्धाययोजयत्सर्वराक्षसान्समुपस्थितान् ॥४१॥ | मनुष्य रामको, जिसने बन्दरका आश्रय लिया हुआ है और जिसे उसके पिताने भी निकाल दिया है, तुम किस बातमें समर्थ मानते हो ? वह तो केवल वनवासी मुनिजनोंका ही प्यारा है ॥ ३८ ॥ मालूम होता है, तुम्हें रामने ही भेजा है इसीलिये तुम इस प्रकार ऊटपटांग बातें बनाते हो । जाओ, तुम बूढ़े और अपने सगे-सम्बन्धी हो इसलिये मैंने तुम्हारी सब बातें सहन कर लीं हैं ॥ ३९ ॥ किन्तु अब तुम्हारे वचन मेरे कानोंको जलाते हैं ।” ऐसा कहकर वह अपने समस्त मन्त्रियोंसहित वहाँसे चल दिया ॥ ४० ॥ और अपने राजभवनके सर्वोच्च तलपर बैठकर वानर-सैनिकों- को देखता हुआ अपने आस-पास बैठे हुए राक्षसोंको युद्धके लिये नियुक्त करने लगा ॥ ४१ ॥
रामोऽपि धनुरादाय लक्ष्मणेन समाहृतम् ।<br>दृष्ट्वा रावणमासीनं कोपेन कलुषीकृतः ॥४२॥<br>किरीटिनं समासीनं मन्त्रिभिः परिवेष्टितम् ।<br>शशाङ्कार्धनिभेनेव बाणेनैकेन राघवः ॥४३॥<br>श्वेतच्छत्रसहस्राणि किरीटदशकं तथा ।<br>चिच्छेद निमिषार्धेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥४४॥<br>लज्जितो रावणस्तूर्णं विवेश भवनं स्वकम् ।<br>आहूय राक्षसान् सर्वान्प्रहस्तप्रमुखान् खलः॥४५॥<br>वानरैः सह युद्धाय नोदयामास सत्वरः । | इधर, रामचन्द्रजीने रावणको बैठा देख अति क्रोधातुर हो लक्ष्मणजीका लाया हुआ धनुष उठाया ॥ ४२ ॥ वह शिरपर मुकुट धारण किये अपने अनेकों मन्त्रियोंसे घिरा हुआ बैठा था भगवान् रामने आधे निमेषमें ही एक अर्धचन्द्राकार बाणसे उसके हजारों श्वेत छत्र और दसों मुकुट काट डाले । यह बड़ा आश्चर्य-सा हो गया ॥ ४३-४४ ॥ इससे लज्जित होकर रावण तुरन्त अपने घरमें घुस गया; और उस दुष्टने शीघ्र ही प्रहस्त आदि मुख्य-मुख्य राक्षसोंको बुलाकर वानरोंके साथ युद्ध करनेकी आज्ञा दी ।
ततो भेरीमृदङ्गाद्यैः पणवानकगोमुखैः ॥४६॥<br>महिषोष्ट्रैः खरैः सिंहैर्द्दीपिभिः कृतवाहनाः ।<br>खड्गशूलधनुःपाशयष्टितोमरशक्तिभिः ॥४७॥<br>लक्षिताः सर्वतो लङ्कां प्रतिद्वारमुपाययुः ।<br>तत्पूर्वमेव रामेण नोदिता वानरर्षभाः ॥४८॥<br>उद्यम्य गिरिशृङ्गाणि शिखराणि महान्ति च ।<br>तरूंश्चोत्पाट्य विविधान्युद्धाय हरियूथपाः ॥४९॥<br>प्रेक्षमाणा रावणस्य तान्यनीकानि भागशः ।<br>राघवप्रियकामार्थं लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥५०॥<br>ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च मुष्टिभिश्च प्लवङ्गमाः ।<br>ततः सहस्रयूथाश्च कोटियूथाश्च यूथपाः ॥५१॥ | तब राक्षसलोग भेरी, मृदंग, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाते भैंसों, ऊँटों, गधों, सिंहों और हाथियोंपर चढ़कर खड्ग, शूल, धनुष, पाश, यष्टि (डण्डे), तोमर और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो लङ्काके प्रत्येक द्वारपर आ गये । भगवान् रामने वानरोंको पहले ही आज्ञा दे दी थी ॥४५-४८॥ अतः वे पर्वतोंकी शिलाएँ तथा बड़े-बड़े शिखर उठ कर और नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर युद्धके लिये चले और रावणकी वह पृथक्-पृथक् सेना देखकर रघुनाथजीका प्रिय कार्य करनेके लिये लंकापर चढ़ गये ॥ ४९-५० ॥ उनमेंसे कोई सहस्रयूथपति, कोई कोटियूथप और कोई शतकोटि-यूथनायकथे। उन वानरों ने उछलते-कूदते और गर्जते हुए
सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५७
| कोटीशतयुताश्चान्ये रुरुधुर्नगरं भृशम् ।<br>आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवङ्गमाः ॥५२॥<br>रामो जयत्यतिबलो लक्ष्मणश्च महाबलः ।<br>राजा जयति सुग्रीवो राघवेणानुपालितः ॥५३॥<br>इत्येवं घोषयन्तश्च समं युयुधिरेऽरिभिः ।<br>हनूमानङ्गदश्चैव कुमुदो नील एव च ॥५४॥<br>नलश्च शरभश्चैव मैन्दो द्विविद एव च ।<br>जाम्बवान्दधिवक्त्रश्च केसरी तार एव च ॥५५॥<br>अन्ये च बलिनः सर्वे यूथपाश्च प्लवङ्गमाः ।<br>द्वाराण्युत्प्लुत्य लङ्कायाः सर्वतो रुरुधुर्भृशम् ।<br>तदा वृक्षैर्महाकायाः पर्वताग्रैश्च वानराः ॥५६॥<br>निजघ्नुस्तानि रक्षांसि नखैर्दन्तैश्च वेगिताः ।<br><br>राक्षसाश्च तदा भीमा द्वारेभ्यः सर्वतो रुषा ॥५७॥<br>निर्गत्य भिन्दिपालैश्च खड्गैः शूलैः परश्वधैः ।<br>निजघ्नुर्वानरानीकं महाकाया महाबलाः ॥५८॥<br>राक्षसांश्च तथा जघ्नुर्वानरा जितकाशिनः ।