ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव
सूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव
कदु प्रियाय धाम्ने मनामहे स्वक्षत्राय स्वयशसे महे वयम्.
आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो वृणाना वितनोति मायिनी.. (१)
हम सबके प्रिय विद्युत्-संबंधी तेज की स्तुति कब करेंगे? बल एवं यश उसका आधार हैं
एवं वह सबका पूज्य है. वह शक्ति सब ओर से परिमित लगने वाले आकाश में वर्षा का
विस्तार करती है. वह प्रज्ञावती एवं आकाश को ढकने वाली है. (१)
ता अतन्त वयुनं वीरवक्षणं समान्या वृतया विश्वमा रज:.
अपो अपाचीरपरा अपेजते प्र पूर्वाभिस्तिरते देवयुर्जन:.. (२)
क्या उषाएं ऋत्विजों द्वारा धारण करने योग्य ज्ञान का विस्तार करती हैं? वे एक रूप
वाली आवरण शक्ति से सारे संसार को ढक लेती हैं. देवों की अभिलाषा करने वाले लोग
पूर्ववर्तिनी एवं भविष्य में आने वाली उषाओं को छोड़कर सामने उपस्थित वर्तमान उषाओं से
अज्ञान को लांघते हैं. (२)
आ ग्रावभिरहन्येभिरक्तुभिर्वरिष्ठं वज्रमा जिघर्ति मायिनि.
शतं वा यस्य प्रचरन्त्स्वे दमे संवर्तयन्तो वि च वर्तयन्नहा.. (३)
पत्थरों द्वारा रात एवं दिन में तैयार किए गए सोमरस से प्रसन्न होकर इंद्र मायावी वृत्र
को मारने के लिए वज्र को तेज बनाते हैं. इंद्ररूपी सूर्य की सैकड़ों किरणें दिनों को लाती एवं
विदा करती हुई आकाश में घूमती हैं. (३)
तामस्य रीतिं परशोरिव प्रत्यनीकमख्यं भुजे अस्य वर्पस:.
सचा यदि पितुमन्तमिव क्षयं रत्नं दधाति भरहूतये विशे.. (४)
अपने स्वामी का अभिमत पूरा करने वाले परशु के समान हम अग्नि की दीप्ति को
देखते हैं. इस रूपवान् सूर्य की किरणों का वर्णन हम सुख पाने के निमित्त करते हैं. अग्नि देव
हमारे सहायक होकर यज्ञशाला में आते हैं एवं यजमान को अन्न से भरा हुआ घर तथा उत्तम
धन देते हैं. (४)
स जिह्वया चतुरनीक ऋञ्जते चारु वसानो वरुणो यतन्नरिम्.
न तस्य विद्म पुरुषत्वता वयं यतो भग: सविता दाति वार्यम्.. (५)
अग्नि रमणीय तेज को धारण करते हुए अंधकाररूपी शत्रु का नाश करते हैं एवं चारों
दिशाओं में ज्वालारूपी लपटें फैला कर सुशोभित होते हैं. हम पुरुष के समान आचरण करने
वाले अग्नि को नहीं जानते, क्योंकि भगरूपी महान् सविता हमें उत्तम धन देते हैं. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव
देवं वो अद्य सवितारमेषे भगं च रत्नं विभजन्तमायोः.
आ वां नरा पुरुभुजा ववृत्यां दिवेदिवे चिदश्विना सखीयन्.. (१)
तुम यजमानों के कल्याण के लिए हम आज सविता एवं भग के समीप जाते हैं. ये दोनों
यजमानों को धन देते हैं. हे नेता एवं बहुत भोग करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारी मित्रता की
अभिलाषा करते हुए हम प्रतिदिन तुम्हारे सामने जाते हैं. (१)
प्रति प्रयाणमसुरस्य विद्वान्सूक्तैर्देवं सवितारं दुवस्य.
उप ब्रुवीत नमसा विजानञ्ज्र्यैषं च रत्नं विभजन्तमायोः.. (२)
हे अंतरात्मा! तुम शत्रुओं का नाश करने वाले सूर्यदेव को वापस आया जानकर
स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करो. उन्हें मानवों को उत्तम रत्न एवं धन बांटने वाला जानकर हव्य एवं
स्तुतियां समर्पित करो. (२)
अदत्रया दयते वार्याणि पूषा भगो अदितिर्वस्त उस्रः.
