१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पूर्वकाण्ड ] [ २२७
पूर्वकाण्ड ] [ २२७
इन्द्र होता है। महेश्वर का मानस रूप ब्रह्मा की यज्ञ को भोगने वाला
देवता है ॥ ११ ॥ उस मानस ब्रह्म का रूप है 'हंस सोऽहं ।"
इस तन्मयता को प्राप्त करने के लिये जो यज्ञ किया जाता है, वह
नादानुसंधान । तन्मयता का विकार ही जीव है ॥ १२ ॥ यह हंस
परमात्मा का स्वरूप है जो बाहर और भीतर चलता रहता
है। भीतर जाने पर अनवकाश वाले स्थान में यह हंस सुपर्ण स्वरूप
( ईश्वर ) होता है ॥ १३ ॥ छियानवे तन्तुओं के रूप में
व्यक्त होने वाला, चित् के तीन सूत्रों से चिन्मय, नौ तत्वों से तिगुना
किया हुआ, ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप तीन अग्नियों से संयुक्त चिद्
ग्रन्थि से बँधा, अद्वैत ग्रन्थि से युक्त, यज्ञ के साधारण अङ्ग रूप में
बाह्य और अन्तर को सुप्रकाशित करने वाला यज्ञोपवीत हंस
ही है ॥१४-१५॥
इस प्रकार उपवीत के सूत्र ब्रह्म-यज्ञ रूप हैं, अर्थात्
यज्ञोपवीत ब्रह्म का प्रतीक रूप है। इस प्रकार यज्ञोपवीत और
ब्रह्मयज्ञ एक दूसरे के स्वरूप हैं ॥ १६ ॥ इसके अङ्ग मात्रा है।
यज्ञोपवीत इस मनोयज्ञ का हंस है। ब्रह्म-यज्ञ से युक्त प्रणव भी
ब्रह्मसूत्र हैं। प्रणव का अन्तवर्ती हंस भी ब्रह्म सूत्र है; यह ब्रह्म-यज्ञ
मोक्ष का साधन रूप है ॥ १७ ॥ ब्रह्म-संध्या मानसिक यज्ञ की
क्रिया है। संध्या-क्रिया मानसिक यज्ञ का लक्षण है ॥ १८ ॥
जो यज्ञ सूत्र, प्रणव, ब्रह्म-यज्ञ की क्रिया से युक्त है, वह ब्राह्मण है।
ब्रह्मचर्य में देव रहते हैं। सूत्र रूप हंस यज्ञ में रहते हैं, हंस और प्रणव
एक ही हैं ॥ १६ ॥
हंसस्य प्रार्थनास्त्रिकालाः । त्रिकालास्त्रिवर्णाः । त्रेताग्न्य-
नुसंधांनो यागः । त्रेताग्न्यात्माकृतिकवर्णोद्धारहंसानुधानोऽन्तर्यागः
॥२०॥ चित्स्वरूपन्तन्मयं तुरीयस्वरूपम् । अन्तरादित्ये ज्योतिः
२२८ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
स्वरूपो हंसः ॥२१॥ यज्ञाङ्गं ब्रह्मसंपत्तिः । ब्रह्मप्रवृत्तितत्प्रणव-
हंससूत्रेणैव ध्यानमाचरन्ति ॥२२
प्रोवाच पुनः स्वयंभुवं प्रतिजानीते ब्रह्मपुत्रो ऋषिखालि-
खिल्यः । हंससूत्राणि कतिसंख्यानि कियद्वा प्रमाणम् ॥२३॥
हृदादित्यमरीचीनां पदं षण्णवतिः । चित्सूत्राघ्राणयोः स्वनिर्गता
प्रणवाधारा षडङ्गुलदशाशीतिः ॥२४॥
वामबाहुदक्षिणकट्योरन्तश्चरति हंस परमात्मा ब्रह्म-
गुह्यप्रकारो नान्यत्र विदितः ॥२५॥ ये जानन्ति तेऽमृतफलकाः ।
सर्वकालं हंसं न प्रकाशकम् । प्रणवहंसान्तर्ध्यानप्रकृतिं विना न
मुक्तिः ॥२६॥
हंस की प्रार्थना तीन समय की जाती है तीन काल में तीन
वर्ण होते हैं। यह यज्ञ तीनों अग्नियों से करने का है। तीन अग्नि,
आत्मा की आकृति और वर्ण वाले ॐकार रूप हंस का विचारना
भीतर का यज्ञ है ॥ २० ॥ चित् रूप से तन्मय होना तुरीय
का स्वरूप है। भीतर के सूर्य में हंस की ज्योति रूप है ॥ २१ ॥
यज्ञ का यह अंग ही ब्रह्म-सम्पत्ति है। इसलिये ब्रह्म की प्राप्ति
के निमित्त प्रणव रूप हंस की साधना ही विधेय है ॥ २२ ॥
ब्रह्मपुत्र बालखिल्य ने पुनः स्वयंभू से पूछा—“हंस सूत्रों की
संख्या कितनी है और उनका प्रमाण कितने हैं ? आप तो सब जानते
हैं, बतलाइये ।” ॥ २३ ॥ स्वयंभू ब्रह्म ने उत्तर दिया—
“हृदय--आदित्य की छियानवे किरणें हैं। चित्त सूत्र रूप घ्राण से
स्वर सहित निकलने वाली धारा भी छियानवे अंगुल होती है
॥ २४ ॥ बाम भुजा के पास कमर के दाहिनी ओर के मध्य में
परमात्मा हंस का निवास है ॥ २५ ॥ पर इस गुह्य विषय को कोई
जान नहीं पाता। जिनको अमृतत्व प्राप्त हो गया है, वे ही