ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—५२ देवता—मरुद्गण
स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव.
पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि.. (१५)
जिस प्रकार सूर्य और चंद्र निर्बाधरूप से अपने मार्ग पर चलते हैं, उसी प्रकार हम भी
कल्याण मार्ग पर चलें. ऐसे बंधुमित्रों से हमारा मिलन हो, जो बहुत दिन से बिछुड़कर भी
क्रोधित नहीं हैं एवं हमारा स्मरण करते हैं. (१५)
सूक्त—५२ देवता—मरुद्गण
प्र श्यावाश्व धृष्णुयार्चा मरुद्भिर्ऋक्वभि:.
ये अद्रोधमनुष्वधं श्रवो मदन्ति यज्ञिया:.. (१)
हे ऋषि श्यावाश्व! तुम धीरतापूर्वक स्तुतिपात्र मरुतों की पूजा करो. वे यज्ञ के पात्र हैं
एवं प्रतिदिन हविरूपी अन्न को निर्बाध रूप में पाकर प्रसन्न होते हैं. (१)
ते हि स्थिरस्य शवस: सखाय: सन्ति धृष्णुया.
ते यामन्ना धृषद्विनस्तमना पान्ति शश्वत:.. (२)
वे धीर हैं एवं स्थिर शक्ति के मित्र हैं. वे मार्ग में भ्रमण करने वाले हैं एवं अपने आप
हमारी संतान की रक्षा करते हैं. (२)
ते स्पन्द्रासो नोक्षणोऽति ष्कन्दन्ति शर्वरी:.
मरुतामधा महो दिवि क्ष्मा च मन्महे.. (३)
गतिशील एवं जल बरसाने वाले मरुद्गण रात्रियों को लांघते हुए हमारे पास आते हैं,
इसी कारण मरुतों का तेज धरती एवं आकाश में व्याप्त तथा स्तुति योग्य है. (३)
मरुत्सु वो दधीमहि स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया.
विश्वे ये मानुषा युगा पान्ति मर्त्यं रिष:.. (४)
हे अध्वर्यु एवं होताओ! तुम लोग धीरतापूर्वक मरुतों की स्तुति करते एवं हव्य देते हो.
इसका क्या कारण है? केवल यही कारण है कि वे मनुष्यों को हिंसक शत्रुओं से बचाते हैं.
(४)
अर्हन्तो ये सुदानवो नरो असामिशवस:.
प्र यज्ञं यज्ञियेभ्यो दिवो अर्चा मरुद्द्रय:.. (५)
हे होताओ! पूजा योग्य, शोभन दान वाले, यज्ञकर्म के नेता, पर्याप्त शक्तिशाली यज्ञ के
पात्र एवं दीप्तिशाली मरुतों की अर्चना यज्ञ साधनों द्वारा करो. (५)
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आ रुक्मैरा युधा नर ऋष्वा ऋष्टीरसृक्षत.
अन्वेनाँ अह विद्युतो मरुतो जङ्झतीरिव भानुरर्त त्मना दिवः.. (६)
वर्षा करने वाले महान् मरुद्गण चमकने वाले आभरणों एवं आयुधों से सुशोभित हैं
तथा मेघ का भेदन करने के लिए आयुध चलाते हैं. कल-कल बहने वाले जल के समान
बिजली मरुतों के पीछे चलती है एवं उसका प्रकाश स्वयं ही इधर-उधर फैलता है. (६)
ये वावृधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ.
वृजने वा नदीनां सधस्थे वा महो दिवः.. (७)
जो मरुद्गण धरती एवं आकाश में वृद्धि प्राप्त करते हैं, वे नदियों की धाराओं एवं
महान् स्वर्ग के स्थान में उन्नति करें. (७)
शर्धो मारुतमुच्छंस सत्यशवसमृभ्वसम्.
उत स्म ते शुभे नरः प्र स्पन्द्रा युजत त्मना.. (८)
हे स्तोताओ! मरुतों के अत्यंत विस्तृत एवं सत्य पर आधारित उत्तम बल की स्तुति
करो. वर्षा करने वाले मरुद्गण जल बरसाने के लिए अपने आप सबकी रक्षा के विचार से
परिश्रम करते हैं. (८)
उत स्म ते परुष्ण्यामूर्णा वसत शुन्ध्यवः.
उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा.. (९)
परुष्णी नामक नदी में रहने वाले मरुद्गण सबको शुद्ध करने वाले प्रकाश से घिरे रहते
हैं. वे रथ के पहिए की नेमि एवं अपनी शक्ति द्वारा बादल को भेदते हैं. (९)
आपथयो विपथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः.
एतेभिर्मह्यं नामाभिर्यज्ञं विष्टार ओहते.. (१०)
अभिमुख चलने वाले, विमुख चलने वाले, प्रतिकूल मार्ग में चलने वाले एवं अनुकूल
मार्ग में चलने वाले इन चारों नामों वाले मरुद्गण विस्तृत होकर हमारे यज्ञ को धारण करें.
(१०)
अधा नरो न्योहतेऽधा नियुते ओहते.
अधा पारावता इति चित्रा रूपाणि दर्शया.. (११)
वर्षा आदि इष्ट कार्यों के नेता देवगण संसार को धारण करते हैं. सबको मिलाने वाले
जगत् को धारण करते हैं. दूरवर्ती आकाश के ग्रह, तारों आदि को धारण करने वाले देवों का
रूप विचित्र एवं दर्शनीय है. (११)
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छन्दः स्तुभः कुभन्यव उत्समा कीरिणो नृतुः.
ते मे के चिन्न तायव ऊमा आसन्दृशि त्विषे.. (१२)
छंदों द्वारा स्तुति करने वाले एवं जल के अभिलाषी स्तोताओं ने मरुतों की प्रार्थना की
एवं प्यासे गोतम के लिए कुआं बनवाया. मरुतों में से कुछ ने चोर के समान छिपकर हमारी
रक्षा की थी एवं कुछ स्पष्ट रूप से हमारी शक्ति बढ़ाने में कारण बने थे. (१२)
य ऋष्वा ऋष्टिविद्युतः कवयः सन्ति वेधसः.
तमृषे मारुतं गणं नमस्या रमया गिरा.. (१३)
हे श्यावाश्व ऋषि! तुम दर्शनीय, विद्युतरूपी आयुध धारण करने वाले, बुद्धिमान् एवं
सबके निर्माता मरुद्गणों की रमणीय वाक्यों द्वारा स्तुति करो. (१३)
अच्छ ऋषे मारुतं गणं दाना मित्रं न योषणा.
दिवो वा धृष्णव ओजसा स्तुता धीभिरिषण्यत.. (१४)
हे ऋषि! तुम हव्य देते हुए एवं स्तुतियां करते हुए मरुतों के समीप आदित्य के समान
जाओ. हे शक्ति द्वारा शत्रुओं को हराने वाले मरुतो! तुम हमारी स्तुतियां सुनकर स्वर्गलोक से
हमारे यज्ञ में आओ. (१४)
नू मन्वान एषां देवाँ अच्छा न वक्षणा.
दाना सचेत सूरिभिर्यामश्रुतेभिरज्जिभिः.. (१५)
स्तोता मरुतों को स्तुति द्वारा शीघ्र प्राप्त करके अन्य देवों को पाने की अभिलाषा नहीं
करते. वे ज्ञानी, शीघ्रगतिशील के रूप में प्रसिद्ध एवं फल देने वाले मरुतों से दान पाते हैं.
(१५)
प्र ये मे बन्ध्वेषे गां वोचन्त सूरयः पृश्निं वोचन्त मातरम्.
अधा पितरमिष्मिणं रुद्रं वोचन्त शिक्वसः.. (१६)
जब मैं अपने बंधुओं को खोज रहा था, तब समर्थ मरुतों ने मुझे बताया कि पृश्नि उनकी
माता है. उन्होंने अन्न के स्वामी रुद्र को अपना पिता बताया. (१६)
सप्त मे सप्त शाकिन एकमेका शता ददुः.
यमुनायामधि श्रुतमुद्राधो गव्यं मृजे नि राधो अश्व्यं मृजे.. (१७)
उनचास संख्या वाले शक्तिशाली मरुतों ने एकत्र होकर मुझे सैकड़ों गाएं दीं. मरुतों
द्वारा दिए गए गोरूप अथवा अश्वरूप धन को हमने गंगा तट पर प्राप्त किया. (१७)
सूक्त—५३ देवता—मरुद्गण
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को वेद जानमेषां को वा पुरा सुम्नेष्वास मरुताम्.