<br>तदा बभूव समरो मांसशोणितकर्दमः ॥५९॥<br>रक्षांसां वानराणां च सम्प्रभूवाद्वुतोपमः ।<br>ते हयैश्च गजैश्चैव रथैः काञ्चनसंनिभैः ॥६०॥<br>रक्षोव्याघ्रा युयुधिरे नादयन्तो दिशो दश ।<br>राक्षसाश्च कपीन्द्राश्च परस्परजयैषिणः ॥६१॥<br>राक्षसान्वानरा जघ्नुर्वानरांश्चैव राक्षसाः ।<br>रामेण विष्णुना दृष्टा हरयो दिविजांशजाः ॥६२॥<br>बभूवुर्बलिनो हृष्टास्तदा पीतामृता इव ।<br>सीताभिमर्शपापेन रावणेनाभिपालितान् ॥६३॥<br>हृतश्रीकान्हतबलान् राक्षसान् जघ्नुरोजसा ।<br>चतुर्थांशावशेषेण निहतं राक्षसं बलम् ॥६४॥<br>स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा मेघनादोऽथ दुष्टधीः ।<br>ब्रह्मदत्तवरः श्रीमानन्तर्धानं गतोऽसुरः ॥६५॥ | वृक्ष, पर्वतशिखर और मुट्ठियाँ तानकर नगरको सब ओर-<br>से घेर लिया ॥५१-५२॥ 'महाबली राम और वीरवर<br>लक्ष्मणकी जय हो, रघुनाथजीसे सुरक्षित राजा सुग्रीवकी<br>जय हो' इस प्रकार शब्द करते हुए वे शत्रुओंसे लड़ने<br>लगे। हनुमान्, अंगद, कुमुद, नील, नल, शरभ, मैन्द,<br>द्विविद, जाम्बवान्, दधिमुख, केसरी, तार तथा<br>अन्य समस्त बलवान् वानर और यूथपतियोंने उछल-<br>उछलकर लंकाके सब द्वारोंको चारों ओरसे घेर<br>लिया। तब ये महाकाय वानरगण वृक्ष, पर्वतशिखर<br>और नख तथा दाँतोंसे अति वेगपूर्वक उन राक्षसोंको<br>मारने लगे।<br><br>तब, महाभयानक और बड़े-बड़े डीलवाले महा-<br>बली राक्षसगण भी अति रोषपूर्वक सब द्वारोंसे<br>निकलकर भिन्दिपाल, खड्ग, शूल और परशु आदि<br>विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-सेनापर प्रहार करने लगे<br>॥ ५३-५८ ॥ इसी प्रकार विजयी वानरवीर<br>भी राक्षसोंको मारने लगे। उस समय वहाँ राक्षसों<br>और वानरोंका बड़ा विचित्र युद्ध छिड़ गया, जिससे<br>उस रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच हो गयी। वीर<br>राक्षसकेसरी घोड़ों, हाथियों और सुवर्णमय रथोंपर चढ़-<br>कर अपने शब्दसे दशों दिशाओंको गुञ्जायमान करते हुए<br>लड़ रहे थे, और राक्षस तथा वानर दोनों ही परस्पर एक<br>दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ ५९-६१ ॥ वानरगण<br>राक्षसोंको और राक्षसलोग वानरोंको मारने लगे।<br>विष्णुरूप भगवान् रामकी दृष्टि पड़नेसे देवताओंके अंश-<br>से उत्पन्न हुए वानरगण बड़े प्रबल हो गये; और मानो<br>अमृतपान कर अति हर्षसे उत्साहपूर्वक, सीताजीको<br>(हरण करते समय) स्पर्श करनेके कारण महापापी<br>रावणसे पालित निस्तेज और बलहीन राक्षसोंको<br>मारने लगे। धीरे-धीरे राक्षसोंकी सेना नष्ट होकर केवल<br>एक चौथाई रह गयी ॥ ६२-६४॥<br><br>अपनी सेनाको नष्ट हुई देख ब्रह्माजीके वरसे<br>श्रीसम्पन्न हुआ दुष्टबुद्धि राक्षस मेघनाद अन्तर्धान हो<br>गया ॥६५॥ वह दैत्य सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलानेमें |
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- २५८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५
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मूल संस्कृत श्लोक:
सर्वास्त्रकुशलो व्योम्नि ब्रह्मास्त्रेण समन्ततः ।
नानाविधानि शस्त्राणि वानरानीकमर्दयन् ॥ ६६ ॥
ववर्ष शरजालानि तदद्भुतमिवाभवत् ।
रामोऽपि मानयन्ब्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ६७ ॥
क्षणं तूष्णीमुवासाथ ददर्श पतितं बलम् ।
वानराणां रघुश्रेष्ठश्चुकोपानलसन्निभः ॥ ६८ ॥
चापमानय सौमित्रे ब्रह्मास्त्रेणासुरं क्षणात् ।
भस्मीकरोमि मे पश्य बलमद्य रघूत्तम ॥ ६९ ॥
मेघनादोऽपि तच्छ्रुत्वा रामवाक्यमतन्द्रितः ।
तूर्णं जगाम नगरं मायया मायिकोऽसुरः ॥ ७० ॥
पतितं वानरानीकं दृष्ट्वा रामोऽतिदुःखितः ।
उवाच मारुतिं शीघ्रं गत्वा क्षीरमहोदधिम् ॥ ७१ ॥
तत्र द्रोणगिरिर्नाम दिव्यौषधिसमुद्भवः ।
तमानय द्रुतं गत्वा सञ्जीवय महामते ॥ ७२ ॥
वानरौघान्महासत्त्वान्कीर्तिस्ते सुस्थिरा भवेत् ।
आज्ञाप्रमाणमित्युक्त्वा जगामानिलनन्दनः ॥ ७३ ॥
आनीय च गिरिं सर्वान्वानरान्वानरर्षभः ।
जीवयित्वा पुनस्तत्र स्थापयित्वाऽऽययौ द्रुतम् ॥ ७४ ॥
पूर्ववच्चोद्भरं नादं वानराणां बलौघतः ।
श्रुत्वा विस्मयमापन्नो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७५ ॥
