ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
(१५)
सूक्त—३१ देवता—विश्वेदेव
आ नो देवानामुप वेतु शंसो विश्वेभिस्तुरैरवसे यजत्रः.
तेभिर्वयं सुसखायो भवेम तरन्तो विश्वा दुरिता स्याम.. (१)
हम स्तोताओं के स्तुतियोग्य एवं यज्ञपात्र इंद्र शीघ्रगामी मरुतों के साथ हमारी रक्षा के
लिए आवें. हम उन देवों के शोभन सखा बनें एवं सभी पापों से पार हो जावें. (१)
परि चिन्मर्तो द्रविणं ममन्यादृतस्य पथा नमसा विवासेत्.
उत स्वेन क्रतुना सं वदेत श्रेयांसं दक्षं मनसा जगृभ्यात्.. (२)
मनुष्य सभी प्रकार से देवयज्ञ के लिए धन की अभिलाषा करें एवं धन पाकर हव्य द्वारा
यज्ञ के मार्ग से देवों की सेवा करें. वे अपने ज्ञान से देवों का ध्यान करें एवं अति प्रशंसनीय
तथा सर्वव्यापक अंतरात्मा को मन से ग्रहण करें. (२)
अधायि धीतिरसमृग्रमंशास्तीर्थे न दस्ममुप यन्त्यूमाः.
अभ्यानशम सुवितस्य शूंषं नवेदसो अमृतानामभूम.. (३)
देवयज्ञ की क्रिया आरंभ हो गई है. जिस प्रकार तीर्थ में तर्पण वाले जल के अंश देवों के
पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारे दिए हुए तृप्तिकारक हव्य दर्शनीय एवं छोटे-बड़े देवों के पास
जाते हैं. हमने विस्तृत स्वर्ग का सुख पाया है और हम देवों का स्वरूप जानने वाले बनें. (३)
नित्यश्चाकन्यात् स्वपतिर्दमूना यस्मा उ देवः सविता जजान.
भगो वा गोभिर्यमेमनज्यात्सो अस्मै चारुश्छदयदुत स्यात्.. (४)
अपनी प्रजाओं के स्वामी प्रजापति दानोत्सुक होकर फल देने की अभिलाषा करें.
यज्ञकर्त्ता को सविता देव ने फल दिया है. स्तुति द्वारा प्रसन्न इंद्र एवं अर्यमा मुझे फल दें. सुंदर
रूप वाले सभी देव मुझे फल दें. (४)
इयं सा भूया उषासामिव क्षा यद्ध क्षुमन्तः शवसा समायन्.
अस्य स्तुतिं जरितुर्भिक्षमाणा आ नः शग्मास उपयन्तु वाजाः.. (५)
जिस समय स्तुति अभिलाषी देवगण शब्द करते हुए तेज चाल से मेरे पास आए, उस
समय यह धरती प्रातःकाल के प्रकाश से भर गई. सुखकारक अन्न हमारे पास आवे. (५)
अस्येदेषा सुमतिः पप्रथानाभवत्पूर्व्या भूमना गौः.
अस्य सनीळा असुरस्य योनौ समान आ भरणे बिभ्रमाणाः.. (६)
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इस समय हमारी देवस्तुति देवों के पास जाने के लिए पहले के समान विस्तृत हो रही है.
मुझ शक्ति के यज्ञ में सब देव अपने अनुकूल स्थान ग्रहण करें एवं मेरे लिए उत्तम फल दें. मेरा
यज्ञ सब देवों का पोषक है. (६)
किं स्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः.
संतस्थाने अजरे इतऊती अहानि पूर्वीरुषसो जरन्त.. (७)
वह कौन सा वन अथवा कौन सा वृक्ष है, जिससे सामग्री लेकर देवों ने द्यावा-पृथिवी को
बनाया है? देवों द्वारा सुरक्षित द्यावा-पृथिवी ठीक से स्थित एवं जरारहित हैं, जबकि प्राचीन
दिन एवं उषाएं जीर्ण हो गई हैं. (७)
नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति.
त्वचं पवित्रं कृणुत स्वधावान्यदीं सूर्य न हरितो वहन्ति.. (८)
द्यावा-पृथिवी ही सबसे बढ़कर नहीं हैं. उनसे बढ़कर भी कोई है. वह प्रजाओं को बनाने
वाला और द्यावा-पृथिवी का रक्षक है. उस अन्न के स्वामी ने उस समय अपने शरीर का
निर्माण किया था, जिस समय सूर्य के घोड़ों ने उनका रथ खींचना भी आरंभ नहीं किया था.
(८)
स्तेगो न क्षामत्येति पृथ्वीं मिहं न वातो वि ह वाति भूम.
मित्रो यत्र वरुणो अज्यमानोऽग्निर्वने न व्यसृष्ट शो कम्.. (९)
रश्मिसमूह वाले सूर्य विस्तृत धरती का अतिक्रमण करके नहीं जाते और वायु भी समर्थ
होते हुए वर्षा को छिन्न-भिन्न नहीं करते. मित्र एवं वरुण प्रकट होकर इस प्रकार प्रकाश करते
हैं, जिस प्रकार अग्नि वन को प्रकाशित कर सकते हैं. (९)
स्तरीर्यत्सूत सद्यो अज्यमाना व्यथिरव्यथीः कृणुत स्वगोपा.
पुत्रो यत्पूर्वः पित्रोर्जनिष्ट शम्यां गौर्जगार यद्ध पृच्छान्.. (१०)
बूढ़ी गाय जिस प्रकार वीर्य से सिंचित होकर शीघ्र ही बच्चा पैदा करती है, उसी प्रकार
दुःख नष्ट करने वाली एवं अपनी रक्षा करने वाली अरणियां अग्नि को उत्पन्न करती हैं. अग्नि
माता-पिता के समान दोनों अरणियों से प्राचीनकाल में उत्पन्न हुए थे, इसलिए उनके पुत्र हैं.
शमी वृक्ष पर जन्म लेने वाली अरणिरूप गाय की खोज की जाती है. (१०)
उत कण्वं नृषदः पुत्रमाहुरुत श्यावो धनमादत्त वाजी.
प्र कृष्णाय रुशदपिन्वतोधर्ऋतम्त्र नकिरस्मा अपीपेत्.. (११)
वेदवाही लोग कण्व को नृषद का पुत्र कहते हैं. काले रंग वाले एवं हव्यान्न धारक कण्व
ने धन प्राप्त किया. अग्नि ने कण्व के लिए अपना शोभनरूप प्रकट किया. कण्व के
अतिरिक्त अग्नि के लिए वैसा यज्ञ कोई नहीं कर सकता. (११)
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