अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
युद्धकाण्ड - सर्ग ४: समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुक-संवाद
| २४८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सागरो विनयान्वितः ॥८३॥
नलः सेतुं करोत्वस्मिन् जले मे विश्वकर्मणः ।
सुतो धीमान् समर्थोऽस्मिन्कार्ये लब्धवरो हरिः॥८४॥
कीर्तिं जानन्तु ते लोकाः सर्वलोकमलापहाम् ।
इत्युक्त्वा राघवं नत्वा ययौ सिन्धुरदृश्यताम्॥८५॥
ततो रामस्तु सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
नलमाज्ञापयच्छीघ्रं वानरैः सेतुबन्धने ॥८६॥
ततोऽतिहृष्टः प्लवगेन्द्रयूथपै-
र्महानगेन्द्रप्रतिमैर्यतो नलः ।
बबन्ध सेतुं शतयोजनायतं
सुविस्तृतं पर्वतपादपैर्दृढम् ॥८७॥
॥ ८१-८३ ॥ "हे राम ! विश्वकर्माका पुत्र नल मेरे जलपर पुल निर्माण करे । वह चतुर वानर वरके प्रभावसे इस कार्यको करनेमें समर्थ है ॥ ८४ ॥ इससे सब लोग आपकी संसार-मलापहारिणी कीर्ति जान जायँगे ।" रघुनाथजीसे इस प्रकार कह समुद्र उन्हें प्रणाम कर अन्तर्धान हो गया ॥ ८५ ॥
तदनन्तर, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने नलको वानरोंकी सहायतासे तुरन्त पुल बाँधनेकी आज्ञा दी ॥ ८६ ॥ तब नलने, महापर्वतके समान अन्य वानरयूथपतियोंके साथ, अति प्रसन्नतापूर्वक पर्वत और वृक्षादिकोंसे एक सौ योजन लम्बा अति विस्तीर्ण और सुदृढ पुल बनाया ॥८७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुकसंवाद ।
श्रीमहादेव उवाच
सेतुमारभमाणस्तु तत्र रामेश्वरं शिवम् ।
संस्थाप्य पूजयित्वाऽऽह रामो लोकहिताय च ॥१॥
प्रणमेत्सेतुबन्धं यो दृष्ट्वा रामेश्वरं शिवम् ।
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते मदनुग्रहात् ॥ २ ॥
सेतुबन्धे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा रामेश्वरं हरम् ।
सङ्कल्पानियतो भूत्वा गत्वा वाराणसीं नरः॥ ३ ॥
आनीय गङ्गासलिलं रामेशमभिषिच्य च ।
समुद्रे क्षिप्ततद्भारो ब्रह्म प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ४ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! सेतुबन्धके आरम्भ होनेपर भगवान् रामने रामेश्वर महादेवकी स्थापना कर उनका पूजन करते हुए लोकहितके लिये इस प्रकार कहा—॥ १॥ "जो पुरुष रामेश्वर शिवका दर्शन कर सेतुबन्धको प्रणाम करेगा वह मेरी कृपासे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ २ ॥ यदि कोई पुरुष सेतुबन्धमें स्नान कर रामेश्वर महादेवके दर्शन करे और फिर संकल्पपूर्वक काशी जाकर वहाँ से गंगाजल लावे तथा उससे रामेश्वरका अभिषेक कर उस जलके पात्रको समुद्रमें डाल दे तो वह निःसन्देह ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है" ॥ ३-४ ॥
कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश ।
द्वितीयेन तथा चाह्ना योजनानि तु विंशतिः ॥ ५ ॥
