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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ७: वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पाति-से भेंट

१८८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

श्रुत्वा रघूत्तमवचोऽमृतसारकल्पं<br>  गत्वा तदैव बदरीतरुखण्डजुष्टम् ।<br>तीर्थं तदा रघुपतिं मनसा स्मरन्ती<br>  त्यक्त्वा कलेवरमवाप परं पदं सा ॥८४॥रघुनाथजीके ये अमृतके समान मधुर वचन सुनकर स्वयंप्रभा उसी समय पुण्यक्षेत्र बद्रिकाश्रमको चली गयी, जहाँ बहुत-से बेरीके वृक्ष लगे हुए हैं। वहाँ अपने अन्तःकरणमें श्रीरघुनाथजीका स्मरण करती हुई वह अन्तमें शरीर-पात होनेपर परमपदको प्राप्त हुई ॥८४॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तम सर्ग

वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पातिसे भेंट।

श्रीमहादेव उवाच
अथ तत्र समासीना वृक्षखण्डेषु वानराः ।<br>चिन्तयन्तो विमुह्यन्तः सीतामार्गणकर्शिताः ॥१॥**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर, सीताजीकी खोजसे थके हुए वानरगण उस गुहाके समीप सघन वृक्षोंवाले स्थानपर बैठकर (सीताको न पानेके कारण) मोहित होकर आपसमें सोचने लगे ॥ १ ॥
तत्रोवाचाङ्गदः कांश्चिद्वानरान् वानरर्षभः ।<br>भ्रमतां गह्वरेऽस्माकं मासो नूनं गतोऽभवत् ॥२॥उस समय वानरश्रेष्ठ अंगदजीने कुछ वानरोंसे कहा—"मालूम होता है इस कन्दरामें घूमते-घूमते हमारा एक मास अवश्य पूरा हो गया ॥ २ ॥
सीता नाधिगतास्माभिर्न कृतं राजशासनम् ।<br>यदि गच्छाम किष्किन्धां सुग्रीवोऽस्मान् हनिष्यतिपरन्तु अभीतक हमें सीताजी नहीं मिलीं । हम वानरराज सुग्रीवकी आज्ञाका पालन नहीं कर सके । अब यदि हम किष्किन्धापुरीको लौट चलें तो वह हमें अवश्य मार डालेगा ॥ ३ ॥
विशेषतः शत्रुसुतं मां मिषाच्चिहनिष्यति ।<br>मयि तस्य कुतः प्रीतिरहं रामेण रक्षितः ॥ ४ ॥विशेषतः, अपने शत्रुके पुत्र मुझे तो वह इस मिषसे अवश्य ही मार डालेगा । मुझमें उसका प्रेम कहाँ हो सकता है ? मेरी रक्षा तो श्रीरामचन्द्रजीने ही की है ॥ ४ ॥
इदानीं रामकार्यं मे न कृतं तन्मिषं भवेत् ।<br>तस्य मद्हनने नूनं सुग्रीवस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥अब मुझसे श्रीरघुनाथजीका कार्य नहीं सधा; अतः मेरा वध करनेके लिये उस दुरात्मा सुग्रीवको निश्चय ही यह अच्छा बहाना मिल जायगा ॥ ५ ॥
मातृकल्पां भ्रातृभार्यां पापात्मानुभवत्यसौ ।<br>न गच्छेयमतः पार्श्वं तस्य वानरपुङ्गवाः ॥ ६ ॥<br>त्यक्ष्यामि जीवितं चात्र येन केनापि मृत्युना ।वह पापात्मा अपने बड़े भाईकी पत्नीको, जो उसकी माताके समान है, भोगता है; अतः हे वानरश्रेष्ठो ! मैं अब उसके पास तो जाऊँगा नहीं ॥ ६ ॥ किसी-न-किसी उपायसे यहीं अपने जीवनका अन्त कर दूँगा ।”
इत्यश्रुनयनं केचिद्दृष्ट्वा वानरपुङ्गवाः ॥ ७ ॥<br>व्यथिताः साश्रुनयना युवराजमथाब्रुवन् ॥ ८ ॥इस प्रकार उन्हें नेत्रोंमें जल भरे देखकर कितने ही प्रमुख वानरोंको बड़ा खेद हुआ और उन्होंने आँखोंमें आँसू भरकर युवराजसे कहा—॥ ७-८ ॥
किमर्थं तव शोकोऽत्र वयं ते प्राणरक्षकाः ।<br>भवामो निवसामोऽत्र गुहायां भयवर्जिताः ॥ ९ ॥“आप इतना शोक क्यों करते हैं, हम सब आपके प्राणोंकी रक्षा करेंगे और निर्भय होकर इस गुहामें ही रहेंगे ॥ ९ ॥ इसमें जो नगर है वह अमरावतीपुरीके

