सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग १: सुग्रीवसे भेंट

ॐ

अध्यात्मरामायण

किष्किन्धाकाण्ड


प्रथम सर्ग

सुग्रीवसे भेंट।

श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके सहित धीरे-धीरे पम्पासरके तटपर आये। उस सुन्दर सरोवरको देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ उसका विस्तार एक कोशका था और उसमें अति निर्मल अगाध जल भरा हुआ था तथा सब ओर खिले हुए कमल, कह्लार, कुमुद और उत्पल आदि सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सरोवरमें जहाँ-तहाँ हंस और कारण्डव आदि पक्षी विहार कर रहे थे, चक्रवाकादि उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और जलकुक्कुट, कोयष्टि तथा क्रौंच आदि पक्षियोंके कलरवसे वह शब्दायमान हो रहा था ॥ ३ ॥ वह चित्र-विचित्र पुष्प-लताओंसे परिपूर्ण और नाना प्रकारके फलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था तथा उसका कमलकेशरसे सुवासित जल सज्जनोंके चित्तके समान स्वच्छ था ॥ ४ ॥
ततः सलक्ष्मणो रामः शनैः पम्पासरस्तटम् ।<br>आगत्य सरसां श्रेष्ठं दृष्ट्वा विस्मयमाययौ ॥ १ ॥<br><br>क्रोशमात्रं सुविस्तीर्णमगाधामलशम्बरम् ।<br>उत्फुल्लाम्बुजकह्लारकुमुदोत्पलमण्डितम् ॥ २ ॥<br><br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकादिशोभितम् ।<br>जलकुक्कुटकोयष्टिकौञ्चनादोपनादितम् ॥ ३ ॥<br><br>नानापुष्पलताकीर्णं नानाफलसमावृतम् ।<br>सतां मनःस्वच्छजलं पद्मकिञ्जल्कवासितम् ॥ ४ ॥
तत्रोपस्पृश्य सलिलं पीत्वा श्रमहरं विभुः ।<br>सानुजः सरसस्तीरे शीतलेन पथा ययौ ॥ ५ ॥<br><br>ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वे गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ ।<br>धनुर्वाणकरौ दान्तौ जटावल्कलमण्डितौ ।<br>पश्यन्तौ विविधान्वृक्षान् गिरेः शोभां सुविक्रमौ ॥ ६ ॥<br><br>सुग्रीवस्तु गिरेर्मूर्ध्नि चतुर्भिः सह वानरैः ।वहाँ पहुँचनेपर छोटे भाई लक्ष्मणके सहित प्रभु रामने आचमनकर उस सरोवरका श्रमहारी शीतल जल पीया और फिर उसके किनारे-किनारे शीतल छायायुक्त मार्गसे चलने लगे ॥ ५ ॥ इस प्रकार जटा-वल्कलविभूषित जितेन्द्रिय परम पराक्रमी राम और लक्ष्मण, जब हाथमें धनुष-बाण लिये विविध वृक्षों और पर्वतकी शोभाको निहारते हुए ऋष्यमूक पर्वतकी बगलमें चल रहे थे ॥ ६ ॥ उस समय अपने चार मन्त्रियोंके सहित गिरि-शिखरपर बैठे हुए सुग्रीवने उन्हें उधर
'१५२अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

स्थित्वा ददर्श तौ यान्तावारुरोह गिरेः शिरः॥ ७॥
भयादाह हनूमन्तं कौ तौ वीरवरौ सखे ।
गच्छ जानीहि भद्रं ते बटुर्भूत्वा द्विजाकृतिः ॥८॥
वालिना प्रेषितौ किंवा मां हन्तुं समुपागतौ ।
ताभ्यां सम्भाषणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयोः॥९॥
यदि तौ दुष्टहृदयौ संज्ञां कुरु कराग्रतः ।
विनयावनतो भूत्वा एवं जानीहि निश्चयम् ॥१०॥

तथेति वटुरूपेण हनुमान् समुपागतः ।
विनयावनतो भूत्वा रामं नत्वेदमब्रवीत् ॥११॥
कौ युवां पुरुषव्याघ्रौ युवानौ वीरसम्मतौ ।
द्योतयन्तौ दिशः सर्वाः प्रभया भास्कराविवा॥ १२॥
युवां त्रैलोक्यकर्ताराविति भाति मनो मम ।
युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ ॥१३॥
मायया मानुषाकारौ चरन्ताविच लीलया ।
भूभारहरणार्थाय भक्तानां पालनाय च ॥१४॥
अवतीर्णाविह परौ चरन्तौ क्षत्रियाकृती ।
जगत्स्थितिलयौ सर्गं लीलया कर्तुमुद्यतौ ॥१५॥
स्वतन्त्रौ प्रेरकौ सर्वहृदयस्थाविहेश्वरौ ।
नरनारायणौ लोके चरन्ताविति मे मतिः ॥१६॥

