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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

नि पर्वता अदसदो न सेदुस्त्वया दृळ्हानि सुक्रतो रजांसि.. (३)

को धारण करते हैं, कोई भी उन्हें नष्ट नहीं कर सकता. इंद्र प्रतिदिन गोलाकार सूर्य को देखने
योग्य बनाते हैं. शोभन-कर्म वाले इंद्र ने सारे संसार को विस्तृत किया है. (२)
अद्या चिन्नू चित्तदपो नदीनां यदाभ्यो अरदो गातुमिन्द्र.
नि पर्वता अदसदो न सेदुस्त्वया दृळ्हानि सुक्रतो रजांसि.. (३)
हे इंद्र! पहले के समान आज भी तुम्हारा नदियों से संबंधित जलरूपी कर्म विद्यमान है.
तुमने इनके बहने के लिए मार्ग बनाया था. खाना खाने के लिए बैठे मनुष्यों के समान पर्वत
तुम्हारी आज्ञा से बैठ गए थे. हे शोभन कर्म वाले इंद्र! तुमने लोकों को दृढ़ बनाया है. (३)
सत्यमित्तन्न त्वावाँ अस्तीन्द्र देवो न मर्त्यो ज्यायान्.
अहन्नहिं परिशयानमर्णोऽवासृजो अपो अच्छा समुद्रम्.. (४)
हे इंद्र! यह बात सत्य है कि तुम्हारे समान दूसरा नहीं है. कोई भी मनुष्य या देव तुमसे
बड़ा नहीं है. तुमने जल को रोककर सोए हुए मेघ को मारा एवं जल को समुद्र में बहने के
लिए स्वतंत्र बनाया. (४)
त्वमपो वि दुरो विषूचीरिन्द्र दृळ्हमरुजः पर्वतस्य.
राजाभवो जगतश्चर्षणीनां साकं सूर्य जनयन् द्यामुषासम्.. (५)
हे इंद्र! तुमने वृत्र असुर द्वारा रोके हुए जल को बहने के लिए स्वच्छंद बनाया एवं मेघ के
दृढ़ जलावरोध को नष्ट किया था. तुम सूर्य, उषा एवं स्वर्ग को एक साथ ही प्रकाशित करते
हुए प्रजाओं के राजा बने. (५)
सूक्त—३१ देवता—इंद्र
अभूरेको रयिपते रयीणामा हस्तयोरधिथा इन्द्र कृष्टीः.
वि तोके अप्सु तनये च सुरेऽवोचन्त चर्षणयो विवाचः.. (१)
हे धनपति इंद्र! तुम धनों के एकमात्र स्वामी हो. हे इंद्र! तुम अपने दोनों हाथों में प्रजाओं
को धारण करते हो. प्रजाएं, पुत्र, जल एवं वीर पुत्र पाने के निमित्त हम तुम्हारी स्तुति करते हैं.
(१)
त्वद्वियेन्द्र पार्थिवानि विश्वाच्युता चिच्च्यावयन्ते रजांसि.
द्यावाक्षामा पर्वतासो वनानि विश्वं दृळ्हं भयते अज्मन्ना ते.. (२)
हे इंद्र! मेघ तुम्हारे भय के कारण विस्तृत एवं आकाश में उत्पन्न जल को बरसाते हैं.
वैसे वह जल नीचे गिराने योग्य नहीं है. तुम्हारे आगमन से धरती-आकाश, पर्वत, वन एवं
समस्त प्राणी डरते हैं. (२)
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त्वं कुत्सेनाभि शुष्णमिन्द्राशुषं युध्य कुयवं गविष्टी.
दश प्रपित्वे अध सूर्यस्य मुषायश्चक्रमविवे रपांसि.. (३)
हे इंद्र! तुमने शुष्ण नामक प्रबल असुर के विरोध में कुत्स के साथ रहकर युद्ध किया था
एवं संग्राम में कुयव का वध किया था. तुमने युद्ध में सूर्य के रथ का एक पहिया चुरा लिया था
एवं पापकारी राक्षसों को इस संसार से भगा दिया था. (३)
त्वं शतान्यव शम्बरस्य पुरो जघन्थाप्रतीनि दस्यो:.
