अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
बालकाण्ड - सर्ग ३: भगवान्का जन्म और बाल-लीला
| १२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
ब्रह्मोवाच
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| विष्णुर्मानुषरूपेण भविष्यति रघोः कुले ॥२९॥<br>यूयं सृजध्वं सर्वेऽपि वानरेष्वंशसम्भवान् ।<br>विष्णोः सहायं कुरुतं यावत्स्थास्यति भूतले ॥३०॥ | ब्रह्माजी बोले—भगवान् विष्णु रघुकुलमें मनुष्य-रूपसे अवतार लेंगे। तुम लोग भी सब अपने-अपने अंशसे वानर-वंशमें पुत्र उत्पन्न करो तथा जबतक श्रीविष्णु भगवान् भूलोकमें रहें तबतक उनकी सहायता करते रहो ॥ २९-३० ॥ |
| इति देवान्समादिश्य समाश्वास्य च मेदिनीम्।<br>ययौ ब्रह्मा स्वभवनं विज्वरः सुखमास्थितः ॥३१॥ | इस प्रकार देवताओंको आज्ञा दे और पृथिवीको ढाढ़स बँधा ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये और वहाँ निश्चिन्त होकर सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ३१ ॥ |
| देवाश्च सर्वे हरिरूपधारिणः<br>स्थिताः सहायार्थमितस्ततो हरेः ।<br>महाबलाः पर्वतवृक्षयोधिनः<br>प्रतीक्षमाणा भगवन्तमिश्वरम् ॥३२॥ | इधर समस्त देवगण पर्वत और वृक्षोंसे लड़नेवाले महाबलवान् वानरोंका रूप धारण कर भगवान्की सहायताके लिये उनकी प्रतीक्षा करते हुए जहाँ-तहाँ रहने लगे ॥ ३२ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
बालकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीय सर्ग
भगवान्का जन्म और बाललीला
श्रीमहादेव उवाच
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अथ राजा दशरथः श्रीमान्सत्यपरायणः ।<br>अयोध्यापतिर्वीरः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥ १॥<br>सोऽनपत्यत्वदुःखेन पीडितो गुरुमेकदा ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमभिवाद्येदमब्रवीत् ॥ २॥ | श्रीमहादेवजी बोले—एक बार सबलोकप्रसिद्ध सत्यपरायण श्रीमान् अयोध्यापति वीरवर महाराज दशरथने पुत्रके न होनेसे अत्यन्त दुःखित हो अपने कुलके आचार्य गुरुवर वशिष्ठजीको बुला उन्हें प्रणाम कर इस प्रकार कहा ॥ १-२ ॥ |
| स्वामिन्पुत्राः कथं मे स्युः सर्वलक्षणलक्षिताः ।<br>पुत्रहीनस्य मे राज्यं सर्वं दुःखाय कल्पते ॥ ३॥ | "स्वामिन् ! यह बताइये कि मेरे सर्व सुलक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र किस प्रकार हो सकते हैं ? क्योंकि बिना पुत्रके यह सम्पूर्ण राज्य मुझे दुःखरूप हो रहा है" ॥ ३ ॥ |
| ततोऽब्रवीद्वसिष्ठस्तं भविष्यन्ति सुतास्तव ।<br>चत्वारः सत्त्वसम्पन्ना लोकपाला इवापराः ॥ ४॥ | तब राजा दशरथसे वशिष्ठजीने कहा—"तुम्हारे साक्षात् दूसरे लोकपालोंके समान अत्यन्त सामर्थ्यवान् चार पुत्र होंगे ॥ ४ ॥ |
| शान्ताभर्तारमानीय ऋष्यशृङ्गं तपोधनम् ।<br>अस्माभिः सहितः पुत्रकामेष्टिं शीघ्रमाचर ॥ ५॥ | तुम शान्ताके पति तपोधन ऋष्यशृंग※ को बुलाकर शीघ्र ही हमें साथ लेकर पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान करो" ॥ ५ ॥ |
※ ऋष्यशृंग मुनिवर विभाण्डकके पुत्र थे । एक बार विभाण्डक मुनि एक कुण्डमें समाधि लगाये बैठे थे, उस समय उधरसे उर्वशी अप्सरा निकली । उसे देखकर मुनिका वीर्य स्खलित हो गया । उसे जलके साथ एक मृगी पी गयी । उसीसे इनका जन्म हुआ । माताके समान इनके शिरपर भी शृङ्ग (सींग) होनेकी सम्भावना थी, इसलिये पिता विभाण्डकने इनका नाम ऋष्यशृङ्ग रखा । एक बार अङ्ग देशमें घोर अनावृष्टि हुई । उस संबंध...