श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह पश्यैनं वटुरूपिणम् ।
शब्दशास्त्रमशेषेण श्रुतं नूनमनेकधा ॥१७॥
अनेन भाषितं कृत्स्नं न किञ्चिदपशब्दितम् ।
ततः प्राह हनूमन्तं राघवो ज्ञानविग्रहः ॥१८॥
अहं दाशरथी रामस्त्वयं मे लक्ष्मणोऽनुजः ।
सीतया भार्यया सार्धं पितुर्वचनगौरवात् ॥१९॥ | जाते देखा और वह सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ गया ॥ ७॥ फिर भयभीत होकर हनुमान्जीसे बोला— "मित्र ! देखो, ये दो वीरवर कौन हैं। तुम्हारा कल्याण हो, तुम ब्राह्मण ब्रह्मचारीके वेषमें उनके पास जाकर यह मालूम तो करो ॥ ८॥ तुम उनसे बातचीत करके उनके यहाँ आनेका अभिप्राय मालूम करना । ऐसा न हो, वे वालीके भेजनेसे मुझे मारनेके लिये आ रहे हों ॥ ९ ॥ यदि तुम्हें उनका हृदय दूषित मालूम हो तो अपनी अंगुलीसे मुझे संकेत कर देना । देखो, बड़े विनीत होकर यह सब भेद मालूम कर लेना ॥ १०॥<br><br>तब हनुमान्‌जी सुग्रीवसे 'जो आज्ञा' कह ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रघुनाथजीके पास आये और बड़ी नम्रतासे उन्हें नमस्कार कर बोले—॥ ११॥ "हे पुरुषव्याघ्र! आप दोनों कौन हैं? आपकी युवावस्था है और आप बड़े वीर मालूम होते हैं। अहो! अपने शरीरकी कान्तिसे आपने समस्त दिशाओंको सूर्यके समान प्रकाशमान कर रक्खा है ॥ १२॥ मेरा मन तो यह कहता है कि आप दोनों त्रिलोकीके रचनेवाले संसारके कारणभूत जगन्मय प्रधान और पुरुष ही हैं ॥ १३ ॥ आप मानो पृथ्वीका भार उतारने और भक्तजनोंकी रक्षा करनेके लिये ही लीलावश अपनी मायासे मनुष्यरूप धारण-कर विचर रहे हैं ॥ १४॥ आप साक्षात् परमात्मा ही क्षत्रियकुमारके रूपमें अवतीर्ण होकर पृथिवीपर घूम रहे हैं ! आप लीलाहीसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और (दुष्टोंका) नाश करनेमें तत्पर हैं ॥ १५ ॥ मेरी बुद्धिमें तो यही आता है कि आप सबके हृदयमें विराजमान, सबके प्रेरक, परम स्वतन्त्र भगवान् नर-नारायण ही इस लोकमें विचर रहे हैं" ॥ १६॥<br><br>तब श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! इस ब्रह्मचारीको देखो। अवश्य ही इसने सम्पूर्ण शब्दशास्त्र (व्याकरण) कई बार भली प्रकार पढ़ा है ॥ १७॥ देखो, इसने इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलनेमें कहीं कोई एक भी अशुद्धि नहीं हुई।" तदनन्तर विज्ञानघन श्रीरघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा—॥ १८॥ "हे द्विज ! मैं दशरथका पुत्र राम हूँ और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। मैं पिताकी आज्ञा मानकर अपनी स्त्री सीताके सहित वनमें आया

सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५३


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
आगतस्तत्र विपिने स्थितोऽहं दण्डके द्विज ॥१९॥<br>तत्र भार्या हृता सीता रक्षसा केनचिन्मम ।<br>तामन्वेष्टुमिहायातौ त्वं को वा कस्य वा वद॥२०॥था और यहाँ दण्डकारण्यमें रहता था। वहाँ किसी राक्षसने मेरी भार्या सीताको हर लिया। उसे ढूँढ़नेके लिये हम यहाँ आये हैं। कहिये, आप कौन हैं और किसके पुत्र हैं ? ॥ १९-२० ॥
बटुरुवाच<br>सुग्रीवो नाम राजा यो वानराणां महामतिः ।<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गिरिमूर्धनि तिष्ठति ॥२१॥<br>भ्राता कनीयान् सुग्रीवो वालिनः पापचेतसः ।<br>तेन निष्कासितो भार्या हृता तस्येह वालिना॥२२॥<br>तद्भयादृष्यमूकाख्यं गिरिमाश्रित्य संस्थितः ।<br>अहं सुग्रीवसचिवो वायुपुत्रो महामते ॥२३॥<br>हनूमान्नाम विख्यातो ह्यञ्जनीगर्भसम्भवः ।<br>तेन सख्यं त्वया युक्तं सुग्रीवेण रघूत्तम ॥२४॥<br>भार्यापहारिणं हन्तुं सहायस्ते भविष्यति ।<br>इदानीमेव गच्छाम आगच्छ यदि रोचते ॥२५॥ब्रह्मचारी बोले— महामति सुग्रीव वानरोंके राजा हैं। वे अपने चार मन्त्रियोंके साथ इस पर्वतके शिखरपर रहते हैं ॥ २१ ॥ वे दुष्टचित्त वालीके छोटे भाई हैं। उस वालीने उनकी स्त्री छीनकर उन्हें घरसे निकाल दिया है ॥ २२ ॥ अतः उसके भयसे वे इस ऋष्यमूक पर्वतपर ही रहते हैं। हे महामते ! मैं उन्हीं सुग्रीवका मन्त्री और वायुका पुत्र हूँ ॥ २३ ॥ मेरा जन्म माता अञ्जनीके गर्भसे हुआ है और मैं 'हनूमान्' नामसे विख्यात हूँ। हे रघुश्रेष्ठ ! आपको महाराज सुग्रीवसे मित्रता करनी चाहिये ॥ २४ ॥ वे आपकी भार्याको चुरानेवालेका वध करनेमें आपके सहायक होंगे। आइये, यदि आपकी इच्छा हो तो अभी उनके पास चलें ॥ २५ ॥
श्रीराम उवाच<br>अहमप्यागतस्तेन सख्यं कर्तुं कपीश्वर ।<br>सख्युस्तस्यापि यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम्॥२६॥श्रीरामचन्द्रजी बोले— हे कपीश्वर ! मैं भी उनसे मित्रता करनेके लिये ही आया हूँ। उन मित्रवरका भी जो कुछ कार्य होगा वह मैं निस्सन्दह पूर्ण कर दूँगा ॥ २६ ॥
हनूमान् स्वस्वरूपेण स्थितो राममथाब्रवीत् ।<br>आरोहतां मम स्कन्धौ गच्छामः पर्वतोपरि ॥२७॥<br>यत्र तिष्ठति सुग्रीवो मन्त्रिभिर्वालिनो भयात् ।<br>तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः॥२८॥<br>उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ।<br>वृक्षच्छायां समाश्रित्य स्थितौ तौ रामलक्ष्मणौ॥२९॥यह सुनकर हनूमान्‌जीने अपना रूप धारण कर रामसे कहा, “आइये, आप दोनों मेरे कन्धोंपर चढ़ जाइये, अब हम पर्वतके ऊपर चलते हैं, जहाँ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव वालीके भयसे (छिपकर) रहते हैं।” तब राम और लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कह उनके कन्धोंपर चढ़ गये ॥ २७-२८ ॥ वानरराज हनूमान् एक क्षणमें ही पर्वतके शिखरपर कूदकर पहुँच गये। वहाँ राम और लक्ष्मण एक वृक्षकी छायामें खड़े हो गये ॥ २९ ॥
हनूमानपि सुग्रीवमुपगम्य कृताञ्जलिः ।<br>व्येतु ते भयमायातो राजन् श्रीरामलक्ष्मणौ ॥३०॥<br>शीघ्रमुत्तिष्ठ रामेण सख्यं ते योजितं मया ।<br>अग्निं साक्षिणमारोप्य तेन सख्यं द्रुतं कुरु ॥३१॥<br>ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवः समागम्य रघूत्तमम् ।इधर हनूमान्‌जीने सुग्रीवके पास जा उनसे हाथ जोड़कर कहा—“राजन् ! अब अपनी शंका दूर कीजिये, क्योंकि आपके यहाँ श्रीराम और लक्ष्मण पधारे हैं ॥ ३० ॥ शीघ्र उठिये, मैंने रामके साथ आपकी मित्रता होनेका योग लगा दिया है। शीघ्र ही अग्निको साक्षी करके उनसे मित्रता कीजिये ॥ ३१ ॥<br>तब सुग्रीव अति प्रसन्न होकर रघुनाथजीके पास

२०

१५४अध्यात्मरामायण[सर्ग १ .

वृक्षशाखां स्वयं छित्त्वा विष्टराय ददौ मुदा ॥३२॥
हनूमांल्लक्ष्मणायादात्सुग्रीवाय च लक्ष्मणः ।
हर्षेण महताऽऽविष्टाः सर्व एवावतस्थिरे ॥३३॥
लक्ष्मणस्त्वब्रवीत्सर्वं रामवृत्तान्तमादितः ।
वनवासाभिगमनं सीताहरणमेव च ॥३४॥

लक्ष्मणोक्तं वचः श्रुत्वा सुग्रीवो राममब्रवीत् ।
अहं करिष्ये राजेन्द्र सीतायाः परिमार्गणम् ॥३५॥
साहाय्यमपि ते राम करिष्ये शत्रुघातिनः ।
शृणु राम मया दृष्टं किञ्चित्ते कथयाम्यहम् ॥३६॥
एकदा मन्त्रिभिः सार्धं स्थितोऽहं गिरिमूर्धनि ।
विहायसा नीयमानां केनचित्प्रमदोत्तमाम् ॥३७॥
क्रोशन्तीं रामरामेति दृष्ट्वाऽस्मान्पर्वतोपरि ।
आमुच्याभरणान्याशु स्वोत्तरीयेण भामिनी ॥३८॥
निरीक्ष्याधः परित्यज्य क्रोशन्ती तेन रक्षसा ।
नीताऽहं भूषणान्याशु गुहायामक्षिपं प्रभो ॥३९॥
इदानीमपि पश्य त्वं जानीहि तव वा न वा ।
इत्युक्त्वाऽऽनीय रामाय दर्शयामास वानरः॥४०॥
विमुच्य रामस्तद्दृष्ट्वा हा सीतेति मुहुर्मुहुः ।
हृदि निक्षिप्य तत्सर्वं रुरोद प्राकृतो यथा ॥४१॥

