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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

अरण्यकाण्ड - सर्ग २: शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट

सर्ग २ ]अरण्यकाण्ड१०७

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
गच्छ विद्याधराशेषमायादोषगुणा जिताः।<br>त्वया मदर्शनात्सद्यो मुक्तो ज्ञानवतां वरः ॥४४॥<br>मद्भक्तिर्दुर्लभा लोके जाता चेन्मुक्तिदा यतः।<br>अतस्त्वं भक्तिसम्पन्नः परं याहि ममाज्ञया ॥४५॥"हे विद्याधर ! अब तू जा । तूने मायाके सम्पूर्ण गुण-दोषोंको जीत लिया है। तू ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ है और मेरे दर्शनके प्रभावसे तुरन्त मुक्त हो गया है ॥ ४४ ॥ संसारमें मेरी भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है, क्योंकि वह उत्पन्न होती है तो अवश्य मुक्ति देनेवाली होती है। तू मेरी भक्तिसे सम्पन्न है, इसलिये मेरी आज्ञासे तू परमधामको जा" ॥ ४५ ॥
रामेण रक्षोनिधनं सुघोरं<br>शापाद्विमुक्तिर्वरदानमेवम् ।<br>विद्याधरत्वं पुनरेव लब्धं<br>रामं गृणन्नेति नरोऽखिलार्थान् ॥४६॥इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीद्वारा किये हुए इस भयंकर राक्षसके वध, उसके शापसे मुक्त होने, वरदान पाने और पुनः विद्याधरत्व प्राप्त करनेके वृत्तान्तको जो पुरुष श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए पढ़ता या सुनता है वह अवश्य सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थोंको पाता है ॥ ४६ ॥
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इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे<br>
अरण्यकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥१॥


द्वितीय सर्ग

शरभंग तथा सुतीक्ष्ण आदि मुनीश्वरोंसे भेंट।

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संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रीमहादेव उवाच<br>विराधे स्वर्गते रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।<br>जगाम शरभङ्गस्य वनं सर्वसुखावहम् ॥ १ ॥श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! विराधके स्वर्ग सिधारनेपर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ शरभंग मुनिके सर्वसुखदायक तपोवनको गये ॥ १ ॥
शरभङ्गस्ततो दृष्ट्वा रामं सौमित्रिणा सह ।<br>आयान्तं सीतया सार्धं सम्भ्रमादुत्थितः सुधीः ॥२॥मतिमान् शरभंग श्रीरामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके सहित आते देख सहसा उठ खड़े हुए ॥ २ ॥
अभिगम्य सुसम्पूज्य विष्टरेषूपवेशयत् ।<br>आतिथ्यमकरोत्तेषां कन्दमूलफलादिभिः ॥ ३ ॥और आगे बढ़कर उनकी भली प्रकार पूजाकर उनको आसनपर बैठाया तथा कन्द-मूल-फलादिसे उनका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ ३ ॥
प्रीत्याऽऽह शरभङ्गोऽपि रामं भक्तपरायणम् ।<br>बहुकालमिहैवासं तपसे कृतनिश्चयः ॥ ४ ॥तदनन्तर मुनिवर शरभंगने भक्तवत्सल भगवान् रामसे प्रीतिपूर्वक कहा— "मैं बहुत कालसे आपके दर्शनोंकी आकांक्षासे तपस्याका निश्चयकर यहीं रहता हूँ ॥ ४ ॥
तव सन्दर्शनाकाङ्क्षी राम त्वं परमेश्वरः ।<br>अद्य मत्तपसा सिद्धं यत्पुण्यं बहु विद्यते ।<br>तत्सर्वं तव दास्यामि ततो मुक्तिं व्रजाम्यहम् ॥ ५ ॥हे राम ! आप साक्षात् परमात्मा हैं। मुझे तपस्याके द्वारा जो बहुत-सा पुण्य प्राप्त हुआ है वह सब आज आपको देकर मैं मोक्षपद प्राप्त करूँगा" ॥ ५ ॥
समर्प्य रामस्य महत्सुपुण्य-<br>फलं विरक्तः शरभङ्गयोगी ।ऐसा कह महाविरक्त मुनिवर शरभंग अपना महान् पुण्य-फल श्रीरामचन्द्रजीको समर्पण कर सीताके सहित
१०८अध्यात्मरामायण[ सर्ग २

