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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

About this granth

Raghuvamsha (रघुवंशम्) is Kalidasa's mahakavya in nineteen cantos on the kings of the Solar dynasty, from Dilipa to the dissolute Agnivarna. It is counted among his most mature poems and has been a core text of Sanskrit education for centuries.

Its well-loved episodes include Dilipa's service of the cow Nandini, Raghu's conquest of the quarters and his gift to the student Kautsa, the svayamvara of Indumati and Aja's lament at her death, the story of Dasharatha and then of Rama, Kusha's resettling of Ayodhya and the decline of the line under Agnivarna.

This is No. 40 of the Chaukhamba Surbharati Granthamala, in its fifth edition of 1994. It prints the verses with Mallinatha's classic Sanskrit commentary Sanjivani and the Chandrakala Hindi commentary of Dr. Shrikrishnamani Tripathi, former head of the department of Purana-Itihasa, culture and geography at Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. With text, Mallinatha's analysis and plain Hindi together, the 735-page volume serves both students and lovers of poetry.

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( ३ )

साहित्यजगत के समालोचक शेक्सपियर को अन्तर्जगत का तथा कालिदास को बाह्यजगत का कलाकार कवि कहते हैं। प्रकृति के मनोरम चित्रण में कालिदास अद्वितीय हैं। इनके प्रकृतिचित्रण रमणीयता, भव्यता, सजीवता तथा स्वाभाविकता से ओत-प्रोत हैं।

प्रकृति के साथ कालिदास की अपूर्व सहानुभूति है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन जैसा इन्होंने किया है वैसा संस्कृत जगत् का कोई अन्य कवि नहीं कर पाया है। इन्होंने प्रकृति के अनुपम दृश्यों का सच्चा चित्र खींचा है। ये कोमल रूप के उपासक हैं, भवभूति के समान उग्र रूप में इनका प्रेम नहीं है। ये प्रायः शान्त तपोवन, नदीतट, उपवन, प्रासाद, भ्रमर, मृग तथा कोकिल आदि के वर्णन करने में अपना सौभाग्य समझते हैं। इन्हें विन्ध्याचल पर्वत की अपेक्षा हिमालय से अधिक प्रेम है। इन्होंने अपने कुमार-सम्भव में हिमालय का सजीव वर्णन किया है। इन्हें ६ ऋतुओं में ग्रीष्म और बसन्तऋतु बहुत प्रिय हैं।

जहाँ पाश्चात्य कवियों के प्रकृतिवर्णन नग्न होते हैं वहाँ भारतीय कवियों का प्रकृति-वर्णन अलंकृत होता है। पाश्चात्य कवि बिना किसी आवरण के प्रकृति को उसके असली रूप में उपस्थित कर देते हैं, परन्तु भारतीय कवि प्रकृति को मनोरम मुग्धकारी विविध आभूषणों से सुसज्जित कर पाठकों के समक्ष उपस्थित करते हैं। महाकवि कालिदास में इस अलंकृत वर्णनशैली की ही निपुणता है। इतना ही नहीं इनके प्रकृति-वर्णन में वैज्ञानिक ज्ञान का पर्याप्त परिचय मिलता है।

रघुवंश के नवम सर्ग में वायु से हिलाई गई लता को लक्ष्य कर वसन्त ऋतु का कैसा मनोरञ्जक वर्णन है—

श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः कुसुमकोमलदन्तरुचो बभुः।
उपवनान्तलताः पवनाहतैः किसलयैः सलयैरिव पाणिभिः ॥

स्त्री और पुरुषों के विविध मनोभावों का इन्हें पूर्ण ज्ञान है; उसे व्यक्त करने के लिए इन्होंने अभिधाशक्ति का प्रयोग न कर व्यंजनाशक्ति से ही काम लिया है। इससे इनकी कविता में और भी चमत्कार आ जाता है।