सर्ग ३ ]
बालकाण्ड
१३
तथेति मुनिनानीय मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।
यज्ञकर्म समारेभे मुनिभिर्वीतकल्मषैः ॥ ६ ॥
श्रद्धया हूयमानेऽग्नौ तप्तजाम्बूनदप्रभः।
पायसं स्वर्णपात्रस्थं गृहीत्वोवाच हव्यवाट् ॥ ७ ॥
गृहाण पायसं दिव्यं पुत्रियं देवनिर्मितम् ।
लप्स्यसे परमात्मानं पुत्रत्वेन न संशयः ॥ ८ ॥
इत्युक्त्वा पायसं दत्त्वा राज्ञे सोऽन्तर्दधेऽनलः।
ववन्दे मुनिशार्दूलौ राजा लब्धमनोरथः ॥ ९ ॥
वसिष्ठऋष्यशृङ्गाभ्यामनुज्ञातो ददौ हविः ।
कौसल्यायै सकैकैय्यै अर्धमर्धं प्रयत्नतः ॥ १० ॥
ततः सुमित्रा संप्राप्ता जगृध्नुः पौत्रिकं चरुम् ।
कौसल्या तु स्वभागार्धं ददौ तस्यै मुदान्विता ॥ ११ ॥
कैकैयी च स्वभागार्धं ददौ प्रीतिसमन्विता ।
उपभुज्य चरुं सर्वाः स्त्रियो गर्भसमन्विताः ॥ १२ ॥
देवता इव रेजुस्ताः स्वभासा राजमन्दिरे ।
दशमे मासि कौसल्या सुषुवे पुत्रमद्भुतम् ॥ १३ ॥
मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे शुभे ।
पुनर्वस्वृक्षसहिते उच्चस्थे ग्रहपञ्चके ॥ १४ ॥
मेषं पूषणि संप्राप्ते पुष्पवृष्टिसमाकुले ।
आविरासीज्जगन्नाथः परमात्मा सनातनः ॥ १५ ॥
नीलोत्पलदलश्यामः पीतवासाश्चतुर्भुजः ।
जलजारुणनेत्रान्तः स्फुरत्कुण्डलमण्डितः ॥ १६ ॥
राजाने "बहुत अच्छा" कह मुनिवर ऋष्यशृंगको बुलाया और मन्त्रियोंके सहित पवित्र होकर निष्पाप मुनिजनोंकी सहायतासे यज्ञानुष्ठानं आरंभ किया ॥ ६ ॥ यज्ञानुष्ठानके समय अग्निमें श्रद्धापूर्वक आहुति देनेपर तप्त सुवर्णके समान दीप्तिमान् हव्यवाहन भगवान् अग्नि एक स्वर्णपात्रमें पायस लेकर प्रकट हुए और बोले ॥ ७ ॥ "हे राजन् ! यह देवताओंकी बनायी हुई पुत्र-प्रदायिनी दिव्य पायस (खीर) लो । इसके द्वारा तुम निस्सन्देह साक्षात् परमात्माको पुत्ररूपसे प्राप्त करोगे" ॥ ८ ॥
अग्निदेव ऐसा कहकर और वह खीर राजाको देकर अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर राजाने सफल-मनोरथ हो मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ और ऋष्यशृङ्गकी चरण-वन्दना की और उन दोनोंकी आज्ञासे बड़ी सावधानीके साथ वह हवि महारानी कौसल्या और कैकेयीमें आधी-आधी बाँट दी ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर उस पुत्र देनेवाले चरुको लेनेकी इच्छासे सुमित्राजी भी वहाँ आ पहुँचीं । इसपर कौसल्याजीने प्रसन्नतापूर्वक अपने भागमेंसे आधा उन्हें दे दिया ॥ ११॥ तथा कैकेयीने भी प्रीतिपूर्वक अपने भागमेंसे आधा सुमित्राको दिया । इस प्रकार उस हविको खाकर सभी रानियाँ गर्भवती हो गयीं ॥ १२ ॥
