अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)
The Adhyatma Ramayana
Original Sanskrit Stanzas with Hindi Translation
Translated by Munilal
ॐ
अध्यात्मरामायण
हिन्दी-अनुवादसहित
आलोड्याखिलवेदराशिमसकृद्यत्तारकं ब्रह्म त-
द्रामो विष्णुरहस्यमूर्तिरिति यो विज्ञाय भूतेश्वरः ।
उद्धृत्याखिलसारसङ्ग्रहमिदं सङ्क्षेपतः प्रस्फुटम्
श्रीरामस्य निगूढतत्त्वमखिलं प्राह प्रियायै भवः ॥
अनुवादक
मुनिलाल
मिलनेका पता–
गीताप्रेस, गोरखपुर
मूल्य
साधारण जिल्द १।।।) बढ़िया जिल्द २)
श्रीरामचतुष्टय
यत्पादपङ्कजपरागसुरागयोगिवृन्दैर्जितं भवभयं जितकालचक्रैः।
यन्नामकीर्तनपरा जितदुःखशोका देवास्तमेव शरणं सततं प्रपद्ये॥
(अ० रा० बाल० ६। ७५)
श्रीराम
कोसलपाल कृपालु,
आप ही हैं प्रेरकवर ।
प्रभु-इच्छा ही पूर्ण सतत करते सब सुर-नर ।
इससे भी जो बना आपकी ही लीला है।
अहो ! आपकी केलि परमविस्मयशीला है !!
अब इसको दीजे यही, दानी दशरथलाल !
तुम्हें छोड़ चाहे न कुछ—
पदपायक
मुनिलाल
भक्ति ही सार है।
भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है। देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया। फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायँ तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निःसन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है। अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है। अतः उनके कामधेनुरूप चरणयुगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो। हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्रविस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो।
( अरण्य० १०। ४२-४४ )
श्रीहरिः
निवेदन
——◇——
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥
भगवान्की लीलाका रहस्य कौन जान सकता है? बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, महात्मा और सिद्धगण आजन्म उसीका मनन करते रहनेपर भी उसका पार नहीं पा सके। किन्तु वह इतनी दुर्विज्ञेय और गूढ़ होनेपर भी कितनी मधुर, मनमोहिनी और कल्याणमयी है। रसिकजन संसारके सभी भोगोंको छोड़कर अपनी आयुको एकमात्र उसीके अनुशीलनमें लगाकर अपनेको अत्यन्त बड़भागी समझते हैं। वे उसकी माधुरीका आस्वादन करते-करते कभी नहीं अघाते। अन्य लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंका पर्यवसान उनसे विरक्त हो जाने—अघा जानेमें होता है, किन्तु इस लोकोत्तर रससे इसके रसिकका चित्त कभी नहीं ऊबता। जिसका चित्त इससे ऊबने लगे, समझना चाहिये उसने इसका आस्वादन ही नहीं किया। इसीलिये रसिकचक्रचूड़ामणि श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
रामचरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेस जाना तिन नाहीं॥
धन्य हैं, वे महाभाग जिन्हें उसके यथेष्ट आस्वादनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है!
भगवान्के उसी दुर्लभ गूढ़ रहस्यको, जिसका यथावत् समझना बड़े-बड़े मेधावी आचार्य और योगनिष्ठ यतियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है और जिसे विभिन्न रूपसे ग्रहण करनेके कारण ही इस अनादि संसारमें अनादि कालसे अनन्त सम्प्रदायों और मतोंकी प्रवृत्ति होती आयी है, मुझ-जैसे मन्दमतिको ठीक-ठीक समझ लेना कैसे सम्भव है? उसे समझनेके योग्य मेरे पास विद्या, बुद्धि, विवेक अथवा श्रद्धा आदि कोई भी तो सामग्री नहीं है। इस ओर मेरा प्रवृत्त होना भी बड़ी हँसीकी बात है और प्रवृत्त होनेके अनन्तर जितनी भी सेवा मुझसे बनी है उसपर भी मुझे तो आश्चर्य है। मैं इस बातको स्वयं ही अनुभव करता हूँ कि इस अनधिकार चेष्टामें प्रवृत्त होकर मैं विद्या और विद्वानोंका अपराध कर रहा हूँ।
