सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड - सर्ग ८: सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट

सर्ग ८ ] अरण्यकाण्ड १३५


स्वान्तःपुरे रहस्येतामशोकविपिनेऽक्षिपत् ।
राक्षसीभिः परिवृतां मातृबुद्धयाऽन्वपालयत् ॥ ६५ ॥
कृशाऽतिदीना परिकर्मवर्जिता
दुःखेन शुष्यद्वदनाऽतिविह्वला ।
राम रामेति विलप्यमाना
सीता स्थिता राक्षसवृन्दमध्ये ॥ ६६ ॥

उन्हें अपने अन्तःपुरके एकान्त देश अशोकवनमें रखा और राक्षसियोंसे घेरे रखकर मातृबुद्धिसे उनकी रक्षा करने लगा ॥ ६१–६५ ॥ उस स्थानमें अति कृश और दीनवदना सीताजी सब प्रकारका श्रृंगार छोड़कर दुःखके कारण अति शुष्कवदन और विह्वल होकर 'हा राम ! हा राम !' ऐसे विलाप करती हुई राक्षसोंके बीचमें रहने लगीं ॥ ६६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टम सर्ग

सीताजीके वियोगमें भगवान् रामका विलाप और जटायुसे भेंट ।

श्रीमहादेव उवाच
रामो मायाविनं हत्वा राक्षसं कामरूपिणम् ।
प्रतस्थे स्वाश्रमं गन्तुं ततो दूराद्ददर्श तम् ॥ १ ॥
आयान्तं लक्ष्मणं दीनं मुखेन परिशुष्यता ।
राघवश्चिन्तयामास स्वात्मन्येव महामतिः ॥ २ ॥
लक्ष्मणस्तन्न जानाति मायासीतां मया कृताम् ।
ज्ञात्वाप्येनं वञ्चयित्वा शोचामि प्राकृतो यथा ॥ ३ ॥
यद्यहं विरतो भूत्वा तूष्णीं स्थास्यामि मन्दिरे ।
तदा राक्षसकोटीनां वधोपायः कथं भवेत् ॥ ४ ॥
यदि शोचामि तां दुःखसन्तप्तः कामुको यथा ।
तदा क्रमेणानुचिन्वन्सीतां यास्येऽसुरालयम् ।
रावणं सकुलं हत्वा सीतामग्नौ स्थितां पुनः ॥ ५ ॥
मयैव स्थापितां नीत्वा याताऽयोध्द्यामतन्द्रितः ।
अहं मनुष्यभावेन जातोऽस्मि ब्रह्मणाऽर्थितः ॥ ६ ॥
मनुष्यभावमापन्नः किञ्चित्कालं वसामि कौ ।
ततो मायामनुष्यस्य चरितं मेऽनुशृण्वताम् ॥ ७ ॥
मुक्तिः स्यादप्रयासेन भक्तिमार्गानुवर्तिनाम् ।

**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर रामचन्द्रजी जब कामरूपधारी मायावी राक्षसको मारकर अपने आश्रमपर चलनेको प्रस्तुत हुए तो उन्होंने दूरसे ही दीन और उदास मुखसे लक्ष्मणको आते देखा । तब महामति रघुनाथजी मन-ही-मन सोचने लगे ॥ १-२ ॥ 'लक्ष्मणको यह पता नहीं है कि मैंने मायामयी सीता बना दी है । मैं यह जानता हूँ तथापि लक्ष्मणसे यह बात छिपाकर मैं साधारण मनुष्यके समान शोक करूँगा ॥ ३ ॥ यदि मैं उपराम होकर चुपचाप अपनी कुटीमें बैठ गया तो इन करोड़ों राक्षसोंके नाशका उपाय कैसे होगा ? ॥ ४ ॥ यदि मैं उसके लिये दुःखातुर होकर कामी पुरुषके समान शोक करूँगा तो क्रमशः सीताकी खोज करता हुआ राक्षसराज रावणके यहाँ पहुँच जाऊँगा और उसे कुलसहित मारकर अपने आप ही अग्निमें स्थापित की हुई सीताको उसमेंसे निकालकर फिर तुरन्त अयोध्या चला जाऊँगा । ब्रह्माकी प्रार्थनासे मैंने मनुष्यावतार लिया है अतः मैं कुछ समय पृथिवीपर मनुष्य-भावसे ही रहूँगा । इससे मुझ माया-मानवके चरित्रोंको सुननेवाले भक्ति-परायण पुरुषोंकी अनायास ही मुक्ति हो जायगी ।'