जब अङ्गिरा ऋषि हिमालय के पास आकर कहने लगे कि अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान् सदाशिव के साथ कर दीजिए। उस समय पार्वती का वर्णन करते हुए अन्तर्जगत के पारखी कालिदास कहते हैं कि—अङ्गिरा ऋषि के इस प्रकार कहते समय अपने पिता हिमालय के पास खड़ी हुई पार्वती लज्जावश मुँह नीचे करके हाथ में लिए लीलाकमल के पत्तों को गिनने लगीं—

एवं वादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी।
लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ॥

इस श्लोक में कवि ने लज्जा शब्द का प्रयोग नहीं किया है; किन्तु लज्जा के उद्भव होने पर पार्वती ने जो कार्य किया है, उसी का वर्णन किया है, वही कार्य हृदयगत लज्जाभाव को व्यक्त कर देता है।

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( ४ )

पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, छन्दों में मन्दाक्रान्ता, अलङ्कारों में उपमा, रसों में शृङ्गार और ऋतुओं में वसन्त कालिदास को परम प्रिय थे।

संस्कृत साहित्य के लक्षणकार आचार्यों ने गौडी, पाञ्चाली, वैदर्भी और लाटी नाम की चार रीतियाँ तथा माधुर्य, ओज और प्रसाद ये ३ गुण माने हैं। गौडी रीति में बड़े-बड़े समास तथा पाञ्चाली में छोटे-छोटे समास होते हैं। वैदर्भी रीति में समास प्रायः नहीं के बराबर होते हैं। गौडी में ओज गुण, पाञ्चाली में माधुर्य गुण और वैदर्भी में प्रसाद गुण की प्रधानता होती है।

कालिदास की कविता वैदर्भी रीति और प्रसाद गुण से ओतप्रोत है। प्रसाद गुण के प्राधान्य होने के कारण कालिदास की कविता शीघ्र ही समझ में आ जाती है।

कालिदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा व्याकरण से परिष्कृत सरल, सरस एवं सुबोध होती है। ये—'च, तु, हि, वै, किल, खलु' आदि का प्रयोग केवल पाद की पूर्ति के लिए नहीं करते हैं; किन्तु उनका जहाँ प्रयोग करते हैं वहाँ वे सार्थक होते हैं। इनके शब्द नपे-तुले होते हैं और इनके वाक्यों में क्रियापद प्रायः स्पष्ट होते हैं। ये किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने की अपेक्षा सीधे कह देना अधिक पसन्द करते हैं। थोड़े शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की प्रवृत्ति इनमें विशेष रूप से दीख पड़ती है।

जैसे भिन्न-भिन्न वर्गों के उच्चारण के लिए भिन्न-भिन्न कण्ठ-ताल्वादि के आघातों के भेद हैं और भिन्न-भिन्न वर्ण, भिन्न-भिन्न रस, भाव एवं अलङ्कारों के व्यञ्जक हैं, वैसे ही विभिन्न रसों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न छन्द भी हैं। शृङ्गार रस के व्यञ्जक वर्णों के द्वारा ही शृङ्गार रस की पुष्टि तथा वीर रस के व्यञ्जक वर्णों से वीर रस की पुष्टि हो सकती है, अन्य वर्णों से नहीं। अतः केवल शब्द-योजना ही काव्य में रस सिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है, उसके लिए छन्द की योजना भी अपेक्षित है। क्षेमेन्द्र ने अपने सुवृत्ततिलक में कहा है कि काव्य में रस तथा वर्णनीय वस्तु के अनुसार छन्दों का विनियोग करना चाहिए—

काव्ये रसानुसारेण वर्णनानुगुणेन च।
कुर्वीतसर्ववृत्तानां विनियोगं विभाववित् ॥

कालिदास का छन्द-विषयक ज्ञान भी गम्भीर और पूर्ण है। उन्होंने अपने काव्यों में प्रायः सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्दों का चुनाव रस और वर्ण्य-वस्तु के अनुकूल ही करते हैं। कालिदास मन्दाक्रान्ता छन्द के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं। इन्होंने अपने खण्डकाव्य मेघदूत को केवल मन्दाक्रान्ता छन्द में ही लिखा है—