किन्तु, एक विचार है जो मुझे इन संकोच और आश्चर्य दोनोंहीसे मुक्त कर देता है। हम पद-पदपर देखते हैं कि अपनी इच्छा न होनेपर भी हमें बलात्कारसे बहुत-से ऐसे कार्योंमें लग जाना पड़ता है जिनमें प्रवृत्त होनेकी पहले कभी आशा भी नहीं थी। इसका कारण यही है कि हमारी सारी प्रवृत्तियोंका नियामक कोई और ही है, जो देहाभिमानके पर्देमें छिपा हुआ हमारे अन्तःकरणोंमें विराजमान है। हमारी सारी प्रवृत्तियाँ उस हृदयस्थित देवके ही इशारेपर नाचती रहती हैं। वस्तुतः तो 'हमारी प्रवृत्तियाँ, हमारी चित्तवृत्तियाँ' ऐसा कहना और मानना भी अज्ञानवश परिच्छिन्न अहंकारको स्वीकार करनेके ही कारण है। विज्ञान-विभासुका विमल प्रकाश होनेपर अज्ञानान्धकारके नष्ट होते ही जब देहाभिमानरूप उलूक न जाने कहाँ छिप जाता है, तब कर्ता कर्म और करणादिका कोई भेद नहीं रहता। फिर तो प्रवृत्ति, प्रवर्तक और प्रवर्त्य—सब कुछ एकमात्र वह अन्तर्यामी ही रहते हैं जिनके यत्किञ्चित् कृपा-कटाक्षसे ही यह सम्पूर्ण प्रपञ्च भासित हो रहा है तथा जिनकी सत्ता पाकर ही यह, सर्वथा असत् होनेपर भी, ध्रुव-सत्य बना हुआ है। अतः हमारा सारा
[ २ ]
संकोच और आश्चर्य तभीतक है जबतक हम सच्चे कर्ताको भूलकर तुच्छ देहाभिमानके शिरपर सारे कर्तृत्व-भोक्तृत्वका भार लाद देते हैं और उस देहाभिमानको देहाभिमान न समझकर अपना परमार्थस्वरूप मान बैठते हैं, नहीं तो जो लीलामय बिना किसी प्रयोजनके केवल लीलाके लिये ही इच्छामात्रसे इस अनन्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं, जिनकी मायासे मोहित होकर हमारी इस हाड़-मांसके पञ्जरमें आत्मबुद्धि होती है और फिर इसीकी आसक्तिमें फँसकर स्त्री-धन-धरती आदि महाघृणित और असार वस्तुओंमें रमणीय-बुद्धि होती है तथा जिनके लेशमात्र कृपाकणसे यह अनन्त ब्रह्माण्ड बालूकी भाँत हो जाता है, उन महामहिम सर्वशक्तिमान् सर्वेश्वरके लिये क्या दुष्कर है ? उनकी जैसी इच्छा होती है उसी ओर सबको प्रवृत्त होना पड़ता है और उनकी इच्छाके अनुसार ही उन्हें उसमें सफलता अथवा असफलता प्राप्त होती रहती है।
अस्तु। ‘तोमार इच्छा पूर्ण हउक करुणामय स्वामी’ इस वंग-कहावतके अनुसार प्रभुने जो कार्य सौंपा है उसे उन्हींका काम समझकर उन्हींके इङ्गितके अनुसार करते रहनेमें ही हमारा कल्याण है; और वास्तवमें हम करते भी ऐसा ही हैं, परन्तु ऐसा समझते नहीं। इसीलिये उसकी सफलता-असफलतामें हर्ष-शोकके शिकार होते हैं। प्रभु हमें ऐसा ही समझते रहनेकी शक्ति प्रदान करें।
श्रीमदध्यात्मरामायण कोई नवीन ग्रन्थ नहीं है, जिसके विषयमें कुछ विशेष कहनेकी आवश्यकता हो। यह परम पवित्र गाथा साक्षात् भगवान् शंकरने अपनी प्रेयसी आदिशक्ति श्रीपार्वतीजीको सुनायी है। यह आख्यान ब्रह्माण्डपुराणके उत्तरखण्डके अन्तर्गत माना जाता है। अतः इसके रचयिता महामुनि वेदव्यासजी ही हैं। इसमें परमरसायन रामचरितका वर्णन करते-करते पद-पदपर प्रसंग उठाकर भक्ति, ज्ञान, उपासना, नीति और सदाचार-सम्बन्धी दिव्य उपदेश दिये गये हैं। विविध विषयोंका विवरण रहनेपर भी इसमें प्रधानता अध्यात्मतत्त्वके विवेचनकी ही है। इसीलिये यह 'अध्यात्म-रामायण' कहलाता है। उपदेशभागके सिवा इसका कथाभाग भी कुछ कम महत्त्वका नहीं है। भगवान् श्रीराम मूर्त्तिमान् अध्यात्मतत्त्व हैं, उनके परमपावन चरित्रकी महिमाका कहाँतक वर्णन किया जाय ? आजकल जिस श्रीरामचरितमानसमें अवगाहन कर करोड़ों नर-नारी अपनेको कृतकृत्य मान रहे हैं उसके कथानकका आधार भी अधिकांशमें यही ग्रन्थ है। श्रीरामचरितमानसकी कथा जितनी अध्यात्मरामायणसे मिलती-जुलती है उतनी और किसीसे नहीं मिलती। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीने भी इसीका प्रामाण्य सबसे अधिक स्वीकार किया है।
अबतक इस ग्रन्थके कई अनुवाद हो चुके हैं। चार-पाँच तो मेरे देखनेमें भी आये हैं। प्रस्तुत अनुवादमें श्रीवेंकटेश्वर स्टीमप्रेसद्वारा प्रकाशित स्वर्गीय पं० बलदेवप्रसादजी मिश्र तथा स्वर्गीय पं० रामेश्वरजी भट्टके अनुवादोंसे सहायता ली गयी है। इसके लिये उक्त दोनों महानुभावोंका मैं हृदयसे कृतज्ञ हूँ। इस ग्रन्थरत्नका अनुवाद करनेका आदेश देकर गीताप्रेसने मुझे इसके अनुशीलनका अमूल्य अवसर दिया है और फिर उसीने इसका संशोधन कराकर इसे प्रकाशित करनेकी भी कृपा की है, इस उपकारके लिये मैं उसके सञ्चालकोंका हृदयसे आभारी हूँ।