चितिं समारोहयदप्रमेयं<br>रामं ससीतं सहसा प्रणम्य ॥ ६ ॥<br>ध्यायंश्चिरं राममशेषहृत्स्थं<br>दूर्वादलश्यामलमम्बुजाक्षम् ।<br>चीराम्बरं स्निग्धजटाकलापं<br>सीतासहायं सहलक्ष्मणं तम् ॥ ७ ॥<br>को वा दयालुः स्मृतकामधेनु-<br>रन्यो जगत्त्यां रघुनायकादहो ।<br>स्मृतो मया नित्यमनन्यभाजा<br>ज्ञात्वा स्मृतिं मे स्वयमेव यातः ॥ ८ ॥<br>पश्यत्विदानीं देवेशो रामो दाशरथिः प्रभुः ।<br>दग्ध्वा स्वदेहं गच्छामि ब्रह्मलोकमकल्मषः ॥ ९ ॥<br>अयोध्यापतिर्मेऽस्तु हृदये राघवः सदा ।<br>यद्वामाङ्के स्थिता सीता मेघस्येव तडिल्लता ॥ १० ॥ | अप्रमेय भगवान् रामको प्रणामकर सहसा चितापर चढ़ गये ॥ ६ ॥ उस समय वे मन-ही-मन सर्वान्तर्यामी, दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, चीराम्बरधारी, स्निग्ध जटाजूटधारी श्रीरामचन्द्रजीका सीता और लक्ष्मणके सहित बहुत देरतक ध्यान करते रहे ॥ ७ ॥ (फिर मन-ही-मन कहने लगे—) "अहो ! इस संसारमें श्रीरघुनाथजीको छोड़कर स्मरण करनेवालेकी कामनाओं-को इस प्रकार पूर्ण करनेवाला और कौन दयालु है ? मैं अनन्य भावसे उनका नित्य स्मरण करता था । अतः मेरे स्मरणको जानकर वे स्वयं ही चले आये ॥ ८ ॥ दशरथनन्दन भगवान् राम ! मेरी ओर देखते रहिये, मैं अपना शरीर जलाकर अब निष्पाप होकर ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ ॥ ९ ॥ मेरे हृदयमें सर्वदा अयोध्यापति श्रीरामचन्द्रजी विराजमान रहें, जिनके वामांकमें मेघमें बिजलीके समान श्रीसीताजी विराजमान हैं" ॥ १० ॥

इति रामं चिरं ध्यात्वा दृष्ट्वा च पुरतः स्थितम् ।<br>प्रज्वाल्य सहसा वह्निं दग्ध्वा पञ्चात्मकं वपुः ॥ ११ ॥<br>दिव्यदेहधरः साक्षाद्ययौ लोकपतेः पदम् । | इस प्रकार रामचन्द्रजीका बहुत देरतक ध्यान करते हुए तथा अपने सम्मुख विराजमान उनके दिव्य स्वरूपको देखते हुए मुनिवर शरभंगने अग्नि प्रज्वलित-कर अपना पाञ्चभौतिक शरीर जला डाला ॥ ११ ॥ नया दिव्य देह धारणकर साक्षात् ब्रह्मलोकको चले गये ।