सुवशा कालिदासस्य मन्दाक्रान्ता प्रवल्गति ।
सदश्वस्य दमस्येव कम्बोजतुरगाङ्गना ॥

प्रत्येक कवियों में किसी न किसी विषय की खास विशेषता रहती है। कविवर कालिदास उपमा अलंकार के आचार्य माने जाते हैं। तत्तव कवियों की विशेषता व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने बहुत ही ठीक कहा है—

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( ५ )

उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं त्रयोऽप्येकैकतोऽधिकाः ॥

कालिदास की उपमाएँ एक से एक बढ़कर हैं। उन्होंने नई-नई उपमाओं की उद्भावना की है। इनकी उपमाओं के विशेष चमत्कार का कारण यह है कि प्रायः इनकी उपमाएँ अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् दोनों से ली गई हैं। इन्होंने उपमाओं में उपमान तथा उपमेय के वचन और लिंग तक का भी विचार किया है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर में उपस्थित राजाओं की दशा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिम्बरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥

इस श्लोक में इन्दुमती की उपमा स्त्रीवाची दीपशिखा शब्द से दी गई है। और राजा की उपमा पुंलिङ्ग अट्ट शब्द से दी गई है। लिंग की समता के साथ-साथ वचन की समता भी दर्शनीय है।

रघुवंश के द्वितीय सर्ग में जब दिलीप वसिष्ठजी की लाल नन्दिनी को चराकर लौटते हैं तो सुदक्षिणा उनकी प्रतीक्षा करती हुई स्वागत करने के लिए खड़ी हैं, दोनों के बीच में नन्दिनी की शोभा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या ॥

यहाँ राजा की उपमा दिन से, सुदक्षिणा की उपमा रात्रि से और लाल नन्दिनी की उपमा लाल सन्ध्या से दी गई है। और भी देखिए—

शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डुना ।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥

शरीर की दुर्बलता के कारण कुछ ही आभूषण पहनी हुई उस सुदक्षिणा की लोध्रपुष्प सदृश पीले मुख से ऐसी शोभा हुई जैसे प्रातःकाल टिमटिमाते हुए ताराओं से युक्त रात की शोभा पीले वर्ण के चन्द्रमा से होती है। यह भाव व्यक्त करने के लिए कवि ने लोध्रपाण्डु मुख से चन्द्रमा की एवं एकाध तारा युक्त प्रभातकल्पशर्वरी से सुदक्षिणा की उपमा देते हुए कितने सुन्दर ढङ्ग से पूर्णोपमा व्यक्त की है। इस प्रकार कालिदास की कविता में स्थल-स्थल पर अनूठी उपमा का चमत्कार मिलता है। इनकी उपमाओं में स्वाभाविकता का उत्कर्ष है जिससे पाठक का हृदय सहसा चमत्कृत हो उठता है।

कालिदास का समय

संस्कृतसाहित्य जगत् के देदीप्यमान मणि कविवर कालिदास के समय के सम्बन्ध में विद्वानों का महान् मतभेद है, क्योंकि कालिदास ने तो अपने सम्बन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है। विभिन्न विद्वानों ने आन्तरिक एवं बाह्य प्रमाणों के आधार पर कालिदास का अस्तित्व

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ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक माना है। कालिदास ने प्रथमशती के शुङ्गवंशी नरेश अग्निमित्र को अपने मालविकाग्निमित्र नामक नाटक का नायक बनाया है तथा छठी शताब्दी के महाराज हर्षवर्द्धन के दरबारी महाकवि बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित में कालिदास की कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अतः कालिदास का समय ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी के बीच में कहीं होना चाहिए। इस आधार पर इनके विषय में मुख्य रूप से तीन मत उपस्थित होते हैं—

( १ ) कालिदास की सत्ता छठी शताब्दी में मानना आवश्यक है।
( २ ) कालिदास जैसे उत्तम कवि गुप्तनरेशों के स्वर्णयुग में ही हो सकते हैं।
( ३ ) कालिदास ई० पू० प्रथम शताब्दी के महाकवि हैं।