अन्तमें, जिन लीलामयके लीलाकटाक्षसे प्रेरित होकर यह लीला हुई है, उनकी यह लीला आदरपूर्वक उन्हींको समर्पित है। इसमें यदि कुछ अच्छा है तो उन्हींके कृपाकटाक्षका प्रसाद है और जो भूल है वह मेरी अहंकारजनित धृष्टताका फल है। इत्यलम्।
\begin{aligned}
& विनीत- \
& अनुवादक
\end{aligned}
श्रीहरिः
विषय-सूची
| सर्ग | विषय | पृष्ठ | सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| १-माहात्म्य | ... ... ... | २। | ९-भगवान् राम और भरतका मिलन, भरतजीका अयोध्यापुरीको लौटना और श्रीरामचन्द्रजीका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाना | ... ... | ९२ |
| बालकाण्ड | अरण्यकाण्ड | ||||
| १-रामहृदय | ... ... ... | ३ | १-विराध-वध | ... ... ... | १०३ |
| २-भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवान्का उनकी प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें धैर्य बँधाना | ... ... | ६ | २-शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट | ... ... ... | १०७ |
| ३-भगवान्का जन्म और बाल-लीला | ... ... | १२ | ३-मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट | ... ... | १११ |
| ४-विश्वामित्रजीका आगमन; राम और लक्ष्मणका उनके साथ जाना और ताटकाका वध करना | ... ... | १८ | ४-पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश | ... ... | ११६ |
| ५-मारीच और सुबाहुका दमन तथा अहिल्योद्धार | ... ... ... | २१ | ५-शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना | ... ... | १२० |
| ६-धनुर्भङ्ग और विवाह | ... ... ... | २७ | ६-रावणका मारीचके पास जाना | ... | १२६ |
| ७-परशुरामजीसे भेंट | ... ... | ३३ | ७-मारीचवध और सीताहरण | ... | १२६ |
| अयोध्याकाण्ड | ८-सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट | ... ... | १३५ | ||
| १-भगवान् रामके पास नारदजीका आना | ... | ४१ | ९-कबन्धोद्धार | ... ... ... | १४० |
| २-राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद | ... ... | ४४ | १०-शबरीसे भेंट | ... ... ... | १४५ |
| ३-राजा दशरथका कैकेयीको वर देना | ... | ५१ | किष्किन्धाकाण्ड | ||
| ४-भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा सीता और लक्ष्मणके सहित वन-गमनकी तैयारी करना | ... ... | ५५ | १-सुग्रीवसे भेंट | ... ... ... | १५१ |
| ५-भगवान्का वनगमन | ... ... | ६५ | २-वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण | ... ... | १५६ |
| ६-गङ्गोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट | ... ... | ७० | ३-ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राजपद प्राप्त करना | ... ... ... | १६५ |
| ७-सुमन्त्रका प्रत्यागमन, राजा दशरथका स्वर्गवास तथा भरतजीका ननिहालसे आना और वसिष्ठजीके आदेशसे पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करना | ... | ७८ | ४-भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रिया-योगका वर्णन करना | ... ... | १७० |
| ८-भरतजीका वनको प्रस्थान, मार्गमें गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूट-दर्शन | ... ... ... | ८७ | ५-भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना | ... ... | १७५ |
| ६-सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभा-चरित्र | ... ... | १८१ |
( २ )
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ७-वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पाति-से भेंट | ... ... ... | १८८ |
| ८-सम्पातीकी आत्मकथा | ... ... | १९३ |
| ९-समुद्रोलङ्घनकी मन्त्रणा | ... ... | १९७ |
सुन्दरकाण्ड