वे तीनों रानियाँ उस राजभवनमें अपनी कान्तिसे देवताओंके समान शोभा पाने लगीं । फिर दशवाँ महीना लगनेपर कौसल्याने एक अद्भुत बालकको जन्म दिया ॥ १३ ॥ चैत्रमासके शुक्ल-पक्षकी नवमीके दिन कर्क-लग्नमें पुनर्वसु-नक्षत्रके समय जब कि पाँच ग्रह उच्च स्थानमें तथा सूर्य मेषराशिपर थे तब (मध्याह्न-कालमें) सनातन परमात्मा जगन्नाथका आविर्भाव हुआ । उस समय आकाश दिव्य पुष्पोंकी वर्षासे पूर्ण हो गया ॥ १४-१५॥ जो नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण हैं, पीताम्बर पहिने हुए हैं और चार भुजाएँ धारण किये हैं तथा जिनके नेत्रोंके भीतरका भाग अरुण
मुनियोंने अङ्गनरेश रोमपादसे कहा, यदि बाल्यब्रह्मचारी ऋष्यशृङ्गको यहाँ स्त्रियाँ लावें तो वृष्टि हो । राजाने इसके लिये वेश्याओंको नियुक्त किया । उनमेंसे एक ब्रह्मचारीका वेष बनाकर उन्हें मोहित कर ले आयी । उनके अङ्गदेशमें आते ही पुष्कल वर्षा हो गयी । राजाने उनका ऐसा अद्भुत प्रभाव देखकर उन्हें अपनी कन्या शान्ता विवाह दीं । कहीं-कहीं ऐसा भी कहा जाता है कि यह शान्ता महाराज दशरथकी पुत्री थी और इन्होंने इसे अपने मित्र रोमपादको गोद दे दिया था ।
१० १४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ३
सहस्रार्कप्रतीकाशः किरीटी कुञ्चितालकः ।
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविराजितः ॥१७॥
अनुग्रहाख्यहृत्स्थेन्दुसूचकस्मितचन्द्रिकः ।
करुणारससम्पूर्णविशालोत्पललोचनः ।
श्रीवत्सहारकेयूरनूपुरादिविभूषणः ॥१८॥
दृष्ट्वा तं परमात्मानं कौसल्या विस्मयाकुला ।
हर्षाश्रुपूर्णनयना नत्वा प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥१९॥
कौसल्योवाच
देवदेव नमस्तेऽस्तु शङ्खचक्रगदाधर ।
परमात्माऽच्युतोऽनन्तः पूर्णस्त्वं पुरुषोत्तमः॥२०॥
वदन्त्यगोचरं वाचां बुद्ध्यादीनामतीन्द्रियम् ।
त्वां वेदवादिनः सत्तामात्रं ज्ञानैकविग्रहम् ॥२१॥
त्वमेव मायया विश्वं सृजस्यवसि हंसि च ।
सत्त्वादिगुणसंयुक्तस्तुर्य एवामलः सदा ॥२२॥
करोषीव न कर्ता त्वं गच्छसीव न गच्छसि ।
शृणोषि न शृणोषीव पश्यसीव न पश्यसि ॥२३॥
अप्राणो ह्यमनाः शुद्ध इत्यादि श्रुतिरब्रवीत् ।
समः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्नपि न लक्ष्यसे ॥२४॥
अज्ञानध्वान्तचित्तानां व्यक्त एव सुमेधसाम् ।
जठरे तव दृश्यन्ते ब्रह्माण्डाः परमाणवः ॥२५॥