राघवो मे महान् शत्रुः प्राप्तो देवविनिर्मितः ।
हन्तुं तं समरे शीघ्रं गच्छन्तु मम यूथपाः ॥ ७६ ॥
मन्त्रिणो बान्धवाः शूरा ये च मत्प्रियकाङ्क्षिणः ।
सर्वे गच्छन्तु युद्धाय त्वरितं मम शासनात् ॥ ७७ ॥
ये न गच्छन्ति युद्धाय भीरवः प्राणविप्लवात् ।
तान्हनिष्याम्यहं सर्वान्मच्छासनपराङ्मुखान् ॥ ७८ ॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्ता निर्जग्मू रणकोविदाः । -
हिन्दी अनुवाद:
कुशल था। अतः वह आकाशमें चढ़कर ब्रह्मास्त्रद्वारा वानर-सेनाको दलित करता हुआ सब ओर नाना प्रकारके शस्त्र और बाणसमूह बरसाने लगा। यह बड़ा आश्चर्य-सा होने लगा। अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् राम भी ब्रह्मास्त्रका मान रखनेके लिये एक क्षणतक चुपचाप वानर-सेनाका पतन देखते रहे। अन्तमें वे रघुश्रेष्ठ क्रोधसे अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे ॥ ६६-६८ ॥ और बोले— "लक्ष्मण! मेरा धनुष तो लाओ, मैं एक क्षणमें ही इस दुष्ट दानवको ब्रह्मास्त्रसे भस्म कर डालूँगा। हे रघूश्रेष्ठ! आज तुम मेरा पराक्रम देखना" ॥ ६९ ॥
मेघनाद भी बहुत सावधान था; रामचन्द्रजीके ये वाक्य सुनते ही वह मायामयी दैत्य मायापूर्वक तुरन्त अपने नगरको चला गया ॥ ७० ॥
वानर-सेनाको नष्ट हुई देख श्रीरामचन्द्रजी अति दुःखित होकर हनुमान्जीसे बोले— "हनुमान् ! तुम तुरन्त ही क्षीर-सागरपर जाओ। वहाँ द्रोणाचल नामक पर्वत है, जिसपर नाना प्रकारकी दिव्य ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। हे महामते ! तुम झटपट जाकर उस पर्वतको ले आओ और इन महापराक्रमी वानरयूथोंको जीवित करो। इससे तुम्हारी कीर्ति अविचल हो जायगी।" यह सुनकर पवन-कुमार 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर चल दिये ॥ ७१-७३ ॥
और तुरन्त ही उस पर्वतको लाकर (उसकी ओषधियों-से) समस्त वानरोंको जीवित कर उसे फिर वहीं रख आये ॥ ७४ ॥
तब वानर-सेनाका फिर पूर्ववत् भयानक शब्द सुनकर रावण अति विस्मित होकर कहने लगा—॥ ७५ ॥
"देवताओंका प्रकट किया हुआ यह राम मेरा महान् शत्रु आया है। इसे युद्धमें मारनेके लिये मेरे सेनापति, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा और भी जो शूरवीर मेरा हित चाहते हों, वे सब मेरी आज्ञा मानकर तुरन्त जायँ ॥ ७६-७७ ॥
जो डरपोक अपने प्राणोंके भयसे युद्ध करने नहीं जायेंगे, अपनी आज्ञा न मानने-वाले उन सबको मैं मार डालूँगा" ॥ ७८ ॥
रावणकी यह आज्ञा सुनकर अतिकाय, प्रहस्त, महानाद, महोदर,
सर्ग ६ ] युद्धकाण्ड २५९
अतिकायः प्रहस्तश्च महानादमहोदरौ ॥७९॥
देवशत्रुर्निकुम्भश्च देवान्तकनरान्तकौ ।
अपरे बलिनः सर्वे ययुर्युद्धाय वानरैः ॥८०॥
एते चान्ये च बहवः शूराः शतसहस्रशः ।
प्रविश्य वानरं सैन्यं ममन्थुर्गलदर्पिताः ॥८१॥
भुशुण्डीभिन्दिपालैश्च बाणैः खड्गैः परश्वधैः ।
अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुर्हरियूथपान् ॥८२॥
ते पादपैः पर्वतशृंगैर्नखदंष्ट्रैश्च मुष्टिभिः ।
प्राणैर्विमोचयामासुः सर्वराक्षसयूथपान् ॥८३॥
रामेण निहताः केचित्सुग्रीवेण तथाऽपरे ।
हनूमता चाङ्गदेन लक्ष्मणेन महात्मना ।
यूथपैर्वानराणां ते निहताः सर्वराक्षसाः ॥८४॥
रामतेजः समाविश्य वानरा बलिनोऽभवन् ।
रामशक्तिविहीनानामेवं शक्तिः कुतो भवेत् ॥८५॥
सर्वेश्वरः सर्वमयो विधाता
मायामनुष्यत्वविडम्बनेन ।
सदा चिदानन्दमयोऽपि रामो
युद्धादिलीलां वितनोति मायाम् ॥८६॥
देवशत्रु, निकुम्भ, देवान्तक और नरान्तक आदि रणकुशल वीर तथा और भी समस्त बलवान् योद्धा भयभीत होकर वानरोंके साथ युद्ध करनेके लिये चले ॥७९-८०॥ ये तथा और भी बहुत-से सैकड़ों-सहस्रों शूरवीर अपने-अपने बलके गर्वसे उन्मत्त हो वानर-सेनामें घुसकर उसे दलित करने लगे ॥ ८१ ॥ वे भुशुण्डी, भिन्दिपाल, बाण, खड्ग, परशु तथा और भी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-यूथपतियोंपर प्रहार करने लगे ॥ ८२ ॥
