सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 374

३६६ ] [ गणपति उपनिषत्
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् । यो यदि मोहाद्दास्यति
स पापीयान् भवति ॥ १७
सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ।
अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्नन्
जपति स विद्यावान् भवति । इत्यथर्वणवाक्यं ब्रह्माद्याचरणं
विद्यान्न बिभेति कदाचनेति । यो दूर्वाऽङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणो-
पमो भवति । यो लाजैैर्यजति स यशोवान् भवति स मेधावान
भवति । यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति ।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते । अष्टौ
ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति । सूर्यग्रहणे महा-
नद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा स सिद्धमन्त्रो भवति । महावि-
घ्नात् प्रमुच्यते । महादोषात् प्रमुच्यते ॥ १८
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति य एवं वेदेत्यु-
पनिषत् ॥ १९
व्रात-नायक को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रथमपति को
नमस्कार, लम्बोदर को नमस्कार, एकरदन को नमस्कार, विघ्न
विनाशक को नमस्कार, शिव-सुवन को नमस्कार, वरदमूर्ति गणेशजी को
नमस्कार ॥१५॥ यह अथर्वशिरस् है । इसका पाठ करने वाला पुरुष
ब्रह्मत्व-प्राप्ति का अधिकारी होता है । उसके लिये किसी प्रकार का
विघ्न बाधा नहीं करता । वह सभी स्थानों पर सुखी रहता है । पांचों
प्रकार के पाप, उपपापों से वह छूटता है । सायंकाल पाठ करने वाला
दिन के पापों से मुक्त होता है और प्रातःकाल पाठ करने वाले के रात्रि
में किये हुये पाप कट जाते हैं । प्रातः सायं दोनों काल में पाठ करने से
पाप रहते ही नहीं । इसका पाठक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को पाता है
॥१६॥ इस अथर्व शिरस् को अशिष्य को न दे, शिष्य को ही दे ।
मोहवश इसे देने वाला पापी होता है ॥१७॥ सहस्र बार पाठ करने पर
जिस-जिस अभिलाषा का उच्चारण करे, उस-उसकी सिद्धि हो सकती