त्वं ममोदरसम्भूत इति लोकान्विडम्बसे ।
भक्तेषु पारवश्यं ते दृष्टं मेऽद्य रघूत्तम ॥२६॥
संसारसागरे मग्ना पतिपुत्रधनादिषु ।
भ्रमामि मायया तेऽद्य पादमूलमुपागता ॥२७॥
कमलके समान शोभायमान है, कानोंमें कान्तिमान् कुण्डल सुशोभित हैं ॥ १६ ॥ हजारों सूर्योंके समान जिनका प्रकाश है, जिनके शिरपर प्रकाशमान मुकुट और घुँघराली अलकें हैं, हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म तथा गलेमें वैजयन्ती-माला विराजमान है ॥ १७ ॥ जिनके मुख-कमलपर हृदयस्थ अनुग्रहरूप चन्द्रमाकी सूचना देनेवाली मुस्कानरूप चन्द्रिका छिटक रही है, जिनके करुणा-रस-पूर्ण नयन कमलदलके समान विशाल हैं तथा जो श्रीवत्स, हार, केयूर और नूपुर आदि आभूषणोंसे विभूषित हैं ॥ १८ ॥ पुत्ररूपसे प्रकट हुए उन परमात्माको देखकर कौसल्याने विस्मयसे व्याकुल हो, नेत्रोंमें आनन्दाश्रु-भर, हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा ॥१९॥
श्रीकौसल्याजी बोलीं— हे देवदेव ! आपको नमस्कार है; हे शंख-चक्र-गदा-धर ! आप अच्युत और अनन्त परमात्मा हैं तथा सर्वत्र पूर्ण पुरुषोत्तम हैं ॥२०॥ वेदवादीगण आपको मन और वाणी आदिके अविषय तथा इन्द्रियोंसे अतीत सत्तामात्र और एकमात्र ज्ञान-स्वरूप बतलाते हैं ॥ २१ ॥ आप ही अपनी मायाके आश्रयसे सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे युक्त होकर इस विश्वकी रचना, पालन और संहार करते हैं तथापि वास्तवमें आप सदा निर्मल तुरीय पदमें स्थित हैं ॥ २२ ॥ आप कर्त्ता नहीं हैं तथापि करते-से प्रतीत होते हैं; चलते नहीं हैं फिर भी चलते-से मालूम पड़ते हैं, न सुनते हुए भी सुनते-से दिखायी देते हैं और न देखकर भी देखते हुए-से प्रतीत होते हैं ॥२३॥ भगवती श्रुति भी कहती है कि आप 'प्राण और मनसे रहित तथा शुद्ध' हैं। आप समस्त प्राणियोंमें समान-भावसे स्थित हैं, तथापि जिनका अन्तःकरण अज्ञानान्धकारसे ढँका हुआ है उन्हें आप दिखायी नहीं देते, आपका साक्षात्कार सुबुद्धि पुरुषोंको ही होता है । हे भगवन् ! आपके उदरमें अनेकों ब्रह्माण्ड परमाणुओंके समान दिखलायी देते हैं तथापि 'आपने मेरे पेटसे जन्म लिया' ऐसा जो आप लोगोंमें प्रकट कर रहे हैं इससे मैंने आज आपकी भक्त-वत्सलता देख ली ॥ २४–२६ ॥ हे प्रभो ! मैं आपकी मायासे मोहित होकर संसार-सागरमें डूबी हुई पति, पुत्र और धन आदिके फेरमें पड़ रही थी; आज परम सौभाग्यवश आपके चरण-कमलोंकी शरणमें आयी हूँ ॥ २७ ॥ हे देव !
