१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 572 में से
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इन्द्र होता है। महेश्वर का मानस रूप ब्रह्मा की यज्ञ को भोगने वाला
देवता है ॥ ११ ॥ उस मानस ब्रह्म का रूप है 'हंस सोऽहं ।"
इस तन्मयता को प्राप्त करने के लिये जो यज्ञ किया जाता है, वह
नादानुसंधान । तन्मयता का विकार ही जीव है ॥ १२ ॥ यह हंस
परमात्मा का स्वरूप है जो बाहर और भीतर चलता रहता
है। भीतर जाने पर अनवकाश वाले स्थान में यह हंस सुपर्ण स्वरूप
( ईश्वर ) होता है ॥ १३ ॥ छियानवे तन्तुओं के रूप में
व्यक्त होने वाला, चित् के तीन सूत्रों से चिन्मय, नौ तत्वों से तिगुना
किया हुआ, ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप तीन अग्नियों से संयुक्त चिद्
ग्रन्थि से बँधा, अद्वैत ग्रन्थि से युक्त, यज्ञ के साधारण अङ्ग रूप में
बाह्य और अन्तर को सुप्रकाशित करने वाला यज्ञोपवीत हंस
ही है ॥१४-१५॥
इस प्रकार उपवीत के सूत्र ब्रह्म-यज्ञ रूप हैं, अर्थात्
यज्ञोपवीत ब्रह्म का प्रतीक रूप है। इस प्रकार यज्ञोपवीत और
ब्रह्मयज्ञ एक दूसरे के स्वरूप हैं ॥ १६ ॥ इसके अङ्ग मात्रा है।
यज्ञोपवीत इस मनोयज्ञ का हंस है। ब्रह्म-यज्ञ से युक्त प्रणव भी
ब्रह्मसूत्र हैं। प्रणव का अन्तवर्ती हंस भी ब्रह्म सूत्र है; यह ब्रह्म-यज्ञ
मोक्ष का साधन रूप है ॥ १७ ॥ ब्रह्म-संध्या मानसिक यज्ञ की
क्रिया है। संध्या-क्रिया मानसिक यज्ञ का लक्षण है ॥ १८ ॥
जो यज्ञ सूत्र, प्रणव, ब्रह्म-यज्ञ की क्रिया से युक्त है, वह ब्राह्मण है।
ब्रह्मचर्य में देव रहते हैं। सूत्र रूप हंस यज्ञ में रहते हैं, हंस और प्रणव
एक ही हैं ॥ १६ ॥
हंसस्य प्रार्थनास्त्रिकालाः । त्रिकालास्त्रिवर्णाः । त्रेताग्न्य-
नुसंधांनो यागः । त्रेताग्न्यात्माकृतिकवर्णोद्धारहंसानुधानोऽन्तर्यागः
॥२०॥ चित्स्वरूपन्तन्मयं तुरीयस्वरूपम् । अन्तरादित्ये ज्योतिः