यद्युयुञ्जे किलास्यः.. (१)
इन मरुतों का जन्म कौन जानता है? मरुतों का सुख सर्वप्रथम किसने अनुभव किया?
जब इन्होंने रथ में पृश्नि को जोड़ा था, तब इनकी शक्ति किसने जानी? (१)
ऐतान्नथेषु तस्थुषः कः शुश्राव कथा ययुः.
कस्मै ससुः सुदासे अन्वापय इळाभिर्वृष्टयः सह.. (२)
मरुतों को रथ पर बैठा हुआ किसने सुना था? इनके गमन का ढंग कौन जानता है?
बंधुरूप एवं वर्षाकारक मरुद्गण अन्न लेकर किस दानशील के लिए अवतीर्ण होते हैं? (२)
ते म आहुर्य आययुरप द्युभिर्विभिर्मदे.
नरो मर्या अरेपस इमान्पश्यन्निति ष्टुहि.. (३)
तेजस्वी घोड़ों पर सवार होकर जो मरुद्गण सोमरस का आनंद प्राप्त करने आए थे,
उन्होंने मुझसे कहा कि वे नेता, मानव हितकारी एवं आसक्तिरहित हैं. हे ऋषि! इस प्रकार के
मरुतों को देखकर उनकी स्तुति करो. (३)
ये अञ्जिषु ये वाशीषु स्वभानवः स्रक्षु खादिषु.
श्रया रथेषु धन्वसु.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारे आभरणों, आयुधों, मालाओं, सीने पर पहने जाने वाले गहनों, हाथ-
पैरों एवं उन में पहने जाने वाले कंकणों, रथों एवं धनुषों में जो बल आश्रित है, उसकी हम
स्तुति करते हैं. (४)
युष्माकं स्मा रथाँ अनु मुदे दधे मरुतो जीरदानवः.
वृष्टी द्यावो यतीरिव.. (५)
हे शीघ्र दान करने वाले मरुतो! वर्षा के निमित्त सभी जगह जाने वाली दीप्ति के समान
तुम्हारे रथ को देखकर हम प्रमुदित होते हैं. (५)
आ यं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचुच्यवुः.
वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः.. (६)
नेता एवं शोभन दान वाले मरुद्गण हवि देने वाले यजमान के कल्याण के लिए
आकाश से बादल को बरसाते हैं. वे धरती एवं आकाश के कल्याण के लिए बादल को छोड़ते
हैं. वर्षा करने वाले मरुत् सभी जगह जाने वाले जल के साथ गमन करते हैं. (६)
तत्प्रदानाः सिन्धवः क्षोदसा रजः प्र सस्रुर्धेनवो यथा.
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स्यन्ना अश्वा इवाध्वनो विमोचने वि यद्वर्तन्त एन्यः.. (७)
भेदन किए गए बादल से निकली हुई जल-धाराएं वेग के साथ आकाश में इस प्रकार
गमन करती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाय दूध देती है. शीघ्रगामी अश्व जिस प्रकार मार्गों पर
चलते हैं, उसी प्रकार नदियां तेजी से बहती हैं. (७)
आ यात मरुतो दिव आन्तरिक्षादमादुत.
माव स्थात परावतः.. (८)
हे मरुतो! तुम अंतरिक्ष, स्वर्ग अथवा इहलोक से यहां आओ. तुम दूरवर्ती स्थान में मत
रहो. (८)
मा वो रसानितभा कुभा क्रुमुर्मा वः सिन्धुर्नि रीरमत्.
मा वः परि ष्ठात्सरयुः पुरीषिण्यस्मे इत्सुम्नमस्तु वः.. (९)
हे मरुतो! रसा, अनितभा एवं कुभा नाम की नदियां एवं सभी जगह जाने वाली सिंधु
तुम्हें न रोके. जलपूर्ण सरयू नदी तुम्हें न रोके. तुम्हारे आने का सुख हमें प्राप्त हो. (९)
तं वः शर्धं रथानां त्वेषं गणं मारुतं नव्यसीनाम्.