सर्ग ७]
किष्किन्धाकाण्ड
१८९


सर्वसौभाग्यसहितं पुरं देवपुरोपमम् ।<br>शनैः परस्परं वाक्यं वदतां मारुतात्मजः ॥१०॥<br><br>श्रुत्वाऽऽङ्गदं समालिङ्गय प्रोवाच नयकोविदः ।<br>विचार्यते किमर्थं ते दुर्विचारो न युज्यते ॥११॥<br><br>राज्ञोऽत्यन्तप्रियस्त्वं हि तारापुत्रोऽतिवल्लभः ।<br>रामस्य लक्ष्मणात्प्रीतिस्त्वयि नित्यं प्रवर्धते ॥१२॥<br><br>अतो न राघवाद्भीतिस्तव राज्ञो विशेषतः ।<br>अहं तव हिते सक्तो वत्स नान्यं विचारय ॥१३॥<br><br>गुहावासश्च निर्भेद्य इत्युक्तं वानरैस्तु यत् ।<br>तदेतद्रामवाणानामभेद्यं किं जगत्त्रये ॥१४॥<br><br>ये त्वां दुर्बोधयन्त्येते वानरा वानरर्षभ ।<br>पुत्रदारादिकं त्यक्त्वा कथं स्थास्यन्ति ते त्वया ॥१५॥<br><br>अन्यद्गुह्यतमं वक्ष्ये रहस्यं शृणु मे सुत ।<br>रामो न मानुषो देवः साक्षान्नारायणोऽव्ययः ॥१६॥<br><br>सीता भगवती माया जनसम्मोहकारिणी ।<br>लक्ष्मणो भुवनाधारः साक्षाच्छेषः फणीश्वरः ॥१७॥<br><br>ब्रह्मणा प्रार्थिताः सर्वे रक्षोगणविनाशने ।<br>मायामानुषभावेन जाता लोकैकरक्षकाः ॥१८॥<br><br>वयं च पार्षदाः सर्वे विष्णोर्वैकुण्ठवासिनः ।<br>मनुष्यभावमापन्ने स्वेच्छया परमात्मनि ॥१९॥<br><br>वयं वानररूपेण जातास्तस्यैव मायया ।<br>वयं तु तपसा पूर्वमाराध्य जगतां पतिम् ॥२०॥<br><br>तेनैवानुगृहीताः स्मः पार्षदत्वमुपागताः ।<br>इदानीमपि तस्यैव सेवां कृत्वैव मायया ॥२१॥<br><br>पुनर्वैकुण्ठमासाद्य सुखं स्थास्यामहे वयम् ।<br><br>इत्यङ्कदमथ आश्वास्य गता विन्ध्यं महाचलम् ॥२२॥समान समस्त सुख-सामग्रियोंसे सम्पन्न है।” इस प्रकार उनके आपसमें धीरे-धीरे कहे हुए ये शब्द नीतिनिपुण श्रीहनुमान्‌जीके कानोंमें पड़े तो उन्होंने अंगदजीको हृदयसे लगाकर कहा—“अंगद ! तुम ऐसी चिन्ता क्यों करते हो, तुम्हें किसी प्रकारकी दुर्भावना न करनी चाहिये। तुम ताराके अत्यन्त लाडिले लाल हो, अतः महाराज सुग्रीवको भी तुम बहुत प्रिय हो। और श्रीरामचन्द्रजी-की तो तुममें नित्यप्रति लक्ष्मणजीसे भी अधिकं प्रीति बढ़ती जाती है ॥ १०-१२॥ इसलिये तुम्हें श्रीरघुनाथजी या राजा सुग्रीवसे किसी प्रकारका खटका न होना चाहिये। और फिर मैं भी सब प्रकार तुम्हारा हित करनेमें तत्पर हूँ। अतः हे वत्स ! तुम किसी ऐसी-वैसी बातकी चिन्ता मत करो ॥ १३ ॥ और इन वानरोंने जो कहा कि 'गुहामें किसी प्रकारका खटका न होगा' सो त्रिलोकीमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भगवान् रामके बाणोंके लिये अभेद्य हो ? ॥ १४ ॥ हे कपिश्रेष्ठ ! जो वानरगण तुम्हें यह बुरी सलाह दे रहे हैं वे भी अपनी स्त्री और बालकोंको छोड़कर तुम्हारे साथ कैसे रह सकेंगे ? ॥ १५ ॥<br><br>इसके सिवा, बेटा ! एक अत्यन्त गुप्त रहस्य और बताता हूँ, सावधान होकर सुनो—भगवान् राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं वे साक्षात् निर्विकार नारायणदेव हैं ॥ १६ ॥ भगवती सीताजी जगन्मोहिनी माया हैं और लक्ष्मणजी त्रिभुवनाधार साक्षात् नागनाथ शेषजी हैं ॥ १७ ॥ ये सब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे राक्षसोंका नाश करनेके लिये माया-मानवरूपसे उत्पन्न हुए हैं। इनमेंसे प्रत्येक त्रिलोकीकी रक्षा करनेमें समर्थ है ॥ १८॥ हम सब भी वैकुण्ठलोकमें रहनेवाले भगवान् विष्णुके पार्षद हैं। जब परमात्माने अपनी इच्छासे मनुष्यरूप धारण किया तो हम भी उन्हींकी माया-शक्तिसे वानररूपसे उत्पन्न हो गये। पूर्वकालमें हमने तपस्याद्वारा श्रीजगदीश्वरकी आराधना की थी; तब उन्हींकी कृपासे हम उनके पार्षद हुए थे। अब भी हम मायाकी प्रेरणासे उन्हींकी सेवा करते हुए अन्तमें फिर वैकुण्ठमें जाकर आनन्दपूर्वक ( उन्हींके साथ ) रहेंगे।”<br><br>इस प्रकार अंगदजीको ढाँढस बँधाकर वे सब
१९०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