अशिक्षो यत्र शच्या शचीवो दिवोदासाय सुन्वते सुतुक्रे भरद्वाजाय गृणते वसूनि.. (४)
हे इंद्र! तुमने शंबर असुर की सौ अजेय नगरियों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था. हे बुद्धिमान्
एवं निचुड़े हुए सोमरस द्वारा खरीदे गए इंद्र! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले दिवोदास को
बुद्धिमत्तापूर्वक धन दिया एवं स्तुति करने वाले भरद्वाज को संपत्तियां दीं. (४)
स सत्यसत्वन्महते रणाय रथमा तिष्ठ तुविन्नृम्ण भीमम्.
याहि प्रपथिन्नवसोप मद्रिक्प्र च श्रुत श्रावय चर्षणिभ्य:.. (५)
हे शक्तिशाली योद्धाओं वाले तथा अधिक धनसंपन्न इंद्र! तुम महान् रण के लिए अपने
भयानक रथ पर बैठो. हे उत्तम-मार्ग वाले इंद्र! तुम हमारी रक्षा के लिए हमारे सामने आओ.
हे प्रसिद्ध इंद्र! अन्य प्रजाओं की अपेक्षा हमें प्रसिद्ध बनाओ. (५)
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय.
विरप्शिने वज्रिणे शन्तमानि वचांस्यासा स्थविराय तक्षम्.. (१)
हमने महान्, वीर, शक्तिशाली, शीघ्रता करने वाले, विशेषरूप से स्तुतियोग्य, वज्रधारी
एवं उन्नत इंद्र के लिए अपने मुखों के द्वारा अनोखी, बड़ी एवं सुखकारक स्तुतियां की हैं. (१)
स मातरा सूर्येणा कवीनामवासयद्रुजदद्रिं गृणान:.
स्वीधीभिर्ऋक्वभिर्वावशान उदुस्रियामसृजन्निदानम्.. (२)
इंद्र ने माता के समान धरती-आकाश को अंगिरागोत्रीय ऋषियों के कल्याण के निमित्त
सूर्य द्वारा चमकाया था एवं अंगिराओं की स्तुति सुनकर पर्वतों के टुकड़े किए थे. इंद्र ने
शोभन ध्यान वाली स्तुतियां सुनकर गायों को बंधनमुक्त किया था. (२)
स वह्निभिर्ऋक्वभिर्गोषु शश्वन्मितज्ञुभिः पुरुकृत्वा जिगाय.
पुरः पुरोहा सखिभिः सखीयन्दूळहा रुरोज कविभिः कविः सन्.. (३)
वीरतापूर्ण अनेक कर्म करने वाले इंद्र ने हव्य वहन करने वाले स्तुतिकर्त्ता एवं पालथी
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मारकर बैठे हुए अंगिरागोत्रीय ऋषियों का साथ देकर उनके शत्रुओं को जीता. नगरों को नष्ट
करने वाले एवं ज्ञानी इंद्र ने मित्रता मानने वाले अंगिराओं की मित्रता के कारण राक्षसों के
नगर नष्ट किए. (३)
स नीव्याभिर्जरितारमच्छा महो वाजेभिर्महद्भिrequest/sch: स नीव्याभिर्जरितारमच्छा महो वाजेभिर्महद्भिश्च शुष्मैः.
पुरुवीराभिर्वृषभ क्षितीनामा गिर्वणः सुविताय प्र याहि.. (४)
हे कामपूरक एवं स्तुतियों द्वारा सेवा करने योग्य इंद्र! तुम अपने स्तोत्रों को मनुष्यों में
सुखी बनाने के लिए महान् अन्नों, महान् बलों एवं सुंदर बछेड़ों वाली घोड़ियों के साथ उनके
सामने आते हो. (४)
स सर्गेण शवसा तक्तो अत्यैरप इन्द्रो दक्षिणतस्तुराषाट्.
इत्था सृजाना अनपावृदर्थं दिवेदिवे विविषुरप्रमृष्यम्.. (५)
हिंसकों को हराने वाले इंद्र सदा उद्यत बल के द्वारा नित्य चलने वाले तेज से मिलकर
सूर्य के दक्षिणायन होने पर जल को स्वतंत्र करते हैं. इस प्रकार उत्पन्न जल कभी वापस न
लौटने के लिए शांत समुद्र में प्रतिदिन मिलता है. (५)
सूक्त—३३ देवता—इंद्र
य ओजिष्ठ इन्द्र तं सु नो दा मदो वृषन्त्सत्वभिष्टिर्दास्वान्.
सौवश्व्यं यो वनवत्स्वश्वो वृत्रा समत्सु सासहदमित्रान्.. (१)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! हमें अतिशय शक्तिशाली, स्तुतियों द्वारा तुम्हें प्रसन्न करने वाला,
शोभन यज्ञ करने वाला व हव्यदाता पुत्र भली प्रकार दो. वह पुत्र सुंदर घोड़े पर सवार होकर
संग्राम में शत्रुओं के सुंदर घोड़ों को मारे एवं शत्रुओं को पराजित करे. (१)
त्वां ही३ न्द्रावसे विवाचो चर्षणयः शूरसातौ.
त्वं विप्रेभिर्वि पर्णीँरशायस्त्वोत इत्सनिता वाजमर्वा.. (२)
हे इंद्र! विविधरूप से स्तुतियां करने वाले मनुष्य युद्धों में रक्षा के निमित्त तुम्हें बुलाते हैं.
तुमने मेधावी अंगिराओं के साथ मिलकर पणियों का विशेषरूप से नाश किया था. तुम्हारे
द्वारा रक्षित व्यक्ति ही अन्न प्राप्त करता है. (२)
त्वं ताँ इन्द्रोभयाँ अमित्रान्दासा वृत्राण्यार्या च शूर.
वर्धीर्वनेव सुधितेभिरत्कैरा पृत्सु दर्षि नृणां नृतम.. (३)
हे शूर इंद्र! तुम दस्यु एवं आर्य दोनों प्रकार के शत्रुओं का नाश करते हो. हे नेताओं में
श्रेष्ठ इंद्र! लकड़हारा जैसे वनों को काटता है, उसी प्रकार तुम अपने तीखे आयुधों से संग्राम
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में शत्रुओं को काटते हो. (३)
स त्वं न इन्द्राकवाभिरूती सखा विश्वायुरविता वृधे भूः.
स्वर्षता यद्धवयामसि त्वा युध्यन्तो नेमधिता पृत्सु शूर.. (४)
हे सब जगह जाने वाले इंद्र! तुम दोषरहित रक्षा साधनों द्वारा उन्नति के लिए हमारी रक्षा
करो तथा हमारे मित्र बनो. हे शूर इंद्र! हम अपने कुछ सैनिकों के साथ संग्राम करते हुए धन
प्राप्त करने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (४)
नूनं न इन्द्रापराय च स्या भवा मृळीक उत नो अभिष्टौ.
इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्मन्दिवि ष्याम पार्ये गोषतमाः.. (५)
हे इंद्र! तुम आज एवं अन्य दिनों में निश्चितरूप से हमारे बनो एवं हमारे समीप आकर
हमें सुखी बनाओ. हम इस प्रकार की स्तुतियों द्वारा गायों के स्वामी बनकर तुम्हारे द्वारा प्रदत्त
तेजस्वी सुख में स्थित रहें. (५)
सूक्त—३४ देवता—इंद्र
सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीर्वि च त्वद्यन्ति विभ्वो मनीषाः.
पुरा नूनं च स्तुतय ऋषीणां परस्पृध्र इन्द्र अध्युक्थार्का.. (१)
हे इंद्र! तुम में बहुत से स्तुति-वचन मिलते हैं. स्तोताओं की विस्तृत विचारधाराएं तुम्हीं
से निकलती हैं. प्राचीन एवं वर्तमान ऋषियों की स्तुतियां, मंत्र एवं उपासना इंद्र के विषय में
एक-दूसरे से बढ़कर हैं. (१)
पुरुहूतो यः पुरुगूर्त ऋभ्वाँ एकः पुरुप्रशस्तो अस्ति यज्ञैः.