प्रथम मत—डॉ० हार्नली मानते हैं कि यशोधर्धन् ने बलादित्य नरसिंह गुप्त की सहायता से कारूर के युद्ध में हूणवंश के प्रतापी राजा मिहिरकूल को हराकर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की और अपनी इस बड़ी विजय के उपलक्ष्य में उसने विक्रम नाम का एक नया संवत् चलाया, जिसे प्राचीन सिद्ध करने के लिए उसे छः सौ वर्ष पूर्व से ही प्रचारित कर दिया।

समीक्षा—यशोधर्धन द्वारा ६०० सौ वर्ष पहले से विक्रम संवत् का चलाना इतिहास विरुद्ध है, क्योंकि यह प्रसिद्ध है कि मालव संवत् के नाम से जो संवत् चला आता था, शकारि विक्रमादित्य ने शकों की विजय के उपलक्ष्य में उसी का नाम विक्रम संवत् रख दिया। हूणों के विजेता यशोधर्धन हूणारि कहे जा सकते हैं, शकारि नहीं, और उनके शिलालेखों में विक्रम संवत् की स्थापना की चर्चा कहीं भी नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि ४७३ ई० में कुमारगुप्त की प्रशस्ति के लेखक वत्सभट्टिकवि ने अपने ग्रन्थ में कालिदास के अनेक पद्यों का अनुकरण किया है। अतः कालिदास पञ्चम शताब्दी के बाद नहीं हो सकते हैं। यह मत अब अनेकों प्रमाणों में अमान्य एवं अग्राह्य हो चुका है।

दूसरा मत—बहुत से विद्वानों ने सर्वतः समृद्ध एवं शान्तिमय गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानी है। इनमें पूना के प्रो० के० पी० पाठक का मत है कि कालिदास गुप्तनरेशों के समकालीन थे, क्योंकि रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में वर्णित रघु के दिग्विजय से समुद्रगुप्त के दिग्विजय में अधिक समानता है, किन्तु डा० स्मिथ, कीथ, मेकडानल, रा० कृ० भण्डारकर, पं० रामावतार शर्मा आदि बहुसंख्यक विद्वान् मानते हैं कि कालिदास के आश्रयदाता गुप्तनरेशों में सबसे अधिक प्रभावशाली चन्द्रगुप्त द्वितीय थे, क्योंकि शकों को भारत से बाहर निकाल देने वाले विक्रमादित्य उपाधिधारी इन्हीं के राज्य-काल में हर तरह से शान्ति थी तथा भारतीय कलाकौशल की उन्नति चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी। कालिदास के ग्रन्थों के समान गम्भीर विचार के ग्रन्थ ऐसे ही शान्तिमय समय में स्थिर चित्त से लिखे जा सकते हैं।

समीक्षा—कालिदास को गुप्तकाल के स्वर्णयुग का कवि मानना ठीक नहीं, क्योंकि केवल चन्द्रगुप्त द्वितीय ही विक्रमादित्य नहीं थे, किन्तु इनसे पूर्व मालवा में राज्य करनेवाले विक्रमादित्य का भी पता इतिहास को है। दूसरी बात यह है कि यदि कालिदास गुप्तकाल में

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होते तो प्रयाग के समुद्रगुप्त के स्तम्भ पर कालिदास की रचना न होकर साधारण विद्वान् हरिसेन से क्यों लिखवाया जाता ? अतः कालिदास को गुप्तकाल में मानना सर्वथा असंगत है।

तीसरा मत— उपर्युक्त कल्पनाओं से असन्तुष्ट होकर कुछ विद्वानों ने ६८ ई० की गाथा-सप्तशती के पद्यों में दानशील राजा विक्रमादित्य के स्पष्ट उल्लेख मिलने के आधार पर ईसा के पूर्व विक्रमादित्य की सत्ता प्रामाणिक रूप से स्थिर मान ली है। इनके शकारि होने में भी किसी प्रकार की आपत्ति नहीं, क्योंकि ईसा से १५० वर्ष पूर्व भारत में आने वाले शकों का पता इतिहास में पाया जाता है। अतः इन्हीं की सभा में कालिदास की सत्ता मानना युक्तियुक्त एवं प्रामाणिक प्रतीत होता है। इस मत के तर्क एवं प्रमाण विश्वसनीय हैं।