ततो मुनिगणाः सर्वे दण्डकारण्यवासिनः ।<br>आजग्मू राघवं द्रष्टुं शरभङ्गनिवेशनम् ॥ १२ ॥<br>दृष्ट्वा मुनिसमूहं तं जानकीरामलक्ष्मणाः ।<br>प्रणेमुः सहसा भूमौ मायामानुषरूपिणः ॥ १३ ॥<br>आशीर्भरभिनन्द्याथ रामं सर्वहृदि स्थितम् ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे धनुर्बाणधरं हरिम् ॥ १४ ॥<br>भूमेर्भारावताराय जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः ।<br>जानीमस्त्वां हरिं लक्ष्मीं जानकीं लक्ष्मणं तथा ॥ १५ ॥<br>शेषांशं शङ्खचक्रे द्वे भरतं सानुजं तथा ।<br>अतश्चादौ ऋषीणां त्वं दुःखं मोक्तुमिहार्हसि ॥ १६ ॥<br>आगच्छ यामो मुनिसेवितानि<br>वनानि सर्वाणि रघूत्तम क्रमात् । | तदनन्तर दण्डकारण्यवासी समस्त मुनिगण श्री-रघुनाथजीका दर्शन करनेके लिये शरभंग मुनिके आश्रमपर आये ॥ १२ ॥ मुनि-समाजको देखकर माया-मानव-रूप श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने सहसा पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ १३ ॥ उन मुनीश्वरोंने सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका आशीर्वाद-द्वारा अभिनन्दन किया और फिर वे धनुर्बाणधारी श्रीहरिसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ १४ ॥ "आपने ब्रह्माकी प्रार्थनासे पृथिवीका भार उतारनेके लिये अवतार लिया है । हम यह जानते हैं कि आप साक्षात् श्रीहरि, जानकीजी लक्ष्मी, लक्ष्मणजी शेषनाग और भरत-शत्रुघ्न भगवान्‌के शंख और चक्र हैं । इसलिये आप यहाँ सबसे पहले ऋषियोंका दुःख दूर करें ॥ १५-१६ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आइये, सीता और लक्ष्मण-सहित आप हमारे साथ क्रमशः मुनीश्वरोंके समस्त

