सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—३८ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि

तं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम्
समश्वं चर्षणिभ्य आ पुरु शस्त मघत्तये.. (८)
हे वाजगण, ऋभुओ, इंद्र एवं अश्विनीकुमारो! तुम हम स्तुतिकर्त्ता लोगों को देने के
निमित्त अधिक मात्रा में धन एवं अन्न का वचन दो. (८)
सूक्त—३८ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि
उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे.
क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्.. (१)
हे द्यावा-पृथ्वी! प्राचीन काल में त्रसदस्यु नामक राजा ने धन पाकर मांगने वाले लोगों
को दिया था. तुमने उसे घोड़ा, पुत्र एवं दस्युजनों को नष्ट करने योग्य बल दिया था. (१)
उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्.
ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्.. (२)
हे द्यावा-पृथ्वी! तुम दोनों गमनशील, बहुत से शत्रुओं को रोकने वाली, समस्त प्रजाओं
की रक्षा करने वाली, शोभन-गति वाली, दीप्तिशालिनी, तेज चलने वाली एवं राजा के समान
शूर दधिक्रा को धारण करते हो. (२)
यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः.
पद्भिर्गृध्यन्तं मेध्युं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्.. (३)
धरती-आकाश उस दधिक्रा को धारण करते हैं, जिसकी स्तुति प्रसन्नतापूर्वक सभी
मनुष्य किया करते हैं. जिस तरह जल नीचे बहता है, वे उसी तरह गतिशील, युद्ध की इच्छा
करने वाले, वीर के समान दिशाओं को लांघने हेतु तत्पर, रथ पर बैठकर चलने वाले एवं हवा
की तरह तेज चलने वाले हैं. (३)
यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्.
आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यत्तिरो अरतिं पर्याप आयोः.. (४)
जो देव मिले हुए पदार्थों को संग्राम में पृथक्-पृथक् करता हुआ उपभोग करने के लिए
सभी दिशाओं में जाता है, जिसकी शक्ति प्रकट है, जो जानने योग्य बातों को जानता है एवं
स्तुति करने वाले यजमान के शत्रुओं का तिरस्कार करता है. (४)
उत स्सैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु.
नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्.. (५)
लोग संग्राम में दधिक्रा देव को देखकर उसी प्रकार चीखते-चिल्लाते हैं, जिस प्रकार
ebook converter DEMO Watermarks*

कोई मनुष्य वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाता है. जिस प्रकार नीचे की ओर उतरते
हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी भाग जाते हैं, उसी प्रकार अन्न एवं पशु समूह को नष्ट करने
के विचार से चलने वाले दधिक्रा को देखकर लोग भाग उठते हैं. (५)
उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्.
स्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्.. (६)
दधिक्रा देव असुरों की सेनाओं में जाने के इच्छुक होकर उन में श्रेष्ठ स्थान पाते हुए रथ
की पंक्तियों के साथ चलते हैं. वे मानव-हितकारी घोड़े के समान अलंकृत हैं, धूल उड़ाते हैं
एवं लगाम को बार-बार चबाते हैं. (६)
उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्य्ये.
तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्.. (७)
दधिक्रा देव इस प्रकार के घोड़ों के समान युद्ध में सहनशील, शत्रुओं के अन्न पर
अधिकार करने वाले, अपने अंगों से ही अपनी सेवा करने वाले, सीधे चलने वाले, असुर
सेनाओं में वेगपूर्ण, धूल उड़ाने वाले एवं उस धूल को अपनी ही भौंहों पर गिराने वाले हैं. (७)
उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्र्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते.
यदा सहस्रमभि भीमयोधीद्दुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्.. (८)
असुर दधिक्रा देव से इस प्रकार डरते हैं, जिस प्रकार लड़ने वाले लोग शब्द करते हुए
वज्र से डरते हैं. वे चारों ओर हजारों लोगों से युद्ध करते हुए उत्तेजित अवस्था में अत्यंत
भयंकर लगते हैं. कोई भी उन्हें रोकने का साहस नहीं कर पाता. (८)
उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः.
उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः.. (९)
मनुष्य इन दधिक्रा देव की सर्वाधिक गति की स्तुति करते हैं. वे मनुष्यों की अभिलाषा
पूरी करने वाले एवं व्याप्त हैं. वे इनसे कहते हैं कि जब आप हजारों सैनिकों के साथ चलेंगे
तो शत्रु हार जाएंगे. (९)
आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान.
सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि.. (१०)
सूर्य जिस प्रकार अपनी ज्योति से जल का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार दधिक्रा देव
अपने बल से पांचों प्रकार की प्रजाओं की वृद्धि करते हैं. सैकड़ों और हजारों धन देने वाले
वेगशाली दधिक्रा देव हमारी स्तुतियां सुनकर मधुर फल दें. (१०)
सूक्त—३९ देवता—दधिक्रा
ebook converter DEMO Watermarks*

आशुं दधिक्रां तमु नु ष्टवाम दिवस्पृथिव्या उत चर्चकिराम.
उच्छन्तीर्मामुषसः सूदयन्त्वति विश्वानि दुरितानि पर्षन्.. (१)
हम शीघ्र गति वाले दधिक्रा देव की जल्दी-जल्दी स्तुति करेंगे. हम धरती और आकाश
से उनके सामने घास फेंकेंगे. अंधकार नाश करने वाली उषाएं हमारी रक्षा करें एवं सब सुखों
से हमें पार लगावें. (१)
महश्चर्कर्म्यर्वतः क्रतुप्रा दधिक्राव्णः पुरुवारस्य वृष्णः.
यं पूरुभ्यो दीदिवांसं नाग्निं ददथुर्मित्रावरुणा ततुरिम्.. (२)
यज्ञकर्म करने वाला मैं महान्, बहुतों द्वारा इच्छित एवं कामवर्षी दधिक्रा देव की स्तुति
करता हूं. हे मित्र व वरुण! तुम दोनों रक्षा करने वाले एवं अग्नि की तरह प्रकाशयुक्त दधिक्रा
देव को मानवों के कल्याण के लिए धारण करते हो. (२)
यो अश्वस्य दधिक्राव्णो अकारीत्समिद्धे अग्ना उषसो व्युष्टौ.
अनागसं तमदितिः कृणोतु स मित्रेण वरुणेना सजोषाः.. (३)
जो यजमान उषा के फैलने एवं यज्ञाग्नि के प्रज्वलित होने पर अश्वरूपधारी दधिक्रा देव
की स्तुति करते हैं, दधिक्रा देव अदिति, मित्र और वरुण के साथ मिलकर उसे पापरहित
बनाते हैं. (३)
दधिक्राव्ण इष ऊर्जो महो यदन्महि मरुतां नाम भद्रम्.
स्वस्तये वरुणं मित्रमग्निं हवामह इन्द्रं वज्रबाहुम्.. (४)
हम अन्न एवं बल के साधक, महान् एवं स्तुतिकर्त्ताओं के कल्याणकर्त्ता दधिक्रा देव की
स्तुति करेंगे. हम वरुण, मित्र, अग्नि एवं वज्रधारी इंद्र को अपने कल्याण के लिए बुलाते हैं.
(४)
इन्द्रमिवेदुभये वि ह्वयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः.
दधिक्रामु सूदनं मर्त्याय ददथुर्मित्रावरुणा नो अश्वम्.. (५)
युद्ध के लिए उद्योग करने वाले एवं यज्ञ की तैयारी करने वाले, ये दोनों लोग इंद्र के
समान ही दधिक्रा देव को भी बुलाते हैं. हे मित्र वरुण! तुम मनुष्यों को प्रेरणा देने वाले
अश्वरूपी दधिक्रा देव को धारण करते हो. (५)
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः.
सुरभि नो मुखा करतप्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६)
हम जयशील, व्यापक एवं वेगशाली दधिक्रा देव की स्तुति करते हैं. वे हमारी चक्षु आदि
इंद्रियों को आनंदित एवं हमारी आयु को अधिक करें. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*