आश्वास्य राघवं भ्राता लक्ष्मणे वाक्यमब्रवीत् ।
अचिरेणैव ते राम प्राप्स्यते जानकी शुभा ।
वानरेन्द्रसहायेन हत्वा रावणमाहवे ॥४२॥
सुग्रीवोऽप्याह हे राम प्रतिज्ञां करवाणि ते ।
समरे रावणं हत्वा तव दास्यामि जानकीम् ॥४३॥
ततो हनूमान्प्रज्वाल्य तयोरग्निं समीपतः ।
तावुभौ रामसुग्रीवावग्नौ साक्षिणि तिष्ठति ॥४४

| आये और प्रसन्नमनसे अपने हाथसे एक वृक्षकी शाखा तोड़कर उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया ॥३२॥ इसी प्रकार हनुमान्‌जीने लक्ष्मणजीको तथा लक्ष्मणजीने सुग्रीवको आसन दिया और सब लोग अति आनन्दपूर्वक अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये ॥३३॥ तदनन्तर लक्ष्मणजीने आरम्भसे लेकर वनमें आने और सीताजीके हरे जानेतकका रामचन्द्रजी का सारा वृत्तान्त सुनाया ॥३४॥
| लक्ष्मणजीके वचन सुनकर सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजी से कहा—"हे राजराजेश्वर ! मैं सीताजीकी खोज करूँगा ॥३५॥ और शत्रु का वध करते समय भी आपकी सहायता करूँगा। हे राम ! इस सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा है वह आपको सुनाता हूँ, सुनिये ॥३६॥
| "एक दिन अपने मन्त्रियोंके साथ मैं पर्वतके शिखरपर बैठा था । उस समय हमने देखा कि कोई राक्षस किसी उत्तम कामिनीको आकाश-मार्गसे लिये जाता है ॥३७॥ वह 'राम ! राम !' कहकर विलाप कर रही थी । हमें पर्वतपर बैठे देख कर उसने तुरन्त ही अपने आभूषण उतारकर एक वस्त्रमें बाँधे और हमारी ओर देखते हुए नीचे गिरा दिये । हे प्रभो ! इसी प्रकार निरन्तर विलाप करती हुई उस अबलाको वह राक्षस ले गया। प्रभो ! मैंने तुरन्त ही उन आभूषणोंको उठाकर गुफामें रख दिया ॥३८–३९॥ आप उन्हें अभी देखिये और पहचानिये कि वे आपकी हैं या नहीं।" ऐसा कह कपिराज सुग्रीवने वे आभूषण लाकर रामको दिखाये ॥४०॥ रामचन्द्रजी ने उन्हें खोलकर देखा तो (उन्हें पहचानकर) छातीसे लगा लिया और साधारण पुरुषोंके समान वारम्बार 'हा सीते ! हा सीते !' कहकर रोने लगे ॥४१॥
| तब भाई लक्ष्मणने उन्हें ढाँढस बँधाकर कहा— "हे राम ! वानरराज सुग्रीवकी सहायतासे युद्धमें रावणको मारकर आप शीघ्र ही शुभलक्षणा जनक-नन्दिनीको प्राप्त करेंगे" ॥४२॥ सुग्रीवने भी कहा— "हे राम ! मैं आपसे प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रावण-को युद्धमें मारकर आपको सीता दिला दूँगा" ॥४३॥
| तदनन्तर हनूमान्जीने उन दोनोंके पास अग्नि प्रज्वलित की । तब निष्पाप राम और सुग्रीव दोनों ही