सर्ग ३ ] । बालकाण्ड । १५
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देव त्वद्रूपमेतन्मे सदा तिष्ठतु मानसे।<br>आवृणोतु न मां माया तव विश्वविमोहिनी ॥२८॥ | आपकी यह मनोहर मूर्ति सदा मेरे हृदयमें विराजमान रहे और आपकी विश्व-विमोहिनी माया मुझे न व्यापे ॥२८॥ |
| उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम् ।<br>दर्शयस्व महानन्द बालभावं सुकोमलम् ॥<br>ललितालिङ्गनालापैस्तरिष्याम्युत्कटं तमः ॥२९॥ | हे विश्वात्मन् ! अपने इस अलौकिक रूपका उपसंहार कीजिये और परम आनन्ददायक सुकोमल बालरूप धारण कीजिये जिसके अति सुखद आलिंगन और सम्भाषणादिसे मैं घोर अज्ञानान्धकारको पार कर जाऊँगी ॥ २९ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>यद्यदिष्टं तवास्त्यम्ब तत्तद्भवतु नान्यथा ॥३०॥<br>अहं तु ब्रह्मणा पूर्वं भूमेर्भारापनुत्तये ।<br>प्रार्थितो रावणं हन्तुं मानुषत्वमुपागतः ॥३१॥<br>त्वया दशरथेनाहं तपसाऽऽराधितः पुरा ।<br>मत्पुत्रत्वाभिकाङ्क्षिण्या तथा कृतमनिन्दिते ॥३२॥<br>रूपमेतच्चया दृष्टं प्राक्तनं तपसः फलम् ।<br>मद्दर्शनं विमोक्षाय कल्पते ह्यन्यदुर्लभम् ॥३३॥<br>संवादमावयोर्र्यस्तु पठेद्वा शृणुयादपि ।<br>स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥३४॥ | **श्रीभगवान् बोले—**हे मात: ! आप जो-जो चाहती हैं वही हो, उसके विरुद्ध कुछ भी न हो। पूर्वकालमें मुझसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने प्रार्थना की थी, अतः रावणादि निशाचरोंको मारनेके लिये ही मैंने मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥३०-३१॥ हे अनिन्दिते ! दशरथजीके सहित तुमने भी मुझे पुत्ररूप-से प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए मेरी आराधना की थी। उसीको मैंने इस समय प्रकट होकर पूर्ण किया है ॥३२॥ तुमने अपनी पूर्व तपस्याके फलसे ही मेरा यह दिव्य रूप देखा है। मेरा दर्शन मोक्ष-पद देनेवाला होता है; पुण्यहीन जनोंके लिये इसका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है ॥३३॥ जो व्यक्ति हमारे इस संवादको पढ़ेगा या सुनेगा वह मेरी सारूप्य मुक्ति (समानरूपता) प्राप्त करेगा और मरणकालमें उसे मेरा स्मरण रहेगा ॥३४॥ |
| इत्युक्त्वा मातरं रामो बालो भूत्वा रुरोद ह ।<br>बालत्वेऽपीन्द्रनीलाभो विशालाक्षोऽतिसुन्दरः ३५<br>बालारुणप्रतीकाशो ललिताखिललोकपः । | मातासे इस प्रकार कह भगवान् बालरूप होकर रोने लगे। उनका बालरूप भी इन्द्रनीलमणिके समान श्यामवर्ण, बड़े-बड़े नेत्रोंवाला और अति सुन्दर था ॥३५॥ वह प्रभातकालीन बालसूर्यके समान अरुण-ज्योतिर्मय था । भगवान्ने अवतरित होकर उस सुमनोहर बालरूपसे सभी लोकपालोंको परम आनन्दित कर दिया। |
