ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—७ देवता—अग्नि
सूक्त—७ देवता—अग्नि
स्वस्ति नो दिवो अग्ने पृथिव्या विश्वायुर्धेहि यजथाय देव.
सचेमहि तव दस्म प्रकेतैरुरुष्या ण उरुभिर्देव शंसैः.. (१)
हे दिव्यगुण युक्त अग्नि! हम यज्ञकर्त्ताओं के लिए द्यावा-पृथिवी से लाकर कल्याण
प्रदान करो. हे दर्शनीय अग्नि! हम तुम्हें प्राप्त करें. तुम अनेक प्रशंसनीय रक्षासाधनों से
हमारी रक्षा करो. (१)
इमा अग्ने मतयस्तुभ्यं जाता गोभिरश्वैरभि गृणन्ति राधः.
यदा ते मर्तो अनु भोगमानड्वसो दधानो मतिभिः सुजात.. (२)
हे अग्नि! ये स्तुतियां तुम्हारे लिए बोली गई हैं. तुम अश्वों और गायों के साथ हमारे लिए
धन देते हो, इसलिए हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे तेज से सबको ढकने वाले, शोभनकर्मों से
उत्पन्न एवं हमें धन देने वाले अग्नि! जब लोग तुम्हारा दिया हुआ धन प्राप्त करते हैं, तब
तुम्हारी स्तुति की जाती है. (२)
अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित्सखायम्.
अग्नेरनीकं बृहतः सपर्यं दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य.. (३)
मैं अग्नि को ही पिता, बंधु, भ्राता तथा नित्य मित्र मानता हूं. मैं अग्नि के मुख की उसी
प्रकार सेवा करता हूं, जिस प्रकार द्युलोक में स्थित, पूजायोग्य एवं दीप्तिशाली सूर्यमंडल की
आराधना की जाती है. (३)
सिध्रा अग्ने धियो अस्मे सनुत्रीर्यं त्रायसे दम आ नित्यहोता.
ऋतावा स रोहिदश्वः पुरुक्षुर्द्युभिरस्मा अहभिर्वाममस्तु.. (४)
हे अग्नि! तुम्हारे विषय में हमारे द्वारा की गई स्तुतियां पूर्ण हुई हैं. हे नित्य होता व
यज्ञयुक्त अग्नि! तुम हमारी यज्ञशाला में उपस्थित रहकर हमारी रक्षा करते हो. मैं तुम्हारे
सहयोग से यज्ञकर्त्ता बनूं तथा लाल रंग के घोड़े एवं बहुत सा धन प्राप्त करूं, जिससे उत्तम
दिवसों में तुम्हें हव्य मिल सके. (४)
द्युभिर्हितं मित्रमिव प्रयोगं प्रत्नमृत्विजमध्वरस्य जारम्.
बाहुभ्यामग्निमायवोऽजनन्त विक्षु होतारं न्यसादयन्त.. (५)
दीप्तियों से युक्त, मित्र के समान युक्त करने योग्य, पुराने ऋत्विज् एवं यज्ञ को समाप्त
करने वाले अग्नि को यजमानों ने भुजाओं द्वारा उत्पन्न किया तथा देवों को बुलाने का काम
सौंपा. (५)
स्वयं यजस्व दिवि देव देवान्किं ते पाकः कृणवदप्रचेताः.
यथायज ऋतुभिर्देव देवानेवा यजस्व तन्वं सुजात.. (६)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम द्युलोक में रहने वाले देवों का यज्ञ करो. कच्ची बुद्धि वाले
और ज्ञानरहित लोग तुम्हारे बिना क्या कर सकेंगे? हे शोभन जन्म वाले अग्नि! तुमने जिस
प्रकार समयसमय पर देवों के यज्ञ किए हैं, उसी प्रकार अपना भी यज्ञ करो. (६)
भवा नो अग्नेऽवितोत गोपा भवा वयस्कृदुत नो वयोधाः.
रास्वा च नः सुमहो हव्यदातिं त्रास्वोत नस्तन्वो३ अप्रयुच्छन्.. (७)
हे अग्नि! तुम दृष्ट और अदृष्ट दोनों प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करो. तुम हमारे लिए
अन्न उत्पन्न करो एवं अन्न दो. हे शोभन पूजा योग्य अग्नि! तुम हमें हव्य सामग्री का दान करो
एवं हमारे शरीरों का पालन करो. (७)
सूक्त—८ देवता—अग्नि व इंद्र
प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति.
दिवश्चिदन्ताँ उपमाँ उदानळपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (१)
अग्नि बड़ा झंडा लेकर द्यावा-पृथिवी के बीच में जाते हैं एवं देवों को बुलाने के लिए
बैल के समान शब्द करते हैं. अग्नि द्युलोक से दूर या समीप रहकर उसे व्याप्त करते हैं एवं
जल के भंडार अंतरिक्ष में बिजली के रूप में बढ़ते हैं. (१)
मुमोद गर्भो वृषभः ककुद्मान्सेमा वत्सः शिमीवाँ अरावीत्.
स देवतात्युद्यतानि कृण्वन्त्स्वेषु क्षयेषु प्रथमो जिगाति.. (२)
अभिलाषापूरक एवं उन्नत तेज वाले अग्नि द्यावा-पृथिवी के मध्य में प्रसन्न होते हैं.
प्रातःकाल एवं निशा के प्रसिद्ध पुत्र एवं यज्ञकर्म करने वाले अग्नि शब्द करते हैं. वे यज्ञ में
उत्साहपूर्ण कर्म करते हैं, अपने स्थानों में रहते हैं एवं देवों के प्रमुख बनकर जाते हैं. (२)
आ यो मूर्धानं पित्रोररब्ध न्यध्वरे दधिरे सूरो अर्णः.
अस्य पत्मन्नरुषीरश्वबुध्ना ऋतस्य योनौ तन्वो जुषन्त.. (३)
अग्नि अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी के सिर पर अपने तेज से रमण करते हैं.
यज्ञकर्त्ता शोभनशक्ति वाले अग्नि के तेज को यज्ञ में धारण करते हैं. अग्नि के पतन के समय
सुशोभित स्तोता यज्ञ के स्थान में व्याप्त अग्नि के शरीर की सेवा करते हैं. (३)
उषउषो हि वसो अग्रमेषि त्वं यमयोरभवो विभावा.
ऋताय सप्त दधिषे पदानि जनयन्मित्रं तन्वे३ स्वायै.. (४)
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हे प्रशंसनीय अग्नि! तुम प्रतिदिन उषाकाल से पहले ही आ जाते हो तथा आपस में
मिले हुए रात-दिन को प्रकाशित करते हो. तुम अपने शरीर से सूर्य को उत्पन्न करते हुए यज्ञ
के निमित्त सात स्थानों में बैठो. (४)
भुवश्चक्षुर्मह ऋतस्य गोपा भुवो वरुणो यदृताय वेषि.
भुवो अपां नपाज्जातवेदो भुवो दूतो यस्य हव्यं जुजोषः.. (५)
हे अग्नि! तुम चक्षु के समान यज्ञ को प्रकाशित करने वाले तथा रक्षक हो. जब तुम
वरुण के रूप में जाते हो तब तुम रक्षक बनते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हीं जल के नाती एवं
उस यजमान के दूत बनते हो, जिसका हवि तुम स्वीकार कर लेते हो. (५)
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः.
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकृषे हव्यवाहम्.. (६)
हे अग्नि! तुम अंतरिक्ष में कल्याणकारी अश्वों वाले देवों से मिलकर यज्ञ और जल के
नेता बनते हो. तुम प्रधान एवं सबका उपभोग करने वाले सूर्य को स्वर्ग में धारण करते हो एवं
अपनी जीभ को हव्यवहन करने वाली बनाते हो. (६)
अस्य त्रितः क्रतुना वव्रे अन्तरिच्छन्धीतिं पितुरेवैः परस्य.
सचस्यमानः पित्रोरुपस्थे जामि ब्रुवाण आयुधानि वेति.. (७)
यज्ञ के भाग से बढ़ी हुई शक्ति वाले त्रित ऋषि ने अपने रक्षासाधनों से युक्त होकर, यज्ञ
के मध्य में अपना भाग चाहते हुए उत्तम एवं जगत्पालक इंद्र को यज्ञ के द्वारा मित्र बनाया.
माता-पितारूप द्यावा-पृथिवी के मध्य में वर्तमान यज्ञ में ऋत्विजों सहित त्रित ने इंद्र के
अनुकूल स्तोत्र बोलते हुए आयुध प्राप्त किए. (७)
स पित्र्याण्यायुधानि विद्वानिन्द्रेषित आप्त्यो अभ्ययुध्यत्.
त्रिशीर्षाणं सप्तरश्मिं जघन्वान्त्वाष्ट्रस्य चिन्निः ससृजे त्रितो गाः.. (८)
अपने पिता के आयुधों को जानने वाले एवं इंद्र के द्वारा प्रेरित आप्त्यपुत्र त्रित ने युद्ध
किया. उसने सात रश्मियों वाले त्रिशिरा का वध किया और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गाएं
छीन लीं. (८)
भूरीदिन्द्र उदिनक्षन्तमोजोऽवाभिनत् सत्पतिर्मन्यमानम्.
त्वाष्ट्रस्य चिद्विश्वरूपस्य गोनामाचक्राणस्त्रीणि शीर्षा परा वर्कू.. (९)
सज्जनों के पालक इंद्र ने स्वयं को शूर मानने वाले एवं अतिरिक्त तेज धारण करने वाले
त्वष्टापुत्र को मार डाला. इंद्र ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की गायों को बुलाते हुए उसके तीन
सिरों को काट दिया. (९)
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