१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७६
षष्ठं स्थानं भीषणं सप्तमं स्थानं भद्रमष्टमं स्थानं मृत्युमृत्युं नवमं
स्थानं नमामि दशनं स्थानमहमेकादशं स्थानं जानीयाद्यो जानीते
सोऽमृतत्वं च गच्छति एकादशपदा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा
सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमिदमुपसंहृतं तस्मात्सर्वानुष्टुभं
जानीयाद्यो जानीते सोऽम तत्वं च गच्छति ॥३॥
अनुष्टुप् का प्रथम स्थान 'उग्रम्'पद है। जो इसे जानता है, वह
अमर हो जाता है। द्वितीय स्थान 'वीरम्' है, तृतीय स्थान 'महाविष्णुम्'
है, चतुर्थ स्तान 'ज्वलन्तम्' है, पञ्चम स्थान 'सर्वतोमुखम्' है छठा स्थान
'नृसिंहम्' है, सातवां स्थान 'भीषणम्' आठवां स्थान 'भद्रम्' है, नौवां
स्यान, 'मृत्युमृत्युम्' है, दसवां स्थान 'नमामि' है और ग्यारहवां स्थान
'अहम्' है इस प्रकार जाने। जो ऐसा जानता है वह अमृतत्त्व को प्राप्त
होता है। यह अनुष्टुप् वृत्ति ग्यारह पदों वाली है, इसी के द्वारा सम्पूर्ण
जगत् की सृष्टि हुई है, इसी के द्वारा सब का उपसंहार होता है। इस
लिये यह सब अनुष्टुप् की ही महिमा है। जो ऐसा जानता है, वह
अमृतत्व को पाता है ॥३॥
देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नथ कस्मादुच्यत उग्रमिति स
होवाच प्रजापतिर्यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वाना-
त्मनः सर्वाणि भूतान्युद्गृह्णात्यजस्रं सृजति विसृजति वासय-
त्युद्ग्राह्यत उद्गृह्यते स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीम-
मुपहतनुमुग्रं मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यत्ते अस्मन्निवपन्तु
सेनाः तस्मादुच्यत उग्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते वीरमिति
यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि
भूतानि विरमति विरामयत्यजस्रं सृजति विसृजति वासयति
यो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामस्त-
स्मादुच्यते वीरमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते महाविष्णुमिति ॥