सर्ग १] | किष्किन्धाकाण्ड | १५५

बाहू प्रसार्य चालिङ्गय परस्परमकल्मषौ ।<br>समीपे रघुनाथस्य सुग्रीवः समुपाविशत् ॥४५॥अग्निको साक्षी कर परस्पर एक-दूसरेसे भुजा फैलाकर मिले । तत्पश्चात् सुग्रीव रामचन्द्रजीके पास बैठ गये ॥४४-४५॥
स्वोदन्तं कथयामास प्रणयाद्रघुनायके ।<br>सखे शृणु ममोदन्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥४६॥और अति प्रेमपूर्वक उन्हें अपना वृत्तान्त सुनाने लगे । वे बोले—"मित्र ! अब हमारी कहानी सुनो; वालीने पूर्वकालमें मेरे साथ जो कुछ किया है वह सुनाता हूँ ॥४६॥
मयपुत्रोऽथ मायावी नाम्ना परमदुर्मदः ।<br>किष्किन्धां समुपागत्य वालिनं समुपाव्हयत् ॥४७॥एक बार अति मदोन्मत्त मय दानवके पुत्र मायावीने किष्किन्धा-पुरीमें आकर वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥४७॥
सिंहनादेन महता वाली तु तदमर्षणः ।<br>निर्ययौ क्रोधताम्राक्षो जघान दृढमुष्टिना ॥४८॥वह दैत्य बड़ा भारी सिंहनाद करने लगा । वाली उसका यह दर्प न देख सका, उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और उसने बाहर आ उसके बड़े जोरसे एक घूँसा मारा ॥४८॥
दुद्राव तेन संविग्नो जगाम स्वगुहां प्रति ।<br>अनुदुद्राव तं वाली मायाविनमहं तथा ॥४९॥उसके आघातसे व्याकुल होकर मायावी अपनी गुफाकी ओर दौड़ा । तब वाली और मैं दोनोंहीने उसका पीछा किया ॥४९॥
ततः प्रविष्टमालोक्य गुहां मायाविनं रुषा ।<br>वाली मामाह तिष्ठ त्वं बहिर्गच्छाम्यहं गुहाम् ।<br>इत्युक्त्वाविश्य स गुहां मासमेकं न निर्ययौ ॥५०॥मायावीको गुफामें गया देखकर वालीको बड़ा रोष हुआ । उसने मुझसे कहा—"तुम यहीं रहो, मैं गुफामें जाता हूँ।" ऐसा कहकर वह गुफामें घुस गया और एक मास-तक उससे न निकला ॥५०॥
मासादूर्ध्वं गुहाद्वारान्निर्गतं रुधिरं बहु ।<br>तद्दृष्ट्वा परितप्ताङ्गो मृतो वालीति दुःखितः ॥५१॥एक महीना बीत जाने-पर उस गुफाके द्वारसे बहुत-सा रक्त निकला । उसे देख-कर यह समझकर कि वाली मारा गया, मुझे बड़ा दुःख और सन्ताप हुआ ॥५१॥
गुहाद्वारि शिलामेकां निधाय गृहमागतः ।<br>ततोऽब्रुवं मृतो वाली गुहायां रक्षसा हतः ॥५२॥तब (इस भयसे कि कहीं वालीको मारनेवाला दैत्य बाहर आकर मुझे भी न मार डाले) उस गुफाके द्वारपर एक शिला रखकर मैं घर लौट आया; और सबसे यह कह दिया कि वाली गुफामें राक्षसके हाथसे मारा गया ॥५२॥
तच्छ्रुत्वा दुःखिताः सर्वे मामनिच्छन्तमप्युत ।<br>राज्येऽभिषेचनं चक्रुः सर्वे वानरमन्त्रिणः ॥५३॥यह सुनकर सबको बड़ा दुःख हुआ और मेरी इच्छा न होनेपर भी समस्त वानर-मन्त्रिमण्डलने मुझे राजपद्पर अभिषिक्त कर दिया ॥५३॥
शिष्टं तदा मया राज्यं किञ्चित्कालमरिन्दम ।<br>ततः समागतो वाली मामाह परुषं रुषा ॥५४॥हे शत्रुदमन ! मैंने कुछ ही दिन राज्य-शासन किया होगा कि वाली आ गया और क्रोधपूर्वक मुझसे बड़ी कड़वी-कड़वी बातें कहने लगा ॥५४॥
बहुधा भर्त्सयित्वा मां निजघान च मुष्टिभिः ।<br>ततो निर्गत्य नगरादधावं परया भिया ॥५५॥इस प्रकार, मुझे बहुत कुछ भला-बुरा कहकर वह मुझे घूँसोंसे मारने लगा । तब मैं अत्यन्त भयभीत होकर नगर छोड़कर भाग गया ॥५५॥
लोकान् सर्वान्परिक्रम्य ऋष्यमूकं समाश्रितः ।<br>ऋषेः शापभयात्सोऽपि नायातीमं गिरि प्रभो ॥५६॥हे प्रभो ! मैंने सम्पूर्ण लोकोंमें घूमकर अन्तमें इस ऋष्यमूक-पर्वतकी शरण ली है क्योंकि ऋषिशापके भयसे वह इस पर्वत-पर नहीं आता ॥५६॥
तदादि मम भार्या स स्वयं भुङ्क्ते विमूढधीः ।<br>अतो दुःखेन सन्तप्तो हृतदारो हृताश्रयः ॥५७॥तबसे मेरी भार्याको वह दुर्मति स्वयं भोगता है और मैं स्त्री तथा घरके छिन जानेसे मन-ही-मन कुढ़ता हुआ यहाँ रहता हूँ । आज