| अथ राजा दशरथः श्रुत्वा पुत्रोद्भवोत्सवम् ।<br>आनन्दार्णवमग्नोऽसावाययौ गुरुणा सह ॥३६॥ | तत्पश्चात् जब महाराज दशरथजीने पुत्रोत्पत्ति-का शुभ समाचार सुना तो वे मानो आनन्द-समुद्रमें डूब गये और गुरु वशिष्ठजीके साथ राजभवनमें आये ॥३६॥ |
| रामं राजीवपत्राक्षं दृष्ट्वा हर्षाश्रुसंप्लुतः ।<br>गुरुणा जातकर्माणि कर्तव्यानि चकार सः ॥३७॥ | वहाँ आकर कमलनयन रामको देखकर वे आनन्दाश्रुओं-से पूर्ण हो गये और गुरुजीद्वारा उनके जातकर्म आदि आवश्यक संस्कार कराये ॥३७॥ |
| कैकेयी चाथ भरतमसूत कमलेक्षणा ।<br>सुमित्रायां यमौ जातौ पूर्णेन्दुसदृशाननौ ॥३८॥ | तदनन्तर कमलनयनी कैकेयीसे भरतका जन्म हुआ और सुमित्रासे पूर्णचन्द्रके समान मुखवाले दो यमज बालक उत्पन्न हुए ॥३८॥ |
| तदा ग्रामसहस्राणि ब्राह्मणेभ्यो मुदा ददौ ।<br>सुवर्णानि च रत्नानि वासांसि सुरभीः शुभाः ॥३९॥ | उस समय महाराज दशरथने अति उत्साहपूर्वक सहस्रों ग्राम, बहुत-सा सुवर्ण, अनेक रत्न, नाना प्रकारके वस्त्र और शुभलक्षणोंवाली अनेकों गौएँ ब्राह्मणोंको दीं ॥३९॥ |
| १६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
यस्मिन् रमन्ते मुनयो विद्ययाऽज्ञानविप्लवे ।
तं गुरुः प्राह रामेति रमणाद्राम इत्यपि ॥४०॥
भरणाद्भरतो नाम लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् ।
शत्रुघ्नं शत्रुहन्तारमेवं गुरुरभाषत ॥४१॥
लक्ष्मणो रामचन्द्रेण शत्रुघ्नो भरतेन च ।
द्वन्द्वीभूय चरन्तौ तौ पायसांशानुसारतः ॥४२॥
रामस्तु लक्ष्मणेनाथ विचरन्बाललीलया ।
रमयामास पितरौ चेष्टितैर्मुग्धभाषितैः ॥४३॥
भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णमुक्ताफलप्रभम् ।
कण्ठे रत्नमणिव्रातमध्यद्वीपिनखाञ्चितम् ॥४४॥
कर्णयोः स्वर्णसम्पन्नरक्तार्जुनसटालुकम् ।
शिञ्जानमणिमञ्जीरकटिसूत्राङ्गदैर्वृतम् ॥४५॥
स्मितवक्त्रालपदशनमिन्द्रनीलमणिप्रभम् ।
अङ्गणे रिङ्गमाणं तं तर्णकाननु सर्वतः ॥४६॥
दृष्ट्वा दशरथो राजा कौसल्या मुमुदे तदा ।
भोक्ष्यमाणो दशरथो राममेहीति चासकृत् ॥४७॥
आह्वयत्यतिहर्षेण प्रेम्णा नायाति लीलया ।
आनयेति च कौसल्यामाह सा सस्मिता सुतम् ॥४८॥
धावत्यपि न शक्नोति स्प्रष्टुं योगिमनोगतिम् ।
प्रहसन्स्वयमायाति कर्दमाङ्कितपाणिना ॥४९॥
किञ्चिद्गृह्णीत्वा कवलं पुनरेव पलायते ।
कौसल्या जननी तस्य मासि मासि प्रकुर्वती ॥५०॥
वायनानि विचित्राणि समलङ्कृत्य राघवम् ।