१३६अध्यात्मरामायण[सर्ग. ८

निश्चित्यैवं तदा दृष्ट्वा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥८॥
किमर्थमागतोऽसि त्वं सीतां त्यक्त्वा मम प्रियाम्।
नीता वा भक्षिता वापि राक्षसैर्जनकात्मजा ॥९॥

लक्ष्मणः प्राञ्जलिः प्राह सीताया दुर्वचो रुदन्।
हा लक्ष्मणेति वचनं राक्षसोक्तं श्रुतं तया ॥१०॥
त्वद्वाक्यसदृशं श्रुत्वा मां गच्छेति त्वराब्रवीत्।
रुदन्ती सा मया प्रोक्ता देवि राक्षसभाषितम्।
नेदं रामस्य वचनं स्वस्था भव शुचिस्मिते ॥११॥
इत्येवं सान्त्विता साध्वी मया प्रोवाच मां पुनः।
यदुक्तं दुर्वचो राम न वाच्यं पुरतस्तव ॥१२॥
कर्णौ पिधाय निर्गत्य यातोऽहं त्वां समीक्षितुम्।

रामस्तु लक्ष्मणं प्राह तथाऽप्यनुचितं कृतम् ॥१३॥
त्वया स्त्रीभाषितं सत्यं कृत्वा त्यक्ता शुभानना।
नीता वा भक्षिता वाऽपि राक्षसैर्नात्र संशयः ॥१४॥

इति चिन्तापरो रामः स्वाश्रमं त्वरितो ययौ।
तत्रादृष्ट्वा जनकतां विललापातिदुःखितः ॥१५॥
हा प्रिये क्व गताऽसि त्वं नासि पूर्ववदाश्रमे।
अथवा मन्विमोहार्थं लीलया क्व विलीयसे ॥१६॥

इत्याचिन्वन्वनं सर्वं नापश्यज्जानकीं तदा।
वनदेव्यः कुतः सीतां ब्रुवन्तु मम वल्लभाम् ॥१७॥
मृगाश्च पक्षिणो वृक्षा दर्शयन्तु मम प्रियाम्।
इत्येवं विलपन्नेव रामः सीतां न कुत्रचित् ॥१८॥
सर्वज्ञः सर्वथा क्वापि नापश्यद्रघुनन्दनः।
आनन्दोऽप्यन्वशोचत्तामचलोऽप्यनुधावति ॥१९॥


हिन्दी-अनुवाद:

श्रीरामचन्द्रजीने इसप्रकार निश्चयकर लक्ष्मणजीकी ओर देखकर कहा—॥५-८॥ “लक्ष्मण ! तुम प्राणप्रिया सीताको छोड़कर कैसे चले आये ? अब राक्षसगण जनकनन्दिनी सीताको हर ले गये होंगे अथवा उन्हें खा गये होंगे” ॥९॥

तब लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर रोते हुए सीताजीके दुर्वाक्य कह सुनाये। वे बोले— “आपके वाक्यके समान राक्षसके कहे हुए 'हा लक्ष्मण !' इस शब्दको सुनकर सीताजीने अति आतुरतासे रोते हुए मुझसे कहा 'फौरन जाओ'। तब मैंने उन्हें समझाया कि देवि ! यह रघुनाथजीका वाक्य नहीं है, राक्षसका शब्द है, हे शुचिस्मिते ! तुम निश्चिन्त रहो ॥१०-११॥ मेरे इस प्रकार ढाढस बँधानेपर भी साध्वी सीताजीने मुझसे जैसे दुर्बचन कहे हैं, हे रघुनाथजी ! वे आपके सामने कहने योग्य नहीं हैं ॥१२॥ अतः मैं कान मूँदकर वहाँसे आपको देखनेके लिये चला आया।”

इसपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—“लक्ष्मण ! ठीक है, तथापि तुमने उचित नहीं किया ॥१३॥ जो स्त्रीकी बातको सत्य मानकर शुभानना सीताको छोड़ दिया ! इसमें सन्देह नहीं अब राक्षसलोग या तो उन्हें हर ले गये होंगे या खा गये होंगे” ॥१४॥

इस प्रकार चिन्ता करते हुए श्रीरामचन्द्रजी बड़ी शीघ्रतासे अपने आश्रममें आये और वहाँ जानकीजीको न देखकर अति दुःखित होकर विलाप करने लगे—॥१५॥ 'हा प्रिये ! आज तुम पूर्ववत् आश्रममें दिखायी नहीं देती हो, सो कहाँ चली गयी हो ? अथवा मुझे मोहित करनेके लिये विनोदसे ही कहीं छिप रही हो ? ॥१६॥

इस प्रकार विलाप करते हुए उन्होंने सारा वन छान डाला किन्तु कहीं भी जानकीजीको न पाया। तब वे कहने लगे—“अयि वनदेवियो ! बताओ मेरी प्राणवल्लभा सीता कहाँ है ? अरे मृग, पक्षी और वृक्षो ! तुम्हीं मेरी प्रियाको दिखाओ।” ॥१७॥ इस प्रकार विलाप करते हुए सर्वज्ञ श्रीरघुनाथजीने सीताजीका कहीं कुछ भी पता न पाया ॥१८॥ अहो ! भगवान् रामने आनन्दस्वरूप होकर भी सीताजीके लिये शोक किया, निश्चल होनेपर भी उनकी खोजमें इधर-उधर

सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३७
निर्ममो निरहङ्कारोऽप्यखण्डानन्दरूपवान् ।<br>मम जायेति सीतेति विललापातिदुःखितः ॥२०॥दौड़ते फिरे तथा ममता और अहंकारसे शून्य अखण्डा- <br>नन्दस्वरूप होकर भी अत्यन्त दुःखित हो 'हे मेरी<br>प्रिये ! हे सीते !' ऐसा कहकर विलाप किया ॥१९-२०॥
एवं मायामनुचरन्नसक्तोऽपि रघूत्तमः ।<br>आसक्त इव मूढानां भाति तत्त्वविदां नहि ॥२१॥इस प्रकार मायाका अनुसरण करते हुए श्रीरघुनाथजी<br>अनासक्त होते हुए भी मूढ़ पुरुषोंको आसक्त-से प्रतीत<br>होते हैं किन्तु तत्त्वज्ञानियोंको ऐसा भ्रम नहीं<br>होता ॥ २१ ॥
एवं विचिन्वन्सकलं वनं रामः सलक्ष्मणः ।<br>भग्नं रथं छत्रचापं कूबरं पतितं भुवि ॥२२॥<br>दृष्ट्वा लक्ष्मणमाहेदं पश्य लक्ष्मण केनचित् ।<br>नीयमानां जनकतां तं जित्वान्यो जहार ताम् ॥२३॥इस प्रकार लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीने सम्पूर्ण<br>वनमें सीताजीको ढूँढते-ढूँढते पृथिवीपर टूटे रथ-<br>छत्र, धनुष और कूबर पड़े देखे । उन्हें देखकर<br>भगवान् रामने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! देखो<br>यहाँ सीताजीको ले जाते हुए किसी पुरुषको कोई अन्य<br>व्यक्ति (युद्धमें) जीतकर उन्हें हर ले गया है" ॥२२-२३॥
ततः कञ्चिद्भुवो मार्गं गत्वा पर्वतसन्निभम् ।<br>रुधिराक्तवपुर्दृष्ट्वा रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥२४॥<br>एष वै भक्षयित्वा तां जानकीं शुभदर्शनाम् ।<br>शेते विविक्तेऽतितृप्तः पश्य हन्मि निशाचरम् ॥२५॥<br>चापमानय शीघ्रं मे बाणं च रघुनन्दन ।फिर कुछ दूर जानेपर एक पर्वत-सदृश शरीरको<br>रुधिरसे लथपथ देखकर रामने कहा—॥ २४ ॥<br>"देखो, निस्सन्देह यही उस शुभदर्शना सीताको खाकर<br>अत्यन्त तृप्त हो यहाँ एकान्तमें सो रहा है; मैं इस<br>निशाचरको अभी मारे डालता हूँ ॥ २५ ॥ हे रघुश्रेष्ठ<br>लक्ष्मण ! शीघ्र ही मेरा धनुष-बाण लाओ ।"
तच्छ्रुत्वा रामवचनं जटायुः प्राह भीतवत् ॥२६॥<br>मां न मारय भद्रं ते म्रियमाणं स्वकर्मणा ।<br>अहं जटायुस्ते भार्याहारिणं समनुद्रुतः ॥२७॥<br>रावणं तत्र युद्धं मे बभूवारिचिमर्दन ।<br>| तस्य वाहान् रथं चापं च्छित्त्वाऽहं तेन घातितः ॥२८॥<br>पतितोऽस्मि जगन्नाथ प्राणांस्त्यक्ष्यामि पश्य माम् ॥रामका यह कथन सुन जटायुने भयभीत होकर<br>कहा—॥ २६ ॥ "मैं अपने ही कर्मसे मर रहा हूँ;<br>आपका कल्याण हो, आप मुझे न मारें । मैं जटायु<br>हूँ, मैंने आपकी भार्याको ले जानेवाले रावणका पीछा<br>किया था । हे शत्रुदमन ! मेरा उससे घोर युद्ध हुआ<br>और मैंने उसके रथ, घोड़े और धनुष आदि भी काट<br>डाले, किन्तु अब मैं उसका घायल किया हुआ पड़ा<br>हूँ । हे जगन्नाथ ! आप मेरी ओर देखिये, मैं अब प्राण<br>छोड़ना ही चाहता हूँ" ॥ २७-२९ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो दीनं कण्ठप्राणं ददर्श ह ।<br>हस्ताभ्यां संस्पृशन् रामो दुःखाश्रुप्लुतलोचनः ॥३०॥<br>जटायो ब्रूहि मे भार्या केन नीता शुभानना ।<br>मत्कार्यार्थं हतोऽसि त्वमतो मे प्रियबान्धवः ॥३१॥यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने (जटायुके पास जाकर)<br>उसे कण्ठगतप्राण और अति दीन अवस्थामें देखा ।<br>तब वे आँखोंमें आँसू भरकर उसपर हाथ फेरते हुए<br>बोले—॥ ३० ॥ "हे जटायो ! कहो, मेरी सुमुखी<br>भार्या सीताजीको कौन ले गया है ? अहो ! तुम मेरे<br>कार्यके लिये मारे गये ! अतः अवश्य ही तुम मेरे प्रिय<br>बन्धु हो" ॥ ३१ ॥
१३८अध्यात्मरामायण[सर्ग ८

मूल श्लोक:

जटायुः सन्नया वाचा वक्त्राद्रक्तं समुद्वमन् ।
उवाच रावणो राम राक्षसो भीमविक्रमः ॥ ३२॥
आदाय मैथिलीं सीतां दक्षिणाभिमुखो ययौ ।
इतो वक्तुं न मे शक्तिः प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः ॥३३॥
दिष्ट्या दृष्टोऽसि राम त्वं म्रियमाणेन मेऽनघ ।
परमात्माऽसि विष्णुस्त्वं मायामानुषरूपधृक् ॥३४॥
अन्तकालेऽपि दृष्ट्वा त्वां मुक्तोऽहं रघुसत्तम ।
हस्ताभ्यां स्पृश मां राम पुनर्यास्यामि ते पदम् ॥ ३५॥
तथेति रामः पस्पर्श तदङ्गं पाणिना स्मयन् ।
ततः प्राणान्परित्यज्य जटायुः पतितो भुवि ॥३६॥
रामस्तमनुशोचित्वा बन्धुवत्साश्रुलोचनः ।
लक्ष्मणेन समानाय्य काष्ठानि प्रददाह तम् ॥३७॥
स्नात्वा दुःखेन रामोऽपि लक्ष्मणेन समन्वितः ।
हत्वा वने मृगं तत्र मांसखण्डान्समन्ततः ॥३८॥
शाद्वले प्राक्षिपद्रामः पृथक् पृथगनेकधा ।
भक्षन्तु पक्षिणः सर्वे तृप्तो भवतु पक्षिराट् ॥३९॥
इत्युक्त्वा राघवः प्राह जटायो गच्छ मत्पदम् ।
मत्सारूप्यं भजस्वाद्य सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४०॥
ततोऽनन्तरमेवासौ दिव्यरूपधरः शुभः ।
विमानवरमारुह्य भास्वरं भानुसन्निभम् ॥४१॥
शङ्खचक्रगदापद्मकिरीटवरभूषणैः ।
द्योतयन्स्वप्रकाशेन पीताम्बरधरोऽमलः ॥४२॥
चतुर्भिः पार्षदैर्विष्णोस्तादृशैरेभिपूजितः ।
स्तूयमानो योगिगणै राममाभाष्य सत्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव रघुनन्दनम् ॥४३॥

जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं
सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।


हिन्दी अनुवाद:

जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती बोलीमें कहा—"हे राम ! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनान्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है। और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ ॥३२-३३॥ हे राम ! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। हे अनघ ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं ॥ ३४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करनेसे ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने करकमलोंसे स्पर्श कीजिये । फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा" ॥ ३५ ॥

तब रामचन्द्रजीने मुसकाते हुए 'बहुत अच्छा' कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ । तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लकड़ियां मँगवा उसका दाह-कर्म किया ॥ ३७ ॥

तत्पश्चात् रामजीने लक्ष्मणके सहित दुःखितचित्तसे स्नान किया और वनमें एक मृग मारकर घासपर सब ओर अलग-अलग उसके अनेकों मांसखण्ड बिखेर दिये । 'इन्हें सब पक्षिगण खायँ और उनसे पक्षिराज जटायु तृप्त हों' ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी बोले-“जटायो ! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो" ॥ ३८-४० ॥ तदनन्तर वह तुरन्त ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ हुआ ॥ ४१ ॥

उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था ॥ ४२ ॥ वैसे ही वेष-भूषावाले चार विष्णु-पार्षद उसकी सेवा कर रहे थे तथा योगिगण उसकी स्तुति कर रहे थे। तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा।४३।

जटायु बोला—"जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदिकारण हैं, तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं उन परम शान्त-स्वरूप परमात्मा

सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उपरमपरं परात्मभूतं<br>सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥४४॥श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ ४४ ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं<br>क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।<br>नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं<br>वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥४५॥जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं<br>रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।<br>शरणदमनिशं सुरागमूले<br>कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४६॥जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं<br>भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।<br>दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं<br>रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥४७॥जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो करोड़ों दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४७॥
अविरतभवभावनातिदूरं<br>भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।<br>भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं<br>शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४८॥जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४८ ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं<br>गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।<br>सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं<br>सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥४९॥जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरण-कमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुरवरदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४९ ॥
परधनपरदारवर्जितानां<br>परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।<br>परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं<br>रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥५०॥जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकार-परायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५० ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्ज-<br>मतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।<br>सितजलरुहचारुनेत्रशोभं<br>रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥५१॥जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है; तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं उन महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५१ ॥
हरिकमलजशम्भुरूपभेदा-<br>त्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।हे प्रभो ! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण