ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि.. (८)
मा ज्योतिषः प्रवस्थानि गन्म वि षू मृधः शिश्रथो जीवसे नः.. (७)
हे प्राणरक्षक वरुण! तुम्हारे जो आयुध यज्ञविरोधियों का विनाश करते हैं, वे हमें न मारें.
हम सूर्य के प्रकाश से दूर न रहें. हमारे जीवन के हिंसकों को हमसे दूर हटाओ. (७)
नमः पुरा ते वरुणोत नूनमुतापरं तुविजात ब्रवाम.
त्वे हि कं पर्वते न श्रितान्यप्रच्युतानि दूळभ व्रतानि.. (८)
हे अनेक प्रदेशों में प्रकट होने वाले वरुण! हमने भूतकाल में तुम्हें नमस्कार किया है,
वर्तमान काल में करते हैं और भविष्यत् काल में करेंगे. हे हिंसा के अयोग्य वरुण! तुम में
पर्वत के समान अच्युत शक्तियां व्याप्त हैं. (८)
पर ऋणा सावीरध मत्कृतानि माहं राजन्नन्यकृतेन भोजम्.
अव्युष्टा इन्तु भूयसीरुषास आ नो जीवान्वरुण तासु शाधि.. (९)
हे राजा वरुण! हमारे पूर्व पुरुषों द्वारा लिए गए ऋणों से हमें छुटकारा दिलाओ. मैंने
वर्तमान काल में जो ऋण लिया है, उससे भी मुझे छुड़ाओ. मैं दूसरे के उपार्जित धन से
जीवनयात्रा न करूं. ऋण के कारण ऋणकर्त्ता के लिए मानो उषाओं का उदय होता ही नहीं.
ऐसी आज्ञा दो, जिससे हम उन सब उषाओं में जाग्रत रहें. (९)
यो मे राजन्युज्यो वा सखा वा स्वप्ने भयं भीरवे मह्यमाह.
स्तेनो वा यो दिप्सति नो वृको वा त्वं तस्माद्वरुण पाह्यस्मान्.. (१०)
हे राजा वरुण! मुझ भीरु को स्वप्न की भयानक बातें कहने वाले मित्र से बचाओ. मुझे
हिंसा करने वाले चोर एवं भेड़िए से बचाओ. (१०)
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः.
मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (११)
हे वरुण! मुझे किसी धनी एवं दानी पुरुष के सामने अपनी निर्धनता न बतानी पड़े. हे
राजन्! मेरे पास जीवन के लिए आवश्यक धन की कमी न हो. हम शोभन पुत्र-पौत्रों को
प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (११)
सूक्त—२९ देवता—विश्वेदेव
धृतव्रता आदित्या इषिरा आरे मत्कर्त रहसूरिवागः.
शृण्वतो वो वरुण मित्र देवा भद्रस्य विद्वाँ अवसे हुवे वः.. (१)
हे व्रतधारी, सबके प्रार्थनीय एवं शीघ्रगामी अदितिपुत्रो! जिस प्रकार व्यभिचारिणी
गुप्तरूप से जन्म लेने वाले बालक को दूर फेंक देती है, उसी प्रकार तुम मेरा पाप मुझसे दूर
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हटा दो. हे मित्र और वरुण! मैं तुम्हारे द्वारा किए हुए मंगल कार्यों को जानता हूं. मैं तुम्हें रक्षा
के लिए बुलाता हूं. तुम मेरी पुकार सुनो. (१)
यूयं देवाः प्रमतिर्यूयमोजो यूयं द्वेषांसि सनुतर्युयोत.
अभिक्षत्तारो अभि च क्षमध्वमद्या च नो मृळयतापरं च.. (२)
हे देवो! तुम उत्तम बुद्धि एवं बलसंपन्न हो. तुम हमारे विरोधियों को गुप्त स्थान में ले
जाओ. हे शत्रुनाशक देवो! तुम भी हमारे शत्रुओं को हराओ एवं आज तथा आने वाले कल में
सुखी करो. (२)
किमूं नु वः कृणवामापरेण किं सनेन वसव आप्येन.
यूयं नो मित्रावरुणादिते च स्वस्तिमिन्द्रामरुतो दधात.. (३)
हे देवो! हम आज या आने वाले दिनों में तुम्हारा कौन सा कार्य कर सकते हैं? अर्थात्
कोई नहीं. हम सनातन प्राप्तव्य कार्य द्वारा भी कुछ नहीं कर सकते. हे मित्र, वरुण, अदिति,
इंद्र एवं मरुद्गण! हमारा कल्याण करो. (३)
हये देवा यूयमिदापयः स्थ ते मृळत नाधमानाय मह्यम्.
मा वो रथे मध्यमवाळ्ते भून्मा युष्मावत्स्वापिषु श्रमिष्म.. (४)
हे देवो! तुम्हीं हमारे बांधव हो. प्रार्थना करने वाले हम लोगों को तुम सुख दो. हमारे यज्ञ
में आते समय तुम्हारे रथ की गति मंद न हो. तुम बांधवों के होते हुए हम परेशान न हों. (४)
प्र व एको मिमय भूर्यागो यन्मा पितेव कितवं शशास.
आरे पाशा आरे अघानि देवा मा माधि पुत्रे विमिव ग्रभीष्ट.. (५)
हे देवगण! मैंने मनुष्य होते हुए भी तुम लोगों के बीच रहकर अपने बहुत से पाप नष्ट
किए हैं. जिस प्रकार पिता कुमार्गगामी पुत्र को रोकता है, उसी प्रकार तुमने मुझे अनुशासन
में रखा है. हे देवो! मुझे बंधन और पाप से दूर रखो. व्याध जिस प्रकार पुत्र के सामने पक्षी
पिता को मारता है, उसी प्रकार मुझे मत मारना. (५)
अर्वाञ्चो अद्या भवता यजत्रा आ वो हार्दि भयमानो व्ययेयम्.
त्राध्वं नो देवा निजुरो वृकस्य त्राध्वं कर्तादवपदो यजत्राः.. (६)
हे यज्ञ योग्य देवो! इस समय हमारे सामने आओ. मैं डरता हुआ तुम्हारे हृदय में आश्रय
पाऊं. हे देवो! भेड़िए की हिंसा से हमें बचाओ. हे यज्ञपात्रो! हमें विपत्ति में डालने वालों से
बचाओ. (६)
माहं मघोनो वरुण प्रियस्य भूरिदाव्न आ विदं शूनमापेः.
मा रायो राजन्त्सुयमादव स्थां बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (७)
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