इसीलिए वल्लालसेन ने अपने भोज-प्रबन्ध में विक्रम संवत् के प्रवर्तक उज्जयिनी के राजा शकारि वीर विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में कविवर कालिदास की भी गणना की है, जिनके बिना उनको एक क्षण भी अच्छा नहीं लगता था और इनकी अद्भुत कविकल्पना पर वे सदा मुग्ध रहा करते थे—

धन्वन्तरि-क्षपणकामरसिंह-शङ्कु-वेतालभट्ट-घटखर्पर-कालिदासाः ।
ख्यातो वराहमिहिरोनृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥

कालिदास के ग्रन्थों से भी राजा विक्रमादित्य के दरबार में रहने का सङ्केत मिलता है। अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की प्रस्तावना में रस एवं भाव का चमत्कार दिखाने वाले कलाकारों के आश्रयदाता विक्रमादित्य की अभिरूप भूयिष्ठ परिषद् में उस नाटक के अभिनय करने का संकेत है—'आर्ये ! इयं हि रसभावविशेषदीक्षागुरोर्विक्रमादित्यस्याभिरूपभूयिष्ठा परिषद् ।' और विक्रमोर्वशीय नाटक में यद्यपि पुरूरवा नायक है तथापि विक्रम का स्पष्ट नामोल्लेख है—'अनुत्सेकः खलु विक्रमालङ्कारः'। इत्यादि वचनों से इसकी पुष्टि होती है कि कालिदास का विक्रमादित्य से सम्बन्ध अवश्य था।

रामचन्द्र काव्य में तो स्पष्ट उल्लेख है कि शकाराति वीर विक्रमादित्य ने कालिदास की बड़ी ख्याति की थी—ख्यातिं कामपि कालिदासकवयो नीताः शकारातिना। अतः कालिदास राजा विक्रमादित्य की सभा के नव रत्नों में एक महारत्न अवश्य थे। जनश्रुति भी इसी मत की पुष्टि करती है—नह्यमूला जनश्रुतिः ।

इसी प्रकार किसी ने इन्हें बङ्गाली, कुछ ने काश्मीरी, कतिपय विद्वानों ने मालव निवासी सिद्ध करने की चेष्टा की है। कालिदास के यशस्वी जीवन तथा उनकी अनुपम भारती का गुणगान करने में जितनी उत्सुकता भारतीय विद्वानों में है, उससे किसी भी अंश में विदेशी विद्वान पीछे नहीं हैं। इनका अनुपम काव्य-कौशल इनके व्यक्तित्व का वास्तविक परिचायक है। इनकी प्रतिभा से निःसृत अमृतकणों का पानकर सबको प्रसन्नता होती है। अतः ये सबके मान्य कवि हैं।

कालिदास की कृतियाँ

महाकवि कालिदास के जन्म एवं जीवनी के विषय में जिस प्रकार मतभेद रहा है वैसे ही उनकी कृतियों के सम्बन्ध में भी कम विवाद नहीं है। कुछ दिन पहले कालिदास

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नामधारी दूसरे व्यक्तियों की कृतियों को इनके नाम से जोड़ देने के सम्बन्ध में काफी विवाद रहा है, किन्तु इधर आधुनिक विद्वानों की खोजों के आधार पर प्रमुख रूप से कालिदास की निम्नाङ्कित कृतियाँ मानी जाती हैं—दो महाकाव्य—( १ ) रघुवंश, ( २ ) कुमारसम्भव । तीन नाटक—( क ) अभिज्ञानशाकुन्तल, ( ख ) विक्रमोर्वशीय, ( ग ) मालविकाग्निमित्र । एक खण्ड काव्य—मेघदूत तथा एक मुक्तककाव्य—ऋतुसंहार । शृङ्गारतिलक के इनके कृतित्व में समीक्षकों को सन्देह है ।