इधर, वानरवीर भी वृक्षों, पर्वतशिखरों, नखों, दाढ़ों और मुष्टियोंसे समस्त राक्षस-यूथपोंको निष्प्राण करने लगे ॥ ८३ ॥ उन राक्षसोंमेंसे कोई श्रीरामके हाथसे, कोई सुग्रीवके द्वारा, कोई हनुमान् और अंगदके द्वारा, कोई महात्मा लक्ष्मणजीके हाथसे और कोई अन्यान्य वानर-यूथपोंके द्वारा मारे गये । इस प्रकार उन समस्त राक्षसोंका अन्त हो गया ॥ ८४ ॥ राम-तेजके समावेश-से वानरगण अत्यन्त प्रबल हो रहे थे । राम-शक्तिसे शून्य होनेपर उनमें इतनी सामर्थ्य कैसे हो सकती थी ? ॥ ८५ ॥ भगवान् राम सर्वेश्वर, सर्वमय, सबके नियन्ता और सर्वदा चिदानन्दमय हैं, तथापि मायासे मानव-चरित्रका अनुकरण करते हुए युद्धादि लीलाका विस्तार करते हैं ॥ ८६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमानजीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संवाद ।
श्रीमहादेव उवाच
श्रुत्वा युद्धे बलं नष्टमतिकायमुखं महत् ।
रावणो दुःखसन्तप्तः क्रोधेन महताऽऽवृतः ॥ १ ॥
निधायेन्द्रजितं लङ्कारक्षणार्थं महाद्युतिः ।
स्वयं जगाम युद्धाय रामेण सह राक्षसः ॥ २ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! युद्धमें अतिकाय आदि राक्षसोंकी महती सेनाको नष्ट हुई सुन रावण अति दुःखार्तुर हो महान् क्रोधसे भर गया ॥ १ ॥ और वह महातेजस्वी राक्षस लङ्काकी रक्षाके लिये इन्द्रजीतको नियुक्त कर स्वयं रघुनाथजीसे लड़नेके लिये चला ॥ २ ॥ महाबली राक्षसराज समस्त शस्त्रास्त्र-
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३६० | अध्यात्मरामायणं | [सर्ग ६
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दिव्यं स्यन्दनमारुह्य सर्वशस्त्रास्त्रसंयुतम् ।
राममेवाभिदुद्राव राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥ ३ ॥
वानरान्बहुशो हत्वा बाणैराशीविषोपमैः ।
पातयामास सुग्रीवप्रमुखान्यूथनायकान् ॥ ४ ॥
गदापाणिं महासत्त्वं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ।
उत्ससर्ज महाशक्तिं मयदत्तां विभीषणे ॥ ५ ॥
तामापतन्तीमालोक्य विभीषणविघातिनीम् ।
दत्ताभयोऽयं रामेण वधार्हो नायमासुरः ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो भीमं चापमादाय वीर्यवान् ।
विभीषणस्य पुरतः स्थितोऽकम्प इवाचलः ॥ ७ ॥
सा शक्तिर्लक्ष्मणतनुं विवेशामोघशक्तितः ।
यावन्त्यः शक्तयो लोके मायायाः सम्भवन्ति हि ॥ ८ ॥
तासामाधारभूतस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः ।
मायाशक्त्या भवेत्किं वा शेषांशस्य हरेस्तनोः ॥ ९ ॥
तथापि मानुषं भावमापन्नस्तदनुव्रतः ।
मूर्च्छितः पतितो भूमौ तमादातुं दशाननः ॥ १० ॥
हस्तैस्तोलयितुं शक्तो न बभूवातिविस्मितः ।
सर्वस्य जगतः सारं विराजं परमेश्वरम् ॥ ११ ॥
कथं लोकाश्रयं विष्णुं तोलयेल्लघुराक्षसः ।
ग्रहीतुकामं सौमित्रिं रावणं वीक्ष्य मारुतिः ॥ १२ ॥
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना ।
तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्भुवि ॥ १३ ॥
आस्यैश्च नेत्रश्रवणैरूद्वमन् रुधिरं बहु ।
वेघूर्णमाननयनो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ १४ ॥
अथ लक्ष्मणमादाय हनूमान् रावणार्दितम् ।
से सुसज्जित एक दिव्य रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी-की ओर ही दौड़ा ॥ ३ ॥ उसने अपने सर्पके समान उग्र बाणोंसे बहुत-से वानरोंको मारकर सुग्रीव आदि यूथपतियोंको भी पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ४ ॥ फिर महापराक्रमी विभीषणको वहाँ गदा लिये खड़ा देख उसने उसकी ओर मयदानवकी दी हुई महान् शक्ति छोड़ी ॥ ५ ॥ उस शक्तिको विभीषणका नाश करनेके लिये बढ़ती देख 'रामने इसे अभय दिया है, यह असुरकुमार वध किये जानेयोग्य नहीं है' ऐसा कहते हुए महावीर्यवान् लक्ष्मणजी अपना प्रचण्ड धनुष लेकर विभीषणके आगे पर्वतके समान अचल होकर खड़े हो गये ॥ ६-७ ॥
उस शक्तिकी सामर्थ्य अमोघ (कभी व्यर्थ न जानेवाली) थी, अतः वह लक्ष्मणजीके शरीरमें घुस गयी। संसारमें मायासे जितनी शक्तियाँ उत्पन्न होतीं हैं महात्मा लक्ष्मणजी, उन सबके आधार भगवान् विष्णुके स्वरूप भूत शेषनागके अंशावतार हैं। उनका उस मायाशक्तिसे क्या बिगड़ सकता था ? ॥ ८-९ ॥ तथापि इस समय मनुष्यभाव अंगीकार करनेसे उसका अनुकरण करते हुए वे मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े। लक्ष्मणजीको ले जानेके लिये रावण उन्हें अपने हाथोंसे उठानेमें सफल न हुआ, अतः उसे बड़ा ही विस्मय हुआ। भला, जो सम्पूर्ण जगत्का सार परमेश्वर विराट् पुरुष है, उस निखिल लोकाधार विष्णुको एक क्षुद्र राक्षस कैसे उठा सकता था ?