अनु प्र यन्ति वृष्टयः.. (१०)
हे मरुतो! तुम्हारे नवीन रथों के वेग एवं दीप्ति की हम प्रशंसा करते हैं. वर्षा मरुतों के
पीछे-पीछे चलती है. (१०)
शर्धंशर्धं व एषां व्रातंव्रातं गणङ्गणं सुशस्तिभिः.
अनु क्रामेम धीतिभिः.. (११)
हे मरुतो! हम सुंदर स्तुतियों एवं हव्य देने आदि कर्मों द्वारा तुम्हारे बलों, समूहों एवं
गणों के पीछे चलते हैं. (११)
कस्मा अद्य सुजाताय रातहव्याय प्र ययुः.
एना यामेन मरुतः.. (१२)
मरुद्गण आज किस उत्तम हवि देने वाले यजमान के पास अपने रथ द्वारा जाएंगे?
(१२)
येन तोकाय तनयाय धान्यं१ बीजं वहध्वे अक्षितम्.
अस्मभ्यं तद्धत्तन यद्व ईमहे राधो विश्वायु सौभाग्यम्.. (१३)
हे मरुतो! तुम जिस कृपालु मन से हमारे पुत्र-पौत्रों के लिए नष्ट न होने वाले अन्नों के
बीज देते हो, उसी मन से हमें भी अन्नों के बीज दो. हम तुमसे पूर्ण आयु एवं सौभाग्ययुक्त धन
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मांगते हैं. (१३)
अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिभिर्हित्त्वावद्यमरातीः.
वृष्ट्वी शं योराप उस्रि भेषजं स्याम मरुतः सह.. (१४)
हे मरुतो! हम कल्याणों द्वारा पाप को त्यागकर निंदक-शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें.
तुम्हारे द्वारा की गई वर्षा से हम सुख, पापों का नाश, जल, गायों एवं ओषधियों को पावें.
(१४)
सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः.
यं त्रायध्वे स्याम ते.. (१५)
हे पूजित एवं नेता मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह अन्य देवों का
कृपापात्र एवं उत्तम पुत्र-पौत्रों वाला बनता है. हम तुम्हारे सेवक इसी प्रकार बनें. (१५)
स्तुहि भोजांत्स्तुवतो अस्य यामनि रणन्गावो न यवसे.
यतः पूर्वाँ इव सखीँरनु ह्वय गिरा गृणीहि कामिनः.. (१६)
हे ऋषि! स्तुति करने वाले इस यजमान के यज्ञ में तुम फल देने वाले मरुतों की स्तुति
करो. गाएं जैसे घास चरने के लिए चलती हुई प्रसन्न होती हैं, उसी प्रकार मरुत् प्रसन्न हों. तेज
चलने वाले मरुतों को पुराने मित्र के समान बुलाओ एवं स्तुति की अभिलाषा करने वाले
मरुतों की वचनों से स्तुति करो. (१६)
सूक्त—५४ देवता—मरुद्गण
प्र शर्धाय मारुताय स्वभानव इमां वाचमनजा पर्वतच्युते.
घर्मस्तुभे दिव आ पृष्टयज्वने द्युम्नश्रवसे महि नृम्णमर्चत.. (१)
स्वायत्त, तेज वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, धूप का शोषण करने वाले, स्वर्ग से
आने वाले, रथ के उपरिभाग पर विराजमान एवं तेजस्वी अन्न वाले मरुतों के बल की प्रशंसा
करो तथा उन्हें पर्याप्त अन्न दो. (१)
प्र वो मरुतस्तविषा उदन्यवो वयोवृधो अश्वयुजः परिज्ग्रयः.
सं विद्युता दधति वाशति त्रितः स्वरन्त्यापोऽवना परिज्ग्रयः.. (२)
हे मरुतो! तुम्हारे दीप्त, जगत् की रक्षा के लिए जल के इच्छुक, अन्न की वृद्धि करने
वाले, चलने के लिए रथ में जोड़ने वाले सभी ओर गमनशील, बिजली के साथ संगत होने
वाले व तीन स्थानों में शब्द करने वाले गण प्रकट होते हैं एवं जलराशि धरती पर गिरने लगती
है. (२)
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