तृतीयेन तथा चाह्ना योजनान्येकविंशतिः ।
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरिति श्रुतम् ॥ ६ ॥
पञ्चमेन त्रयोविंशद्योजनानि समन्ततः ।
बबन्ध सागरे सेतुं नलो वानरसत्तमः ॥ ७ ॥
तेनैव जग्मुः कपयो योजनानां शतं द्रुतम् ।
असङ्ख्याताः सुवेलाद्रिं रुरुधुः प्लवगोत्तमाः ॥ ८ ॥
सुना जाता है, वानरश्रेष्ठ नलने पहले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस योजन, तीसरे दिन इक्कीस योजन, चौथे दिन बाईस योजन और पाँचवें दिन तेईस योजन समुद्रपर पुल बाँधा ॥ ५-७ ॥ उसी पुलसे वानरगण तुरन्त ही सौ योजन समुद्रके उसपार चले गये । और फिर असंख्य वानरवीरोंने सुवेल-पर्वतको घेर लिया ॥ ८ ॥
सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २४९
आरुह्य मारुतिं रामो लक्ष्मणोऽप्यङ्गदं तथा।
दिदृक्षू राघवो लङ्कामारुरोहाचलं महत् ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा लङ्कां सुविस्तीर्णां नानाचित्रध्वजाकुलाम् ।
चित्रप्रासादसम्बाधां स्वर्णप्राकारतोरणाम् ॥ १० ॥
परिखाभिः शतघ्नीभिः सङ्क्रमैश्च विराजिताम् ।
प्रासादोपरि विस्तीर्णप्रदेशे दशकन्धरः ॥ ११ ॥
मन्त्रिभिः सहितो वीरैः किरीटदशकोज्ज्वलः।
नीलाद्रिशिखराकारः कालमेघसमप्रभः ॥ १२ ॥
रत्नदण्डैः सितच्छत्रैरनेकौः परिशोभितः ।
एतस्मिन्नन्तरे बद्धो मुक्तो रामेण वै शुकः ॥ १३ ॥
वानरैस्ताडितः सम्यक् दशाननमुपागतः ।
प्रहसन् रावणः प्राह पीडितः किं परैः शुक॥ १४ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा शुको वचनमब्रवीत् ।
सागरस्योत्तरे तीरेऽब्रुवं ते वचनं यथा ॥
तत उत्प्लुत्य कपयो गृहीत्वा मां क्षणात्ततः ॥ १५ ॥
मुष्टिभिर्नखदन्तैश्च हन्तुं लोप्तुं प्रचक्रमुः ।
ततो मां राम रक्षेति क्रोशन्तं रघुपुङ्गवः ॥ १६ ॥
विसृज्यतामिति प्राह विसृष्टोऽहं कपीश्वरैः।
ततोऽहमागतो भीत्या दृष्ट्वा तद्वानरं बलम् ॥ १७ ॥
राक्षसानां बलौघस्य वानरेन्द्रबलस्य च ।
नैतयोर्विद्यते सन्धिर्देवदानवयोरिव ॥ १८ ॥
पुरप्राकारमायान्ति क्षिप्रमेकतरं कुरु ।
सीतां वाऽस्मै प्रयच्छाशु युद्धं वा दीयतां प्रभो ॥ १९ ॥
मामाह रामस्त्वं ब्रूहि रावणं मद्वचः शुक ।
यद्बलं च समाश्रित्य सीतां मे हृतवानसि ॥ २० ॥
तद्दर्शय यथाकामं ससैन्यः सहवान्धवः ।
फिर, श्रीरामकी लंका देखनेकी इच्छा होनेपर रामचन्द्रजी हनुमान्के और लक्ष्मणजी अङ्गदके ऊपर बैठकर उस महान् पर्वतपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ उन्होंने देखा कि लङ्कापुरी अति विस्तीर्ण है। वह नाना प्रकारकी ध्वजाओं, विचित्र प्रासादों तथा सुवर्णनिर्मित परकोटों और तोरणोंसे सुसज्जित है ॥ १० ॥ वह (सब ओरसे) खाइयों, तोपों और संक्रमों (सुरंगों) से सुशोभित है। उसके एक राजभवनके ऊपर अति विस्तृत भागमें अपने वीर मन्त्रियोंके सहित रावण बैठा है। उसके शिरोंपर दश मुकुट सुशोभित हैं, वह नीलाचलके शिखरके समान आकारवाला एवं श्याम मेघकी-सी आभावाला है ॥ ११-१२ ॥ नाना प्रकारके रत्नदण्डयुक्त श्वेत छत्रोंसे उसकी अपूर्व शोभा हो रही है। इसी समय भगवान् रामद्वारा बाँधकर छोड़ा हुआ शुकनामक दैत्य वानरोंसे भली प्रकार मार खाकर रावणके पास पहुँचा। उसे देखकर रावणने हँसते हुए पूछा—"शुक ! क्या शत्रुओंने तुम्हें कुछ कष्ट पहुँचाया है ?" ॥ १३-१४ ॥