विज्ञानके द्वारा अज्ञानके नष्ट हो जानेपर मुनिजन जिनमें रमण करते हैं अथवा जो अपनी सुन्दरतासे भक्तजनोंके चित्तोंको रमाते (आनन्दमग्न करते) हैं, उनका नाम गुरु वशिष्ठजीने 'राम' रखा ॥४०॥ इसी प्रकार गुरुजीने, संसारका पोषण करनेवाला होनेसे दूसरे पुत्रका नाम 'भरत', समस्त सुलक्षण-सम्पन्न होनेसे तीसरेका नाम 'लक्ष्मण' और शत्रुओंका घातक होनेसे चौथे पुत्रका नाम 'शत्रुघ्न' रखा ॥४१॥ कौसल्या और कैकेयीके दिये हुए पायसांशोंके अनुसार लक्ष्मणजी रामचन्द्रजीके और शत्रुघ्नजी भरतजीके जोड़ीदार होकर रहने लगे ॥ ४२ ॥ लक्ष्मणजीके साथ विचरते हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी बाल-लीलाओं, चेष्टाओं और भोली-भाली बातोंसे माता-पिताको आनन्दित करने लगे ॥ ४३ ॥
जिसके ललाटपर मोतियोंसे सजाया हुआ देदीप्यमान सुवर्णमय अश्वत्थपत्र (पीपलका पत्ता) तथा गलेमें रत्न और मणिसमूहके साथ बीच-बीचमें व्याघ्रनख सजाकर गूँथी हुई लड़ियाँ सुशोभित हैं ॥ ४४ ॥ कानोंमें अर्जुनवृक्षके कच्चे फलोंके समान रत्नजटित सुवर्णके आभूषण लटक रहे हैं, तथा जो झनकारते हुए मणिमय नूपुर सुवर्णमेखला और बाजुबन्दसे विभूषित हैं॥४५॥ उस इन्द्रनील-मणिकी-सी आभावाले तथा स्वल्प दाँतोंसे युक्त मुसकाते हुए मुखवाले बालकको राजभवनके आँगनमें बछड़ेके पीछे-पीछे सब ओर बालगतिसे दौड़ते देख महाराज दशरथ और माता कौसल्या अति आनन्दित होते थे। जिस समय महाराज भोजन करने बैठते तो 'राम ! आ' ऐसा कह-कहकर अति हर्ष और प्रेमपूर्वक उन्हें बारम्बार बुलाते । जब खेलमें लगे रहनेके कारण वे न आते तो वे कौसल्यासे 'इसे पकड़ ला' ऐसा कहकर उन्हें लानेके लिये कहते। किन्तु जो योगिजनोंके चित्तके एकमात्र आश्रय हैं ऐसे पुत्रको कौसल्याजी हँसकर दौड़ती हुई भी न पकड़ पातीं। (उस समय माताको थकी देखकर) वे स्वयं ही कीचमें सने हुए हाथोंसे हँसते-हँसते वहाँ आ जाते और एक-आध ग्रास खाकर ही फिर भाग जाते ॥ ४६-४९ ॥ माता कौसल्या रामको भली प्रकार वस्त्राभूषण पहिनाकर प्रतिमास व्यञ्जन बनातीं और वर्ष लगनेपर पूजा,
| सर्ग ३ ] | बालकाण्ड | १७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अपूपान्मोदकान्कृत्वा कर्णशष्कुलिकास्तथा।<br>कर्णपूरांश्च विविधान् वर्षवृद्धौ च वायनम् ॥५१॥ | लड्डू, पूरी, कचौड़ी आदि विविध व्यञ्जन बनाकर (ब्राह्मण-भोजनादि) द्वारा उत्सव मनाती थीं ॥५०-५१॥ |
| गृहकृत्यं तया त्यक्तं तस्य चापल्यकारणात् ।<br>एकदा रघुनाथोऽसौ गतो मातरमन्तिके ॥५२॥ | रामकी चपलताके कारण कौसल्याने घरका काम करना छोड़ दिया था । एक दिन रामजी माताके पास गये ॥५२॥ और कहा—"माता ! मुझे कुछ खानेको दे।" किन्तु काममें लगी होनेसे माताने न सुना । तब क्रोधित होकर उन्होंने डण्डेसे सब बर्तन फोड़ डाले ॥५३॥ तथा छींकेपर रखे हुए गोरस और माखनको गिरा लिया और उसे तथा वहाँ रखे हुए समस्त दूध-दहीको भी क्रमशः लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको बाँट दिया । तब रसोइयेने जाकर माता कौसल्यासे कहा । वह हँसती हुई पकड़नेको दौड़ीं ॥५४-५५॥ |