रथो न महे शवसे युजानो ३ स्माभिरिन्द्रो अनुमाद्यो भूत्.. (२)
हम लोग बहुतों द्वारा बुलाए गए, बहुतों द्वारा प्रोत्साहित महान्, अद्वितीय एवं बहुतों
द्वारा स्तुत इंद्र को यज्ञ द्वारा प्रसन्न करते हैं. इंद्र रथ के समान महान् शक्ति प्राप्त करने के
लिए हमारे द्वारा सदा स्तुति का विषय बनें. (२)
न यं हिंसन्ति धीतयो न वाणीरिन्द्रं नक्षन्तीदभि वर्धयन्तीः.
यदि स्तोतारः शतं यत्सहस्रं गृणन्ति गिर्वणसं शं तदस्मै.. (३)
सेवाकर्म एवं स्तुति-वचन इंद्र को बाधा नहीं पहुंचा सकते. इंद्र की वृद्धि करती हुई
स्तुतियां उनके सामने जाती हैं. सैकड़ों एवं हजारों स्तोता स्तुतिपात्र इंद्र की स्तुति करके उन्हें
प्रसन्न करते हैं. (३)
अस्मा एतद्दिव्य१ र्चेव मासा मिमिक्ष इन्द्रे न्ययामि सोमः.
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जनं न धन्वन्नभि सं यदापः सत्रा वावृधुर्हवनानि यज्ञैः.. (४)
आज यज्ञ में इंद्र को स्तोत्रों के साथ अर्पित करने हेतु मंत्रों-सहित सोमरस तैयार है.
जिस प्रकार मरुभूमि की ओर बहने वाला जल मनुष्यों का पालन करता है, उसी प्रकार यज्ञ
के साथ दिए गए हव्य इंद्र को पुष्ट करें. (४)
अस्मा एतन्मह्याङ्गूषमस्मा इन्द्राय स्तोत्रं मतिभिरवाचि.
असदद्यथा महति वृत्रतूर्य इन्द्रो विश्वायुरविता वृधश्च.. (५)
स्तोताओं द्वारा इंद्र के लिए यह स्तोत्र इसलिए बोला जाता है, जिससे संग्राम में वह
हमारे रक्षक एवं वृद्धिकर्त्ता हों. (५)
सूक्त—३५ देवता—इंद्र
कदा भुवन्रथक्षयाणि ब्रह्म कदा स्तोत्रे सहस्रपोष्यं दाः.
कदा स्तोमं वासयोऽस्य राया कदा धियः करसि वाजरत्नाः.. (१)
हे इंद्र! हमारी स्तुतियां तुम्हें पाकर कब रथ पर चढ़ेंगी? मुझ स्तोता को तुम हजार लोगों
का पोषण करने वाली गाएं कब दोगे? मेरे स्तोत्रों को धन से युक्त कब करोगे? तुम यज्ञकर्मों
को अन्न से सुशोभित कब करोगे? (१)
कर्हि स्वित्तिन्द्र यन्नृभिर्नॄन्वीरैर्वीरान्रान्नीळयासे जयाजीन्.
त्रिधातु गा अधि जयास गोष्विन्द्र द्युम्नं स्वर्वद्धेह्यस्मे.. (२)
हे इंद्र! तुम हमारे सैनिकों को शत्रु सैनिकों एवं हमारी संतान को शत्रुसंतान के साथ कब
भिड़ाओगे तथा युद्ध में शत्रुओं को कब जीतोगे? तुम शत्रुओं की दूध, दही एवं घी देने वाली
गायों को अधिक संख्या में कब जीतोगे? हे इंद्र! तुम हमें व्याप्त धन कब दोगे? (२)
कर्हि स्वित्तिन्द्र यज्जरित्रे विश्वप्सु ब्रह्म कृणवः शविष्ठ.