रावणके वचन सुनकर शुकने कहा—"समुद्रके उत्तरतटपर जाकर ज्यों ही मैं आपका सन्देश सुनाने लगा त्यों ही कुछ वानरोंने उछलकर मुझे तत्क्षण पकड़ लिया ॥ १५ ॥ और मुझे घूँसों, नखों एवं दाँतोंसे मारने तथा लुप्त करनेका आयोजन करने लगे। तब, 'हे राम ! मेरी रक्षा करो' इस प्रकार मुझे पुकारते सुन रघुश्रेष्ठ रामने कहा, "इसे छोड़दो।" इससे उन वानरोंने मुझे छोड़ दिया। तब मैं वानरोंकी सेना देखकर बड़ा डरता-डरता यहाँ आया हूँ ॥ १६-१७ ॥ मेरे विचारसे देव और दानवोंके समान राक्षसोंके दलबल और वानरोंकी सेनामें किसी प्रकार मेल नहीं हो सकता ॥ १८ ॥ हे प्रभो ! वे शीघ्र ही नगरके परकोटपर आनेवाले हैं, आप दोनोंमेंसे कोई एक काम कीजिये—या तो उन्हें सीता दे दीजिये और या उनके साथ युद्ध कीजिये ॥ १९ ॥ रामने मुझसे कहा है कि 'शुक ! रावणसे मेरी ओरसे कहना कि जिस शक्तिके भरोसे तुमने हमारी जानकीको हरा है उसे भली प्रकार अपनी सेना और बन्धु-बान्धवोंके सहित मुझे दिखलाना। तू कल ही प्रकार और
२५० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ४ ]
श्वःकाले नगरीं लङ्कां सप्राकारां सतोरणाम् ॥२१॥
राक्षसं च बलं पश्य शरैर्विध्वंसितं मया ।
घोररोषमहं मोक्ष्ये बलं धारय रावण ॥२२॥
इत्युक्त्वोपररामाथ रामः कमलोचनः ।
एकस्थानगता यत्र चत्वारः पुरुषर्षभाः ॥२३॥
श्रीरामो लक्ष्मणश्चैव सुग्रीवश्च विभीषणः ।
एत एव समर्थास्ते लङ्कां नाशयितुं प्रभो ॥२४॥
उत्पाट्य भस्मीकरणे सर्वे तिष्ठन्तु वानराः ।
तस्य यादृग् बलं दृष्टं रूपं प्रहरणानि च ॥२५॥
वधिष्यति पुरं सर्वमेकास्तिष्ठन्तु ते त्रयः ।
पश्य वानरसेनां तामसङ्ख्यातां प्रपूरिताम् ॥२६॥
गर्जन्ति वानरास्तत्र पश्य पर्वतसन्निभाः ।
न शक्यास्ते गणयितुं प्राधान्येन ब्रवीमि ते॥२७॥
एष योऽभिमुखो लङ्कां नदंस्तिष्ठति वानरः ।
यूथपानां सहस्राणां शतेन परिवारितः ॥२८॥
सुग्रीवसेनाधिपतिर्नीलो नामाग्निनन्दनः ।
एष पर्वतशृङ्गाभः पद्मकिञ्जल्कसन्निभः ॥२९॥
स्फोटयत्यभिसंरब्धो लाङ्गूलं च पुनः पुनः ।
युवराजोऽङ्गदो नाम वालिपुत्रोऽतिवीर्यवान् ॥३०॥
येन दृष्टा जनकजा रामस्यातीववल्लभा ।
हनूमानेष विख्यातो हतो येन तवात्मजः ॥३१॥
श्वेतो रजतसङ्काशो महाबुद्धिपराक्रमः ।
तूर्णं सुग्रीवमागम्य पुनर्गच्छति वानरः ॥३२॥
यस्त्वेष सिंहसङ्काशः पश्यत्यतुलविक्रमः ।
रम्भो नाम महासत्त्वो लङ्कां नाशयितुं क्षमः ॥३३॥
एष पश्यति वै लङ्कां दिधक्षन्निव वानरः ।
शरभो नाम राजेन्द्र कोटियूथपनायकः ॥३४॥
पनसश्च महावीर्यो मैन्दश्च द्विविदस्तथा ।
