१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंनृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१
जायन्ते ननुष्टुभा जातानि जीवन्ति अनुष्टुभं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति
तस्यैषा भवति अनुष्टुप्प्रथमा भवति अनुष्टुबुत्तमा भवति वाग्वा
अनुष्टुप् वाचैव प्रयन्ति वाचोद्यन्ति परमा वा एषा छन्दसां यद-
नूष्टुबिति ॥ १
प्राचीन काल में यह दृष्टिगोचर सम्पूर्ण विश्व जल के रूप में
था । सर्वत्र जल ही जल दिखाई देता था । उसी जल में एक कमल पत्र
पर सुप्रसिद्ध प्रजापति श्री ब्रह्माजी का प्राकट्य हुआ । ब्रह्माजी ने
विचार किया कि मैं लोक-रचना-कार्य करूँ । यह बात सर्व विदित है
कि मानव की जो भावना बनती है, उसे वह पहले वाणी द्वारा कहता
और फिर क्रिया द्वारा पूर्ण करता है। इस सम्बन्ध में कहा है कि पूर्व
काल में जब सृष्टि रचना हुई तब काम की उत्पत्ति हुई । ज्ञानीजन
अपने मन में निहित आत्मा का निरीक्षण करते रहते हैं और काम.. को
आत्मा के लिये पाश स्वरूप मानते हैं। ज्ञानियों के विचार में प्रकृति के
कार्यभूत मन में काम का प्राकट्य होता है। सृष्टि से पहले जो जल ही
जल था, वही इस विश्व का कारणभूत है । इस बात के जानने वाला
विद्वान् जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह वस्तु उसे मिल जाती है।
सुप्रसिद्ध प्रजापति ने तप प्रारम्भ किया । उसके द्वारा उन्हें
अनुष्टुप् छन्द में अवतीर्ण इस नारसिंह मन्त्रराज की प्राप्ति हुई । उसी
मन्त्रराज के प्रभाव से इस प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर विश्व की उन्होंने रचना
की । इसलिये इस प्रत्यक्ष विश्व को मन्त्रराज आनुष्टुभमय कहा
जाता है ।
इस अनुष्टुप् से ही इन सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, अनुष्टुप्
के प्रभाव से ही यह उत्पन्न प्राणी जीवन धारण करते हैं और मरने पर
इहलोक को त्यागने पर अनुष्टुप् में ही लीन हो जाते हैं। यह अनुष्टुप्
वृत्ति सम्पूर्ण लोक की रचने वाली है । वाणी से ही मनुष्य जन्म-मरण
को प्राप्त होते हैं इसलिये वाणी मात्र अनुष्टुप् ही है। यह अनुष्टुप् छन्द
अन्य सब छन्दों में अधिक महिमा वाला है ॥१॥