कदा धियो न नियुतो युवासे कदा गोमघा हवनानि गच्छाः.. (३)
हे अतिशय बलवान् इंद्र! तुम स्तुतिकर्त्ता को सभी प्रकार का अन्न कब दोगे? तुम
यज्ञकर्मों एवं स्तुतियों को अपने में कब मिलाओगे? तुम स्तोत्रों को गाय देने वाला कब
बनाओगे? (३)
स गोमघा जरित्रे अश्वश्चन्द्रा वाजश्रवसो अधि धेहि पृक्षः.
पीपिहीषः सुदुघामिन्द्र धेनुं भरद्वाजेषु सुरुचो रुरुच्याः.. (४)
हे इंद्र! हम स्तुति करने वाले भरद्वाजगोत्रीय ऋषियों को गाएं देने वाला एवं शक्तिशाली
घोड़ों से युक्त प्रसिद्ध अन्न दो. तुम अन्नों तथा सरलता से दुही जाती गायों को हमें दो एवं उन्हें
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दीप्त बनाओ. (४)
तमा नूनं वृजनमन्यथा चिच्छूरो यच्छक्र वि दुरो गृणीषे.
मा निररं शुक्रदुघस्य धेनोराङ्गिरसान्ब्रह्मणा विप्र जिन्व.. (५)
हे इंद्र! तुम हमारे शत्रु को मृत्यु से मिलाओ. हे शूर एवं शत्रुहंता इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति
करते हैं. हे श्वेत दूध देने वाली गो के दाता इंद्र! हम तुम्हारी स्तुतियों से कभी रुकें नहीं. हे
बुद्धिमान् इंद्र! अंगिरागोत्र वालों को अन्न से तृप्त करो. (५)
सूक्त—३६ देवता—इंद्र
सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः.
सत्रा वाजानामभवो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम्.. (१)
हे इंद्र! यह बात सत्य है कि तुम्हारी सोमपान से उत्पन्न प्रसन्नता सबको हितकारक होती
है. तीनों लोकों में स्थित तुम्हारी संपत्तियां भी लोगों का हित करती हैं. तुम निसंदेह अन्न देने
वाले एवं देवों में बल धारण करने वाले हो. (१)
अनु प्र येजे जन ओजो अस्य सत्रा दधिरे अनु वीर्याय.
स्यूमगृभे दुधयेऽर्वते च क्रतुं वृञ्जन्त्यपि वृत्रहत्ये.. (२)
यजमान इंद्र के बल की सदा विशेष प्रकार से पूजा करता है. यह सत्य है कि वीरता का
काम करने के लिए इंद्र को आगे रखता है. शत्रुओं की घनी पंक्ति के रोकने वाले, हिंसक एवं
उन पर आक्रमण करने वाले इंद्र वृत्र राक्षस को मारने के लिए जाते हैं. (२)
तं सध्रीचीरूतयो वृष्ण्यानि पौंस्यानि नियतः सश्चुरिन्द्रम्.
समुद्रं न सिन्धव उक्थशुष्मा उरुव्यचसं गिर आ विशन्ति.. (३)
परस्पर संगत मरुद्गण एवं वीर्यबल से युक्त तथा रथ में जुते हुए अश्व इंद्र की सेवा
करते हैं. नदियां जिस प्रकार समुद्र से मिलती हैं, उसी प्रकार मंत्र-प्रधान स्तुतियां सर्वत्र
व्यापक इंद्र से मिलती हैं. (३)
स रायस्खामुप सृजा गृणानः पुरुश्चन्द्रस्य त्वमिन्द्र वस्वः.
पतिर्बभूथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्य राजा.. (४)
हे इंद्र! तुम स्तुतियां सुनकर धन की सरिता बहा दो. धन बहुतों को प्रसन्नता एवं
निवासस्थान देने वाला है. तुम मनुष्यों के अद्वितीय स्वामी एवं सारे संसार के राजा हो. (४)
स तु श्रुधि श्रुत्या यो दुवोयुर्द्यौर्न भूमिभि रायो अर्यः.
असो यथा नः शवसा चकानो युगेयुगे वयसा चेकितानः.. (५)
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