नलश्च सेतुकर्ताऽसौ विश्वकर्मसुतो बली ॥३५॥
तोरणादिके सहित लंकापुरी और राक्षसोंकी सेनाको मेरे बाणोंसे विध्वस्त हुई देखेगा। रावण! उस समय मैं भयंकर क्रोध छोड़ूँगा, तू अपने वलको स्थिर रखना' ॥२०–२२॥ ऐसा कहकर कमलनयन भगवान् राम चुप हो गये।
'हे प्रभो! और सब वानर एक ओर रहें तो भी, एक साथ मिल जानेपर, लंकाको जड़से उखाड़कर उसे भस्म और नष्ट करनेमें तो राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण ये चार पुरुषश्रेष्ठ ही पर्याप्त हैं। और मैंने, जैसे उनके बल, रूप और अस्त्र-शस्त्रादि देखे हैं उससे तो यही मालूम होता है कि और तीनों अन्यत्र रहें, अकेले राम ही समस्त नगर-को नष्ट कर सकते हैं। अब, सब ओर फैली हुई वानरोंकी उस असंख्य सेनाको देखिये ॥२३–२६॥ देखिये, ये पर्वतसदृश वानर वीर कैसे गर्ज रहे हैं। इन्हें गिना नहीं जा सकता, इसलिये मैं आपको इनमेंसे प्रधान-प्रधान बतलाता हूँ ॥२७॥ यह वानर, जो लंकाकी ओर देखकर बारम्बार गर्ज रहा है और एक लाख यूथपतियोंसे घिरा हुआ है, वानरराज सुग्रीवका सेनापति अग्निनन्दन 'नील' है। जो कमल-केशरकी-सी आभावाला तथा पर्वत-शिखरके समान विशालकाय है एवं रोषपूर्वक बारम्बार अपनी पूँछ पटक रहा है वह अति वीर्यवान् वालिपुत्र युवराज 'अंगद' है ॥ २८–३० ॥ जिसने रामकी अत्यन्त प्रिया जनक-नन्दिनी सीताको देखा और आपके पुत्रका वध किया, यह वही विख्यात वीर 'हनुमान्' है ॥ ३१ ॥ जिसकी कान्ति चाँदी-के समान शुक्ल वर्ण है, जो बड़ी शीघ्रतासे सुग्रीवके पास आकर फिर लौट जाता है तथा जो महाबुद्धिमान् पुरुषार्थी और सिंहके समान अतुलित पराक्रमी वानर इधर देख रहा है वह 'रम्भ' है। लंकाको नष्ट करनेमें यह अकेला ही समर्थ है ॥ ३२–३३ ॥ हे राजेश्वर ! यह दूसरा वानर, जो लंकाकी ओर इस प्रकार देखता है मानो जला ही डालेगा, करोड़ यूथपतियोंका नायक 'शरभ' है ॥ ३४ ॥ इनके अतिरिक्त महापराक्रमी पनस, मैन्द, द्विविद और सेतु बाँधनेवाला विश्वकर्माका पुत्र महा-बली नल—ये सब भी प्रधान-प्रधान योद्धा हैं ॥३५॥
सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २५१
वानराणां वर्णने वा सङ्ख्याने वा क ईश्वरः ।
शूराः सर्वे महाकायाः सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥३६॥
शक्ताः सर्वे चूर्णयितुं लङ्कां रक्षोगणैः सह ।
एतेषां बलसङ्ख्यानं प्रत्येकं वच्मि ते शृणु ॥३७॥
एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च ।
तथा शङ्खसहस्राणि तथार्बुदशतानि च ॥३८॥
सुग्रीवसचिवानां ते बलमेतत्प्रकीर्तितम् ।
अन्येषां तु बलं नाहं वक्तुं शक्तोऽस्मि रावण ॥३९॥
रामो न मानुषः साक्षादादिनारायणः परः ।
सीता साक्षाज्जगद्धेतुश्चिच्छक्तिर्जगदात्मिका ॥४०॥
ताभ्यामेव समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
तस्माद्रामश्च सीता च जगतस्तस्थुषश्च तौ ॥४१॥
पितरौ पृथिवीपाल तयोर्वैरी कथं भवेत् ।