१५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


वसाम्यद्य भवत्पादसंस्पर्शात्सुखितोऽस्म्यहम् ।
मित्रदुःखेन सन्तप्तो रामो राजीवलोचनः ॥५८॥
हनिष्यामि तव द्वेष्यं शीघ्रं भार्यापहारिणम् ।
इति प्रतिज्ञामकरोत्सुग्रीवस्य पुरस्तदा ॥५९॥

सुग्रीवोऽप्याह राजेन्द्र वाली बलवतां बली ।
कथं हनिष्यति भवान्देवैरपि दुरासदम् ॥६०॥

शृणु ते कथयिष्यामि तद्बलं बलिनां वर ।
कदाचिद्दुन्दुभिर्नाम महाकायो महाबलः ॥६१॥
किष्किन्धामगमद्राम महामहिषरूपधृक् ।
युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत भीषणः ॥६२॥

तच्छ्रुत्वाऽसहमानोऽसौ वाली परमकोपनः ।
महिषं शृङ्गयोर्धृत्वा पातयामास भूतले ॥६३॥

पादेनैकेन तत्कायमाक्रम्यास्य शिरो महत् ।
हस्ताभ्यां भ्रामयञ्छित्त्वा तोलयित्वाक्षिपद्भुवि ॥६४॥

पपात तच्छिरो राम मातङ्गाश्रमसन्निधौ ।
योजनात्पतितं तन्मान्मुनेराश्रममण्डले ॥६५॥

रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यान्दृष्ट्वा तां क्रोधमूर्च्छितः ।
मातङ्गो वालिनं प्राह यद्यागन्तासि मे गिरिम् ॥६६॥

इतः परं भग्नशिरा मरिष्यसि न संशयः ।
एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ ॥६७॥

एतज्ज्ञात्वाहमध्येत्र वसामि भयवर्जितः ।
राम पश्य शिरस्तस्य दुन्दुभेः पर्वतोपमम् ॥६८॥

तत्क्षेपणे यदा शक्तः शक्तस्त्वं वालिनो वधे ।
इत्युक्त्वा दर्शयामास शिरस्तद्गिरिसन्निभम् ॥६९॥


आपके चरणकमलोंका स्पर्श करनेसे मुझे सुख चैन मिला है।" तब कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने सखा सुग्रीवके दुःखसे आतुर होकर उसके सामने प्रतिज्ञा की कि 'मैं बहुत ही शीघ्र तुम्हारी पत्नीको छीननेवाले तुम्हारे शत्रु का नाश कर डालूँगा' ॥ ५७-५९॥

सुग्रीवने कहा--"हे राजेन्द्र ! वाली सम्पूर्ण योद्धाओंमें अग्रणी है, (वह कोई साधारण बलवाला नहीं है।) उसको पराजित करना देवताओंके लिये भी अति कठिन है। फिर आप उसे कैसे मार सकेंगे ? ॥ ६० ॥ हे वीरश्रेष्ठ ! सुनिये मैं आपको उसके बलका वृत्तान्त सुनाता हूँ। एक बार दुन्दुभि नामका एक बड़ा बलवान् और स्थूलकाय दैत्य किष्किन्धापुरीमें भैंसेका रूप बनाकर आया और उस महाभयानक असुरने रात्रिके समय वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६१-६२ ॥ उसकी गर्जना वालीको सहन न हुई और उसने अति क्रोधपूर्वक उस भैंसेके सींग पकड़कर उसे पृथिवीपर पटक दिया ॥ ६३ ॥ तथा अपने एक पैरसे उसके शरीरको दबाकर उसके महान् मस्तकको अपने हाथोंसे मरोड़कर तोड़ डाला और उसे उछालकर पृथिवीपर दूर फेंक दिया ॥ ६४ ॥ हे राम ! वह फिर वहाँसे एक योजन दूर मुनियोंके आश्रममण्डलमें महर्षि मतंगके आश्रमके पास जाकर गिरा ॥ ६५ ॥ उससे जहाँ-तहाँ बहुत-सा रक्त बरसा। उसे देखकर मुनिवर मतंगको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने क्रोधमें भरकर वालीसे कहा—"यदि आजसे तुम कभी मेरे इस पर्वतपर आओगे तो निस्सन्देह तुम्हारा शिर फट जायगा और तुम मर जाओगे।" हे रामजी ! मुनिके इस प्रकार शाप देनेसे ही वह तबसे इस ऋष्यमूक-पर्वतपर नहीं आता ॥ ६६-६७ ॥ ऐसा जानकर ही मैं यहाँ निर्भय होकर रहता हूँ। हे राम ! (जिसे वालीने मारा था) आप ज़रा उस दुन्दुभि दैत्यके पर्वताकार शिरको तो देखिये। (इसीसे आपको उसके बलका कुछ अनुमान हो जायगा ।) ॥ ६८ ॥ यदि आप उस मस्तकको फेंक सकेंगे तो अवश्य वालीका वध भी कर सकेंगे।"