सर्ग २ ] अरण्यकाण्ड १०९


द्रष्टुं सुमित्रासुतजानकीभ्यां<br>तदा दयाऽस्मासु दृढा भविष्यति ॥१७॥आश्रमोंको देखनेके लिये चलिये। ऐसा करनेसे आपको हमपर बड़ी दया आयेगी" ॥१७॥
इति विज्ञापितो रामः कृताञ्जलिपुटैर्विभुः ।<br>जगाम मुनिभिः सार्धं द्रष्टुं मुनिवनानि सः ॥१८॥इस प्रकार हाथ जोड़कर निवेदन किये जानेपर भगवान् राम मुनियोंके साथ उनके तपोवनोंको देखने-के लिये चले ॥ १८ ॥
ददर्श तत्र पतितान्यनेकानि शिरांसि सः ।<br>अस्थिभूतानि सर्वत्र रामो वचनमब्रवीत् ॥१९॥वहाँ उन्होंने सब ओर बहुत-सी खोपड़ियाँ पड़ी देखीं। उन्हें देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे पूछा-॥ १९ ॥
अस्थीनि केषामेतानि किमर्थं पतितानि वै ।<br>तमूचुर्मुनयो राम ऋषीणां मस्तकानि हि ॥२०॥"ये हड्डियाँ किनकी हैं और इस तपोभूमिमें कैसे पड़ी हैं?" तब मुनीश्वरोंने कहा-"हे राम ! ये ऋषियोंके मस्तक हैं ॥ २०॥
राक्षसैर्भक्षितानीश प्रमत्तानां समाधितः ।<br>अन्तरायं मुनीनां ते पश्यन्तोऽनुचरन्ति हि ॥२१॥हे समर्थ ! इन्हें राक्षसोंके खा लिया है, वे राक्षस समाधिसे विरत हुए मुनीश्वरोंको भक्षण करनेके लिये मौका देखते हुए जहाँ-तहाँ घूमते रहते हैं" ॥ २१ ॥
श्रुत्वा वाक्यं मुनीनां स भयदैन्यसमन्वितम् ।<br>प्रतिज्ञामकरोद्रामो वधायाशेषरक्षसाम् ॥२२॥मुनियोंके ये भय और दीनतापूर्ण वचन सुनकर श्रीराम-चन्द्रजीने समस्त राक्षसोंका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की ॥ २२ ॥
पूज्यमानः सदा तत्र मुनिभिर्वनवासिभिः ।<br>जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः ॥२३॥<br>उवास कतिचित्तत्र वर्षाणि रघुनन्दनः ।<br>एवं क्रमेण संपश्यन्नृषीणामाश्रमान्विभुः ॥२४॥इस प्रकार क्रमशः मुनीश्वरोंके आश्रम देखते हुए श्रीरघुनाथजी वनवासी मुनियोंद्वारा नित्य पूजित हुए सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँ कुछ वर्ष रहे ॥ २३-२४॥
सुतीक्ष्णस्याश्रमं प्रागात्प्रख्यातमृषिसङ्कुलम् ।<br>सर्वर्तुगुणसम्पन्नं सर्वकालसुखावहम् ॥२५॥तदनन्तर वे सुविख्यात सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें गये जो ऋषियोंसे घिरा हुआ समस्त ऋतुओंके गुणोंसे युक्त और सब समय सुखदायक था ॥ २५॥
राममागतमाकर्ण्य सुतीक्ष्णः स्वयमागतः ।<br>अगस्त्यशिष्यो रामस्य मन्त्रोपासनतत्परः ।<br>विधिवत्पूजयामास भक्त्युत्कण्ठितलोचनः ॥२६॥रामका आगमन सुन राम-मन्त्रके उपासक और अगस्त्यके शिष्य सुतीक्ष्ण उन्हें लेनेके लिये स्वयं आगे आये और उनकी विधिवत् पूजा की । उस समय सुतीक्ष्णके नेत्र भक्तिवश भगव-द्दर्शनके लिये अति उतावले हो रहे थे ॥ २६ ॥
सुतीक्ष्ण उवाच<br>त्वन्मन्त्रजाप्यहमनन्तगुणाममेय<br>सीतापते शिवविरिञ्चिसमाश्रिताङ्घ्रे ।<br>संसारसिन्धुतरणामलपोतपाद<br>रामाभिराम सततं तव दासदासः ॥२७॥**सुतीक्ष्ण बोले—**हे अनन्त-गुण अप्रमेय सीता-पते ! मैं आपका ही मन्त्र जपता हूँ । हे अभिराम राम ! आपके चरण संसार-सागरसे पार करनेके लिये सुदृढ पोत (जहाज) स्वरूप हैं; शिव और ब्रह्मा सर्वदा उनकी सेवा करते हैं। हे नाथ ! मैं सर्वदा आपके दासोंका दास हूँ ॥ २७ ॥
मामद्य सर्वजगतामविगोचरस्त्वं<br>त्वन्मायया सुतकलत्रगृहान्धकूपे ।<br>मग्नं निरीक्ष्य मलपुद्गलपिण्डमोह-<br>पाशानुबद्धहृदयं स्वयमागतोऽसि ॥२८॥आप समस्त संसार-की इन्द्रियोंके अविषय हैं, तथापि इस मल-मूत्रके पुतले शरीरके मोह-पाशमें जिसका हृदय बँधा हुआ है ऐसे मुझ दीनको अपनी ही मायासे मोहित होकर पुत्र-कलत्र और गृह आदिके अन्धकूपमें पड़ा देखकर आप स्वयं ही मुझे अपना पुण्य-दर्शन देनेके लिये पधारे हैं ! ॥ २८ ॥ आप समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराज-