| भोजनं देहि मे मातर्न श्रुतं कार्यसक्तया ।<br>ततः क्रोधेन भाण्डानि लगुडेनाहनत्तदा ॥५३॥ | |
| शिक्यस्थं पातयामास गव्यं च नवनीतकम् ।<br>लक्ष्मणाय ददौ रामो भरताय यथाक्रमम् ॥५४॥ | |
| शत्रुघ्नाय ददौ पश्चाद्दधि दुग्धं तथैव च ।<br>सूदेन कथिते मात्रे हास्यं कृत्वा प्रधावति ॥५५॥ | |
| आगतां तां विलोक्याथ ततः सर्वैः पलायितम् ।<br>कौसल्या धावमानापि प्रस्खलन्ती पदे पदे ॥५६॥ | माताको आती देखकर वे सब बालक भाग गये । माता कौसल्या भी उनके पीछे दौड़ीं, किन्तु वे पग-पगपर फिसलने लगीं ॥५६॥ |
| रघुनाथं करे धृत्वा किञ्चिन्नोवाच भामिनी ।<br>बालभावं समाश्रित्य मन्दं मन्दं रुरोद ह ॥५७॥ | अन्तमें उन्होंने रामको पकड़ लिया, किन्तु कहा कुछ भी नहीं । उस समय रामजी बालभावसे धीरे-धीरे रोने लगे ॥५७॥ |
| ते सर्वे लालिता मात्रा गाढमालिङ्ग्य यत्नतः।<br>एवमानन्दसन्दोहजगदानन्दकारकः ॥५८॥ | तब उन सबको भयभीत देखकर माताने उन्हें बड़े प्रेमसे हृदय लगाकर प्यार किया । इस प्रकार जगदानन्दकारक आनन्दघन भगवान् राम मायामय बालरूप धारणकर राजदम्पति दशरथ और कौसल्याको आनन्दित करने लगे । तदुपरान्त कुछ काल बीतनेपर उन चारों भाइयोंने कौमार-अवस्था में प्रवेश किया ॥५८-५९॥ |
| मायाबालवपुर्धृत्वा रमयामास दम्पती ।<br>अथ कालेन ते सर्वे कौमारं प्रतिपेदिरे ॥५९॥ | |
| उपनीता वसिष्ठेन सर्वविद्याविशारदाः ।<br>धनुर्वेदे च निरताः सर्वशास्त्रार्थवेदिनः ॥६०॥ | तब वसिष्ठजीने उनका उपनयन-संस्कार किया और लीलासे ही नररूप धारण करनेवाले सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी (चारों भाई) समस्त शास्त्रोंका मर्म जाननेवाले तथा धनुर्वेद आदि सम्पूर्ण विद्याओंके पारगामी हो गये । उन सब भाइयोंमें लक्ष्मणजी सेव्य-सेवक-भावसे आदरपूर्वक सदा रामचन्द्रजीका अनुगमन करते थे और उसी प्रकार शत्रुघ्नजी सदा भरतजीकी सेवामें उपस्थित रहते थे । भगवान् राम नित्यप्रति लक्ष्मणजीके सहित धनुष, बाण और तरकश धारणकर घोड़ेपर सवार हो मृगयाके लिये वनको जाते और वहाँ दुष्ट मृगोंको मारकर उन सबको पिताजीके अर्पण कर देते ॥६०-६३॥ प्रातःकाल उठकर स्नान |
| बभूवुर्जगतां नाथा लीलया नररूपिणः ।<br>लक्ष्मणस्तु सदा राममनुगच्छति सादरम् ॥६१॥ | |
| सेव्यसेवकभावेन शत्रुघ्नो भरतं तथा ।<br>रामश्चापधरो नित्यं तूणीबाणान्वितः प्रभुः ॥६२॥ | |
| अश्वारूढो वनं याति मृगयायै सलक्ष्मणः ।<br>हत्वा दुष्टमृगान्सर्वांन्पित्रे सर्वं न्यवेदयत् ॥६३॥ |
३