ऐसा कहकर सुग्रीवने वह पर्वत-सदृश शिर

सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५७


दृष्ट्वा रामः स्मितं कृत्वा पादाङ्गुष्ठेन चाक्षिपत् ।
दशयोजनपर्यन्तं तदद्भुतमिवाभवत् ॥७०॥
साधु साध्विति सम्प्राह सुग्रीवो मन्त्रिभिः सह ।
पुनरप्याह सुग्रीवो रामं भक्तपरायणम् ॥७१॥
एते ताला महासाराः सप्त पश्य रघूत्तम ।
एकैकं चालयित्वाऽसौ निष्पत्रान्कुरुतेऽञ्जसा ॥७२॥
यदि त्वमेकबाणेन विद्ध्वा छिद्रं करोषि चेत् ।
हतस्त्वया तदा वाली विश्वासो मे प्रजायते ।
तथेति धनुरादाय सायकं तत्र सन्दधे ॥७३॥
बिभेद च तदा रामः सप्त तालान्महाबलः ।
तालान्सप्त विनिर्भिद्य गिरिं भूमिं च सायकः॥७४॥
पुनरागत्य रामस्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः ।
ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवो राममाहातिविस्मितः ॥७५॥
देव त्वं जगतां नाथः परमात्मा न संशयः ।
मत्पूर्वकृतपुण्यौघैः सङ्गतोऽद्य मया सह ॥७६॥
त्वां भजन्ति महात्मानः संसारविनिवृत्तये ।
त्वां प्राप्य मोक्षसचिवं प्रार्थयेऽहं कथं भवम् ॥७७॥
दाराः पुत्रा धनं राज्यं सर्वं त्वन्मायया कृतम् ।
अतोऽहं देवदेवेश नाकाङ्क्षेऽन्यत्प्रसीद मे ॥७८॥
आनन्दानुभवं त्वाऽद्य प्राप्तोऽहं भाग्यगौरवात् ।
मृदर्थं यतमानेन निधानमिव सत्पते ॥७९॥
अनाद्यविद्यासंसिद्धं बन्धनं छिन्नमद्य नः ।
यज्ञदानतपःकर्मपूर्तेष्टादिभिरप्यसौ ॥८०॥
न जीर्यते पुनर्दाढ्यं भजते संसृतिः प्रभो ।
त्वत्पाददर्शनात्सद्यो नाशमेति न संशयः ॥८१॥


दिखलाया ॥ ६९ ॥ उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाते हुए अपने पैरके अँगूठेसे उसे दश योजन दूर फेंक दिया। यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई ॥ ७० ॥ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव भी 'वाह ! वाह !' करने लगे और फिर वह भक्तोंके एकमात्र आश्रय भगवान् रामसे बोले—॥ ७१ ॥ "हे रघूश्रेष्ठ ! देखिये, तालके ये सात वृक्ष कैसे सुदृढ़ हैं, किन्तु वाली इनमेंसे प्रत्येकको हिलाकर अनायास ही पत्र-हीन (बे-पत्तेके) कर दिया करता है ॥ ७२ ॥ यदि आप एक बाणसे ही इन सबको बेधकर इनमें छिद्र कर देंगे तो मुझे यह विश्वास हो जायगा कि आप अवश्य ही वालीको मार डालेंगे।"

तब महाबली रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाया और उन सातों ताल-वृक्षोंको बेध दिया । तत्पश्चात् वह बाण सातों ताल, पर्वत और पृथिवीको बेधकर पहलेके समान फिर आकर रामचन्द्रजीके तरकशमें स्थित हो गया ।

तब सुग्रीवने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे अत्यन्त हर्षके साथ कहा—॥ ७३–७५ ॥ "हे देव ! आप सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी साक्षात् परमात्मा हैं—इसमें सन्देह नहीं। मेरे पूर्वकृत पुण्य-पुञ्जके परिपाकसे ही आज आपसे मेरा संयोग हुआ है ॥ ७६ ॥ महात्मा लोग संसार-बन्धनकी निवृत्तिके लिये आपका भजन करते हैं, फिर आप मोक्षदायक प्रभुको पाकर मैं सांसारिक पदार्थोंकी कामना कैसे करूँ ? ॥ ७७ ॥ हे देव-देवेश्वर ! ये स्त्री, पुत्र, धन, राज्य आदि सभी आपकी मायाके कार्य हैं । अतः अब आपके अतिरिक्त और किसी पदार्थकी मुझे इच्छा नहीं है, आप मुझपर कृपा कीजिये ॥ ७८ ॥ हे सत्पते ! आप आनन्दस्वरूप हैं । मिट्टी खोदते हुए जैसे किसीको खजाना हाथ लग जाय उसी प्रकार आज बड़े भाग्यसे मुझे आपके दर्शन हुए हैं ॥ ७९ ॥ आज हमारा अनादि अविद्याजन्य बन्धन कट गया । हे प्रभो ! यह संसार-बन्धन यज्ञ, दान, तप तथा इष्टापूर्त्त आदि कर्मोंसे भी नहीं टूटता बल्कि और दृढ़ हो जाता है । किन्तु आपके चरणकमलोंका दर्शन करते ही यह तुरन्त नष्ट हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ८०-८१ ॥