इन्द्रो विष्णुर्वरुणो मित्रो अग्निरहानि भद्रा जनयन्त दस्माः.. (३)
पोषणकर्त्ता, सेवा करने योग्य एवं टुकड़े न होने वाले अग्नि अपनी ज्वालाओं द्वारा
उत्तम लकड़ी को खाते हैं एवं तेज का विस्तार करते हैं. इंद्र, विष्णु, वरुण, मित्र, अग्नि आदि
दर्शनीय देवगण हमारे दिवसों को कल्याणमय बनाते हैं. (३)
तन्नो अनर्वा सविता वरूथं तत्सिन्धव इषयन्तो अनु ग्मन्.
उप यद्द्वोचे अध्वरस्य होता रायः स्याम पतयो वाजरत्नाः.. (४)
सविता देव का कोई तिरस्कार नहीं कर पाया. वे हमें उत्तम धन दें. बहती हुई नदियां
उसी धन के लिए गतिशील हों. हम यज्ञ के होता बनकर इसलिए स्तोत्र बोलते हैं कि हम धनों
के स्वामी बनें एवं हमारे पास उत्तम अन्न हो. (४)
प्र ये वसुभ्य ईवदा नमो दुर्ये मित्रे वरुणे सूक्तवाचः.
अवैत्वभ्वं कृणुता वरीयो दिवस्पृथिव्योरवसा मदेम.. (५)
जिन यजमानों ने वसुओं को गतिशील अन्न भेंट किया है एवं मित्र वरुण के प्रति
जिन्होंने स्तुतियां बोली हैं, उन्हें महान् तेज प्राप्त हो. हे देवो! तुम उन्हें श्रेष्ठ सुख दो. हम
धरती और आकाश की रक्षा पाकर प्रसन्न हों. (५)
सूक्त—५० देवता—विश्वेदेव
ebook converter DEMO Watermarks*
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त स॒ख्यम्.
विश्वो राय इषुध्यति द्यु॒म्नं वृणीत पुष्यसे.. (१)
सभी मनुष्य सविता देव से मित्रता की याचना करें, सब लोग उनसे धन की कामना करें
एवं पुष्टि के लिए धन पावें. (१)
ते ते देव नेतर्ये चेमाँ अनुशसे.
ते राया ते ह्मा३पृचे सचेमहि सचथ्यैः.. (२)
हे सविता देव! हम यजमान तथा होता आदि अन्य लोग जो स्तुतियां करते हैं, वे सब
तुम्हारी ही हैं. तुम हमारी अभिलाषाएं पूर्ण करो एवं दोनों प्रकार के लोगों को धनी बनाओ.
(२)
अतो न आ नूनतिथिंनतः पत्नीर्दशस्यत.
आरे विश्वं पर्थेष्ठां द्विषो युयोतु यूयुविः.. (३)
अतः इस यज्ञ के नेता एवं अतिथि के समान पूज्य देवों की सेवा करो एवं देवपत्नियों
की सेवा करो. सबको विभक्त करने वाले सविता दूरवर्ती भागों में उपस्थित बैरियों को हमसे
दूर रखें. (३)
यत्र वह्निरभिहितो दुद्रवद्द्रोण्यः पशुः.
नृमणा वीरपस्त्योऽर्णा धीरेव सनिता.. (४)
जिस यज्ञ में यज्ञ को धारण करने वाला एवं यूप से बांधने योग्य पशु यूप के पास जाता
है. उस यज्ञ में यजमान वीर पत्नियां, पुत्र, घर, धरती, धन आदि पाता है. (४)
एष ते देव नेता रथस्पतिः शं रयिः.
शं राये शं स्वस्तय इषः स्तुतो मनामहे देवस्तुतो मनामहे.. (५)
हे सविता देव! तुम्हारा यह रथ धन से युक्त एवं सबका पालन करने वाला है. यह हमारे
लिए सुख प्रदान करे. हम सुख, धन एवं अन्न पाने के लिए स्तुतियां करते हैं. हम स्तुति योग्य
सविता की स्तुति करते हैं. (५)
सूक्त—५१ देवता—विश्वेदेव
अग्ने सुतस्य पीतये विश्वैरूमेभिरा गहि.
देवेभिर्हव्यदातये.. (१)
हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ सोमरस पीने के लिए हव्यदाता यजमान के पास
आओ. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*
ऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम्.
अग्नेः पिबत जिह्वया.. (२)
हे सच्ची स्तुतियों वाले देवो! तुम सत्यधारण करते हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ और
अग्निरूपी जीभ से सोमरस पिओ. (२)
विप्रेभिर्विप्र सन्त्य प्रातर्यावभिरा गहि.
देवेभिः सोमपीतये.. (३)
हे मेधावी एवं सेवा करने योग्य अग्नि! तुम प्रातःकाल आने वाले के साथ सोमरस पीने
हेतु आओ. (३)
अयं सोमश्चमू सुतोऽमत्रे परि षिच्यते.
प्रिय इन्द्राय वायवे.. (४)
ये सोमरस एवं उसे निचोड़ने वाले पत्थर हैं. सोमरस निचोड़कर पात्र भरा गया है. यह
इंद्र एवं वायु के लिए प्रिय है. (४)
वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये.
पिबा सुतस्यान्धसो अभि प्रयः.. (५)
हे वायु! तुम हव्य दान करने वाले यजमान के प्रति प्रसन्न होकर सोमरस पीने हेतु आओ
एवं आकर निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (५)
इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हथः.
ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः.. (६)
हे वायु! तुम और इंद्र इस सोमरस को पीने की योग्यता रखते हो. तुम निर्बाध होकर
सोमरस का सेवन करो एवं इसी के उद्देश्य से यहां आओ. (६)
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः.
निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः.. (७)
इंद्र एवं वायु के लिए दही मिला सोमरस तैयार किया है. वह सोम तुम्हारी ओर नीचे
बहने वाली सरिताओं के समान पहुंचे. (७)
सजूर्विश्वेभिर्देवैभिरश्विभ्यामुषसा सजूः.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (८)
हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ आओ एवं अश्विनीकुमारों तथा उषा के साथ मित्रता
स्थापित करो. तुम यज्ञ में आकर सोमरस द्वारा उसी प्रकार प्रसन्न बनो, जिस प्रकार अत्रि
ebook converter DEMO Watermarks*
ऋषि प्रसन्नता प्राप्त करते हैं. (८)
सजूर्मित्रावरुणाभ्यां सजूः सोमेन विष्णुना.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (९)
हे अग्नि! तुम मित्र, वरुण, सोम एवं विष्णु के साथ आओ तथा यज्ञ में निचोड़ा हुआ
सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (९)
सजूरादित्यैर्वसुभिः सजूरिन्द्रेण वायुना.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (१०)
हे अग्नि! तुम आदित्य, वसुओं, इंद्र एवं वायु के साथ आओ एवं यज्ञ में निचोड़ा हुआ
सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (१०)
स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः.
स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना.. (११)
अश्विनीकुमार, भग एवं अदितिदेवी हमारा कल्याण करें. सत्यशील एवं बलदाता पूषा
हमारा कल्याण करें. शोभन ज्ञानसंपन्न धरती-आकाश भी हमारा कल्याण करें. (११)
स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः.
बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः.. (१२)
हम कल्याण के लिए वायु की स्तुति करते हैं. सब लोकों के पालक सोम की भी हम
प्रार्थना करते हैं. हम देवसमूह के साथ बृहस्पति की स्तुति कल्याण के लिए करते हैं.
आदित्यगण हमारा कल्याण करें. (१२)
विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्तस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः.. (१३)
इस यज्ञ के पवित्र दिन सभी देव हमारा कल्याण करें. सभी मनुष्यों के नेता एवं घर देने
वाले अग्नि हमारा कल्याण करें. दीप्तिशाली ऋभुगण हमारी रक्षा एवं कल्याण करें. रुद्र
हमारा कल्याण करें एवं हमें पाप से बचावें. (१३)
स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति.
स्वस्ति न इन्द्राश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि.. (१४)
हे मित्रवरुण! हमारा कल्याण करो. हे धन की स्वामिनी एवं मार्ग को हितकर बनाने
वाली देवी! तुम हमारा कल्याण करो. इंद्र तथा अग्नि हमारा कल्याण करें. हे अदिति तुम
हमारा कल्याण करो. (१४)
ebook converter DEMO Watermarks*