१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें२२८ ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
स्वरूपो हंसः ॥२१॥ यज्ञाङ्गं ब्रह्मसंपत्तिः । ब्रह्मप्रवृत्तितत्प्रणव-
हंससूत्रेणैव ध्यानमाचरन्ति ॥२२
प्रोवाच पुनः स्वयंभुवं प्रतिजानीते ब्रह्मपुत्रो ऋषिखालि-
खिल्यः । हंससूत्राणि कतिसंख्यानि कियद्वा प्रमाणम् ॥२३॥
हृदादित्यमरीचीनां पदं षण्णवतिः । चित्सूत्राघ्राणयोः स्वनिर्गता
प्रणवाधारा षडङ्गुलदशाशीतिः ॥२४॥
वामबाहुदक्षिणकट्योरन्तश्चरति हंस परमात्मा ब्रह्म-
गुह्यप्रकारो नान्यत्र विदितः ॥२५॥ ये जानन्ति तेऽमृतफलकाः ।
सर्वकालं हंसं न प्रकाशकम् । प्रणवहंसान्तर्ध्यानप्रकृतिं विना न
मुक्तिः ॥२६॥
हंस की प्रार्थना तीन समय की जाती है तीन काल में तीन
वर्ण होते हैं। यह यज्ञ तीनों अग्नियों से करने का है। तीन अग्नि,
आत्मा की आकृति और वर्ण वाले ॐकार रूप हंस का विचारना
भीतर का यज्ञ है ॥ २० ॥ चित् रूप से तन्मय होना तुरीय
का स्वरूप है। भीतर के सूर्य में हंस की ज्योति रूप है ॥ २१ ॥
यज्ञ का यह अंग ही ब्रह्म-सम्पत्ति है। इसलिये ब्रह्म की प्राप्ति
के निमित्त प्रणव रूप हंस की साधना ही विधेय है ॥ २२ ॥
ब्रह्मपुत्र बालखिल्य ने पुनः स्वयंभू से पूछा—“हंस सूत्रों की
संख्या कितनी है और उनका प्रमाण कितने हैं ? आप तो सब जानते
हैं, बतलाइये ।” ॥ २३ ॥ स्वयंभू ब्रह्म ने उत्तर दिया—
“हृदय--आदित्य की छियानवे किरणें हैं। चित्त सूत्र रूप घ्राण से
स्वर सहित निकलने वाली धारा भी छियानवे अंगुल होती है
॥ २४ ॥ बाम भुजा के पास कमर के दाहिनी ओर के मध्य में
परमात्मा हंस का निवास है ॥ २५ ॥ पर इस गुह्य विषय को कोई
जान नहीं पाता। जिनको अमृतत्व प्राप्त हो गया है, वे ही