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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 505 में से

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पृष्ठ 104

१०४ छान्दाग्योपनिषद्
अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं
दृष्ट्वा कक्षः श्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७॥
अपराह्न के पश्चात् और सूर्यास्त के पहले आदित्य का जो रूप होता है, वह उपद्रव है। सभी वन्य
प्राणी उस रूप के अनुगामी हैं, अतः वे पुरुष को देखकर भय से वन अथवा गुफा में चले जाते हैं ॥ ७ ॥
अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निदधति
निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यः सप्तविधः सामोपास्ते ॥ ८ ॥
तत्पश्चात् अस्त होते हुए सूर्य का जो रूप है, वह निधन है। पितृगण उसके उस रूप के अनुगामी हैं।
चूँकि वे पितृगण निधन रूप साम के उपासक हैं, अतः उन्हें प्रजा (श्राद्धकाल में दर्भ पर) स्थापित करती
है। इस प्रकार इस आदित्य रूप साम की सप्तविध उपासना की जाती है ॥ ८ ॥
॥ दशमः खण्डः ॥
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधःसामोपासीत हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव
इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥
तदनन्तर आत्मा तुल्य अतिमृत्यु रूप सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। शब्द
'हिंकार' तीन अक्षरों वाला है तथा 'प्रस्ताव' भी तीन अक्षरों वाला है, अतः दोनों समान हैं ॥ १ ॥
आदिरिति द्वयक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
शब्द 'आदि' दो अक्षरों से बना है और 'प्रतिहार' शब्द चार अक्षरों से बना है। इसमें से एक अक्षर
निकालकर 'आदि' शब्द में जोड़ने से वे समान हो जाते हैं ॥ २ ॥
उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते
त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥
'उद्गीथ' शब्द तीन अक्षरों वाला है और उपद्रव चार अक्षरों वाला है। ये तीन-तीन अक्षरों में समान हैं, एक
अक्षर शेष रह जाता है। यह शेष रहने वाला 'अक्षर' कहा जाता है, इसमें भी तीन अक्षर हैं, अतः वह भी समान है ॥
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
'निधन' शब्द तीन अक्षरों वाला है, यह उनके समान ही है। इस प्रकार कुल सात शब्दों में बाईस अक्षर हैं ॥
एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्या-
ज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥
इक्कीस अक्षरों से साधक आदित्य लोक को प्राप्त करता है। (बारह मास, पाँच ऋतुएँ और तीन लोक
मिलकर बीस होते हैं) आदित्य ही इक्कीसवाँ अक्षर है। बाईसवें अक्षर से साधक आदित्य से परे सुख
स्वरूप, शोक रहित (स्वर्ग) लोक को प्राप्त करता है ॥ ५ ॥
आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं
विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधः सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥
इस प्रकार जो साधक परमात्म-तुल्य अति मृत्युरूप सप्तविध साम की उपासना करता है, वह
इक्कीसवें अक्षर से आदित्य रूप साम की उपासना करता है और आदित्य लोक को जीत लेता है। बाईसवें
अक्षर से वह आदित्य से परे लोक पर विजय प्राप्त करता है ॥ ६ ॥