ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति
तस्मा इद्विश्वे धुनयन्त सिन्धवोऽच्छिद्रा शर्म दधिरे पुरूणि.
देवानां सुप्रे सुभगः स एधते यंयं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः.. (५)
उसी की ओर सभी नदियां बहती हैं, वह अविच्छिन्न रूप से समस्त सुख प्राप्त करता है
एवं सौभाग्यशाली देवों द्वारा प्रदत्त सुख पाकर बढ़ता है. जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर
स्वीकार कर लेते हैं. (५)
सूक्त—२६ देवता—ब्रह्मणस्पति
ऋजुरिच्छंसो वनवद्वनुष्यतो देवयन्निददेवयन्तमभ्यसत्.
सुप्रावीरिद्वनवत्पृत्सु दुष्टरं यज्छेदयज्योर्वि भजाति भोजनम्.. (१)
ब्रह्मणस्पति का सरल चित्त स्तोता के शत्रुओं का विनाश करे. देवों का वह भक्त
देवविरोधियों को पराजित करे. ब्रह्मणस्पति को तृप्त करने वाला याज्ञिक युद्ध में अदमनीय
शत्रुओं का नाश करके यज्ञविरोधियों के धन का उपभोग करे. (१)
यजस्व वीर प्र विहि मनायतो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये.
हविष्कृणुष्व सुभगो यथाससि ब्रह्मणस्पतेरव आ वृणीमहे.. (२)
हे वीर! ब्रह्मणस्पति की स्तुति करो. अभिमानी शत्रुओं के प्रति युद्ध के लिए प्रस्थान
करो एवं शत्रुनाशक संग्राम में अपना मन दृढ़ करो. ब्रह्मणस्पति के निमित्त हव्य तैयार करो.
इससे तुम्हें सौभाग्य मिलेगा. हम उनसे रक्षा की याचना करते हैं. (२)
स इज्जनेन स विशा स जन्मना स पुत्रैर्वाजं भरते धना नृभिः.
देवानां यः पितरमाविवासति श्रद्धामना हविषा ब्रह्मणस्पतिम्.. (३)
जो श्रद्धालु यजमान देवों के पालक ब्रह्मणस्पति की सेवा हव्य द्वारा करता है, वह
अपने आत्मीयजनों, पुत्रों एवं परिचारकों सहित अन्न और धन प्राप्त करता है. (३)
यो अस्मै इव्यैर्घृतवद्भिर्विधत्प्र तं प्राचा नयति ब्रह्मणस्पतिः.
उरुष्यतीमंहसो रक्षती रिषोंऽहोश्चिदस्मा उरुचक्रिरद्भुतः.. (४)
जो यजमान घृतयुक्त हव्यों से ब्रह्मणस्पति की सेवा करता है, उसे वे प्राचीन सरल मार्ग
से ले जाते हैं, पाप, शत्रुओं तथा दरिद्रता से रक्षा करते हैं और अद्भुत उपकार करते हैं. (४)
सूक्त—२७ देवता—आदित्यगण
इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि.
शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*
मैं सुंदर आदित्यों के लिए घृत टपकाने वाले ये स्तुति रूपी वचन सदा प्रस्तुत करता हूं.
मित्र, अर्यमा, भग, अनेक देशों में उद्भूत वरुण, दक्ष एवं अंश मेरा वचन सुनें. (१)
इमं स्तोमं सक्रतवो मे अद्य मित्रो अर्यमा वरुणो जुषन्त.
आदित्यासः शुचयो धारपूता अवृजिना अनवद्या अरिष्टाः.. (२)
दीप्यमान्, पवित्र, सब पर अनुग्रह करने वाले, अनिंदनीय, दूसरों द्वारा अहिंसित एवं
समान कार्य करने वाले मित्र, अर्यमा एवं वरुण नामक अदितिपुत्र आज मेरे इस स्तोत्र को
सुनें. (२)
त आदित्यास उरवो गभीरा अदब्धासो दिप्सन्तो भूर्यक्षाः.
अन्तः पश्यन्ति वृजिनोत साधु सर्व राजभ्यः परमा चिदन्ति.. (३)
महान्, गंभीर, शत्रुओं द्वारा अहिंसित, शत्रुनाश के अभिलाषी तथा अमित तेजस्वी
अदितिपुत्र प्राणियों के अंतःकरण में रहने के कारण उनके पापपुण्यों को देखते हैं.
प्रकाशमान आदित्यों के लिए दूर की वस्तु भी पास ही है. (३)
धारयन्त आदित्यासो जगत्स्था देवा विश्वस्य भुवनस्य गोपाः.
दीर्घाधियो रक्षमाणा असुर्यमृतावानश्चयमाना ऋणानि.. (४)
स्थावर एवं जंगम को धारण करते हुए आदित्य देव संपूर्ण संसार की रक्षा करते हैं.
विशाल यज्ञों के स्वामी वे आदित्य प्राण के हेतु जल की रक्षा करते हैं. वे सत्ययुक्त एवं
स्तोताओं को ऋणरहित बनाने वाले हैं. (४)
विद्यामादित्या अवसो वो अस्य यदर्यमन्भय आ चिन्मयोभु.
युष्माकं मित्रावरुणा प्रणीतौ परि श्वभ्रेव दुरितानि वृज्याम्.. (५)
हे आदित्यगण! हम तुम्हारी रक्षा प्राप्त करें. तुम्हारा सहारा भय उपस्थित होने पर सुख
देता है. हे अर्यमा, मित्र और वरुण! जिस प्रकार रास्ता चलने वाले गड्ढों को छोड़ देते हैं,
उसी प्रकार तुम्हारे अनुगामी बनकर हम पापों का त्याग कर दें. (५)
सुगो हि वो अर्यमन्मित्र पन्था अनृक्षरो वरुण साधुरस्ति.
तेनादित्या अधि वोचता नो यच्छता नो दुष्परिहन्तु शर्म.. (६)
हे अर्यमा, मित्र एवं वरुण! तुम्हारा पथ सुगम, निष्कंटक एवं सुंदर है. हे आदित्यगण!
हमें उसी मार्ग से ले चलो, मधुर वचन बोलो तथा हमें अविनाशी सुख प्रदान करो. (६)
पिपर्तु नो अदिति राजपुत्राति द्वेषांस्यर्यमा सुगेभिः.
बृहन्मित्रस्य वरुणस्य शर्मोप स्याम पुरुवीरा अरिष्टाः.. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
मित्र आदि सुंदर पुत्रों की माता अदिति हमें शत्रुओं को पराभव करने वाले मार्ग से ले
चलें. हम अनेक वीर पुत्रों से युक्त एवं अन्यों द्वारा अहिंसित होकर मित्र तथा वरुण का सुख
प्राप्त करें. (७)
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीँरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम्.
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन्वरुण मित्र चारु.. (८)
अदितिपुत्र धरती, आकाश, स्वर्ग तीनों लोकों एवं अग्नि, वायु, सूर्य तीनों तेजों को
धारण करते हैं तथा इनके यज्ञों में तीन व्रत स्थिर हैं. हे आदित्यो! यज्ञ से तुम्हारी महिमा बढ़ी
है. हे अर्यमा, वरुण एवं मित्र! तुम्हारा महत्त्व सुंदर है. (८)
त्री रोचना दिव्या धारयन्त हिरण्ययाः शुचयो धारपूताः.
अस्वप्नजो अनिमिषा अदब्धा उरुशंसा ऋजवे मर्त्याय.. (९)
स्वर्णाभूषण धारण करने वाले, दीप्तियुक्त, पवित्र, निद्रारहित, निमेषहीन, असुरों द्वारा
अहिंसित एवं सब लोगों द्वारा स्तुति योग्य अदितिपुत्र सरल मनुष्यों के लिए अग्नि, वायु एवं
सूर्य तीन तेज धारण करते हैं. (९)
त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा ये च देवा असुर ये च मर्ताः.
शतं नो रास्व शरदो विचक्षेऽश्यामायूंषि सुधितानि पूर्वा.. (१०)
हे वरुण! चाहे असुर हों, देव हों अथवा मनुष्य हों, तुम सबके राजा हो. हमें सौ वर्ष तक
देखने की शक्ति दो. हम पूर्वजों द्वारा भोगी हुई अवस्था को प्राप्त करें. (१०)
न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा.
पाक्या चिद्वसवो धीर्या चद्युष्मांनीतो अभयं ज्योतिरश्याम्.. (११)
हे वासदाता अदितिपुत्रो! हम दायां, बायां, सामने, पीछे कुछ भी नहीं जानते. मुझ
अपरिपक्व ज्ञान एवं धैर्यरहित को यदि तुम उत्तम मार्ग से ले जाओगे तो मैं भयरहित ज्योति
पाऊंगा. (११)
यो राजभ्य ऋतनिभ्यो ददाश यं वर्धयन्ति पुष्टयश्च नित्याः.
स रेवान्याति प्रथमो रथेन वसुदावा विदथेषु प्रशस्तः.. (१२)
जो यजमान सुशोभित एवं यज्ञ के नेता आदित्यों को हव्य देता है तथा पोषक आदित्य
जिसको नित्य बढ़ाते हैं, वही धन का स्वामी, प्रसिद्ध, धन दान करने वाला एवं सब लोगों की
प्रशंसा करके रथ के द्वारा यज्ञस्थल में आता है. (१२)
शुचिरपः सूयवसा अदब्ध उप क्षेति वृद्धवयाः सुवीरः.
नकिष्टं घ्नन्त्यन्तितो न दूराद्य आदित्यानां भवति प्रणीतौ.. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*
जो यजमान आदित्यों के मार्ग का अनुसरण करता है, वह शुचि, शत्रुओं द्वारा अहिंसित,
अधिक अन्न का स्वामी, शोभन पुत्रों वाला एवं सुंदर फसलों का मालिक बनकर जल के
समीप निवास करता है. समीप या दूर रहने वाला कोई भी शत्रु उसकी हिंसा नहीं कर सकता.
(१३)
अदिते मित्र वरुणोत मृळ यद्वो वयं चकृमा कच्चिदागः.
उर्वश्यामभयं ज्योतिरिन्द्र मा नो दीर्घा अभि नशन्तमिस्त्राः.. (१४)
हे अदिति, मित्र एवं वरुण! यदि हम तुम्हारे प्रति कोई अपराध करें तो उससे हमारी रक्षा
करना. हे इंद्र! हम विस्तृत एवं भयरहित ज्योति प्राप्त करें. अंधेरी रात हमें व्याप्त न करे.
(१४)
उभे अस्मै पीपयतः समीची दिवो वृष्टिं सुभगो नाम पुष्यन्.
उभा क्षयावाजयन्याति पृत्सूभावर्धौ भवतः साधू अस्मै.. (१५)
जो यजमान अदितिपुत्रों के मार्ग पर चलता है, उसकी वृद्धि धरती-आकाश दोनों
मिलकर करते हैं. वह भाग्यशाली आकाश का जल प्राप्त करके वृद्धि करता है एवं युद्ध में
शत्रुओं को हरा कर अपने और उनके दोनों निवासस्थान प्राप्त करता है. संसार के चर और
अचर दोनों भाग उसके लिए मंगलकारक होते हैं. (१५)
या वो माया अभिद्रुहे यजत्राः पाशा आदित्या रिपवे विचृत्ताः.
अश्वीव ताँ अति येषं रथेनारिष्टा उरावा शर्मन्त्स्याम.. (१६)
हे यज्ञ योग्य आदित्यो! तुमने जो माया द्रोहकारी राक्षसों के लिए एवं जो पाश शत्रुओं
के लिए बनाए हैं, हम उन्हें अश्वारोही के समान रथ से लांघ जावें. हम शत्रुओं द्वारा अहिंसित
होकर महान् सुख प्राप्त करें. (१६)
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः.
मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (१७)
हे वरुण! मैं किसी धनी एवं अधिक दानी व्यक्ति के सम्मुख अपनी दरिद्रता की बात न
कहूं. हे दीप्तिमान् वरुण! हमें कभी भी आवश्यक धन की कमी न रहे. हम शोभन धन प्राप्त
करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (१७)
सूक्त—२८ देवता—वरुण
इदं कवेरादित्यस्य स्वराजो विश्वानि सान्त्यभ्यस्तु मह्ना.
अति यो मन्द्रो यजथाय देवः सुकीर्तिं भिक्षे वरुणस्य भूरेः.. (१)
यह हव्य क्रांतदर्शी एवं स्वयं शोभित आदित्य के लिए है. वे अपने महत्त्व से सभी
प्राणियों को पराजित करते हैं. तेजस्वी वरुण यजमान को प्रसन्न करते हैं. मैं वरुण से अधिक
कीर्ति की याचना करता हूं. (१)
तव व्रते सुभगासः स्याम स्वाध्यो वरुण तुष्टुवांसः.
उपायन उषसां गोमतीनामग्नयो न जरमाणा अनु द्यून्.. (२)
हे वरुण! हम भली प्रकार ध्यान, तुम्हारी स्तुति एवं सेवा करते हुए सौभाग्य प्राप्त करें.
जिस प्रकार किरणों वाली उषाओं के आने पर अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार हम
प्रतिदिन तुम्हारी स्तुति करते हुए दीप्तिसंपन्न हों. (२)
तव स्याम पुरुवीरस्य शर्मन्नुरुशंसस्य वरुण प्रणेतः.
यूयं नः पुत्रा अदितेरदब्धा अभि क्षमध्वं युज्याय देवाः.. (३)
हे विश्वनायक, अनेक वीरों से युक्त एवं बहुत से लोगों द्वारा स्तुत्य वरुण! हम तुम्हारे गृह
में निवास करें. हे शत्रुओं द्वारा अहिंसित अदितिपुत्रो! अपना मित्र बनाते समय हमारे सभी
अपराधों को क्षमा कर देना. (३)
प्र सीमादित्यो असृजद्विधर्ता ऋतं सिन्धवो वरुणस्य यन्ति.
न श्राम्यन्ति न वि मुचन्त्येते वयो न पप्तू रघुया परिज्मन्.. (४)
विश्वधारक एवं अदितिपुत्र वरुण ने जल बनाया है. उन्हीं के महत्त्व से नदियां बहती हैं.
नदियां न कभी विश्राम करती हैं और न पीछे लोटती हैं. ये शीघ्रगामिनी नदियां पक्षियों के
समान वेग से धरती पर बहती हैं. (४)
वि मच्छ्रथाय रशनामिवाग ऋध्याम ते वरुण खामृतस्य.
मा तन्तुश्छेदि वयतो धियं मे मा मात्रा शार्यपसः पुर ऋतोः.. (५)
हे वरुण! पाप ने मुझे रस्सी के समान बांध लिया है. मुझे इससे छुड़ाओ. हम तुम्हारी
जलपूर्ण नदी को प्राप्त करें. यज्ञकर्म करते समय मेरा कार्य रुके नहीं. यज्ञ समाप्ति से पहले
मेरा शरीर कभी शिथिल न हो. (५)
अपो सु म्यक्ष वरुण भियसं मत्सम्राळ्ऋतावोऽनु मा गृभाय.
दामेव वत्साद्वि मुमुग्ध्यंहो नहि त्वदारे निमिषश्चनेशे.. (६)
हे वरुण! भय को मेरे पास से हटाओ. हे शोभासंपन्न एवं सत्ययुक्त! मुझ पर अनुग्रह
करो. जिस प्रकार बंधे हुए बछड़े को रस्सी से छुड़ाते हैं, उसी प्रकार मुझे पाप से छुड़ाओ.
तुमसे दूर रहकर कोई एक पल के लिए भी अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता. (६)
मा नो वधैर्वरुण ये त इष्टावेनः कृण्वन्तमसुर भ्रीणन्ति.
ebook converter DEMO Watermarks*