विचिन्वन्तोऽथ शनकैर्जानकीं दक्षिणाम्बुधेः ।<br>तीरे महेन्द्राख्यगिरेः पवित्रं पादमाययुः ॥२३॥ | विन्ध्याचल पर्वतपर गये ॥ १९—२२ ॥ फिर धीरे-धीरे श्रीजानकीजीको खोजते हुए दक्षिण-समुद्रके तटपर महेन्द्रपर्वतकी पवित्र तराईमें पहुँचे ॥ २३ ॥
दृष्ट्वा समुद्रं दुष्पारमगाधं भयवर्धनम् ।<br>वानराः भयसन्त्रस्ताः किं कुर्म इति वादिनः ॥२४॥ | वहाँ पहुँचनेपर वे अपार, अगाध और भयको बढ़ानेवाले समुद्रको देखकर भयभीत हो गये और एक-दूसरेसे कहने लगे कि अब क्या करना चाहिये ? ॥२४॥
निषेधुरुदधेस्तीरे सर्वे चिन्तासमन्विताः ।<br>मन्त्रयामासुरन्योन्यमङ्गदाद्या महाबलाः ॥२५॥ | अंगद आदि समस्त महापराक्रमी वानर अति चिन्ता-ग्रस्त होकर समुद्रतटपर बैठ गये और आपसमें सलाह करने लगे—॥२५॥
भ्रमतो मे वने मासो गतोऽत्रैव गुहान्तरे ।<br>न दृष्टो रावणो वाऽद्य सीता वा जनकात्मजा ॥२६॥ | 'अहो ! वनमें घूमते-घूमते हमें एक मास तो उस गुहामें ही बीत गया । परन्तु रावण अथवा जनक-नन्दिनी सीताजीको हम अभीतक नहीं देख सके ॥ २६ ॥
सुग्रीवस्तीक्ष्णदण्डोऽस्मान्निहन्त्येव न संशयः ।<br>सुग्रीववधतोऽस्माकं श्रेयः प्रायोपवेशनम् ॥२७॥ | राजा सुग्रीव बड़ा दुर्दण्ड है, वह हमें निस्सन्देह मार डालेगा । सुग्रीवके हाथसे मरनेकी अपेक्षा तो प्रायोपवेशन ( अन्न-जल छोड़कर मर जाने) हीमें हमारा अधिक कल्याण है' ॥ २७ ॥
इति निश्चित्य तत्रैव दर्भानास्तीर्य सर्वतः ।<br>उपाविवेशुस्ते सर्वे मरणे कृतनिश्चयाः ॥२८॥ | ऐसा निर्णय करके वे सब जहाँ-तहाँ कुशा बिछाकर मरनेका निश्चय कर वहीं बैठ गये ॥ २८ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र महेन्द्राद्रिगुहान्तरात् ।<br>निर्गत्य शनकैरागाद्गृध्रः पर्वतसन्निभः ॥२९॥ | इसी समय महेन्द्रपर्वतकी कन्दरासे निकलकर वहाँ एक पर्वताकार गृध्र धीरे-धीरे चलकर आया ॥ २९ ॥
दृष्ट्वा प्रायोपवेशेन स्थितान्वानरपुङ्गवान् ।<br>उवाच शनकैर्गृध्रः प्राप्तो भक्ष्योऽद्य मे बहुः ॥३०॥ | उन बड़े-बड़े वानरोंको प्रायोपवेशनके लिये बैठे देख वह मन्द स्वरमें कहने लगा—"आज मुझे ( एक साथ ही ) बहुत-सा भक्ष्य प्राप्त हो गया ॥ ३० ॥
एकैकशः क्रमात्सर्वान् भक्ष्यामि दिनेदिने ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं वानरा भीतमानसाः ॥३१॥ | अब मैं इन सबको नित्यप्रति क्रमशः एक-एक करके खाऊँगा ।"
भक्षयिष्यति नः सर्वानसौ गृध्रो न संशयः ।<br>रामकार्यं च नास्माभिः कृतं किञ्चिच्छरीश्वराः ॥३२॥ | गृध्रके ये वचन सुनकर वे समस्त वानर भयभीत होकर कहने लगे—॥ ३१ ॥ "अहो ! निस्सन्देह अब यह गृध्र हम सबको खा जायगा । हे वानरेश्वरगण ! हमसे न तो भगवान् रामका ही कुछ काम सधा और न
सुग्रीवस्यापि च हितं न कृतं स्वात्मनामपि ।<br>वृथाऽनेन वधं प्राप्ता गच्छामो यमसादनम् ॥३३॥ | राजा सुग्रीवका या अपना ही कुछ हित हुआ; अब हम व्यर्थ इसके हाथसे मरकर यमलोकको जायेंगे ॥ ३२-३३ ॥
अहो जटायुर्धर्मात्मा रामस्यार्थे मृतः सुधीः ।<br>मोक्षं प्राप दुरावापं योगिनामप्यरिन्यमः ॥३४॥ | अहो ! धर्मात्मा जटायु धन्य है जिस बुद्धिमान्ने श्रीरामके कार्यमें अपने प्राण दे दिये । देखो, उस शत्रुदमनने वह मोक्षपद प्राप्त कर लिया जो योगियोंको भी दुर्लभ है" ॥ ३४ ॥
सम्पातिस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा वानरभाषितम् ।<br>के वा यूयं मम भ्रातुः कर्णपीयूषसन्निभम् ॥३५॥ | वानरोंके कहे हुए इस वाक्यको सुनकर सम्पाति बोला—"हे कपिश्रेष्ठगण ! आपलोग कौन हैं जो आपसमें, मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगने-

