१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
कृष्णोपनिषत् ] [ ३५७
स्तुवते सततं यस्तु सोऽवतीर्णो महीतले ।
वने वृन्दावने क्रोडन्गोपगोपीसुरैः सह ॥७
गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः ।
वंशस्तु भगवान्रुद्रः शृंगमिन्द्रः सगोसुरः ॥८
गोकुलं वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमाः ।
लोभक्रोधादयो दैत्याः कलिकालस्तिरस्कृतः ॥६
भगवान् द्वारा प्राप्त इस आश्वासन से सब देवता अत्यन्त प्रसन्न
हुये और परस्पर कहने लगे—'अब हम धन्य हो गये' । फिर सब देवता
भगवान् की सेवा के लिये अवतीर्ण हुए । नन्द के रूप में भगवान्
का परम आनन्दमय अंश उत्पन्न हुआ । यशोदा के रूप में मुक्ति देवी
प्रकट हुईं । तीन प्रकार की माया कही गई है—सात्त्विकी, राजसी
और तामसी । रुद्र भगवान में सात्त्विकी माया है, ब्रह्माजी में राजसी
और दैत्यों में तामसी माया समाविष्ट हुई है। इस त्रिविध माया से
भिन्न जो वैष्णवी माया है, उस पर विजय प्राप्त करना नितान्त
असम्भव है। जिस ब्रह्ममयी वैष्णवी माया को प्राचीन काल में ब्रह्माजी
भी नहीं जीत सके, उसकी देवगण स्तुति करते हैं। वही वैष्णवी
माया देवकी के रूप में अवतीर्ण हुई । जो वेद नारायण के स्वरूप
की सदैव स्तुति करते हैं, वे ही वसुदेव हुए । वेदों के अर्थभूत ब्रह्म
ही इस पृथिवी पर बलराम और कृष्ण के रूप में प्रकट हुये ।
वही वेदार्थ साक्षात् रूप में, वृन्दावन में गोप-गोपिकाओं के साथ
क्रीड़ा करता है । उन श्रीकृष्ण की गौएं और गोपिकाएं वेदों
की ऋचाएं हैं । लकड़ी का रूप ब्रह्मा ने और वंशी का रूप रुद्र
ने धारण किया है । इन्द्र सींगा बन गये । इस प्रकार गोकुल
के रूप में साक्षात् वैकुण्ठ ही उपस्थित हो गया । वहां तपस्वी
महात्माओं ने वृक्षों का रूप धारण किया है और लोभ-क्रोधादि
[३५८] [कृष्णोपनिषत्
विकार ही दैत्य हो गए हैं। वे कलिकाल में भगवान् का नाम लेने मात्र
से नाश को प्राप्त होते हैं ॥३-६॥
गोपरूपो हरिः साक्षान्मायाविग्रहधारणः ।
दुर्बोधं कुहकं तस्य मायया मोहित जगत् ॥१०
दुर्जेया सा सुरैः सर्वैर्धृष्टिरूपो भवेद्द्विजः ।
रुद्रो येन कृतो वंशस्तस्य माया जगत्कथम् ॥११
बलं ज्ञानं सुराणां वै तेषां ज्ञानं हृतं क्षणात् ।
शेषनागो भवेद्रामः कृष्णोब्रह्मव शाश्वतम् ॥१२
अष्टावष्टसहस्रे द्वे शताधिक्यः स्त्रियस्तथा ।
ऋचोपनिषदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋचः स्त्रियः ॥१३
द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयंत्सरो मुष्टिको जयः ।
दर्पः कुवलयापीडो गर्वो रक्षः खगो बकः ॥१४
दया सा रोहिणी माता सत्यभामा घरेति वै ।
अघासुरो महाव्याधिः कलिः कंसः स भूपतिः ॥१५
शमो मित्रः सुदामा च सत्याक्रू रोद्धवो दमः ।
यः शङ्खः स स्वयं विष्णुर्लक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥१६
दुग्धसिन्धौ समुत्पन्नो मेघघोषस्तु संस्मृतः ।
दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे ॥१७
क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ ।
संहारार्थं च शत्रूणां रक्षणाय च संस्थितः ॥१८
कृपार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् ।
यत्तत्सृष्ट मेश्वरेणासीत्तच्चक्रं ब्रह्मरूपधृक् ॥१६
भगवान् श्रीहरि ने ही गोपरूप में लीला-विग्रह रूप धारण
किया है । यह संसार माया से मोहित है, इसलिए ईश्वरीय
माया का रहस्य जानना अत्यन्त दुष्कर है। क्योंकि प्रभु-माया तो
कृष्णोपनिषत् ] [ ३५६
देवताओं द्वारा भी नहीं जीती जा सकती । जिनकी माया के वश
में पड़कर ही ब्रह्माजी को लकुटी और भगवान् शिव को बांसुरी
बनना पड़ा है, उन श्रीहरि की माया का ज्ञान साधारण प्राणियों
को किस प्रकार हो सकता है ? देवताओं के पास जो ज्ञान रूप बल
है उसका भी श्रीहरि की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया ।
सनातन ब्रह्म श्रीकृष्ण हुए और शेषनाग ने बलराम का रूप ग्रहण
किया । भगवान की सोलह हजार एक सौ रानियां वेद की ऋतुएँ
और उपनिषद् ही हैं । इनके अतिरिक्त ब्रह्म स्वरूपिणी वेद-ऋचाएँ
गोपियों के रूप में प्रकट हुईं । चाणूर मल्ल द्वेष है, अत्यन्त
कठिनाई से जीता जाने के योग्य मुष्टिक मत्सर है और कुबलियापीड
दर्प है । आकाश में विचरण करने वाला राक्षस बकासुर गर्व है ।
साक्षात् दया ही माता रोहिणी हुई है । पृथिवी माता ने सत्यभामा
का रूप धारण किया है । महाव्याधि अघासुर और साक्षात् कलि ने
राजा कंस का रूप बनाया । शम ने सुदामा का, सत्य ने अक्रूर का
और दम ने उद्धव का रूप ग्रहण किया । शंख विष्णु है