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-हनुमान्जीका समुद्रोलङ्घन और लंका-प्रवेश | ... ... ... | २०३ |
| २-हनुमान्जीका वाटिकामें जाना तथा रावणका सीताजीको भय दिखलाना | ... ... | २०८ |
| ३-जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन | ... ... | २१३ |
| ४-हनुमान् और रावणका संवाद तथा लङ्कादहन | ... ... ... | २२० |
| ५-हनुमान्जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको उनका सन्देश सुनाना | ... ... ... | २२६ |
युद्धकाण्ड
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-वानर-सेनाका प्रस्थान | ... ... | २३३ |
| २-रावणद्वारा विभीषणका तिरस्कार | ... ... | २३७ |
| ३-विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धनका आरम्भ | ... ... | २४१ |
| ४-समुद्र-तरण, लङ्का-निरीक्षण तथा रावण-शुक-संवाद | ... ... | २४८ |
| ५-शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्का रावणको समझाना तथा वानर-राक्षस-संग्राम | ... ... | २५३ |
| ६-लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमान्जीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संवाद | ... ... | २५६ |
| ७-कालनेमिका कपट, हनुमान्जीद्वारा उसका वध, लक्ष्मणजीका सचेत होना और रावणका कुम्भकर्णको जगाना | ... ... | २६५ |
| ८-कुम्भकर्ण-वध | ... ... ... | २७० |
| ९-मेघनाद-वध | ... ... ... | २७६ |
| १०-रावणका यज्ञ-विध्वंस तथा उसका मन्दोदरीको समझाना | ... ... | २८२ |
| ११-राम-रावण-संग्राम और रावणका वध | ... ... | २८७ |
| १२-विभीषणका राज्याभिषेक और सीताजीकी अग्नि-परीक्षा | ... ... | २९४ |
| १३-देवताओंका भगवान् रामकी स्तुति करना, सीताजीसहित अग्निदेवका प्रकट होना, अयोध्याके लिये प्रस्थान | ... ... | ३०१ |
| १४-अयोध्या-यात्रा, भरद्वाज मुनिका आतिथ्य तथा भरत-मिलाप | ... ... | ३०७ |
| १५-श्रीराम-राज्याभिषेक | ... ... | ३१५ |
| १६-वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा | ... ... | ३२२ |
उत्तरकाण्ड
| सर्ग | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-भगवान् रामके यहाँ अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र सुनाना | ... ... | ३२६ |
| २-राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण | ... ... | ३३४ |
| ३-वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद | ... ... | ३४१ |
| ४-रामराज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास | ३४६ | |
| ५-रामगीता | ... ... ... | ३५१ |
| ६-लवण-वध, भगवान् रामके यज्ञमें कुश-लवके सहित महर्षि वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश करना | ... ... ... | ३६० |
| ७-भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश, रामचन्द्रजीका माताको उपदेश | ... ... | ३६५ |
| ८-कालका आगमन, लक्ष्मणजीका परित्याग और उनका स्वर्गगमन | ... ... | ३७२ |
| ९-महाप्रयाण | ... ... ... | ३७८ |
चित्र-सूची
| क्र. | चित्र | प्रकार | पृष्ठ | क्र. | चित्र | प्रकार | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १- | रामचतुष्टय | (रंगीन) | आदिमें | ५- | दासभक्त हनुमान्जी | (रंगीन) | १५१ |
| २- | सदाप्रसन्न राम | ( " ) | ३ | ६- | अशोकवाटिकामें सीताजी | ( " ) | २०३ |
| ३- | श्रीसीताराम | ( " ) | ४१ | ७- | श्रीराम-रावण-युद्ध | ( " ) | २३३ |
| ४- | रामजटायु | (सादा) | १०३ | ८- | क्रीडावनमें श्रीरामसीता | (सुनहरी) | ३२६ |
✤ श्रीसीतारामभ्यां नमः ✤
अध्यात्मरामायण
हिन्दी-अनुवादसहित
मायातीतं माधवमाद्यं जगदादिं, मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्द्यम् ।
योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं, वन्दे रामं रञ्जितलोकं रमणीयम् ॥
[पृष्ठ पर केवल पुष्प-चित्र (Decorative Illustration) अंकित है, कोई पाठ नहीं है।]