११०अध्यात्मरामायण[ सर्ग २
त्वं सर्वभूतहृदयेषु कृतालयोऽपि<br>त्वन्मन्त्रजाप्यविमुखेषु तनोषि मायाम्<br>त्वन्मन्त्रसाधनपरेष्वपयाति माया<br>सेवानुरूपफलदोऽसि यथा महीपः ॥ २९ ॥मान हैं, तथापि जो लोग आपके मन्त्रजापसे विमुख हैं उन्हें आप अपनी मायासे मोहित करते हैं और जो उस मन्त्रके जापमें तत्पर हैं उनकी माया दूर हो जाती है। इस प्रकार राजाके समान आप सबको उनकी सेवाके अनुसार फल देनेवाले हैं ॥ २९ ॥ हे ईश ! वास्तवमें एकमात्र आप ही इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण हैं; तथापि मुग्धचित्त पुरुषोंको त्रिगुणमयी मायाके कारण ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आदि विविध रूपोंमें भासते हैं; जिस प्रकार जलके पात्रोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे सूर्य अनेक होकर भासता है ॥ ३० ॥ हे राम ! आप अज्ञान-से सर्वथा परे हैं। तथापि आपके चरणकमलोंको आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। (इससे विदित होता है कि) सबके साक्षी होनेसे आप असत्पुरुषोंको अगोचर होकर भी जिनका चित्त आपके मन्त्रजापसे शुद्ध हो गया है उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आप रूपरहित हैं, तथापि अपने ही माया-विलाससे धारण किये आपके मनोहर मनुष्य-वेष-धारी स्वरूपको मैं देख रहा हूँ। आपका यह रूप करोड़ों कामदेवोंके समान कान्तिमान् है और कमनीय धनुर्बाण धारण किये है। आपका हृदय दयार्द्र तथा मुख मनोहर मुसकानयुक्त है ॥ ३२ ॥ जो सीताजीसे युक्त हैं, कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं, सर्वथा अजेय हैं, जिनके चरणकमल नित्य श्रीसुमित्रानन्दनसे सेवित हैं और जिनकी नीलकमलके समान आभा है उन अनन्तगुणसम्पन्न शान्तमूर्ति सौभाग्यस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३३ ॥ हे राम ! जो लोग आपके स्वरूपको देश-काल आदि समस्त उपाधियोंसे रहित और चिद्घन प्रकाशस्वरूप जानते हैं, वे भले ही वैसा ही जानें; किन्तु मेरे हृदयमें तो, आज जो प्रत्यक्षरूपसे मुझे दिखायी दे रहा है, यही रूप भासमान होता रहे। इसके अतिरिक्त मुझे और किसी रूप की इच्छा नहीं है ॥ ३४ ॥
विश्वस्य सृष्टिलयसंस्थितिहेतुरेक-<br>स्त्वं मायया त्रिगुणया विधिरीशविष्णू<br>भासीश मोहितधियां विविधाकृतिस्त्वं<br>यद्वद्रविः सलिलपात्रगतो ह्यनेकः ॥ ३० ॥
प्रत्यक्षतोऽद्य भवतश्चरणारविन्दं<br>पश्यामि राम तमसः परतः स्थितस्य ।<br>दृक्प्रत्यस्त्वमसतामविगोचरोऽपि<br>त्वन्मन्त्रपूतहृदयेषु सदा प्रसन्नः ॥ ३१ ॥
पश्यामि राम तव रूपमरूपिणोऽपि<br>मायाविडम्बनकृतं सुमनुष्यवेषम् ।<br>कन्दर्पकोटिसुभगं कमनीयचाप-<br>बाणं दयार्द्रहृदयं स्मितचारुवक्त्रम् ॥ ३२ ॥
सीतासमेतमजिनाम्बरमप्रधृष्यं<br>सौमित्रिणा नियतसेवितपादपद्मम् ।<br>नीलोत्पलद्युतिमनन्तगुणं प्रशान्तं<br>तद्भागधेयमनिशं प्रणमामि रामम् ॥ ३३ ॥
जानन्तु राम तव रूपमशेषदेश-<br>कालाद्युपाधिरहितं घनचित्रप्रकाशम् ।<br>प्रत्यक्षतोऽद्य मम गोचरमेतदेव<br>रूपं विभातु हृदये न परं विकाङ्क्षे ॥ ३४ ॥
इत्येवं स्तुवतस्तस्य रामः सस्मितमब्रवीत् ।<br>मुने जानामि ते चित्तं निर्मलं मदुपासनात् ॥ ३५ ॥<br>अतोऽहमागतो द्रष्टुं मदृते नान्यसाधनम् ।<br>मन्मन्त्रोपासका लोके मामेव शरणं गताः ॥ ३६ ॥सुतीक्ष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे मुसकाकर कहा—"हे मुने ! मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारा चित्त मेरी उपासनासे निर्मल हो गया है ॥ ३५ ॥ और तुम्हारा मेरे अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है, इसीलिये मैं तुम्हें देखनेके लिये आया हूँ। संसारमें जो लोग मेरे मन्त्रकी उपासना करते हैं और