अज्ञानता त्वयाऽऽनीता जगन्मातैव जानकी ॥४२॥
क्षणनाशिनि संसारे शरीरे क्षणभङ्गुंरे ।
पञ्चभूतात्मके राजंश्चतुर्विंशतितत्त्वके ॥४३॥
मलमांसास्थिदुर्गन्धभूयिष्ठेऽहङ्कृतालये ।
कैवास्था व्यतिरिक्तस्य काये तव जडात्मके ॥४४॥
यत्कृते ब्रह्महत्यादिपातकानि कृतानि ते ।
भोगभोक्ता तु यो देहः स देहोऽत्र पतिष्यति ॥४५॥
पुण्यपापे समायातो जीवेन सुखदुःखयोः ।
कारणे देहयोगादिनाऽऽत्मनः कुरुतोऽनिशम् ॥४६॥
यावद्देहोऽस्मि कर्तास्मीत्यात्माऽहङ्कुरुतेऽवशः ।
अध्यासात्तावदेव स्याज्जन्मनाशादिसम्भवः ॥४७॥
इन वानरोंका वर्णन करने और गिननेकी सामर्थ्य किसमें है। ये सभी बड़े शूरवीर, विशालकाय और युद्धके लिये उत्सुक हैं ॥३६॥ राक्षसोंके सहित लंकाको चूर्ण करनेमें ये सभी समर्थ हैं। अब मैं इनमेंसे प्रत्येककी सेनाकी संख्या बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३७ ॥ इनमेंसे प्रत्येकके नीचे इक्कीस हजार करोड़, हजारों शंख और सैकड़ों अरब सेना है॥३८॥
"हे रावण ! यह तो मैंने सुग्रीवके मन्त्रियोंकी ही सेना बतायी है; उनके अतिरिक्त औरोंकी सेना गिनानेमें तो मैं सर्वथा असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥ राम भी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात् आदिनारायण परमात्मा हैं; और सीताजी जगत्की कारणरूपा साक्षात् जगद्रूपिणी चित्-शक्ति हैं ॥ ४० ॥ इन दोनोंसे ही समस्त स्थावर-जंगम संसार उत्पन्न हुआ है, अतः राम और सीता स्थावर-जंगम जगत्के माता-पिता हैं। हे पृथिवीपते ! सोचो तो, उनका वैरी कोई कैसे हो सकता है ? आप जिस जानकीको अनजानमें ले आये हैं वह साक्षात् जगन्माता ही हैं ॥४१-४२॥ हे राजन् ! क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले संसारमें चौबीस तत्त्वों*के समूहरूप इस क्षणभंगुर पाञ्चभौतिक शरीरमें जिसमें मल, मांस, अस्थि आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोंकी ही अधिकता है और जो अहंकारका आश्रय-स्थान तथा जडरूप है आप क्या आस्था करते हैं ? आप तो इससे सर्वथा पृथक् हैं ॥ ४३-४४॥ हाय ! जिस शरीरके लिये आपने ब्रह्महत्यादि अनेकों पाप किये हैं, सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता वह शरीर तो यहीं पड़ा रह जायगा ! ॥ ४५ ॥ सुख-दुःखके कारणरूप (पूर्वजन्मकृत) पाप-पुण्य जीवके साथ ही आते हैं और वे ही देह-सम्बन्ध आदिके द्वारा जीवको अहर्निश सुख-दुःखकी प्राप्ति कराते हैं ॥ ४६ ॥ जबतक अज्ञानजन्य अध्यासके कारण जीव 'मैं देह हूँ, मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा अभिमान करता है तभीतक उसे विवश होकर जन्म-मृत्यु आदि भोगने पड़ते हैं
* प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पञ्चभूत और शब्द-स्पर्शा आदि उनके पाँच विषय—ये सब मिलाकर चौबीस तत्त्व कहलाते हैं ।
२५२ अध्यात्मरामायण [सर्ग ४