जब हनुमान्जीने देखा कि रावण लक्ष्मणजीको ले जाना चाहता है तो उन्होंने अति क्रुद्ध होकर उसकी छातीमें एक वज्र-सदृश घूँसा मारा। उस घूँसेके आघातसे रावण घुटनोंके बल पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १०-१३ ॥ और अपने मुख, नेत्र और कानोंसे बहुत-सा रुधिर वमन करता हुआ घूमती हुई आँखोंसे रथके पिछले भागमें बैठ गया ॥ १४ ॥ तदनन्तर हनुमान्जी रावणद्वारा आहत लक्ष्मणजीको अपनी भुजाओंपर उठाकर श्रीरामचन्द्रजी-
सर्ग ६]
युद्धकाण्ड
२६१
आनयद्रामसामीप्यं बाहुभ्यां परिगृह्य तम् ॥१५॥
हनूमतः सुहृत्त्वेन भक्त्या च परमेश्वरः ।
लघुत्वमगमद्देवो गुरूणां गुरुरप्यजः ॥१६॥
सा शक्तिरपि तं त्यक्त्वा ज्ञात्वा नारायणांशजम् ।
रावणस्य रथं प्रागाद्रावणोऽपि शनैस्ततः ॥१७॥
संज्ञामवाप्य जग्राह चापासनमथो रुषा ।
राममेवाभिदुद्राव दृष्ट्वा रामोऽपि तं क्रुधा ॥१८॥
आरुह्य जगतां नाथो हनूमन्तं महाबलम् ।
रथस्थं रावणं दृष्ट्वा अभिदुद्राव राघवः ॥१९॥
ज्याशब्दमकरोत्तीव्रं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम् ।
रामो गम्भीरया वाचा राक्षसेन्द्रमुवाच ह ॥२०॥
राक्षसाधम तिष्ठाद्य क्व गमिष्यसि मे पुरः ।
कृत्वाऽपराधमेवं मे सर्वत्र समदर्शिनः ॥२१॥
येन बाणेन निहता राक्षसास्ते जनालये ।
तेनैव त्वां हनिष्यामि तिष्ठाद्य मम गोचरे ॥२२॥
श्रीरामस्य वचः श्रुत्वा रावणो मारुतात्मजम् ।
वहन्तं राघवं संख्ये शरैस्तीक्ष्णैरताडयत् ॥२३॥
हतस्यापि शरैस्तीक्ष्णैर्वायुसूनोः स्वतेजसा ।
व्यवधंत पुनस्तेजो ननर्द च महाकपिः ॥२४॥
ततो दृष्ट्वा हनूमन्तं सव्रणं रघूसत्तमः ।
क्रोधमाहारयामास कालरुद्र इवापरः ॥२५॥
साश्वं रथं ध्वजं सूतं शस्त्राैधं धनुरञ्जसा ।
छत्रं पताकां तरसा चिच्छेद शितसायकैः ॥२६॥
ततो महाशरेणाशु रावणं रघूसत्तमः ।
विव्याध वज्रकल्पेन पाकारिरिव पर्वतम् ॥२७॥
रामबाणहतो वीरश्चचाल च मुमोह च ।
के पास ले आये ॥ १५ ॥ हनुमान्जीके लिये, उनके सौहार्द और भक्तिभावके कारण वे अजन्मा और प्रकाश-स्वरूप परमेश्वर (लक्ष्मणजी) भारी-से-भारी होनेपर भी अत्यन्त लघु (हल्के) हो गये ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मण-जीको साक्षात् नारायणका अंश जानकर वह शक्ति भी उन्हें छोड़कर फिर रावणके रथपर चली गयी । इधर, रावणको भी जब धीरे-धीरे कुछ चेत हुआ तो उसने अत्यन्त क्रोधसे अपना धनुष उठाया और रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । उसे (अपनी ओर आता) देख जगत्पति भगवान् राम अति क्रुद्ध होकर महाबली हनुमान्जीके कन्धेपर चढ़े और रावणको रथमें बैठा देख उसकी ओर दौड़े ॥ १७-१९॥ भगवान् रामने अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका ऐसा कठोर शब्द किया जो मानो वज्र-को भी चूर्ण करनेवाला था, और फिर अति गम्भीर वाणीसे राक्षसराज रावणसे ऐसा कहा- ॥ २० ॥ "अरे राक्षसा-धम ! जरा ठहर तो, मुझ सर्वत्र समदर्शीका ऐसा अपराध करके तू कहाँ जा सकता है ? ॥ २१ ॥ अरे ! तू तनिक मेरे सामने खड़ा रह, जिस बाणसे मैंने जन-स्थानमें (खर-दूषणादिसे युद्ध करते समय) तेरे राक्षसोंको मारा था आज उसीसे तुझे भी मार डालूँगा" ॥ २२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर रावणने उन्हें वहन करनेवाले हनुमान्जीके बड़े तीखे बाण मारे ॥ २३ ॥ किन्तु उन तीक्ष्ण बाणोंके लगनेपर भी पवन-पुत्रका तेज अपने प्रभावसे बराबर बढ़ता ही गया और वे महान् कपीश्वर बड़े जोरसे गर्जने लगे ॥ २४ ॥ जब रघुनाथजीने हनुमान्जीको क्षत-विक्षत देखा तो दूसरे कालरुद्रके समान बड़ा भयंकर क्रोध धारण किया ॥ २५ ॥ और अपने तीक्ष्ण बाणोंसे बड़ी फुर्तीके साथ सुगमतासे ही रावणके घोड़ेसहित रथ, ध्वजा, सारथी, शस्त्रसमूह, धनुष, छत्र और पताका आदि काट डाले ॥ २६ ॥ फिर इन्द्रने जैसे पर्वतोंपर आक्रमण किया था वैसे ही उन्होंने एक वज्रतुल्य महाबाणसे रावणको वेध डाला ॥ २७ ॥ भगवान् रामका बाण लगने-से वह वीर विचलित हो गया, उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके हाथसे धनुष छूट गया ।