१५८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १

क्षणार्धमपि यच्चित्तं त्वयि तिष्ठत्यचञ्चलम् ।
तस्याज्ञानमनर्थानां मूलं नश्यति तत्क्षणात्॥८२॥
तत्तिष्ठतु मनो राम त्वयि नान्यत्र मे सदा ॥८३॥
रामरामेति यद्वाणी मधुरं गायति क्षणम् ।
स ब्रह्महा सुरापो वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥८४॥
न काङ्क्षे विजयं राम न च दारसुखादिकम् ।
भक्तिमेव सदा काङ्क्षे त्वयि बन्धविमोचनीम्॥८५॥
त्वन्मायाकृतसंसारस्त्वदंशोऽहं रघूत्तम ।
स्वपादभक्तिमादिश्य त्राहि मां भवसङ्कटात्॥८६॥
पूर्वं मित्रार्युदासीनास्त्वन्मायाऽऽवृतचेतसः ।
आसन्मेऽद्य भवत्पाददर्शनादेव राघव ॥८७॥
सर्वं ब्रह्मैव मे भाति क्व मित्रं क्व च मे रिपुः ।
यावत्त्वन्मायया बद्धस्तावद्गुणविशेषता ॥८८॥
सा यावदस्ति नानात्वं तावद्भवति नान्यथा ।
यावन्नानात्वमज्ञानात्तावत्कालकृतं भयम् ॥८९॥
अतोऽविद्यामुपास्ते यः सोऽन्धे तमसि मज्जति ।
मायामूलमिदं सर्वं पुत्रदारादिबन्धनम् ।
तदुत्सारय मायां त्वं दासीं तव रघूत्तम ॥९०॥
त्वत्पादपद्मर्पितचित्तवृत्ति-
स्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी ।
त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे
त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥९१॥
त्वन्मूर्तिभक्तान् स्वगुरुं च चक्षुः
पश्यत्वजस्रं स शृणोतु कर्णः ।

जिसका चित्त आपके स्वरूपमें आधे क्षणके लिये भी निश्चल होकर संलग्न हो जाता है उसका सम्पूर्ण अनर्थोंका मूलकारण अज्ञान तत्काल नष्ट हो जाता है, अतः हे राम ! मेरा मन सदा आपहीमें लगा रहे, वह आपको छोड़कर और कहीं भी न जाय ॥८२-८३॥ जिसकी वाणी एक क्षण भी 'राम-राम' ऐसा सुमधुर गान करती है, वह ब्रह्मघाती अथवा मद्यपी भी क्यों न हो, समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥८४॥ हे राम! अब मुझे वालीको जीतने अथवा स्त्री आदिका सुख प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है। मैं तो संसार-बन्धनको काटनेवाली आपकी भक्ति ही चाहता हूँ ॥८५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! यह संसार आपकी मायाका विलास है और मैं भी आपहीका अंश हूँ। अतः अपने चरणकमलोंकी भक्ति देकर मुझे इस संसार-संकटसे बचाइये ॥८६॥ पहले, जब मेरा चित्त आपकी मायासे ढँका हुआ था, मुझे अपने शत्रु-मित्र और उदासीन दिखायी देते थे। किन्तु हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणकमलोंका दर्शन पाते ही मुझे सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासता है। प्रभो ! संसारमें मेरा कौन मित्र है और कौन शत्रु ? जबतक जीव आपकी मायासे बँधा रहता है तभीतक उसपर सत्त्वादि गुणोंका प्रभाव पड़ता रहता है ॥८७-८८॥ जबतक मायाका प्रभाव रहता है तभी-तक शत्रु-मित्रादि भेद-भाव रहता है। उसके दूर होते ही समस्त भेद-भाव दूर हो जाता है। और जबतक यह अज्ञानजन्य भेद-भाव रहता है तभीतक मृत्युका भय है ॥८९॥ इसलिये जो पुरुष अविद्याकी उपासना करता है (अर्थात् अविद्याजन्य पदार्थोंकी कामना करता है) वह घोर अन्धकारमें पड़ता है। ये पुत्र-स्त्री आदि सम्पूर्ण बन्धन मायामय ही हैं अतः हे रघुश्रेष्ठ ! अपनी दासीरूप इस मायाको हमसे दूर कीजिये ॥९०॥ प्रभो ! मेरी चित्तवृत्ति सदा आपके चरणकमलोंमें लगी रहे, वाणी आपके नामसंकीर्तन और कथा-वार्तामें लगी रहे, हाथ आपके भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरा शरीर (आपके पाद-स्पर्श आदिके मिससे) सदा आपका अङ्गसङ्ग करता रहे ॥९१॥ मेरे नेत्र सर्वदा आपकी मूर्ति, आपके भक्त और अपने गुरुका दर्शन करते रहें, कान निरन्तर आपके अवतारोंकी लीलाओंका श्रवण करें