रघुवंश की विशेषता

रघुवंश में महाकाव्य के सभी लक्षण घटते हैं । इसके १९ सर्गों में कवि कालिदास ने इक्ष्वाकुवंशी महाप्रतापी राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक २७ राजाओं का आदर्शमय वर्णन किया है । यद्यपि इस काव्य की कथा वाल्मीकिरामायण, महाभारत तथा पद्म आदि पुराणों में पायी जाती है, पर वाल्मीकि से अधिक समता है, फिर भी वाल्मीकिरामायण और रघुवंश के वंशक्रम में महान् अन्तर है । वा० रा० आदि काण्ड, सर्ग ७० के १९-४३ श्लोकों के अनुसार दिलीप से राम तक १८ राजाओं का नाम निर्दिष्ट है; किन्तु रघुवंश में दिलीप से राम तक ५ ही पीढ़ी पड़ती है ( १ ) दिलीप, ( २ ) रघु, ( ३ ) अज, ( ४ ) दशरथ और ( ५ ) राम ।

रघुवंश महाकाव्य की संस्कृत व्याख्याओं में मल्लिनाथ की सञ्जीवनी व्याख्या सर्वोत्कृष्ट तथा प्रामाणिक मानी जाती है । अतः इस संस्करण में सञ्जीवनी व्याख्या भी दी गई है और परीक्षार्थी छात्रों की सुविधा के लिए अन्वय, संस्कृत में व्याख्या, समास, भावार्थ तथा हिन्दी में भावार्थ भी दे दिया गया है जिससे यह ग्रन्थ और भी सुबोध एवं उपादेय हो गया है । आशा है, छात्रवर्ग व्याख्याकार तथा प्रकाशक के प्रयास को अवश्य सफल बनायेगा । इति शम् ।

विजयादशमी }
सं० २०३२ }

वशांवद
श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी

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कथासार

प्रथम सर्ग

शब्द तथा अर्थ के समान सर्वदा सम्बद्ध संसार के माता-पिता भगवान् शंकर और पार्वतीजी को नमस्कार कर कविकुलकलाधर कविवर कालिदास सूर्य से उत्पन्न रघुवंश का वर्णन करने संकोच करते हुए कहते हैं—यद्यपि मैं रघुवंश का पार पाने में सर्वथा असमर्थ हूँ, फिर भी वाल्मीकि आदि महाकवियों ने सूर्यवंश पर सुन्दर काव्य लिखकर वाणी का द्वार खोल दिया है। इसलिए उसमें प्रवेश कर उस वंश का कुछ वर्णन कर देना मेरे लिए शक्य हो गया है। जिस प्रकार हीरे की कनी से बिधे मणियों में डोरा पिरोया जा सकता है उसी प्रकार मैं अपनी तुच्छ बुद्धि से उन प्रतापी रघुवंशियों का वर्णन कर सकूँगा, जिनका साम्राज्य समुद्र के ओर-छोर तक फैला हुआ था, जिनके अजेय रथ पृथ्वी से सीधे स्वर्ग तक जाया-आया करते थे। जो शास्त्रों के अनुसार यज्ञ करते थे, जो दान करने के लिए ही धन बटोरते थे, जो सत्य की रक्षा के लिए ही कम बोलते थे, जो अपना यश बढ़ाने के लिए ही दूसरे देशों को जीतते थे, जो भोग-विलास के लिए नहीं वरन् सन्तान उत्पन्न करने के लिए विवाह करते थे और जो बुढ़ापे में पुत्रों को राज्य सौंपकर मुनियों के समान जंगल में रहकर तपोमय जीवन बिताते थे और अन्त में परमात्मा का ध्यान करते हुए अपने पाञ्चभौतिक शरीर का त्याग कर देते थे।

जैसे वेद के छन्दों में सर्वप्रथम ