१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
३७८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
पञ्चाङ्गानि भवन्ति चत्वारः पादाश्चत्वार्यङ्गानि भवन्ति सप्रणवं
सर्वं पञ्चमं भवति हृदयाय नमः शिरसे स्वाहा शिखायै वषट् कव-
चाय हुं अस्त्राय फडिति प्रथमं प्रथमेन संयुज्यत द्वितीयं द्वितीयेन
तृतीयं तृतीयेन चतुर्थं चतुर्थेन पञ्चमं पञ्चमेन व्यतिषजति व्यति-
षिक्तावा इमे लोकास्तस्माद्व्यतिषिक्तान्यङ्गानि भवन्ति ओमित्ये-
तदक्षरमिदं सर्वं तस्मात्प्रत्यक्षरमुभयत ओंकारो भवति अक्षराणां
न्यासमुपदिशन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ २ ॥
आठ अक्षरों का अनुष्टुप् मन्त्र का प्रथम चरण है। आठ-आठ
अक्षरों के ही शेष तीन चरण हैं। इस प्रकार चारों पदों में बत्तीस अक्षर
होते हैं। इस अनुष्टुप् से ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि हुई है। सब का
उपसंहार भी अनुष्टुप् के द्वारा ही होता है। इसके चार अङ्गों का चरणों
के रूप में ऊपर वर्णन हुआ है, परन्तु प्रणव उसका पांचवां अङ्ग है।
इस प्रकार अनुष्टुप् पांच अङ्गों वाला है। मनुष्य शरीर के भी पांच
अङ्ग हैं—हृदय, शिर, शिखा, बाहुमूल और मस्तक। दोनों के पांच-
पांच अङ्ग होने से मन्त्र के प्रथम अङ्ग का हृदय से संयोग करे, दूसरे
अंग का शिर से, तीसरे अंग का शिखा से, चौथे अंग का दोनों बाहुमूलों
से तथा पांचवें अंग का मस्तक से संयोग करे।
जैसे सम्पूर्ण लोक परस्पर मिले हुए हैं वैसे ही दोनों के अंग भी
परस्पर सम्बद्ध हैं। ओंकार को सम्पूर्ण विश्व माना गया है। इसीलिए
अनुष्टुप् के प्रत्येक अक्षर के दोनों ओर ओंकार का सम्पुट देना
चाहिए। ब्रह्मज्ञानीजन इस मन्त्र के प्रत्येक अक्षर के न्याय की बात
कहते हैं ॥ २ ॥
तस्य ह वा उग्रं प्रथमं स्थानं जानीयाद्यो जानीते
सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं द्वितीयं स्थानं महाविष्णुं तृतीयं
स्थानं ज्वलन्तं चतुर्थं स्थानं सर्वतोमुखं पञ्चमं स्थानं नृसिंह
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७६
षष्ठं स्थानं भीषणं सप्तमं स्थानं भद्रमष्टमं स्थानं मृत्युमृत्युं नवमं
स्थानं नमामि दशनं स्थानमहमेकादशं स्थानं जानीयाद्यो जानीते
सोऽमृतत्वं च गच्छति एकादशपदा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा
सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमिदमुपसंहृतं तस्मात्सर्वानुष्टुभं
जानीयाद्यो जानीते सोऽम तत्वं च गच्छति ॥३॥
अनुष्टुप् का प्रथम स्थान 'उग्रम्'पद है। जो इसे जानता है, वह
अमर हो जाता है। द्वितीय स्थान 'वीरम्' है, तृतीय स्थान 'महाविष्णुम्'
है, चतुर्थ स्तान 'ज्वलन्तम्' है, पञ्चम स्थान 'सर्वतोमुखम्' है छठा स्थान
'नृसिंहम्' है, सातवां स्थान 'भीषणम्' आठवां स्थान 'भद्रम्' है, नौवां
स्यान, 'मृत्युमृत्युम्' है, दसवां स्थान 'नमामि' है और ग्यारहवां स्थान
'अहम्' है इस प्रकार जाने। जो ऐसा जानता है वह अमृतत्त्व को प्राप्त
होता है। यह अनुष्टुप् वृत्ति ग्यारह पदों वाली है, इसी के द्वारा सम्पूर्ण
जगत् की सृष्टि हुई है, इसी के द्वारा सब का उपसंहार होता है। इस
लिये यह सब अनुष्टुप् की ही महिमा है। जो ऐसा जानता है, वह
अमृतत्व को पाता है ॥३॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नथ कस्मादुच्यत उग्रमिति स
होवाच प्रजापतिर्यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वाना-
त्मनः सर्वाणि भूतान्युद्गृह्णात्यजस्रं सृजति विसृजति वासय-
त्युद्ग्राह्यत उद्गृह्यते स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीम-
मुपहतनुमुग्रं मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यत्ते अस्मन्निवपन्तु
सेनाः तस्मादुच्यत उग्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते वीरमिति
यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि
भूतानि विरमति विरामयत्यजस्रं सृजति विसृजति वासयति
यो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामस्त-
स्मादुच्यते वीरमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते महाविष्णुमिति ॥
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३८० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
[Main Text]
यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि
भूतानि व्याप्नोति व्यापयति स्नेहो यथा पललपिण्डं शान्त-
मूलमोतं प्रोतमनुव्यास व्यतिषिक्तो व्याप्यते व्यापयते यस्मान्न
जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा प्रजापतिः
प्रजया संविदानः त्रीणि ज्योतींषि सचते सषोडशीं तस्मा
दुच्यते महाविष्णुमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते ज्वलन्तमिति
यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि
स्वतेजसा ज्वलति ज्वालयति ज्वाल्यते ज्वालपते सविता
प्रसविता दीप्तो दीपयन्दीन्यमानः ज्वल ज्वलिता तपन्वित-
पन्तसंतपन्नोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणस्तस्मा-
दुच्यते ज्वलन्तमिति ॥
यह सुनकर कर देवताओं ने प्रश्न किया—'नृसिंह भगवान् के
लिए 'उग्रम्' क्यों कहा गया है ?'
प्रसिद्ध प्रजापति ने इसका उत्तर दिया—'भगवान् नृसिंह अपनी
महिमा से सब देवताओं, सब भूतों सब आत्माओं और सब लोकों को
ऊपर उठाते हैं, वही उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार करते हैं, वे ही
उन्हें अपने में लीन कर लेते हैं। संसार पर दूसरों से अनुग्रह कराते
और स्वयं भी करते हैं। इसीलिए उन्हें उग्र कहा जाता है। इस विषय
में ऋग्वेद में कहा है, श्रुतियां जिनकी स्तुति करती हैं, उन्हीं परमेश्वर
की स्तुति करो। वे हृदय रूप गर्त में हैं, नवीन तरुणाई से शोभाय-
मान हैं, सिंह रूप से प्रकट होते हुए भी भक्तों के लिये विकराल नहीं
हैं। सब पर कृपा करने के लिये वे सब स्थान पर तथा सब
के समीप पहुँचते हैं। वे सन्तजनों पर कृपा और दुष्टों को नष्ट करने
वाले हैं, इसलिए उग्र कहे जाते हैं। हे भगवान नृसिंह ! आप इस
स्तुति से संतुष्ट होकर मुझ स्तोता को सुखी करो। आपकी भयङ्कर
सेना हम पर आक्रमण न करे, वह कहीं अन्यत्र जाय । इस मंत्र में
[Page-header: नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१ ]
भगवान् नृसिंह को 'उग्र' कह कर स्तुति की है, इसलिए उन्हें उग्र कहा
गया है।'
इसके पश्चात् देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवन् ! प्रभु श्रीनृसिंह
को 'वीर' क्यों कहा गया है ?' इस पर ब्रह्माजी ने कहा—'भगवान
नृसिंह अपनी महिमा के द्वारा ही सब भूतों के साथ विभिन्न प्रकार
के खेल खेलते हैं, वही सब लोकों और सब देवताओं में व्याप्त हैं, सभी
आत्मा उन्हीं का प्रतिरूप मात्र हैं। वही सृष्टि के पालन और विनाश
करने वाले हैं। सम्पूर्ण विश्व प्रलय के पश्चात् उन्हीं में लीन हो जाता
है, इसलिए वे 'वीर' कहे गए हैं ।
ऋग्वेद में भी भगवान् को वीर कहा गया है, वे भक्तों पर
तुरन्त कृपा करने वाले हैं, वे कर्मठ हैं क्योंकि सोमयाग में पाषण हाथ
में लेकर अध्वर्यु आदि के रूप में सोम निष्पीडन करते हैं। यही देव-
ताओं की रचना करने की कामना करते रहते हैं।'
देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवान को 'महाविष्णु क्यों कहा
जाता है ? 'ब्रह्माजी' बोले—'भगवान नृसिंह अपनी महिमा से सब देव-
ताओं, सब आत्माओं, समस्त भूतों और सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त करते
हैं। मांस पिण्ड में चिकनाई के व्याप्त रहने के समान देह के सब
अवयवों में व्याप्त हैं। यह संसार प्रलयकाल में, उनमें ही लय हो जाता
है, क्योंकि यह उन्हीं से संबंधित है।'
ऋग्वेद में भी इनकी महिमा का वर्णन हुआ है—जो सर्वव्यापी
होने से समस्त संसार में व्याप्त हैं, जो प्रजा-पालक और प्रजा के
उपास्यदेव हैं, जिनसे प्रबल अन्य कोई भी प्रकट नहीं हुआ, वे
भगवान सोलह कलाओं से युक्त होकर तीनों प्रकार के तेजों में व्याप्त
रहते हैं। इसलिए इन्हें 'महाविष्णु' कहा जाता है।
देवता पूछने लगे—"यह 'ज्वलन्त' क्यों कहे जाते हैं ?" प्रजापति
३८२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
ने उत्तर दिया- "भगवान् अपने महत्त्व से ही सब देवताओं, सब
आत्माओं सब लोकों और सब भूतों को अपने तेज से प्रकाशित
करते और उसी तेज से स्वयं भी प्रकाशित रहते हैं। सभी लोक
और ज्योतियाँ उनके तेज से प्रकाशित होकर अपना प्रकाश फैलाते
हैं। ऋग्वेद में कहा कि—"वे सविता हैं, प्रसविता भी वही हैं,
वे प्रकाश से युक्त हैं, वे स्वयं प्रज्ज्वलित रहकर दूसरों को भी
प्रज्ज्वलित करते हैं। वे स्वयं तपते और दूसरों को तपाते हैं। वे अपने
तेज से ही कान्तियुक्त हैं तथा अपनी कान्ति से दूसरों को कान्तिमान
बनाते हैं। वे परम कल्याणरूप एवं सुशोभित हैं तथा अन्य पदार्थ
उन्हीं के द्वारा सुशोभित होते हैं। इसीलिये ज्ञानीजन उन्हें 'ज्वलन्त'
कहते हैं।
अथ कस्मादुच्यते सर्वतोमुखमिति यस्मात्स्महिम्ना
सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि स्वयमनिन्द्रि
योऽपि सर्वतः पश्यति सर्वतः शृणोति सर्वतो गच्छति सर्वत
आदत्ते सर्वगः सर्वगतस्तिष्ठा । एकः पुरन्ताद्य इदं बभूव यतो
बभूव भुवनस्य गोपाः । यमप्येति भुवनं सांपराये नमामि तमहं
सर्वतोमुखम् । तस्मादुच्यते सर्वतोमुखमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते
नृसिंहमिति यस्मात्सर्वेषां भूतानां ना वीर्यंतमः श्रेष्ठतमश्च सिंहो
वीर्यतमः श्रेष्ठतमश्च । तस्मान्नृसिंह आसीत्परमेश्वरो जगद्धितं
वा एतद्रू पं यदक्षरं भवति प्रतिद्विष्णुस्तवते वीर्याय मृगो न भीमः
कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेण्वधिक्षियन्ति भुव-
नानि विश्वा तस्मादुच्यते नृसिंहमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते
भीषणमिति यस्माद्भीषणं यस्य रूपं दृष्ट्वा सर्वे लोकाः सर्वे
देवाः सर्वाणि भूतानि भीत्या पलायन्ते स्वयं यतः कुतश्च न
बिभेति भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः भीषास्मादग्नि-
श्चेन्द्रस्य मृत्युर्धावति पञ्चम इति तस्मादुच्यते भीषणमिति ॥
अथ कस्मादुच्यते भद्रोमिति यस्मात्स्वयं भद्रो भूत्वा सर्वदा भद्रं
[Header]
नृसिंहपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३८३
ददाति रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः । भद्रं
कर्णेभिः शृणुयामः देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरंगै-
स्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः तस्मादुच्यते भद्रमिति ॥
अथ कस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति यस्मात्स्वमहिम्ना स्वभक्तानां
स्मृत एव मृत्युमपमृत्युं च मारयति । य आत्मदा बलदा यस्य
विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः यस्य छायामृतं यो मृत्युमृत्युः
कस्मै देवाय हविषा विधेम । तस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति ॥
अथ कस्मादुच्यते नमामीति यस्माद्यं सर्वे देवा नमन्ति मुमुक्षवो
ब्रह्मवादिनश्च । प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युकथ्यं यस्मिन्निन्द्रो
वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे तस्मादुच्यते नमा-
मीति ॥ अथ कस्मादुच्यतेऽहमिति । अहमस्मि प्रथमजा ऋतऽस्य
पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाभिः । यो मा ददाति स इदेवमावाः
अहमन्नमन्नमदन्तमद्मि अह ं विश्वं भुवनमभ्यभवां सुवर्णज्योतिर्र्यं
एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ इति द्वितीयोपनिषत् ॥ २ ॥
देवता पूछने लगे—'वे 'सर्वतोमुख' किस लिये कहे जाते हैं ?'
ब्रह्माजी ने कहा— सब प्राणियों, आत्माओं, देवताओं और सभी लोकों
को वे अपनी महिमा के द्वारा ही, इन्द्रियों से परे होते हुए भी सबको
सब ओर देखते हैं। वे सब ओर से सुनते, सब ओर से ग्रहण करते और
सब ओर गमन करते हैं । वे सभी स्थानों में समान रूप से व्याप्त
रहते हैं । ऋग्वेद में उनकी महिमा का वर्णन इस प्रकार किया गया
है—"जो भगवान सृष्टि से पूर्व अकेले ही थे और स्वयं ही इस विश्व
रूप से उत्पन्न हो गए, जिनके द्वारा इस विश्व की सृष्टि हुई, जो सब
लोकों का पालन करते हैं तथा समस्त सृष्टि अन्त में, उन्हीं में
लीन हो जाती है, वे भगवान सर्वतोमुख हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता
हूँ।' इसमें भगवान को सर्वतोमुख कहा गया है, इसलिए वे 'सर्वतोमुख'
कहाते हैं !
३८४ ] नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
देवताओं ने पूछा—"भगवान को नृसिंह क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी
बोले—'सब प्राणियों में मानव का पराक्रम प्रसिद्ध है और सिंह भी
सबसे अधिक पराक्रमी होता है। अतः नर और सिंह दोनों के संयुक्त रूप
से पराक्रम में अधिक प्रबलता होती है, इसीलिए भगवान ने यह रूप
धारण किया है। वे अपने इस रूप से विश्व का कल्याण करते हैं।
उनका यह स्वरूप अविनाशी एवं सनातन है। वेद में कहा है—"भगवान
विष्णु सिंह रूप धारण कर स्तोताओं द्वारा प्रस्तुत होते हैं। विभिन्न
स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की जाती है। स्तोतागण विभिन्न प्रकार की
शक्तियों को पाने के लिए उनकी स्तुति करते हैं। सिंह रूपधारी होने
पर भी भगवान् अपने भक्तों के लिए भयङ्कर नहीं होते। वे पृथ्वी और
पर्वत सर्वत्र हैं, सब रूपों में स्थिति हैं और स्तोता की वाणी में भी
निहित हैं। इनके तीन डगों में लीन लोक समा गए। इसीलिए उन्हें
'नृसिंह कहा जाता है।'
देवताओं ने प्रश्न किया—"उन्हें भीषण क्यों कहा जाता है ?"
प्रजापति ने कहा—"इनके भीषण रूप से सब भयभीत होते हैं। सभी
देवता, सभी प्राणी और सब लोक इनकी विकरालता से कांप कर भागते
हैं, परन्तु यह किसी से भी नहीं डरते। वेद में कहा है— "इनके भय से
ही सूर्य समय से प्रकाशित होता है। इनके भय से ही वायु चलता है
और अग्नि तपता है, इन्द्र भी इन्हीं के भय से वर्षा आदि कर्म करते हैं
तथा मृत्यु भी इनके भय से ही प्राणियों को देह से मुक्त करती है।
इसीलिए यह 'भीषण' कहे जाते हैं।"
देवताओं ने पूछा—"इन्हें भद्र क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी ने
उत्तर दिया—"भद्र का तात्पर्य कल्याण से है। वे भगवान् कल्याण
स्वरूप हैं और दूसरों का भी कल्याण करते हैं। वे स्वयं कान्तिमान हैं
और दूसरों को भी कान्ति प्रदान करते हैं। वे स्वयं शोभा सम्पन्न हैं
इसलिए दूसरों को भी शोभा सम्पन्न करते हैं। वेद में कहा है कि
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८५
“देवताओ ! हम यज्ञ करते हुए कानों से भद्र (कल्याण) सुनें—कल्याण
का ही दर्शन करें। हम भगवान का स्तोत्र करते हुए अपने दृढ़ अङ्गों
से ऐसी आयु पावें जो हमारे उपास्य भगवान के भजन, चिन्तनादि में
काम आवे। इस प्रकार 'भद्र' वर्णित होने से भगवान को 'भद्र'
कहते हैं।'
देवताओं ने पूछा कि "भगवान को मृत्यु-मृत्यु क्यों कहा जाता
है ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि 'अपनी महिमा द्वारा अपने भक्तों के
स्मरण करते ही उनकी मृत्यु और अपमृत्यु को भी नष्ट कर डालते
हैं। वेद का कथन है कि जिनकी अनुज्ञा में देवगण मस्तक झुकाकर
रहते और आज्ञा पालन करते हैं, जिनकी छाया अमृत स्वरूप है, जो
आत्मा और शक्ति के देने वाले हैं, जो मृत्यु के लिए भी मृत्यु स्वरूप
ऐसे एक एवं अद्वितीय भगवान के समक्ष हम स्वयं उपस्थित होकर
आराधना करते हैं।' इसी के अनुसार भगवान् को 'मृत्यु-मृत्यु'
कहते हैं।'
देवताओं ने प्रश्न किया कि 'मन्त्रराज में 'नमामि' पद क्यों
प्रयुक्त हुआ है ?' प्रजापति ने उत्तर दिया 'कि जिन भगवान को सभी
देवता, ब्रह्मवादीजन तथा मुक्ति की कामना वाले साधक नमस्कार
करते हैं, इसलिए उन्हें नमस्कार करना चाहिए।' वेद में कहा है
कि जिन भगवान को लक्ष्य करके ही ब्रह्मा अपने स्तवन में नमस्कार
करते हैं, वे भगवान ब्रह्मा और वेदों के रक्षक हैं। इन्द्र, वरुण, मित्र,
अर्यमा आदि के आश्रयभूत हैं, इसीलिए उनके निमित्त 'नमामि' शब्द
प्रयुक्त हुआ है।'
देवताओं ने पुनः प्रश्न किया कि 'मंत्र में 'अहम्' पद क्यों
प्रयुक्त हुआ है ?' इसके उत्तर में ब्रह्माजी ने कहा कि 'श्रुति में कहा