सर्ग ७ ] किष्किन्धाकाण्ड १९१


जटायुरिति नामाद्य व्याहरन्तः परस्परम् ।
उच्यतां वो भयं माभून्मत्तः प्लवगसत्तमाः ॥३६॥

तमुवाचाङ्गदः श्रीमानुत्थितो गृध्रसन्निधौ ।
रामो दाशरथिः श्रीमान् लक्ष्मणेन समन्वितः ॥३७॥
सीतया भार्यया सार्धं विचचार महावने ।
तस्य सीता हृता साध्वी रावणेन दुरात्मना ॥३८॥
मृगयां निर्गते रामे लक्ष्मणे च हृता बलात् ।
रामरामेति क्रोशन्ती श्रुत्वा गृध्रः प्रतापवान् ॥३९॥
जटायुर्नाम पक्षीन्द्रो युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।
रावणेन हतो वीरो राघवार्थे महाबलः ॥४०॥
रामेण दग्धो रामस्य सायुज्यमगमत्क्षणात् ।
रामः सुग्रीवमासाद्य सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ४१
सुग्रीवचोदितो हत्वा वालिनं सुदुरासदम् ।
राज्यं ददौ वानराणां सुग्रीवाय महाबलः ॥४२॥
सुग्रीवः प्रेषयामास सीतायाः परिमार्गणे ।
अस्मान्यानरवृन्दान्यै महासत्त्वान्महाबलः ॥४३॥
मासादार्वाङ्निवर्तध्वं नोचेत्प्राणान्हरामि वः ।
इत्याज्ञया भ्रमन्तोऽस्मिन्वने गह्वरमध्यगाः ॥४४॥
गतो मासो न जानीमः सीतां वा रावणं च वा ।
मर्तुं प्रायोपविष्टाः स्मस्तीरे लवणवारिधेः ॥४५॥
यदि जानासि हे पक्षिन्सीतां कथय नः शुभाम् ।

अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा सम्पातिर्हृष्टमानसः ॥४६॥
उवाच मत्प्रियो भ्राता जटायुः प्लवगेश्वराः ।
बहुवर्षसहस्रान्ते भ्रातृवार्ता श्रुता मया ॥४७॥
वाक्साहाय्यं करिष्येऽहं भवतां प्लवगेश्वराः ।


वाला मेरे भाईका 'जटायु' नाम ले रहे हैं । आप मुझसे किसी प्रकारका भय न करके अपना वृत्तान्त कहिये ।" ॥ ३५-३६ ॥

तब श्रीमान् अंगदजी उठकर उस गृध्रके पास गये और बोले—"दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और प्राणप्रिया सीताके सहित घोर दण्डकारण्यमें विचर रहे थे । वहाँ उनकी साध्वी भार्या सीताको दुरात्मा रावण हर ले गया ॥३७-३८॥ जिस समय राम और लक्ष्मण मृगयाके लिये गये हुए थे उसी समय वह बलात्कारसे उन्हें ले चला। उस समय वे 'हा राम ! हा राम !' कहकर रोने लगीं । उनका शब्द सुनकर महाप्रतापी पक्षिराज गृध्रवर जटायुने श्रीरघुनाथजीके लिये रावणसे घोर युद्ध किया, किन्तु अन्तमें वे महाबलवान् वीरवर रावणके हाथसे मारे गये ॥ ३९-४० ॥ फिर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने उनका दाह-संस्कार किया और उन्होंने तत्काल भगवान् राममें ( लीन होकर ) सायुज्यमोक्ष प्राप्त किया । तदनन्तर श्रीरघुनाथजी सुग्रीवके पास आये और अग्निको साक्षी बनाकर उनसे मित्रता की ॥ ४१ ॥ फिर सुग्रीवके कहनेसे महाबली रामजीने अति दुर्जय वालीको मारा और वानरोंका राज्य सुग्रीवको दिया ॥ ४२ ॥ महाबली सुग्रीवने हमारे-जैसे अनेकों महापराक्रमी वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा है ॥ ४३ ॥ और यह कह दिया है कि 'सब लोग एक मासके भीतर ही लौट आना नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा ।' उनकी आज्ञासे इस वनमें घूमते हुए हम एक गुहामें चले गये ॥ ४४ ॥ वहाँ हमारा मास समाप्त हो गया, किन्तु अभीतक हमें न तो सीताका पता चला है और न रावणका । अतः अब हम प्रायोपवेशन करके मरनेके लिये इस क्षार (खारी) समुद्रके तटपर बैठे हैं ॥ ४५ ॥ हे पक्षिन् ! यदि तुम्हें शुभलक्षणा सीताका कुछ पता हो तो बतलाओ ।"

अंगदके ये वचन सुनकर सम्पाति चित्तमें प्रसन्न होकर बोला—"हे कपीश्वरो ! जटायु मेरा परम प्रिय भाई था । आज कई सहस्र वर्षोंके अनन्तर मैंने भाईका समाचार सुना है ॥ ४६-४७ ॥ हे वानरो ! मैं बातोंसे अवश्य आपलोगोंकी कुछ सहायता करूँगा । पहले भाईको जलाञ्जलि देनेके लिये मुझे जलके पास ले