| २६२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग... |
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हस्तान्निपतितश्चापस्तं समीक्ष्य रघूत्तमः ॥२८॥
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद तत्किरीटं रविप्रभम् ।
अनुजानामि गच्छ त्वमिदानीं बाणपीडितः॥२९॥
प्रविश्य लङ्कामाश्वास्य श्वः पश्यसि बलं मम ।
उसकी ऐसी दशा देखकर रघुनाथजीने एक अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसका सूर्यसदृश प्रकाशमान मुकुट काट डाला और कहा—"रावण ! तुम मेरे बाणसे पीड़ित हो; अतः मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, इस समय तुम जाओ ॥२८-२९॥ आज लंकामें जाकर विश्राम करो, फिर कल मेरा पराक्रम देखना।"
रामबाणेन संविद्धो हतदर्पोऽथ रावणः ॥३०॥
महत्या लज्जया युक्तो लङ्कां प्राविशदातुरः ।
रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा मूर्च्छितं पतितं भुवि ॥३१॥
मानुषत्वमुपाश्रित्य लीलयानुशुशोच ह ।
ततः प्राह हनूमन्तं वत्स जीवय लक्ष्मणम् ॥३२॥
महौषधीः समानीय पूर्ववद्वानरानपि ।
तथेति राघवेणोक्तो जगामाशु महाकपिः ॥३३॥
हनूमान्वायुवेगेन क्षणात्तीर्त्वा महोदधिम् ।
एतस्मिन्नन्तरे चारा रावणाय न्यवेदयन् ॥३४॥
तब, श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे विद्ध होनेके कारण सारा दर्प चूर्ण हो जानेपर रावणने लज्जित और व्याकुल हो लंकामें प्रवेश किया। इधर रामचन्द्रजी भी लक्ष्मणजीको मूर्च्छित अवस्थामें पृथिवीपर पड़े देख मनुष्यभावका आश्रय ले लीलासे शोक करने लगे और हनुमान्जीसे बोले—"वत्स ! पहली तरह ही (द्रोणाचलसे) महौषधि लाकर लक्ष्मण और वानरोंको जीवित करो।" रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर महाकपि हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह एक क्षणमें ही महासागरको पारकर वायुवेगसे चले। इसी समय रावणके गुप्तचरोंने उससे कहा—॥३०-३४॥
रामेण प्रेषितो देव हनूमान् क्षीरसागरम् ।
गतो नेतुं लक्ष्मणस्य जीवनार्थं महौषधीः ॥३५॥
श्रुत्वा तच्चारवचनं राजा चिन्तापरोऽभवत् ।
जगाम रात्रावेकाकी कालनेमिगृहं क्षणात् ॥३६॥
"स्वामिन् ! रामने हनुमान्को क्षीर-समुद्रपर भेजा है और वह लक्ष्मणको जीवित करनेके लिये महौषधि लेने गया है" ॥३५॥ उनके ये वचन सुनकर राक्षसराज अति चिन्तातुर हुआ और उसी क्षण रात्रिमें ही अकेला कालनेमिके घर गया ॥३६॥
गृहागतं समालोक्य रावणं विस्मयान्वितः ।
कालनेमिरुवाचेदं प्राञ्जलिर्भयविह्वलः ।
अर्घ्यादिकं ततः कृत्वा रावणस्याग्रतः स्थितः॥३७॥
किं ते करोमि राजेन्द्र किमागमनकारणम् ।
कालनेमिमुवाचेदं रावणो दुःखपीडितः ॥३८॥
रावणको घर आया देख कालनेमिको बड़ा आश्चर्य हुआ; वह उसे अर्घ्यादि दे उसके सामने खड़ा हो गया और अति भयभीत हो हाथ जोड़कर बोला ॥३७॥ "राजराजेश्वर ! आज किस निमित्तसे आना हुआ ? कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" तब रावणने अति दुःखित होकर कालनेमिसे कहा ॥३८॥
ममापि कालवशतः कष्टमेतदुपस्थितम् ।
मया शक्त्या हतो वीरो लक्ष्मणः पतितो भुवि ॥३९॥
तं जीवयितुमानेतुमोषधीर्हनुमान् गतः ।
यथा तस्य भवेद्विघ्नं तथा कुरु महामते ॥४०॥