है कि मैं अमृत का भण्डार हूँ। देवताओं से भी पूर्व मैं प्रकट हुआ हूँ।
मैं ही इस प्रकट और अप्रकट संसार से पूर्व प्रकट होने वाला आत्मा
३८६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
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हूँ। हे देव ! तुम मुझे आश्रय प्रदान करते हो, वैसे तुमने मेरा
पालन किया है। मैं अन्न हूँ, अन्न भक्षक का भी भक्षक बन जाता हूँ।
सूर्य के प्रकाश के समान यह सम्पूर्ण विश्व मेरे प्रकाश के सामने फीका
पड़ जाता है। जो इस प्रकार का ज्ञाता है; वही यथार्थ उपासना करने
वाला है। यही महोपनिषत् है।
॥ द्वितीय उपनिषद् समाप्त ॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नर-
सिंहस्य शक्तिं बीजं नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच प्रजापतिर्माया
वा एषा नारसिंही सर्वमिदं सृजति सर्वमिदं रक्षति सर्वमिदं
संहरति तस्मान्मायामेतां शक्तिं विद्याद्य एतां मायां शक्तिं वेद
स पाप्मानं तरति स मृत्युं तरति स संसारं तरति सोऽमृतत्वं च
गच्छति महतीं श्रियतश्नुते मीमासन्ते ब्रह्मवादिनो ह्रस्वा दीर्घा-
प्लुता चेति ॥ यदि ह्रस्वा भवति सर्वं पाप्मानं दहत्यमृतत्वं च
गच्छति यदि दीर्घा भवति महतीं श्रियमाप्नोत्यमृतत्वं च गच्छति
यदि प्लुता भवति ज्ञानवान्भवत्यमृतत्वं च गच्छति तदेतदृषिणो-
क्तं निदर्शनं स ईं पाहि य ऋजीषी तरुतः श्रियं लक्ष्मीमौपलाम-
म्बिकां गां षष्ठीं च यामिन्द्रसेनेत्युदाहुः तां विद्यां ब्रह्मयोनिं सरूपा-
मिहायुषे शरणमहं प्रपद्ये।सर्वेषां वा एतद्भूतानामाकाशः परा-
यणं सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव जायन्त आकाशादेव
जातानि जीवन्त्याकाशं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तस्मादाकाशं बीजं
विद्यात्तदेव ज्यायस्तदेतदृषिणोक्तं निदर्शनं हंस शुचिषद्वसुरन्त-
रिक्षद्वोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ॥ नृषद्वरसदृतसद् व्योम-
दब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ य एवं वेदेति
महोपनिषत् ॥
॥ इति तृतीयोपनिषत् ॥
प्रसिद्ध देवगण जिज्ञासु भाव से प्रजापति ब्रह्माजी के सामने
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८७
नतमस्तक होकर बोले- 'भगवान ! मंत्रराज आनुष्टुभ की शक्ति और
बीज का हमें उपदेश कीजिये ।'
इस पर ब्रह्माजी ने कहा- "भगवान की शक्तिभूता माया ही इस
विश्व की रचना, रक्षा और विनाश करती है। इसलिए यह माया ही
शक्ति है। इस माया को शक्ति रूप से जानने वाला ज्ञानी पापों से
पार होता है और भव-सागर से तर कर अमृतत्व को प्राप्त होता है,
और वह इस लोक में भी महान् सुख-समृद्धि का उपभोग करता है।
ब्रह्मवादी जन सोचते हैं कि भगवान की माया शक्ति लघु
दीर्घ अथवा प्लुत है ? यदि लघु है तो जो कोई इसे लघु जाने वह
अपने सब पापों को उसके द्वारा भस्म कर देता और अमृतत्व को पाता
है। यदि दीर्घ है तो जो कोई उसके इस रूप को जानता है वह महान्
ऐश्वर्य प्राप्त करता हुआ अंत में अमर हो जाता है। यदि वह प्लुत
है तो जो उसके इस रूप का ज्ञाता है, वह अत्यन्त ज्ञानी होता और
अमृतत्व प्राप्त करता है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि- "हे माया
रूप बिन्दुममय स्वर ! मैं इस भव-सागर से पार होने की कामना वाला
हूँ तो साधन के निमित्त दीर्घ आयु भी प्राप्त करना चाहता हूँ। इस
उद्देश्य से मैं भगवान की शक्ति श्री, लक्ष्मी शङ्कर भगवान की शक्ति
अम्बिका, ब्रह्मशक्ति सरस्वती, स्कन्दशक्ति षष्ठी, इन्द्र-शक्ति इन्द्रसेना और
ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली साक्षात् प्रकट विद्या-शक्ति का
आश्रय ग्रहण करता हूँ । तुम सभी उपरोक्त शक्तियों के सहित मेरी
रक्षा करो।'
यह सभी प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं, इसलिए आकाश
ही सब प्राणियों का आश्रयभूत है। उत्पन्न प्राणी आकाश से ही
जीवन धारण करते और अपना देह त्यागते और आकाश में ही लीन
हो जाते हैं। अतः आकाश को ही सम्पूर्ण विश्व का बीज मानना
चाहिए। इस विषय में यह दृष्टांत है कि जो पुरुषोत्तम भगवान् अपने
३८८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
विशुद्ध परमधाम में स्वयं प्रकाशित हैं, वे ही अन्तरिक्ष में निवास करने
वाले वसु हैं। वे ही घरों में आने वाले अतिथि हैं। वे ही यज्ञ की वेदी
में प्रतिष्ठित अग्नि और उसमें आहुति देने वाले होते हैं। वे आकाश
और स्वर्गलोक में निवास करते हैं, वे मर्त्यलोक में और सर्वश्रेष्ठ
सत्यलोक में रहते हैं। वे ही पृथिवी, जल, पर्वतों और शुभ कर्मों में
प्रकट होते हैं, वे ही परम सत्य एवं सबसे महान् हैं।' इस प्रकार
जानने वाला ज्ञानी पूर्व कथित फलों को प्राप्त करता है। यह
महोपनिषद् है।
॥ तृतीय उपनिषद् समाप्त ॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नाष्टुभस्य मन्त्रराजस्य
नारसिंहस्याङ्गमन्त्रान्नो ब्रूहि भगव इति सहोवाच प्रजापतिः
प्रणवं सावित्रीं यजुर्लक्ष्मीं नृसिंहगायत्रीमित्यङ्गानि जानीयाद्यो
जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ १ ॥
प्रसिद्ध देवताओं ने जिज्ञासु भाव से ब्रह्माजी ने प्रश्न किया—
‘मन्त्रराज अनुष्टुप के अङ्गभूत मन्त्रों को हमारे प्रति कहने की कृपा
करो।'
प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा— 'प्रणव, यजुलक्ष्मी, गायत्री और
नृसिंह गायत्री ये सब मंत्रराज के अङ्गभूत मन्त्र हैं। इनका ज्ञाता ऐश्वर्य
प्राप्ति के साथ ही अन्त में अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भ-
विष्यदिति सर्वमोंकार एव यच्चान्यन्त्रिकालातीतं तदप्योंकार
एव सर्वं ह्येतद्ब्रह्मायामात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पाज्जा-
गरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वा-
नरः प्रथमः पादः। स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्तांग एकोनविंश-
तिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः। यत्र सुप्तो न कञ्चन
कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तं सुषुप्तस्थान
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१
एकीभूतः प्रज्ञानघन एकानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ-
स्तृतीयः पादः । एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः
सर्वस्य प्रभवाप्यौ हि भूतानां नान्तः प्रज्ञं न बहिः प्रज्ञं नोभयतः
न प्रज्ञं प्रज्ञं नाप्रज्ञं न प्रज्ञानघनमदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम-
चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं
चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ २
‘ओंकार अविनाशी है, इसी की महिमा यह सम्पूर्ण दृश्यमान
विश्व है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीनों कालों से सम्बन्धित जो
कुछ है, वह सब ओंकार ही है । उक्त तीनों कालों में अतीत जो है, वह
भी ओंकार है । यह सब कुछ ओंकार रूप ब्रह्म है । यह भगवान् नृसिंह
ब्रह्म ही है । उनके चार पाद हैं ।
जाग्रत अवस्था और उससे व्याप्त यह स्थूल विश्व ही जिनका
स्थान है और बाह्य संसार में जिनका ज्ञान प्रसारित है, सातों लोक
जिनके अङ्ग हैं, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पंच प्राण और चार
अन्तःकरण, इस प्रकार उन्नीस जिनके मुख हैं, जो इस स्थूल विश्व के
भोगने वाले हैं, जो विश्व रूप देह में स्थित होने से वैश्वानर कहाते हैं,
वही सर्वरूप वैश्वानर भगवान् श्रीनृसिंह के प्रथम पाद हैं ।
स्वप्नावस्था और उससे प्रभावित यह सूक्ष्म विश्व ही जिनका
स्थान है और आन्तरिक संसार में जिनका ज्ञान फैला हुआ है, सातों
लोक जिनके अङ्ग और उन्नीस मुख हैं जो सूक्ष्म विश्व के भोक्ता, पालक
एवं रक्षक हैं, ऐसे वे तैजस पुरुष ही भगवान् नृसिंह के द्वितीय पाद हैं ।
सुषुप्ति और उससे उपलक्षित सम्पूर्ण विश्व की प्रलय रूप
अवस्था ही जिनका स्थान है, जो एक रूप में ही स्थित हैं और जिनका
रूप घनीभूत विज्ञान है, जिनका मुख चिन्मय प्रकाश है, जो स्वयं
आनन्दमय हैं और जो अपने स्वरूप रूप आनन्द के भोगने वाले हैं तथा
३६० ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
जिनसे परे और कोई नहीं है, ऐसे वे प्राज्ञ पुरुष ही भगवान् नृसिंह के
तृतीय पाद हैं ।
उपरोक्त त्रिपाद परमेश्वर सबके स्वामी, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी
हैं । सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्थान भी
वही हैं ।
जो न स्थूल का ज्ञाता है, न सूक्ष्म का और न इन दोनों का ही
ज्ञाता है, जो न प्रज्ञान का घनीभूत है, न दिखाई देता है, जो न व्यवहार
में आता, न स्पर्श में, जो किसी आकार वाला भी नहीं है, जो अचिन्त्य
और अवर्णनीय है, जिनका स्वरूप आत्मसत्ता की प्रतीति मात्र है । जो
प्रपंच-रहित, कल्याणकारी अद्वितीय है, ऐसा पूर्ण ब्रह्म ही भगवान् नृसिंह
का चतुर्थ पाद है इस प्रकार ज्ञानीजन मानते हैं । उपरोक्त चार पादों
में जिनका वर्णन हुआ है वे भगवान् नृसिंह ही हैं । उन्हें जानना
चाहिए ॥२॥
अथ सावित्री गायत्र्या यजुषा प्रोक्ता तया सर्वमिदं
व्याप्तं घृणिरिति द्वे अक्षरे सूर्य इति त्रीणि आदित्य इति
त्रीणि एतद्वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं यं एवं वेद
श्रिया हैवाभिषिच्यते तदेयहचाभ्युक्तं ऋचो अक्षरे परमे व्योम-
न्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेदा किमृचा करिष्यति
य इत्तद्विदुस्त इमे समासस इति न ह वा एतस्यर्चा न यजुषा
न साम्नार्थोऽस्ति यः सावित्रं वेदेति । ओंभूलक्ष्मीर्भु वर्लक्ष्मीः
स्वर्लक्ष्मीः कालकर्णी तन्नो महालक्ष्मीः प्रचोदयात् इत्येषा वै
महालक्ष्मीर्यजुर्गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा भवति । गायत्री वा इदं
सर्वं यदिदं किंच तस्माद्य एतां महालक्ष्मीं याजुषीं वेद महतीं
श्रियमश्नुते । ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि । तन्नः
सिंहः प्रचोदयात् इत्येषा वै नृसिंहगायत्री देवानां वेदानां निदानं
भवति य एवं वेद निदानवान्भवति ॥ ३ ॥
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१
अब सावित्री मन्त्र के सम्बन्ध में उपदेश करते हैं—यह सावित्री
मन्त्र, गायत्री छन्द से युक्त होकर यजुर्मन्त्र के रूप में प्रकट हुआ है ।
यह सभी विश्व उससे व्याप्त है । अष्टाक्षरी होने से इसे गायत्री कहा
गया है । इसमें 'घृणिः' और 'सूर्य' दो-दो अक्षर हैं तथा 'आदित्यः' तीन
अक्षर हैं, आरम्भ में इसे 'श्री' बीज से अलंकृत किया जाता है । इस
प्रकार यह सावित्री मन्त्र अष्टाक्षरी कहा गया है । जो ज्ञानी इस मन्त्र
का ज्ञाता है, वह लक्ष्मी के द्वारा अलंकृत होता है । ऐसा दृष्टान्त भी
है कि 'ऋग्वेद की ऋचायें परम व्योमरूप अविनाशी, प्रकाशमान ब्रह्म में
विद्यमान हैं, वहीं सब देवताओं का निवास है। जो साधक उन स्वयं
तेजस्वी ब्रह्म को नहीं जानता वह स्वाध्याय से क्या लाभ उठा लेगा ?
जो ज्ञानी उस ब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे परमधाम में आनन्दोपभोग करते हुए
रहते हैं।' इस सावित्रमन्त्र के इस प्रकार जानने वाले को ऋग्वेद,
सामवेद और यजुर्वेद के मन्त्र से कोई कार्य नहीं रहता ।
'जो देवी भू-लोक की लक्ष्मी, भुवर्लोक की लक्ष्मी और स्वर्ग
लोक की लक्ष्मी है, जो कालकर्णी नाम वाली है, वह महालक्ष्मी हमें
श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करे ।' यह यजुर्वेदोक्त महालक्ष्मी की गायत्री
चौबीस अक्षरों वाली है। यह सब दृश्यमान विश्व गायत्री रूप ही है ।
अतः जो इस गायत्री का ज्ञाता है, वह महान् ऐश्वर्य को प्राप्त
करता है ।
'हम भगवान् नृसिंह की प्राप्ति के निमित्त उपासना करते हैं ।
वज्ररूप नखों वाले उन परमात्मा का ही हम चिन्तन करते हैं, वे ही
नृसिंह भगवान् हमें सत्कर्मों में प्रेरित करें।' यह नृसिंह गायत्री देवताओं
और वेदों के भी कारणभूता हैं । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी भगवान्
को प्राप्त होता है ॥३॥
देवा ह वै प्रजापति मब्रुवन्नथ कैर्मन्त्रैः स्तुतो देवः प्रीतो
भवति स्वात्मानं दर्शयति तन्नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच
३६२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
प्रजापतिः । ॐ यो ह वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च ब्रह्मा भूर्भुवः
स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ (यथा प्रथममन्त्रोक्तावाद्यन्तौ
तथा सर्वमन्त्रेषु द्रष्टव्यौ) ॥ यश्च विष्णुः ॥ २ ॥ यश्च महेश्वरः
॥ ३ ॥ यश्च पुरुषः ॥ ४ ॥ यश्चेश्वरः ॥ ५ ॥ या सरस्वती ॥ ६
या श्रीः ॥ ७ ॥ या गौरी ॥ ८ ॥ या प्रकृतिः ॥ ९ ॥ या विद्या
॥ १० ॥ यश्चोंकारः ॥ ११ ॥ याश्चतस्रोऽर्धमात्राः ॥ १२ ॥
ये वेदाः साङ्गाः सशाखाः सेतिहासाः ॥ १३ ॥ ये च पंचाग्नयः
॥ १४ ॥ याः सप्त महाव्याहृतयः ॥ १५ ॥ ये चाष्टौ लोकपालाः
॥ १६ ॥ ये चाष्टौ वसवः ॥ १७ ॥ ये चैकादश रुद्राः ॥ १८ ॥
ये च द्वादशादित्याः ॥ १९ ॥ ये चाष्टौ ग्रहाः ॥ २० ॥ यानि
च पंच महाभूतानि ॥ २१ ॥ यश्च कालः ॥ २२ ॥ यश्च मनुः
॥ २३ ॥ यश्च मृत्युः ॥ २४ ॥ यश्च यमः ॥ २५ ॥ यश्चान्तकः
॥ २६ ॥ यश्च प्राणः ॥ २७ ॥ यश्च सूर्यः ॥ २८ ॥ यश्च सोमः
॥ २९ ॥ यश्च विराट् पुरुषः ॥ ३० ॥ यश्च जीवः ॥ ३१ ॥ यश्च
सर्वम् ॥ ३२ ॥ इति द्वात्रिंशत् इति तान्प्रजापतिरब्रवीदेतैर्मन्त्रै-
र्नित्यं देवं स्तुवध्वम् । ततो देवः प्रीतो भवति स्वात्मान दर्शयति
तस्माद्य एतैर्मन्त्रैर्नित्यं देवं स्तौति स देवं पश्यति सोऽमृतत्वं च
गच्छति य एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ ४ ॥
देवताओं ने प्रजापति से पुनः प्रश्न किया कि 'भगवान् नृसिंह
किन स्तोत्रों से स्तुत होने पर प्रसन्न होते और अपने दर्शन देते हैं?'