१९२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७
भ्रातुः सलिलदानाय नयध्वं मां जलान्तिकम् ॥४८॥<br>पश्चात्सर्वं शुभं वक्ष्ये भवतां कार्यसिद्धये ।<br>तथेति निन्युस्ते तीरं समुद्रस्य विहङ्गमम् ॥४९॥<br>सोऽपि तत्सलिले स्नात्वा भ्रातुर्दत्त्वा जलाञ्जलिम् ।<br>पुनः स्वस्थानमासाद्य स्थितो नीतो हरीश्वरैः ।<br>सम्पातिः कथयामास वानरान्परिहर्षयन् ॥५०॥<br>लङ्कानाम नगर्य्यास्ते त्रिकूटगिरिमूर्धनि ।<br>तत्राशोकवने सीता राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥५१॥<br>समुद्रमध्ये सा लङ्का शतयोजनदूरतः ।<br>दृश्यते मे न सन्देहः सीता च परिदृश्यते ॥५२॥<br>गृध्रत्वादूरदृष्टिर्मे नात्र संशयितुं क्षमम् ।<br>शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं यस्तु लङ्घयेत् ॥५३॥<br>स एव जानकीं दृष्ट्वा पुनरायास्यति ध्रुवम् ।<br>अहमेव दुरात्मानं रावणं हन्तुमुत्सहे ।<br>भ्रातुर्हन्तारमेकाकी किन्तु पक्षविवर्जितः ॥५४॥<br>यतध्वं मतियत्नेन लङ्घितुं सरितां पतिम् ।<br>ततो हन्ता रघुश्रेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम् ॥५५॥<br>उल्लङ्घ्य सिन्धुं शतयोजनायतं<br>लङ्कां प्रविश्याथ विदेहकन्यकाम् ।<br>दृष्ट्वा समाभाष्य च वारिधिं पुन-<br>र्त्तर्तुं समर्थः कतमो विचार्यताम् ॥५६॥चलो ॥४८॥ फिर आपलोगोंकी कार्य-सिद्धिके लिये जो ठीक होगा वह सब बतलाऊँगा।"<br><br>तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सम्पातिको समुद्रतटपर ले गये ॥४९॥ वहाँ पहुँचकर उसने जलमें स्नान कर भाईको जलाञ्जलि दी। तदनन्तर वानरगण उसे उसके स्थानपर ले गये। वहाँ बैठकर सम्पाति (अपने वचनसे) वानरोंको आनन्दित करता हुआ बोला—॥५०॥ "त्रिकूट-पर्वतपर लंका नामकी एक नगरी है। वहाँ श्रीसीताजी अशोकवनमें राक्षसियोंकी देख-रेखमें रहती हैं ॥५१॥ वह लंकापुरी यहाँसे सौ योजनकी दूरीपर समुद्रके बीचमें है। इसमें सन्देह नहीं मुझे तो वह और सीताजी यहींसे दीख रही हैं ॥५२॥ आपलोग इसमें सन्देह न करें। गृध्र होनेके कारण मेरी दृष्टि बहुत दूरतक जाती है। आपमेंसे जो कोई सौ योजन समुद्रको लाँघ सकता हो वही निश्चय जानकीजीको देखकर आ सकता है। मेरे भाईको मारनेवाले इस दुरात्मा रावणको मारनेमें तो मैं अकेला ही समर्थ हूँ; परन्तु (करूँ क्या?) मेरे पंख नहीं रहे ॥५३-५४॥ आपलोग किसी-न-किसी तरह समुद्र लाँघनेका प्रयत्न कीजिये; फिर राक्षसराज रावणको तो श्रीरघुनाथजी स्वयं मार डालेंगे ॥५५॥ आपलोग, अब यह विचार करें कि आपमेंसे ऐसा शक्तिशाली कौन है जो सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघकर लंकामें जाय और श्रीजानकीजीसे मिलकर तथा उनके साथ सम्भाषण कर फिर समुद्र पार करके लौट आवे" ॥५६॥
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इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥७॥

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