तस्मात्त्वं त्यज देहादावभिमानं महामते ।
आत्माऽतिनिर्मलः शुद्धो विज्ञानात्माऽचलोऽव्ययः
स्वाज्ञानवशतो बन्धं प्रतिपद्य विमुह्यति ।
तस्मात्त्वं शुद्धभावेन ज्ञात्वाऽऽत्मानं सदा स्मर ॥४९॥
विरतिं भज सर्वत्र पुत्रदारगृहादिषु ।
निरयेष्वपि भोगः स्याच्छ्वशूकरतनावपि ॥५०॥
देहं लब्ध्वा विवेकाढ्यं द्विजत्वं च विशेषतः ।
तत्रापि भारते वर्षे कर्मभूमौ सुदुर्लभम् ॥५१॥
को विद्वानात्मसात्कृत्वा देहं भोगानुगो भवेत् ।
अतस्त्वं ब्राह्मणो भूत्वा पौलस्त्यतनयश्च सन् ॥५२॥
अज्ञानीव सदा भोगाननुधावसि किं मुधा ।
इतः परं वा त्यक्त्वा त्वं सर्वसङ्गं समाश्रय ॥५३॥
राममेव परात्मानं भक्तिभावेन सर्वदा ।
सीतां समर्प्य रामाय तत्पादानुचरो भव ॥५४॥
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं प्रयास्यसि ।
नो चेद्गमिष्यसेऽधोऽधः पुनरावृत्तिवर्जितः ।
अङ्गीकुरुष्व मद्वाक्यं हितमेव वदामि ते ॥५५॥
सत्सङ्गतिं कुरु भजस्व हरिं शरण्यं
श्रीराघवं मरकतोपलकान्तिकान्तम् ।
सीतासमेतमनिशं धृतचापबाणं
सुग्रीवलक्ष्मणविभीषणसेविताङ्घ्रिम् ॥५६॥
अर्थ / हिन्दी टीका:
॥ ४७ ॥ अतः हे महामते ! आप देह आदिमें अभिमान छोड़िये । आत्मा तो अत्यन्त निर्मल, शुद्धस्वरूप, विज्ञानमय, अविचल और अविकारी है ॥ ४८ ॥ अपने अज्ञानके कारण ही वह बन्धनमें पड़कर मोहको प्राप्त होता है । अतः आप आत्माको शुद्ध भावसे जानकर नित्य उसीका स्मरण कीजिये ॥ ४९ ॥ पुत्र, स्त्री और गृह आदि सभीसे उपराम हो जाइये क्योंकि भोग तो कुत्ते और शूक्रादिकी योनिमें तथा नरकादिमें भी मिल सकते हैं ॥ ५० ॥ सदसद्विवेक-बुद्धिसे युक्त मनुष्य-शरीर पाकर, उसमें भी विशेषतः द्विजत्व पाकर और अति दुर्लभ कर्मभूमि भारतवर्षमें जन्म ग्रहण कर, ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो देहमें आत्मबुद्धि कर भोगोंका सेवन करेगा ?
"अतः आप ब्राह्मण-शरीर और सो भी पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाके पुत्र होकर अज्ञानीके समान सदा ही इन भोगोंकी ओर व्यर्थ क्यों दौड़ते हैं ? आजसे आप सब प्रकारका संग छोड़कर अति भक्तिभावसे सदा परमात्मा रामका ही आश्रय लीजिये और श्रीसीताजीको भगवान् रामके अर्पण कर उनके चरणकमलोंकी सेवा कीजिये ॥ ५१–५४ ॥ यदि आप ऐसा करेंगे तो सब पापोंसे छूटकर विष्णुलोक प्राप्त करेंगे, नहीं तो पुनः ऊपर लौटनेसे वञ्चित रहकर उत्तरोत्तर नीचेके लोकोंमें ही जाते रहेंगे । मैं आपके हितकी ही बात कहता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये ॥ ५५ ॥ हे रावण ! आप अहर्निश सत्संग कीजिये और जिनके शरीरकी कान्ति मरकतमणिके समान है तथा सुग्रीव, लक्ष्मण और विभीषण जिनके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे हैं उन शरणागतवत्सल, धनुर्बाणधारी श्रीरघुनाथजीका सीताजीके सहित भजन कीजिये” ॥ ५६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