ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१४ देवता—पितृलोक आदि
का पोषण करती हैं. (५)
सूक्त—१४ देवता—पितृलोक आदि
परेयिवांसं प्रवतो महीरनु बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम्.
वैवस्वतं सङ्गमनं जनानां यमं राजानं हविषा दुवस्य.. (१)
हे यजमान! तुम पितरों के स्वामी यम की पुरोडाश आदि के द्वारा सेवा करो. यम बहुत
से पुण्यकर्म करने वालों को सुख देने वाले स्थानों में ले जाते हैं, बहुतों का मार्ग सरल बनाते
हैं एवं सभी मनुष्यों की मंजिल एक है. (१)
यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ.
यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुरेना जज्ञानाः पथ्या३ अनु स्वाः.. (२)
सबके प्रमुख यम हमारे मार्गों को जानते हैं. यम के मार्ग का नाश कोई नहीं कर सकता.
जिस मार्ग से पूर्ववर्ती पितर गए हैं, उसीसे हम सब लोग जावें. (२)
मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पतिर्ऋक्वभिर्वावृधानः.
याँश्च देवा वावृधुर्यै च देवान्त्स्वाहान्ये स्वधयान्ये मदन्ति.. (३)
इंद्र कव्य नामक पितरों की सहायता से, यम अंगिरा नामक पितरों की सहायता से और
बृहस्पति ऋक्व नामक पितरों की सहायता से बढ़ते हैं. देवों की संवर्धना करने वाले एवं देवों
द्वारा संबंधित लोग भी बढ़ते हैं. देवों में कोई स्वाहा और कोई स्वधा के द्वारा प्रसन्न होता है.
(३)
इमं यम प्रस्तरमा हि सीदाङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः.
आ त्वा मन्त्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन्हविषा मादयस्व.. (४)
हे यम! अंगिरा नामक पितरों के साथ एकता रखते हुए तुम इस विस्तृत यज्ञ में आकर
बैठो. विद्वान् ऋत्विजों द्वारा बोले हुए मंत्र तुम्हें बुलावें. हे स्वामी यम! तुम इस हवि से प्रसन्न
बनो. (४)
अङ्गिरोभिरा गहि यज्ञियेभिर्यम वैरूपैरिह मादयस्व.
विवस्वन्तं हुवे यः पिता तेऽस्मिन्यज्ञे बर्हिष्या निषद्य.. (५)
हे यम! नानारूप धारी एवं यज्ञकर्त्ता अंगिराओं के साथ इस यज्ञ में पधारो एवं यजमान
को प्रसन्न करो. मैं तुम्हारे पिता विवस्वान् को बुलाता हूं. वे इस यज्ञ में बैठकर यजमान को
प्रसन्न करें. (५)
अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः.
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तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (६)
नवीन आगमन वाले अंगिरा, अथर्वा और भृगु नामक पितर सोमरस के अधिकारी हैं.
हम उन यज्ञपात्र पितरों की कृपादृष्टि पावें एवं उनकी कृपादृष्टि के कारण कल्याण प्राप्त करें.
(६)
प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूर्व्येभिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः.
उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम्.. (७)
हे मेरे पिता! जिन प्राचीन मार्गों से हमारे पूर्ववर्ती पितर गए हैं, उन्हीं से तुम भी पधारो.
तुम वहां स्वधा से प्रसन्न होते हुए यम एवं वरुणदेव—दोनों स्वामियों को देखो. (७)
सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन्.
हित्वायावद्यं पुनरस्तमेहि सं गच्छस्व तन्वा सुवर्चाः.. (८)
हे मेरे पिता! तुम उत्तम स्वर्ग में जाकर अपने पितरों से, यम से और अपने श्रौत, स्मार्त
कर्मों के फलों से मिलो. तुम अपना पाप छोड़कर म्रियमान नामक घर में आओ एवं शोभन
दीप्ति वाले शरीर से मिलो. (८)
अपेत वीत वि च सर्पतातोऽस्मा एतं पितरो लोकमक्रन्.
अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै.. (९)
हे श्मशान पर रहने वाले पिशाचो! यहां से चले जाओ, हट जाओ. पितरों ने इस स्थान
को हमारे इस मरे हुए यजमान के लिए बनाया है. यम ने दिवसों, जलों और रात्रियों से युक्त
यह स्थान इस मरने वाले को दिया है. (९)
अति द्रव सारमेयौ श्वानौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा.
अथा पितृन्त्सुविदत्राँ उपेहि यमेन ये सधमादं मदन्ति.. (१०)
हे अग्नि! तुम सरमा के पुत्र, चार आंखों वाले एवं चितकबरे दो कुत्तों को पार करके
उत्तम मार्ग के द्वारा जाते हुए यम के साथ प्रसन्न रहने वालों एवं शोभनज्ञानसंपन्न पितरों के
समीप जाओ. (१०)
यौ ते श्वानो यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षसौ.
ताभ्यामेनं परि देहि राजन्त्स्वस्ति चास्मा अनमीवं च धेहि.. (११)
हे स्वामी यम! जो तुम्हारे घर के रक्षक, चार आंखों वाले, मार्ग की रक्षा करने वाले एवं
मनुष्यों द्वारा प्रशंसित दो कुत्ते हैं, उनसे इस मृत व्यक्ति की रक्षा करो एवं इसे कल्याण एवं
रोगहीनता दो. (११)
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उरूणसावसुतृपा उदुम्बलौ यमस्य दूतौ चरतो जनाँ अनु.
तावस्मभ्यं दृशये सूर्याय पुनर्दातामसुमद्येह भद्रम्.. (१२)
लंबी नाक वाले, दूसरों के प्राणों से तृप्त होने वाले, अत्यंत बली एवं यम के दूत जो दो
कुत्ते हैं, वे आज हमें सूर्य का दर्शन करने के लिए यहां कल्याणकारी प्राण दें. (१२)
यमाय सोमं सुनुत यमाय जुहुता हवि:. यमं ह यज्ञो गच्छत्यग्निदूतो अरङकृत:.. (१३)
हे ऋत्विजो! यम के लिए सोमरस निचोड़ो तथा हवि का होम करो. अग्नि को दूत बनाने
वाला एवं अलंकृत यज्ञ यम के पास जाता है. (१३)
यमाय घृतवद्धविर्जुहोत प्र च तिष्ठत. स नो देवेष्वा यमद्दीर्घमायु: प्र जीवसे.. (१४)
हे ऋत्विजो! यम के लिए घी वाला हवि होम करो एवं उनकी सेवा करो. यम देव हमें
लंबा जीवन बिताने के लिए अधिक आयु दें. (१४)
यमाय मधुमत्तमं राज्ञे हव्यं जुहोतन.
इदं नम ऋषिभ्य: पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृद्भ्य:.. (१५)
हे ऋत्विजो! स्वामी यम के लिए अत्यंत मधुर हवि का होम करो. हमारे जिन पूर्वज
ऋषियों ने पहले यह मार्ग बनाया है, उनके लिए नमस्कार है. (१५)
त्रिकद्रुकेभि: पतति षळुर्वीरिकमिद्बृहत्.
त्रिष्टुब्गायत्री छन्दांसि सर्वा ता यम आहिता.. (१६)
यम त्रिकद्रुक नामक यज्ञ को प्राप्त करते हैं, छ: स्थानों में रहते हैं एवं एक विस्तृत
संसार में घूमते हैं. त्रिष्टुप्, गायत्री आदि सब छंद यम की स्तुति में प्रयुक्त हैं. (१६)
सूक्त—१५ देवता—पितृलोक
उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:.
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु.. (१)
उत्तम, मध्यम और अधम—तीनों श्रेणियों के पितर कृपा करते हुए हमारा हवि ग्रहण
करें. हमारी हिंसा न करने वाले और हमारे यज्ञों को जानने वाले जो पितर हमारी प्राणरक्षा
करने आए हैं, वे यज्ञों में हमारी रक्षा करें. (१)
इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वांसो य उपरास ईयु:.
ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु.. (२)
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जो बाबा आदि पितर पहले मरे हैं, जो बड़े भाई आदि पितर बाद में मरे हैं, जो पृथिवी
पर जन्म लेकर आ गए हैं अथवा जो शोभन धन वाली प्रजाओं के बीच हैं, उनके लिए यह
नमस्कार है. (२)
आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः.
बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः.. (३)
मैंने ऐसे पितरों को पाया है जो मेरी भक्ति को भली-भांति जानते हैं. मैंने व्यापक यज्ञ
की नित्यता एवं पूरा करने का उपाय भी पाया है. जो पितर कुशों पर बैठकर सोमरस पीते
हुए प्रसन्न होते हैं, वे इस कर्म में आवें. (३)
बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चक्रमा जुषध्वम्.
त आ गतावसा शन्तमेनाथा नः शं योररपो दधात.. (४)
हे कुशों पर बैठने वाले पितरो! इस समय तुम हमारी रक्षा करो. हमने तुम्हारे लिए ये
हव्य तैयार किए हैं, तुम इनका उपभोग करो. तुम आओ और रक्षा करते हुए हमारा कल्याण
करो. तुम हमें सुखी करो, हमारा दुःख मिटाओ और हमें पापरहित बनाओ. (४)
उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु.
त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्.. (५)
कुशों के ऊपर प्रिय द्रव्य रखे जाने के बाद सोमरस के प्रेमी पितर बुलाए गए हैं. वे वहां
आवें, हमारी स्तुतियां सुनें, स्तुतियां सुनकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करें एवं हमारी रक्षा करें.
(५)
आच्या जानु दक्षिणतो निषद्योमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे.
मा हिंसिष्ट पितरः केनचिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम.. (६)
हे पितरो! तुम सब मेरी दाहिनी ओर धरती पर घुटने टेककर बैठो और तुम सब इस यज्ञ
की प्रशंसा करो. हम पुरुष होने के कारण भूल से पाप कर बैठते हैं. तुम किसी पाप के
कारण हमारी हिंसा मत करो. (६)
आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय.
पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात.. (७)
हे लाल ज्वालाओं के समीप बैठने वाले पितरो! हव्य देने वाले मनुष्य को धन दो, तुम
यजमान के पुत्रों को धन दो तथा हमारे इस यज्ञ में धन धारण करो. (७)
ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः.
तेभिर्यमः संरणानो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (८)
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हमारे सोमरस तैयार करने वाले, उत्तम वस्त्रधारक एवं नियमपूर्वक देवादि को सोमपान
कराने वाले प्राचीन पितर यम के साथ एवं यम उनके साथ हवि आदि का उपभोग करना
चाहते हैं. यम उन पितरों के साथ अपनी इच्छाओं के अनुसार हव्य भक्षण करें. (८)
ये तातृषुर्देवत्रा चेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः.
आग्ने याहि सुविद्वेत्रेभिर्वाङ् सत्यैः काव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः.. (९)
हे अग्नि! यज्ञ करने के ज्ञाता, स्तोत्रों और मंत्रों के बनाने वाले एवं क्रम से देवत्व पाने
वाले जो पितर प्यासे हैं, उन्हें हमारे सामने लेकर आओ. वे पितर विशेष परिचित,
विवादरहित, यज्ञ में बैठने वाले एवं हव्य ग्रहण करने वाले हैं. (९)
ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः.
आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः.. (१०)
हे अग्नि! जो पितर सच्चे, हव्य भक्षण करने वाले, सोम पीने वाले, इंद्रादि देवों के साथ
एक रथ पर बैठने वाले, देवाराधन कर्त्ता, पहले वाले, उनके बाद वाले एवं यज्ञ में बैठने वाले
हैं. उन पितरों के साथ आओ. (१०)
अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः.
अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन.. (११)
हे अग्निष्वात्त नामक पितरो! यहां आओ और स्वागत स्वीकार करके अपने-अपने
आसनों पर बैठो एवं कुशों पर फैले हुए हव्यों को खाओ. इसके बाद हमें पुत्र-पौत्रों से युक्त
धन दो. (११)
त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाढ्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी.
प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि.. (१२)
हे सबको जानने वाले अग्नि! हमने तुम्हारी स्तुति की है. तुमने हमारा हव्य सुगंधित
बनाकर पितरों को दिया है. पितर ‘स्वधा’ शब्द के साथ दिया हुआ हवि भक्षण करें. हे अग्नि
देव! तुम हमारे प्रयत्न द्वारा संपादित हव्यों का भक्षण करो. (१२)
ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म.
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व.. (१३)
हे जातवेद अग्नि! तुम उन सब पितरों को जानते हो, जो यहां आए हैं, जो यहां नहीं
आए हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम नहीं जानते हैं. तुम स्वधा शब्द के साथ किए गए
हमारे यज्ञ को स्वीकार करो. (१३)
ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते.
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