मायया मुनिवेषेण मोहयस्व महाकपिम् ।
कालात्ययो यथा भूयात्तथा कृत्वैहि मन्दिरे ॥४१॥
"आज कालक्रमसे मुझे भी यह कष्ट उपस्थित हो गया। मेरी शक्तिसे आहत होकर वीर लक्ष्मण पृथिवीपर गिर पड़ा है ॥३९॥ उसे जीवित करनेके लिये हनुमान् ओषधि लेने गया है। हे महामते ! तुम कोई ऐसा उपाय करो जिससे उसके लानेमें विघ्न खड़ा हो जाय ॥४०॥ तुम मायासे मुनि-वेष बनाकर हनुमान्को मोहित करो जिससे (उस ओषधिके प्रयोग-का) समय निकल जाय। यह कार्य करके फिर अपने घर लौट आना" ॥४१॥
सर्ग ६ ]
युद्धकाण्ड
२६३
| रावणस्य वचः श्रुत्वा कालनेमिरुवाच तम् ।<br>रावणेश वचो मेऽद्य शृणु धारय तत्त्वतः ॥४२॥ | रावणके वचन सुनकर कालनेमिने उससे कहा—<br>“महाराज रावण ! मेरी बात सुनिये और उसे यथार्थ समझकर धारण कीजिये॥ ४२॥ मैं आपका प्रिय करूँगा ही, |
| प्रियं ते करवाण्येव न प्राणान् धारयाम्यहम् ।<br>मारीचस्य यथाऽरण्ये पुराभून्मृगरूपिणः ॥४३॥<br>तथैव मे न सन्देहो भविष्यति दशानन ।<br>हताः पुत्राश्च पौत्राश्च बान्धवा राक्षसाश्च ते ॥४४॥ | उसके लिये मैं अपने प्राणोंकी परवा नहीं करता, (तथापि उससे क्या लाभ होगा ? ) हे दशानन ! इसमें सन्देह नहीं जो कुछ दण्डकारण्यमें मृगरूपधारी मारीचका हुआ था वही दशा मेरी भी होगी । देखिये, आपके पुत्र, पौत्र और अनेकों सगे-सम्बन्धी राक्षसलोग मारे गये ॥ ४३-४४॥ इस प्रकार राक्षस- |
| घातयित्वाऽसुरकुलं जीवितेनापि किं तव ।<br>राज्येन वा सीतया वा किं देहेन जडात्मना ॥४५॥ | वंशका नाश कराकर आपके जीवन, राज्य, सीता अथवा इस जड देहसे भी क्या लाभ है ? ॥ ४५ ॥ हे |
| सीतां प्रयच्छ रामाय राज्यं देहि विभीषणे ।<br>वनं याहि महाबाहो रम्यं मुनिगणाश्रयम् ॥४६॥ | महाबाहो ! आप रामचन्द्रजीको सीता और विभीषणको राज्य देकर मुनिगणसेवित सुरम्य तपोवनको जाइये |
| स्नात्वा प्रातः शुभजले कृत्वा सन्ध्यादिकाः क्रियाः | ॥ ४६ ॥ वहाँ प्रातःकाल शुद्ध जलमें स्नान कर तथा सन्ध्योपासनादि नित्य-कर्मोंसे निवृत्त हो एकान्त देशमें |
| तत एकान्तमाश्रित्य सुखासनपरिग्रहः ॥४७॥ | सुखमय आसनसे बैठिये ॥ ४७॥ और सब ओरसे |
| विसृज्य सर्वतः सङ्गामितरान्विषयान्वहिः ।<br>बहिःप्रवृत्ताक्षगणं शनैः प्रत्यक् प्रवाहय ॥४८॥ | निःसंग हो बाह्य विषयोंको छोड़ अपनी बाह्य वृत्तिवाली इन्द्रियोंको धीरे-धीरे अन्तर्मुख कीजिये ॥ ४८ ॥ हे |
| प्रकृतेर्भिन्नमात्मानं विचारय सदाऽनघ ।<br>चराचरं जगत्कृत्स्नं देहबुद्धीन्द्रियादिकम् ॥४९॥ | अनघ ! अपने आत्माको सदा प्रकृतिसे भिन्न विचारिये। देह, बुद्धि और इन्द्रियादिसे युक्त सम्पूर्ण चराचर जगत् अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब ( कीटविशेष ) पर्यन्त जो |
| आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं दृश्यते श्रूयते च यत् ।<br>सैषा प्रकृतिरित्युक्ता सैव मायेति कीर्तिता ॥५०॥ | कुछ दिखायी या सुनायी देता है वह सब प्रकृति है और वही माया भी कहलाती है ॥ ४९-५० ॥ वही |
| सर्गस्थितिविनाशानां जगद्वृक्षस्य कारणम् ।<br>लोहितश्वेतकृष्णादि प्रजाः सृजति सर्वदा ॥५१॥ | सर्वदा संसार-रूपी वृक्षकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशकी कारणरूप श्वेत (सात्त्विक) लोहित (राजस) और कृष्णवर्ण ( तामस ) प्रजा उत्पन्न करती है ॥५१ ॥ |
| कामक्रोधादिपुत्रांश्चाहिंसातृष्णादिकन्यकाः ।<br>मोहयन्त्यनिशं देवमात्मानं स्वैर्गुणैर्विभुम् ॥५२॥ | तथा वही अपने गुणोंसे अहर्निश सर्वव्यापक आत्मदेवको मोहित कर काम-क्रोधादि पुत्रों और हिंसा-तृष्णादि कन्याओंको उत्पन्न करती है ॥ ५२॥ वह कर्तृत्व |
| कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखान् स्वगुणानात्मनीश्वरे ।<br>आरोप्य स्ववशं कृत्वा तेन क्रीडति सर्वदा ॥५३॥ | और भोक्तृत्व आदि अपने गुणोंको अपने प्रभु आत्मामें आरोपित कर उसे अपने वशीभूत कर उससे सदा खेलती रहती है ॥ ५३ ॥ जिससे युक्त होकर |
| शुद्धोऽप्यात्मा यया युक्तः पश्यतीव सदा बहिः ।<br>विस्मृत्य च स्वमात्मानं मायागुणविमोहितः ॥५४॥ | आत्मा मायिक गुणोंसे मोहित होकर अपने स्वरूपको भूल जाता है, और नित्य-शुद्ध होता हुआ भी सदा बाह्य विषयोंको देखने लगता है ॥ ५४ ॥ जिस समय |
| यदा सद्गुरुणा युक्तो बोध्यते बोधरूपिणा । | सद्गुरुका साक्षात्कार होता है और वे इसे निर्मल ज्ञानदृष्टिसे जागृत करते हैं उस समय यह् बाह्य विषयों- |
| २६४ | अध्यात्मरामायण | [सर्गः ६] |
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[संस्कृत श्लोक]
निवृत्तदृष्टिरात्मानं पश्यत्येव सदा स्फुटम् ॥५५॥
जीवन्मुक्तः सदा देही मुच्यते प्राकृतैर्गुणैः ।
त्वमप्येवं सदात्मानं विचार्य नियतेन्द्रियः ॥५६॥
प्रकृतेरन्यमात्मानं ज्ञात्वा मुक्तो भविष्यसि ।
ध्यातुं यद्यसमर्थोऽसि सगुणं देवमाश्रय ॥५७॥
हृत्पद्मकर्णिके स्वर्णपीठे मणिगणान्विते ।
मृदुश्लक्ष्णतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् ॥५८॥
वीरासनं विशालाक्षं विद्युत्पुञ्जप्रभाम्बरम् ।
किरीटहारकेयूरकौस्तुभादिभिरन्वितम् ॥५९॥
नूपुरैः कटकैर्भाान्तं तथैव वनमालया ।
लक्ष्मणेन धनुर्द्वन्द्वकरेण परिसेवितम् ॥६०॥
एवं ध्यात्वा सदाऽऽत्मानं रामं सर्वहृदि स्थितम् ।
भक्त्या परमया युक्तो मुच्यते नात्र संशयः ॥६१॥
शृणु वै चरितं तस्य भक्तैर्नित्यमनन्यधीः ।
एवं चेत्कृतपूर्वाणि पापानि च महान्त्यपि ।
क्षणादेव विनश्यन्ति यथाऽग्नेस्तूलराशयः ॥६२॥
भजस्व रामं परिपूर्णमेकं
विहाय वैरं निजभक्तियुक्तः ।
हृदा सदा भावितभावरूप-
मनामरूपं पुरुषं पुराणम् ॥६३॥
[हिन्दी अनुवाद]
से अपनी दृष्टि हटाकर अपने आपको ही स्पष्ट देखता है ॥५५॥ और फिर यह देहधारी जीव जीवन्मुक्त होकर प्राकृत गुणोंसे छूट जाता है ।
हे रावण ! आप भी संयतेन्द्रिय होकर इसी प्रकार अपने वास्तविक आत्मस्वरूपका चिन्तन कीजिये ॥५६॥ इससे आत्माको प्रकृतिसे भिन्न जानकर आप मुक्त हो जायँगे । और यदि आप इस प्रकार ध्यान करनेमें असमर्थ हों तो सगुण भगवान्का आश्रय लीजिये ॥५७॥ (उस सगुण ध्यानकी विधि इस प्रकार है) हृदयकमलकी कर्णिकाओंगें मणिगणजटित अति मृदुल और स्वच्छ सुवर्ण-सिंहासनपर जो जानकीजीसहित विराजमान हैं, जो वीरासनसे बैठे हैं, जिनके नेत्र अति विशाल और वस्त्र विद्युल्लताके समान तेजोमय हैं तथा जो किरीट, हार, केयूर और कौस्तुभमणि आदि आभूषणोंसे सुशोभित हैं; नूपुर, कटक और वनमाला आदिसे जिनकी अपूर्व शोभा हो रही है तथा लक्ष्मणजी अपने हाथोंमें दो धनुष (एक अपना और एक प्रभु रामका) लिये जिनकी सेवामें खड़े हैं, उन सबके हृदयमें विराजमान अपने आत्मारूप भगवान् रामका इस प्रकार सर्वदा अत्यन्त भक्तिपूर्वक ध्यान करनेसे आप मुक्त हो जायँगे—इसमें सन्देह नहीं ॥५८-६१॥ नित्य अनन्यबुद्धि होकर उनके भक्तोंके मुखारविन्दसे उनके पवित्र चरित्र सुनिये । ऐसा करनेसे आपके पूर्वकृत महान् पाप भी एक क्षणमें ही इस प्रकार भस्म हो जायँगे जैसे अग्निसे रूईका ढेर भस्म हो जाता है ॥६२॥ जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं उन अद्वितीय भगवान् रामके साथ वैर छोड़कर आत्मप्रेम-पूर्वक उन नामरूपरहित पुराणपुरुषकी हृदयमें सगुण-भावसे भावना कर उनका सर्वदा भजन कीजिये”॥६३॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