इस पर प्रजापति ब्रह्माजी बोले—वे ऊपर लिखे १ से ३२ की संख्या
वाले मन्त्रराज के बत्तीस मन्त्रों से परम प्रसन्न होते हैं । 'देवताओ ! इन
मन्त्रों से नित्य प्रति भगवान् की स्तुति करो । ऐसा करने से भगवान्
नृसिंह प्रसन्न होकर अपना साक्षात् दर्शन देते हैं । अतः जो इस प्रकार
स्तुति करता है वह उनके विश्वरूप के दर्शन करता है और उसे
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६३
अमृतत्व की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जानने वाले को भी उपरोक्त
फल प्राप्त होता है। यह महोपनिषद् है।
॥ चतुर्थ उपनिषद् समाप्त ॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नाष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार-
सिंहस्य महाचक्रं नाम चक्रं नो ब्रूहि भगव इति सार्वकामिकं
मोक्षद्वारं उद्योगिन उपदिशन्ति स होवाच प्रजापतिः षडक्षरं व
एतत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्मात्षडरं भवति षट्पत्रं चक्रं भवति
षड्वा ऋतव ऋतुभिः सम्मितं भवति मध्ये नाभिर्भवति नाभ्यां
वा एते अराः प्रतिष्ठिता मायया एतत्सर्वं वेष्टितं भवति नात्मानं
माया स्पृशति तस्मान्मायया बहिर्वेष्टितं भवति । अथाष्टारमष्ट-
पत्रं चक्रं भवत्यष्टाक्षरा वै गायत्री गायत्र्या सम्मितं भवति
बहिर्मायया वेष्टितं भवति क्षेत्रं क्षेत्रं वै मायैषा सम्पद्यते । अथ
द्वादशारं द्वादशपत्रं चक्रं भवति द्वादशाक्षरा वै जगती जगत्या
संमितं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवति । अथ षोडशारं षोड-
शपत्रं चक्रं भवति षोडशकलो वै पुरुषः पुरुष एवेदं सर्वं पुरुषेण
संमितं भवति मायया बहिर्वेष्टितं भवति । अथ द्वात्रिंशदरं
द्वात्रिंशत्पत्रं चक्रं भवति द्वात्रिंशदक्षरा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा
सर्वमिदं भवति बहिर्मायया वेष्टितं भवत्यरैर्वा एतत्सुबद्धं
भवति वेदा वा एते आराः पत्रैर्वा एतत्सर्वतः परिक्रामति छन्दांसि
वै पत्राणि ॥ १
देवताओं ने प्रजापतिजी से श्रद्धापूर्वक कहा—'भगवन् !
आनुष्टुभ मन्त्रराज के महाचक्र नामक चक्र के सम्बन्ध में बताने की
कृपा करें। यह चक्र मोक्ष-द्वार और सम्पूर्ण अभीष्टों का पूरक बताया
जाता है।'
इस पर प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—'आपका कहना
यथार्थ है। इस महाचक्र का नाम सुदर्शन है और यह छै अक्षरों से
युक्त है। इसमें छः ऋतुएं हैं, उन ऋतुओं की समता अरों से की जाती
३६४ ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
है। इस चक्र में जो नाभि हैं, उसमें यह अरे जुड़े हुए हैं। सम्पूर्ण चक्र
माया रूप नेमि से घिरा हुआ है। माया आत्मा का स्पर्श नहीं कर
सकती, इसलिये इस चक्र को माया ने बाहर से ही घेर रखा है। फिर
आठ अरों वाला अष्टदल चक्र बनता है और गायत्री के भी आठ पाद
होते हैं इसलिए गायत्री के पादों से अरों की समता की जाती है। माया
ने इन्हें भी बाहर की ओर ही घेर रखा है। फिर द्वादश अरों वाला
चक्र बनता है, द्वादश अक्षरों वाले जगती छन्द से इस द्वादश दल चक्र
की समता की जाती है। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही घिरा
है। फिर सोलह दल वाला षोडशार बनता है यह सोलह कलाओं से
युक्त है, भगवान् नृसिंह भी सोलह कला वाले हैं, इसलिये इसे साक्षात्
भगवान् ही समझें। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित
है। फिर बत्तीस अरों से युक्त चक्र बनता है, अनुष्टुप् में भी बत्तीस
अक्षर होते हैं। अनुष्टुप् के अक्षरों से चक्र के अरों की समता करे।
यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। वेद ही इस चक्र
के अरे हैं, छन्द इसके पत्ते हैं। उन पत्तों से ही यह सब ओर
घूमता है ॥१॥
एतत्तत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्य मध्ये नाभ्यां तारकं यदक्षरं
नरसिंहमेकाक्षरं तद्भवति षट्सु पत्रेषु षडक्षरं सुदर्शनं भवत्य-
ष्टसु पत्रेष्वष्टाक्षरं नारायणं भवति द्वादशसु पत्रेषु द्वादशाक्षरं
वासुदेवं भवति षोडशसु पत्रेषु मातृकाद्याः सबिन्दुकाः षोडश
स्वरा भवन्ति द्वात्रिंशत्सु पत्रेषु द्वात्रिंशदक्षर मन्त्रराजं नारसिंह
मानुष्टुभं भवति तद्वा एतत्सुदर्शन नाम चक्रं सार्वकामिकं
मोक्षद्वारमृङ् मयं यजुर्मयं साममयं ब्रह्ममयममृतमयं भवति तस्य
पुरस्ताद्वसव आसते रुद्रा दक्षिणत आदित्याः पश्चाद्विश्वे देवा
उत्तरतो ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा नाभ्यां सूर्याचन्द्रमसौ पार्श्वयोस्त-
देतदृचाभ्युक्तम्। ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधिविश्वे
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६५
निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे
समासत इति तदेतत्सुदर्शनं महाचक्रं बालो वा युवा वा वेद स
महान्भवति स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवत्यनुष्टुभा होमं
कुर्यादनुष्टुभार्चनं कुर्यात्तदेतद्रक्षोघ्न मृत्यतारकं गुरुणा लब्धं
कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नीत सप्तद्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं
नावकल्पते तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां दद्यात्सा दक्षिणा
भवति ॥२
यह बत्तीस दल वाला चक्र ही सुदर्शन नामक महाचक्र है ।
इसके बीच में जो नाभि है, उनमें ही भगवान् नृसिंह से सम्बन्धित तारक
मन्त्र का न्यास करना चाहिए । वह तारक मन्त्र केवल एक अक्षर का
है । छः पत्रों में षडाक्षरी सुदर्शन मन्त्र का न्यास होता है । आठ दलों
में अष्टाक्षरी नारायण मन्त्र का और बारह दलों में द्वादशाक्षरी वासुदेव
मन्त्र का न्यास होता है । सोलह दलों में षोडश अक्षर होते हैं । बत्तीस
दलों में मन्त्रराज अनुष्टुभ का न्यास किया जाता है । यह सुदर्शन नामक
महाचक्र सुविख्यात है । यह सभी अभीष्टों का पूरक, मुक्ति का द्वार
और ऋक्, यजु, साम का साक्षात् रूप तथा अमृतयुक्त है । इनके पूर्व
में अष्टावसु, पश्चिम में द्वादश आदित्य, उत्तर में विश्वेदेवा और दक्षिण
में एकादश रुद्र रहते हैं । नाभि में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा इधर-
उधर सूर्य और चन्द्रमा रहते हैं ।
ऋचा में भी कहा है कि 'भगवान् नृसिंह परम व्योम रूप एवं
अविनाशी हैं, उन्हीं में सम्पूर्ण वेद विद्यमान हैं । उन्हीं में सब देवता
प्रतिष्ठित हैं । जो उन परमेश्वर भगवान् नृसिंह को नहीं जानता, उसे
ऋग्वेद पढ़ने से कोई लाभ नहीं । जो पुरुष भगवान् नृसिंह और उनके
महाचक्र का ज्ञाता है, वह परब्रह्म में स्थित होता है । इस महाचक्र को
यदि कोई बालक अथवा युवा भी जान लेता है, वह महान् हो जाता
३६६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
है और सब का गुरु होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् से ही पूजन और
हवन करे। यह महाचक्र राक्षसों के डर से बचाने वाला है, यही मृत्यु
से पार लगाने वाला है। गुरु से इसे यन्त्र रूप में लेकर कण्ठ, शिखा या
भुजा में बांधे। जो गुरु इस मन्त्र का उपदेश दे, उसे दक्षिणा में समूची
पृथिवी भी दे दी जाय तो वह न्यून है। श्रद्धा के अनुसार जितना हो
सके भू-भाग दान करे, वही सर्वश्रेष्ठ दक्षिणा है ॥२॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार-
सिंहस्य फलं नो ब्रूहि भगव इति स होवाच प्रजापतिर्थ एतं
मन्त्रराज नारसिंहमानुष्टुभं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति स
वायुपूतो भवति स आदित्यपूतो भवति स सोमपूतो भवति स
सत्यपूतो भवति स ब्रह्मपूतो भवति स विष्णुपूतो भवति स रुद्र-
पूतो भवति स देवपूतो भवति स सर्वपूतो भवति स सर्वपूतो
भवति ॥ ३
देवताओं ने प्रजापति से पुनः पूछा—भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज
का फल हमें कृपापूर्वक बताइये।'
प्रजापति बोले— 'इस मन्त्रराज का दैनिक जप करने वाला
पुरुष अग्नि में तपा कर शुद्ध किये सुवर्ण के समान हो जाता है। वह
वायु, सूर्य और चन्द्रमा द्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। वह सत्य
तथा लोक के द्वारा और ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा वेद के द्वारा
शुद्ध हो जाता है ॥३॥
॥ नृसिंहपूर्वंतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
नृसिंहषट्चक्रोपनिषत्
ॐ देवा हः वै सत्यं लोकमायंतं प्रजापतिमपृच्छन्नार-
सिंहचक्रन्नो ब्रूहीति । तान्प्रजापमिनार्रसिंहचक्रमवोचत् । षड् वै
नार्सिंहानि चक्राणि भवन्ति । यत् प्रथमं तच्चतुररं यद्वितीयं
तच्चतुररं यत्तृतीयं तदष्टारं यच्चतुर्थं तत्पञ्चारं यत्पञ्चमं तत्पञ्चारं
यत् षष्ठं तदष्टारं तदेताति षडेव नार्सिहानि चक्राणि भवन्ति ॥
अथ कानि नामानि भवन्ति । यत् प्रथमं तदाचक्रं यद्-
द्वितीयं तत्सुचक्रं यत्तृतीयं तन्महाचक्रं यच्चतुर्थं यत्सकललोक-
रक्षणचक्रं यत्पञ्चमं तद्द्यूतचक्रं यद्वै षष्ठं तदसुरान्तकचक्रं
तदेतानि षडेव नारसिंहचक्रनामानि भवन्ति ॥
अथ कानि त्रीणि वलयानि भवन्ति । यत्प्रथमं तदान्तर-
वलयं भवति । यद्द्वितीयं तन्मध्यमवलयं भवति । यत् तृतीयं
तद्बाह्यं वलयं भवति । तदेतानि त्रीण्येव वलयानि भवन्ति ।
यदा तद्धैतद्बीजं यन्मध्यमं तां नारसिंहगायत्रीं यद्बाह्यं
तन्मन्त्रः ॥
अथ किमान्तरं वलयम् । षड्वान्तराणि वलयानि भवन्ति ।
यन्नारसिंह तत्प्रथमस्य यन्माहालक्ष्म्यं तद्द्वितीयस्य यत्सारस्वतं
तत्तृतीयस्य यस्य यत्कामं देवं तच्चतुर्थस्य यत् प्रणवं तत्पञ्चमस्य
तत्क्रोधदैवतं तत् षष्ठस्य । तदेतानि षष्णां नारसिंहचक्राणां षडा-
न्तराणि वलयानि भवन्ति ॥
ॐ देवताओं ने सत्य स्वरूप व्यापक लोकपिता प्रजापति से कहा
हमें नारसिंह चक्र का उपदेश करो । तब उन्हें प्रजापति ने नारसिंह चक्र
का उपदेश दिया, जो इस प्रकार है कि नारसिंह चक्र छः हैं । पहला
चक्र चार 'अर' वाला ( तांगे आदि के पहियों में जो गोलाकार रूप से
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi