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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—६२ देवता—इंद्र, वरुण आदि

मही मित्रस्य वरुणस्य माया चन्द्रेव भानुं वि दधे पुरुत्रा.. (७)
जल बरसाने वाले सूर्य सत्यरूप दिन के आरंभ में उषा को प्रेरित करते हुए विशाल
धरती-आकाश के बीच में प्रवेश करते हैं. महती उषा मित्र एवं वरुण की प्रभा बनकर इस
प्रकार अपना प्रकाश सब जगह फैलाती है, जैसे सोना अपनी चमक फैलाता है. (७)
सूक्त—६२ देवता—इंद्र, वरुण आदि
इमा उ वां भृमयो मन्यमाना युवावते न तुज्या अभूवन्.
क्व१ त्यादिन्द्रावरुणा यशो वां येन स्मा सिनं भरथः सखिभ्यः.. (१)
हे इंद्र व वरुण! शत्रुओं द्वारा सताई हुई एवं घूमती हुई तुम्हारी प्रजाएं बलवान् शत्रुओं
द्वारा नष्ट न हो जावें. तुम्हारा वह यश कहां है, जिससे तुम हम मित्रों को अन्न देते हो? (१)
अयुम वां पुरतमो रयीयञ्छश्वत्तममवसे जोहवीति.
सजोष़ाविन्द्रावरुणा मरुद्भिर्दिवा पृथिव्या शृणुतं हवं मे.. (२)
हे इंद्र व वरुण! धन का इच्छुक एवं महान् यजमान अपनी रक्षा के लिए तुम दोनों को
सदा बुलाता है. तुम दोनों मरुतों, द्युलोक एवं धरती के साथ मिलकर मेरी स्तुति सुनो. (२)
अस्मे तदिन्द्रावरुणा वसु ष्यादस्मे रयिर्मरुतः सर्ववीरः.
अस्मान्वरूत्रीः शरणैरवन्त्वस्मान्होत्रा भारती दक्षिणाभिः.. (३)
हे इंद्र व वरुण! हमारे पास मनचाहा उत्तम धन हो. हे मरुतो! हमारे पास सब काम में
कुशल एवं वीर पुत्र हों एवं देवपत्नियां वर देकर हमारी रक्षा करें. अग्निपत्नी होत्रा एवं
सूर्यपत्नी भारती दक्षिणा के रूप में गाएं देकर हमारी रक्षा करें. (३)
बृहस्पते जुषस्व नो हव्यानि विश्वदेव्य. रास्व रत्नानि दाशुषे.. (४)
हे सब देवों के हितकारी बृहस्पति! इन लोगों के हव्य का सेवन करो एवं यजमान को
उत्तम धन दो. (४)
शुचिमर्कैर्बृहस्पतिमध्वरेषु नमस्यत. अनाम्योज आ चके.. (५)
हे ऋत्विजो! तुम यज्ञ में स्तुतियों द्वारा पवित्र बृहस्पति की सेवा करो. मैं उनसे वह बल
मांगता हूं, जिसे शत्रु न हरा सकें. (५)
वृषभं चर्षणीनां विश्वरूपमदाभ्यम्. बृहस्पतिं वरेण्यम्.. (६)
कामवर्षी, विश्वरूप नामक बैल की सवारी वाले, तिरस्कार न करने योग्य एवं सबके
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सेवा योग्य बृहस्पति से मैं मनचाहा फल मांगता हूं. (६)
इयं ते पूषन्नाघृणे सुष्टुतिर्देव नव्यसी. अस्माभिस्तुभ्यं शस्यते.. (७)
हे पूषादेव! यह अतिशय नवीन एवं शोभन स्तुति तुम्हारे लिए है. इसे हम तुम्हारे निमित्त
बोलते हैं. (७)
तां जुषस्व गिरं मम वाजयन्तीमवा धियम्. वध्यूरिव योषणाम्.. (८)
हे पूषा! तुम मेरी स्तुतिरूपी वाणी को स्वीकार करो. कामी पुरुष जिस प्रकार नारी के
समीप जाता है, उसी प्रकार तुम मेरी अन्न की अभिलाषा से पूर्ण स्तुति के सामने आओ. (८)
यो विश्वाभि विपश्यति भुवनां सं च पश्यति. स नः पूषाविता भुवत्.. (९)
जो सूर्य सब लोकों को विशेष रूप से देखते हैं एवं सभी वस्तुओं को वास्तव में जानते
हैं, वे हमारे रक्षक हैं. (९)
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (१०)
हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज का ध्यान करते हैं, जिन्होंने हमारी बुद्धि को प्रेरित
किया. (१०)
देवस्य सवितुर्वयं वाजयन्तः पुरंध्या. भगस्य रातीमीमहे.. (११)
अन्न की अभिलाषा करते हुए हम लोग तेजस्वी सविता देव के धन का दान उनकी
स्तुति द्वारा चाहते हैं. (११)
देवं नरः सवितारं विप्रा यज्ञैः सुवृक्तिभिः. नमस्यन्ति धियेषिताः.. (१२)
यज्ञकर्मकुशल एवं मेधावी अध्वर्यु आदि यज्ञ करने की भावना से प्रेरित होकर हव्य एवं
स्तुतियों द्वारा सविता देव की सेवा करते हैं. (१२)
सोमो जिगाति गातुविद् देवानामेति निष्कृतम्. ऋतस्य योनिमासदम्.. (१३)
मार्ग को जानने वाला सोमरस गंतव्य स्थान दिखाता है एवं देवों के बैठने योग्य यज्ञस्थल
में जाता है. (१३)
सोमो अस्मभ्यं द्विपदे चतुष्पदे च पशवे. अनमीवा इषस्करत्.. (१४)
सोम हम मानवों तथा दो पैर और चार पैर वाले पशुओं को रोगरहित अन्न दे. (१४)
अस्माकमायुर्वर्धयन्नभिमातीः सहमानः. सोमः सधस्थमासदत्.. (१५)
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सोमदेव हमारी आयु बढ़ाते हुए एवं यज्ञ में विघ्न डालने वाले शत्रुओं को हराते हुए
हमारे यज्ञ में बैठें. (१५)
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्. मध्वा रजांसि सुक्रतू.. (१६)
हे शोभन कर्म वाले मित्र व वरुण! हमारी गोशाला को दूध से सींच दो एवं हमारे घरों
को मधुर रस से भर दो. (१६)
उरुशंसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथ:. द्राघिष्ठाभि: शुचिव्रता.. (१७)
हे पवित्र कर्म वाले मित्र व वरुण! तुम बहुतों द्वारा स्तुत एवं हव्य अन्न से वृद्धि को प्राप्त
हो. तुम विशाल स्तुतियों द्वारा धन का महत्त्व पाकर सुशोभित बनो. (१७)
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम्. पातं सोममृतावृधा.. (१८)
हे मित्र व वरुण! तुम जमदग्नि ऋषि द्वारा स्तुत होकर यज्ञ में बैठो. यज्ञकर्म का फल
बढ़ाने वाले तुम दोनों सोम पिओ. (१८)
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