और लक्ष्मी का भ्राता होने से उसी के समान है । वह मेघ के समान
गम्भीर घोष करने वाला क्षीर सागर से उत्पन्न हुआ है । भगवान्
श्रीकृष्ण ने जो दूध-दही के मटके फोड़ कर घर-घर में दूध-दही
की नदी-सी बहा दी वह प्रवाह साक्षात् क्षीर सागर ही हुआ ।
दूध-दही के प्रवाह रूप क्षीर सागर में बालक रूप में भगवान्
श्रीकृष्ण पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं । सन्तजनों की रक्षा में तथा दुष्टों के
विनाश में वे समान रूप से लगे हुए हैं । सब प्राणियों पर अनुग्रह करने
और धर्म की रक्षा करने के लिये ही भगवान् श्रीकृष्ण ने भूतल पर
अवतार लिया है । जो चक्र भगवान शंकर ने श्रीहरि भगवान्
के निमित्त प्रकट किया था, वही चक्र भगवान् श्रीकृष्ण के
कर-कमलों में सुशोभित हो रहा है । वह चक्र भी ब्रह्म के समान
है ॥ १०–१६ ॥
३६० ] [ कृष्णोपनिषत्
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जयन्तीसंभवौ वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः ।
यस्यासौ ज्वलनाभासः खङ्गरूपो महेश्वरः ॥२०
कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्माताऽदितिस्तथा ।
चक्रं शंखं च संसिद्धि बिन्दुं च सर्वमूर्धनि ॥२१
यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जनाः ।
नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशयः ॥२२
गदा च कालिका ताक्षात्सर्वशत्रु निबर्हिणी ।
धनुः शार्ङ्गं स्वमाया च शरत्कालः सुभोजनः ॥२३
अब्जकाण्डं जगद्बीजं धृतं पाणौ स्वलीलया ।
गरुडो वटभाण्डीरः सुदामा नारदो मुनिः ॥२४
वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धिः सर्वजन्तुप्रकाशिनी ।
तस्मान्न भिन्नं नाभिन्नमाभिर्भिन्नो न वै विभुः ॥
भूमावुत्तारितं सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् ॥२५
सर्वतीर्थफलं लभते य एवं वेद । देहबन्धाद्विमुच्यते
इत्युपनिषत् ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
धर्म ने चँवर का रूप धारण किया और वायु देवता वैजयन्ती-
माला के रूप में हुए । महेश्वर ने चमकते हुए खंग का रूप बनाया
और कश्यप नन्दगृह में ऊखल बन गए । माता अदिति ने रस्सी का रूप
बनाया । सब वर्णों पर जैसे अनुस्वार अलंकृत होता है, वैसे ही सब से
ऊपर सुशोभित आकाश भगवान का . छत्र है । वाल्मीकि और व्यास
आदि महर्षियों ने देवताओं के जितने रूपों का वर्णन किया है और जिन-
जिन रूपों में देवताओं को सब प्राणी नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता
भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रम में ही रहते हैं । भगवान् की गदा साक्षात्
काली स्वरूपा है, जो समस्त शत्रुओं का नाश करने में समर्थ है । वैष्णवी
माया ने शार्ङ्ग धनुष का रूप बनाया और प्राण नाशक काल ही उस पर
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कृष्णोपनिषत् ] [ ३६१
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संधान किये जाने के लिये बाण बना । संसार का बीज रूप कमल भगवान्
के हाथों में लीलापूर्वक सुशोभित है । भाण्डीर वट का रूप गरुड़ ने धारण
किया और नारद कृष्ण के सखा श्री सुदामा हुए । साक्षात् भक्ति ही
वृन्दा हुई । सब प्राणियों को कर्म का ज्ञान कराने वाली, प्रकाश दायिनी
बुद्धि ही भगवान् की क्रिया शक्ति हुई । इस प्रकार यह गोप-गोपी आदि
सभी भगवान श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने स्वर्ग के और
बैकुण्ठ के सब देवताओं को पृथिवी पर उतारा है ॥२०—२५॥
इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी सब तीर्थों का फल प्राप्त करता
और शरीर-बन्धन से मुक्त होता है—यह उपनिषद् है ।
॥ कृष्णोपनिषद् समाप्त ॥
—:—
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गणपत्युपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा ॥
स्थिरैरङ्गै स्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति न पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ता-
क्ष्र्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो वृहस्पतिर्द धातु ॥ ॐ शांतिः
शांतिः शांति ॥
हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से
कल्याण को देखें । अंगों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें
और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे
भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने
वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे
गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें !
ॐ शांति, शांति, शांति ॥
ॐ लं नमस्ते गणपतये ॥१॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि । त्वमेव
केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि । त्वमेव सर्वं खल्विदं
ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्माऽसि ॥२॥
नित्यमृतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥३॥
अथ त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव
दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पुरस्ता-
त्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव पश्चात्तात् । अवोत्तरात्तात् अव
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गणपत्युपनिषत् ] [ ३६३
च्चोर्ध्वात्तात् । अवाधरात्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्
॥४॥
त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः । त्वमानन्दमयस्त्व ब्रह्ममयः ।
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वं ज्ञानमयो
विज्ञानमयोऽसि ॥ ५
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदं त्वत्तस्ति-
ष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्वं जगदिदं त्वयि
प्रत्येति । त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः । त्वं चत्वारि वाक्प-
रिमिता पदानि । त्वं गुणत्रयातीतः । त्वं देहत्रयातीतः । त्वं
कालत्रयातीतः । त्वं मूलाधारे स्थितोऽसि नित्यम् । त्वं शक्ति-
त्रयात्मकः । त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् । त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णु-
स्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म
भूर्भुवः सुवरोम् ॥ ६
भगवान् गणपति को नमस्कार ॥१॥ तुम्हीं कर्ता, धर्ता हो
एवं प्रत्यक्ष तत्व हो । तुम्हीं इन रूपों में विराजमान साक्षात् ब्रह्म हो ।
तुम ही नित्य एवं आत्म स्वरूप हो ॥२॥ मैं सत्यपूर्वक एवं न्यायपूर्वक
कहता हूँ ॥३॥ तुम मुझ शिष्य की एवं उपदेष्टा गुरु की रक्षा करो।
श्रोता, दाता और घाता की रक्षा करो। व्याख्या आचार्य और शिष्य
की रक्षा करने वाले होओ । पश्चिम की ओर से मेरी रक्षा करो, पूर्व
की ओर से रक्षा करो, उत्तर की ओर से तथा दक्षिण ओर से भी मेरी
रक्षा करो। ऊपर, नीचे तथा सब ओर से मेरी रक्षा करो । चारों ओर
से मेरे रक्षक बनो ॥४॥ तुम वाङ्मय, चिन्मय एवं आनन्दमय हो ।
तुम ब्रह्ममय, सत्-चित्-आनन्द रूप तथा एक अद्वितीय हो । ज्ञान-विज्ञान-
३६४ ] [ गणपत्युपनिषत्
मय भी हो, तुम्हीं साक्षात् ब्रह्म हो ॥५॥ यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हारे द्वारा
ही प्रकट होता है । यह विश्व तुम्हारे द्वारा ही स्थित है । यह समस्त
संसार तुम्हीं में लीन हो जाता है । इस सम्पूर्ण विश्व की प्रतीति तुम में
ही होती है । तुम्हीं पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो । वाणी
के चार रूप परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा भी तुम हो । सत्व, रज
और तम से परे—गुणातीत हो । भूत, भविष्यत्, वर्तमान से परे तथा
स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों प्रकार के शरीरों से भी परे हो । तुम
मूलाधार चक्र में सदा स्थिति रहते हो । इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और
ज्ञानशक्ति यह तीनों रूप तुम्हारे ही हैं । योगी पुरुष तुम्हारा नित्य प्रति
चिन्तन करते हैं । तुम ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हो । इन्द्राग्नि और
वायु भी तुम ही हो । सूर्य-चन्द्रमा हो । तुम ब्रह्म हो तथा भूः भुवः स्वः
रूप त्रिलोक और ओंकार रूप परब्रह्म तुम ही हो ॥६॥
गणादीन् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् ।
अनुस्वारः परतरः [अर्धेन्दुलसितं तथा ॥
तारेण युक्तमेतदेव मनुस्वरूपम् ॥ ७
गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वार-
श्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् । नादः संधानम् । संहिता
संधिः । सैषा गाणेशी विद्या ॥ ८
गणक ऋषिः । नृचद्गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपति-
देवता । ॐ गणपतये नमः ॥ ६
एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः
प्रचोदयात् ॥ १०
एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणाम् ।
अभयं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥ ११
रक्तलम्बोदरं शूर्पसुकर्णं रक्तवाससम् ।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ॥ १२
गणपत्युपनिषत् [ ३६५
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ।
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात् परम् ॥१३
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ १४
प्रथम 'ग्' का उच्चारण कर फिर 'अ' का उच्चारण करे ।
इसके पश्चात् अनुस्वार का उच्चारण होता है । इस प्रकार अनुस्वार
से अलंकृत 'गँ' ही तुम्हारे बीज मन्त्र का रूप है । क्योंकि अर्द्धचन्द्र रूप
में ओंकार अवरुद्ध है, ।७॥ गकार इसका पूर्वरूप, अकार मध्यरूप
अनुस्वार अन्तरूप तथा बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संघान, संहिता सन्धि
है। इस प्रकार यह गणेश-विद्या है ॥८॥ इसके ऋषि गणक, छन्द
निचृद्गायत्री, देवता महागणपति हैं ॥६॥ एक दन्त से हम परिचित
हैं। उन वक्रतुण्ड का हम चिन्तन करते हैं । यह गजानन हमें प्रेरणा
करें यही गणेश-गायत्री है । जो योगी चतुर्भुज, पाश-अंकुश-वर-अभय
मुद्राधारी, एकदन्त, लम्बोदर, मूषक-ध्वज, रक्तवर्ण वाले, बड़े-बड़े कानों
वाले, लाल वस्त्र वाले, रक्त चन्दन का लेप किये हुये, लाल रङ्ग के
पुष्पों से विभूषित, भक्त पर कृपा करने वाले, विश्व के कारण,
अविनाशी सृष्टि के आदि में उत्पन्न, प्रकृति और पुरुष से पर श्रीगणेश
जी का नित्य चिन्तन करता है, वह सब योगियों में श्रेष्ठ होता है
॥११-१४॥
नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्ते-
ऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय वरद-
मूर्तये नमोनमः ॥ १५
एतदथर्वशिरो योऽधीते स ब्रह्मभूयाय कल्पते । स सर्वतः
सुखमेधते । स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते । स पञ्चमहापातकोपपातकात्
प्रमुच्यते । सायमधियानो दिवसकृतं पापं नाशयति । प्रातर-
धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽपापो
भवति । धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥ १६
३६६ ] [ गणपति उपनिषत्
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् । यो यदि मोहाद्दास्यति
स पापीयान् भवति ॥ १७
सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ।
अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्नन्
जपति स विद्यावान् भवति । इत्यथर्वणवाक्यं ब्रह्माद्याचरणं
विद्यान्न बिभेति कदाचनेति । यो दूर्वाऽङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणो-
पमो भवति । यो लाजैैर्यजति स यशोवान् भवति स मेधावान
भवति । यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति ।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते । अष्टौ
ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति । सूर्यग्रहणे महा-
नद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा स सिद्धमन्त्रो भवति । महावि-
घ्नात् प्रमुच्यते । महादोषात् प्रमुच्यते ॥ १८
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति य एवं वेदेत्यु-
पनिषत् ॥ १९
व्रात-नायक को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रथमपति को
नमस्कार, लम्बोदर को नमस्कार, एकरदन को नमस्कार, विघ्न
विनाशक को नमस्कार, शिव-सुवन को नमस्कार, वरदमूर्ति गणेशजी को
नमस्कार ॥१५॥ यह अथर्वशिरस् है । इसका पाठ करने वाला पुरुष
ब्रह्मत्व-प्राप्ति का अधिकारी होता है । उसके लिये किसी प्रकार का
विघ्न बाधा नहीं करता । वह सभी स्थानों पर सुखी रहता है । पांचों
प्रकार के पाप, उपपापों से वह छूटता है । सायंकाल पाठ करने वाला
दिन के पापों से मुक्त होता है और प्रातःकाल पाठ करने वाले के रात्रि
में किये हुये पाप कट जाते हैं । प्रातः सायं दोनों काल में पाठ करने से
पाप रहते ही नहीं । इसका पाठक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को पाता है
॥१६॥ इस अथर्व शिरस् को अशिष्य को न दे, शिष्य को ही दे ।
मोहवश इसे देने वाला पापी होता है ॥१७॥ सहस्र बार पाठ करने पर
जिस-जिस अभिलाषा का उच्चारण करे, उस-उसकी सिद्धि हो सकती
गणपत्युपनिषत् ] [ ३६७
है। इसके द्वारा गणपति का अभिषेक करने वाला वक्ता बन जाता है।
चतुर्थी तिथि को उपवास करके जो इसे जपता है, वह विद्यावान् होता
है—ऐसा महर्षि अथर्वण का कथन है। इस मन्त्र के द्वारा तप करने
वाले को कभी भय नहीं लगता। दूर्वा के अंकुरों द्वारा गणपति का
यजन करने वाला कुबेर के समान धनवान् होता है। लाजाओं के द्वारा
यज्ञ करने वाला यशस्वी होता है। सहस्र मोदकों से जो पुरुष यजन
करता है वह इच्छित फल पाता है। घृत और समिधा से यज्ञ करता है
उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। आठ ब्राह्मणों को भले प्रकार से इसे
ग्रहण करावे तो सूर्य के समान तेजस्वी हो। सूर्य ग्रहण के समय किसी
महानदी या प्रतिमा के निकट बैठ कर जप करे तो मन्त्र-सिद्धि प्राप्त
होती है, ऐसा साधक घोर विघ्न से भी छुटकारा पा लेता है। वह
महान् दोषों और महापापों से मुक्त हो जाता है ॥१८॥ इस प्रकार
जानने वाला पुरुष भी सर्व ज्ञानी हो जाता है। सर्वज्ञता
प्राप्त करता है ॥१९॥
॥ गणपति उपनिषद् समाप्त ॥
—०~०—
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न
इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो
अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः
शांतिः शांतिः ॥
हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण
को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और
देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें।
महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा
देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव
हमारा कल्याण करें और बृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति,
शांति, शांति ॥
ॐ आपो वा इदमासन्त्सलीलमेव । स प्रजापतिरेकः पुष्क-
रपर्णे समभवत् । तस्यान्तर्मनसिः कामः समवर्तत इदं सृजेय-
मिति । तस्माद्यत्पुरुषो मनसाभिगच्छति तद्वाचा वदति तत्क-
र्मणा करोति तदेषाभ्यनूक्ता । कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो
रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति । निरविन्दन्हृदि प्रतीष्य
कवयो मनीषेति उपैनं तदुपनमति यत्कामो भवति य एवं वेदांग
तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभम-
पश्यत् तेन व सर्वमिदमसृजत यदिदं किंच । तस्मात्सर्वमानुष्टु-
भमित्याचक्षते यदिदं किंच । अनुष्टुभो वा इमानि भूतानि
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१
जायन्ते ननुष्टुभा जातानि जीवन्ति अनुष्टुभं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति
तस्यैषा भवति अनुष्टुप्प्रथमा भवति अनुष्टुबुत्तमा भवति वाग्वा
अनुष्टुप् वाचैव प्रयन्ति वाचोद्यन्ति परमा वा एषा छन्दसां यद-
नूष्टुबिति ॥ १
प्राचीन काल में यह दृष्टिगोचर सम्पूर्ण विश्व जल के रूप में
था । सर्वत्र जल ही जल दिखाई देता था । उसी जल में एक कमल पत्र
पर सुप्रसिद्ध प्रजापति श्री ब्रह्माजी का प्राकट्य हुआ । ब्रह्माजी ने
विचार किया कि मैं लोक-रचना-कार्य करूँ । यह बात सर्व विदित है
कि मानव की जो भावना बनती है, उसे वह पहले वाणी द्वारा कहता
और फिर क्रिया द्वारा पूर्ण करता है। इस सम्बन्ध में कहा है कि पूर्व
काल में जब सृष्टि रचना हुई तब काम की उत्पत्ति हुई । ज्ञानीजन
अपने मन में निहित आत्मा का निरीक्षण करते रहते हैं और काम.. को
आत्मा के लिये पाश स्वरूप मानते हैं। ज्ञानियों के विचार में प्रकृति के
कार्यभूत मन में काम का प्राकट्य होता है। सृष्टि से पहले जो जल ही
जल था, वही इस विश्व का कारणभूत है । इस बात के जानने वाला
विद्वान् जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह वस्तु उसे मिल जाती है।
सुप्रसिद्ध प्रजापति ने तप प्रारम्भ किया । उसके द्वारा उन्हें
अनुष्टुप् छन्द में अवतीर्ण इस नारसिंह मन्त्रराज की प्राप्ति हुई । उसी
मन्त्रराज के प्रभाव से इस प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर विश्व की उन्होंने रचना
की । इसलिये इस प्रत्यक्ष विश्व को मन्त्रराज आनुष्टुभमय कहा
जाता है ।
इस अनुष्टुप् से ही इन सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, अनुष्टुप्
के प्रभाव से ही यह उत्पन्न प्राणी जीवन धारण करते हैं और मरने पर
इहलोक को त्यागने पर अनुष्टुप् में ही लीन हो जाते हैं। यह अनुष्टुप्
वृत्ति सम्पूर्ण लोक की रचने वाली है । वाणी से ही मनुष्य जन्म-मरण
को प्राप्त होते हैं इसलिये वाणी मात्र अनुष्टुप् ही है। यह अनुष्टुप् छन्द
अन्य सब छन्दों में अधिक महिमा वाला है ॥१॥
३७० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
ससागरां समर्वतां सप्तद्वीपां वसुन्धरां तत्साम्नः प्रथमं
पादं जानीयात् यक्षगन्धर्वाप्सरोगणसेवितमन्तरिक्षं तत्साम्नो
द्वितीयं पादं जानीयाद्वसुरुद्रादित्यैः सर्वैर्देवैः सेवितं दिवं तत्साम्न-
स्तृतीयं पादं जानीयात् ब्रह्मस्वरूपं निरंजनं परमं व्योमकं
तत्साम्नश्चतुर्थ पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति
ऋग्यजुः सामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाश्चत्वारः
पादा भवन्ति किं ध्यानं किं दैवतं कान्यंगानि कानि दैवतानि
किं छन्दः क ऋषिरिति ॥ २
मन्त्रराज का प्रथम चरण रूप यह पर्वत, समुद्र तथा सप्तद्वीप
वाली पृथिवी है । द्वितीय चरण रूप यक्षों, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा
सेवित अन्तरिक्ष है । तृतीय चरण के रूप में, वसु, रुद्र और आदित्य
आदि देवताओं द्वारा सेवित द्युलोक है और चतुर्थ चरण रूप माया-
रहित, पवित्र, परम व्योम युक्त ब्रह्म रूप है । इन सब को इस प्रकार
जानने वाला ज्ञानी अमरत्व को प्राप्त होता है ।
मन्त्रराज के चार पाद हैं—शाखाओं और अङ्गों सहित ऋक्,
यजु, साम और अथर्व यह चारों वेद । तब प्रश्न हुआ कि मन्त्रराज का
ध्यान कैसे है, उसका देवता, अङ्ग, देवताओं का गण, छन्द और ऋषि
यह सब कौन-कौन हैं ? ॥२॥
स होवाच प्रजापतिः स यो ह वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं
श्रियाभिषिक्तं तत्साम्नोजं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते सर्वे
वेदाः प्रणवादिकास्तं प्रणवं तत्साम्नोऽङ्गं वेद स त्रीँल्लोकांज
यति चतुर्विंशत्यक्षरा महालक्ष्मीर्यजुस्तत्साम्नोऽङ्गं वेद स आयु-
र्यशःकीर्तिज्ञानैश्वर्यवान्भवति तस्मादिदं सांगं साम जानीयाद्यो
नृसिंहपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३७१
जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति सावित्रीं प्रणव यजुलक्ष्मीं स्त्री-
शूद्राय नेच्छन्ति द्वात्रिंशदक्षरं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृ-
तत्वं च गच्छति सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणव यदि जानीयात् स्त्री
शूद्रः स मृतोऽधो गच्छति तस्मात्सर्वदा नाचष्टे यद्याचष्टे स
आचार्यस्तेनैव स मृतोऽधौ गच्छति ॥ ३ ॥
इस पर सुप्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—'जो पुरुष श्री
बीज से अभिषिक्त गायत्री मन्त्र अष्टाक्षरी पद को इस मन्त्रराज साम
ही अंग समझता है वह श्रीसम्पन्न होता है । सभी वेदों के आदि में
प्रणव है । अतः जो ज्ञानी इस प्रणव को साम का ही अंग मानता है वह
त्रिलोकी पर विजय प्राप्त कर लेता है । चौबीस अक्षरों वाला
महालक्ष्मी मन्त्र यजुर्वेद का ही स्वरूप है, उसे साम का अंग मानने
वाला ज्ञानी यश, कीर्ति, ज्ञान, आयु और ऐश्वर्य से युक्त होता है । जो
पुरुष अंगों सहित साम का ज्ञाता है, वह अमृतत्व प्राप्त करता है,
इसलिए इस साम को अंगों सहित जानना चाहिये । ज्ञानीजन प्रणव,
गायत्री और यजु स्वरूप महालक्ष्मी मन्त्र अनधिकारी जीवों को नहीं
बताते । क्योंकि ऐसे व्यक्ति इन्हें जान लें तो भी उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त
नहीं होती । इसलिये मन्त्र देने में सदा सावधान रहना चाहिये । जो
आचार्य आदि किसी अनधिकारी को मन्त्रोपदेश करे, वह भी अधोगति
प्राप्त करता है । बत्तीस अक्षर वाले साम को जानना चाहिये, उसका
जानने वाला अमृतत्व को पाता है ॥ ३ ॥
स होवाच प्रजापतिः अग्निर्वै देवा इदं सर्वं विश्वा भूतानि
प्राणा वा इन्द्रियाणि पशवोऽन्नममृतं सम्राट स्वराड्विराट्
तत्साम्नः प्रथमं पादं जानीयात् ऋग्यजुःसामाथर्वरूपः सूर्योऽन्त-
रादित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तत्साम्नो द्वितीयं पादं जानीयात् य
ओषधीनां प्रभुर्भवति ताराधिपतिः सोमस्तत्साम्नस्तृतीयं पादं
३७२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
जानीयात् स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः
स्वराट् तत्साम्नश्चतुर्थं पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च
गच्छति उग्रं प्रथमस्याद्यं ज्वलं द्वितीयस्याद्यं नृसिंह तृतीयस्याद्यं
मृत्युं चतुर्थस्याद्यं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति
तस्मादिदं साम यत्र कुत्रचिन्नाचष्टे यदि दातुमपेक्षते पुत्राय
शुश्रूषवे दास्यत्यन्यस्मै शिष्याय वा चेति ॥ ४ ॥
ब्रह्माजी फिर कहने लगे—'सम्पूर्ण विश्व, सम्पूर्ण प्राणी,
सम्पूर्ण वेद, अग्नि, प्राण, इन्द्रिय, अन्न, पशु, अमृत, सम्राट, स्वराट्,
विराट् इन सब को मन्त्रराज साम का प्रथम चरण जानना चाहिए ।
ऋक्, यजु, साम, अथर्व रूप सूर्य उनके मण्डल में स्थित हिरण्यमय
पुरुष, यह साम का दूसरा चरण जानना चाहिए । सब औषधियों और
तारागणों के स्वामी चन्द्रमा को साम का तृतीयचरण जाने ब्रह्मा,
विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि और अविनाशी परमेश्वर इन्हें साम का
चतुर्थ चरण जाने । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त
होता है ।
मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण का आदि अंश 'उग्रम्' है,
द्वितीय चरण का आदि अंश 'ज्वलं' है, तृतीय चरण का आदि अंश
'नृसिंह' है और चतुर्थ चरण का आदि अंश 'मृत्यु' हैं। इन चारों को
साम स्वरूप ही समझना चाहिए । ऐसा समझने वाला ज्ञानी अमृतत्व
की प्राप्त होता है। यह मन्त्र किसी को देना हो तो जो इसका उपदेश
लेना चाहे ऐसे सेवा परायण पुत्र को अथवा सदाचारी शिष्य आदि को
देना चाहिए ॥ ४ ॥
स होवाच प्रजापतिः क्षीरोदार्णवशायिनं नृकेसरिविग्रहं
योगिध्येयं परं पदं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च
गच्छति वीरं प्रथमस्याद्यार्द्धान्त्यं तं स द्वितीयस्याद्यार्द्धान्त्यं हं भी
तृतीयस्याद्यान्त्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यार्द्धान्त्यं साम तु जानीयाद्यो
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७३
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जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम येन केनचिदा-
चार्यमुखेन यो जानीते स तेनैव शरीरेण संसारान्मुच्यते मोचयति
मुमुक्षुर्भवति जपात्तेनैव शरीरेण देवतादर्शनं करोति तस्मादिदमेव
मुख्यद्वार कलौ नान्येषां भवति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो
जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ ५ ॥
सुप्रसिद्ध प्रजापति ने पुनः कहा—'भगवान् का जो नृसिंह रूप
विग्रह क्षीर सागरशायी है, वह परमपद रूप है तथा योगियों के लिये
भी ध्यान करने योग्य है । उस विग्रह को सामवेद का ही रूप
माने । जो ऐसा मानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है ।
मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग
'वीर' है । द्वितीय चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'तं सं' है ।
तृतीय चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'हृं भी' है और चतुर्थ चरण
के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'मृत्युम्' पद है । इन सब को साम ही
जानना चाहिए । जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है ।
अतः जो इस साम को किसी आचार्य के मुख से प्राप्त कर इस प्रकार
जानता है, वह इस जीवन में ही भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है
और अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य व्यक्तियों को भी भव-पाश से
छुड़ाता है । जो व्यक्ति सांसारिक मोह ममता में पड़ा है, वह इसे
सुनकर मुक्ति की कामना करने लगता है । इस मन्त्रराज साम के जप
से इसी देह में भगवान् नृसिंह का दर्शन कर लेता है । कलियुग में मुक्ति
का यह एक सरल मार्ग है । अतः इस साम को अङ्गों सहित भले
प्रकार जान ले । इसे जो भले प्रकार जान लेता है, वह अमृतत्व को
प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम् । ऊर्ध्वरेतं विरू-
पाक्षं शङ्कर नीलोहितम् ॥ उमापतिः पशुपतिः पिनाकी
ह्यमितद्युतिः । ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधि-
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
३७४ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्यो वै यजुर्वेदवाच्यस्तं साम जानीयाद्यो
जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति महाप्रथमान्तार्धस्याद्यन्तवतो
द्वितीयान्तार्धस्याद्यंषणं तृतीयान्तार्धस्याद्यन्नाम चतुर्थान्तार्धस्याद्यं
साम जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम सच्चिदानन्द-
मयं परं ब्रह्म तमेवंविद्वानमृतं इह भवति तस्मादिदं साङ्गं साम
जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ ६ ॥ विश्वसृज एतेन
वै विश्वमिदमसृजन्त यदिदंविश्वमसृजन्त तस्माद्विश्वसृजो विश्वमेनाननु
प्रजायते ब्रह्मणः सलोकतां साष्ट्रितां सायुज्यं यान्ति तस्मादिदं
साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति विष्णुं
प्रथमान्त्यं मुखं द्वितीयान्त्यं भद्रं तृतीयान्त्यं म्यहं चतुर्थान्त्यं साम
जानीयाद्यो जानीते तोऽमृतत्वं च गच्छति योऽसौ वेद यदिदं
किञ्चात्मनि ब्रह्मण्येवानुष्टुभं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च
गच्छति स्त्रीपुंसयोर्वा इहैव स्थातुमपेक्षते तस्मै सर्वैश्वर्यं ददाति
यत्र कुत्रापि म्रियते देहान्ते देवः परमं ब्रह्म तारकं व्याचष्टे
येनासावमृतीभूत्वा सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम मध्यगं
जपति तस्मादिदं सामाङ्गं प्रजापतिस्तस्मादिदं सामाङ्गं प्रजा-
पतिर्य एवं वेदेति महोपनिषत् । य एतां महोपनिषदं वेद स
कृतपुरश्चरणो महाविष्णुर्भवति । महाविष्णुर्भवति । इति प्रथमो-
पनिषत् ॥ ७ ॥
भगवान् नृसिंह अन्तर्यामी और सर्वव्यापी परमेश्वर हैं । उन्हें
ऋत और सत्य समझना चाहिए । वे मनुष्य और सिंह की संयुक्त
आकृति वाले, काले-पीले रङ्ग से युक्त हैं । उनके नेत्र अत्यन्त विकराल
तथा भयङ्कर हैं । वही कल्याणकारी शिव हैं । कण्ठ में नीलवर्ण और
उसके ऊर्ध्व भाग में तेजोमय लोहित वर्ण का होने के कारण
'नील लोहित' कहलाते हैं । वे सर्व देवात्मक भगवान् नृसिंह ही
गिरिजा, उमापति, पशुपति, धनुर्धारी और अत्यन्त तेजस्वी महेश्वर
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७५
हैं। वे सम्पूर्ण विद्याओं और भूतों के स्वामी हैं। जो देवपति, ब्रह्मा के
भी स्वामी और यजुर्वेद के वाच्यार्थ हैं, उन भगवान् नृसिंह को साम ही
जान ले। जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है।
मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग
'महा' है, द्वितीय चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'व॑न्तो' है, तृतीय-
चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'षणं' है, चतुर्थ चरण के उत्तरार्द्ध
का आदि भाग 'नमा' है। इन सब को ही साम जाने। जो इस प्रकार
जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है।
यह साम सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म ही है। उसे इस प्रकार
जानने वाला पुरुष इस देह के रहते ही अमरत्व को प्राप्त होता है।
इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार इसका
ज्ञाता है वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त
करता है।
विश्व के रचने वाले प्रजापतियों ने ही इस साम युक्त मन्त्र के
द्वारा सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। इसीलिये वे विश्व रचयिता कहे
गए हैं। यह विश्व उनसे ही प्रकट हुआ है। इस रहस्य के ज्ञाता ज्ञानी-
जन ब्रह्मलोक और उसके पद को प्राप्त करते हैं। इस साम को अङ्गों
सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानते हैं वे भव-बन्धन से मुक्त
होकर अमरत्व प्राप्त करते हैं ॥ ६ ॥
मन्त्रराज के प्रथम चरण का अन्तिमपद 'विष्णु' है, द्वितीय-
चरण का अन्तिम पद 'मुखम्' है, तृतीय चरण का अन्तिम पद 'भद्रं'
है तथा चतुर्थ चरण का अन्तिम पद 'म्यहम्' है। इन सब को
साम जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त
होता है।
प्रजापति ने ही इन सब तत्वों को जाना। ब्रह्म में स्थित इस
अनुष्टुभ मन्त्र की ब्रह्म में ही स्थिति है। जो ज्ञानी इस प्रकार जानता
है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है।
३७६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
जो साधक स्त्री पुरुष इस लोक में उत्तम आचरणपूर्वक रहकर
आनन्द में स्थित रहने की की इच्छा करते हैं, भगवान् नृसिंह उनके लिए
सम्पूर्ण ऐश्वर्य देते हैं। वह जहाँ भी देह-त्याग करता है वहीं भगवान्
नृसिंह उसे तारक मन्त्र का उपदेश कर अमृतत्व प्राप्त कराते हैं। मोक्ष-
प्राप्ति के इच्छुकों तारक मन्त्र का जाप करना उचित है। साम के
अङ्गभूत प्रजापति मन्त्रदृष्टा होने से तारक मन्त्र है। ऐसा जानने वाला
ही सच्चा साधक होता है। यह महोपनिषद् है, जो जानता है, वह
साक्षात् विष्णु स्वरूप हो जाता है ॥ ७ ॥
॥ प्रथम उपनिषद् समाप्त ॥
देवा ह वै मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयुस्ते प्रजा-
पतिमुपाधावंस्तेभ्य एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रायच्छत्तेन
वै ते मृत्युमजयन् पाप्मानं चातरन्संसारं चातरंस्तस्माद्यो मृत्योः
पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयात्स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं
प्रतिगृह्णीयात्स मृत्युं तरति स पाप्मानं तरति स संसारं तरति
तस्य ह वै प्रणवस्य या पूर्वा मात्रा पृथिव्यकारः स ऋग्भि-
र्ऋग्वेदो ब्रह्मा वसवो गायत्री गार्हपत्यः सा साम्नः प्रथमः
पादो भवति द्वितीयान्तरिक्षं स उकारः स यजुर्भैर्यजुर्वेदो
विष्णुरुद्रास्त्रिष्टुब्दक्षिणाग्निः सा साम्नो द्वितीयः पादो भवति
तृतीया द्यौः स मकारः स सामभिः सामवेदो रुद्रा आदित्या
जगत्याहवनीयः सा साम्नस्तृतीयः पादो भवति यावसानेऽस्य
चतुर्थ्यर्धमात्रा सा सोमलोक ओंकारः सौऽथर्वणैर्मन्त्रैरथर्ववेदः
संवर्तकोऽग्निर्मरुतो विराडेकर्षिर्भास्वती स्मृता सा साम्नश्चतुर्थः
पादो भवति ॥ १ ॥
एक समय की बात है कि मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता
अत्यन्त भयभीत हुए और भागकर प्रजापति ब्रह्माजी की शरण में
पहुंचे। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान् नृसिंह का मन्त्रराज आनुष्टुभ् बताया।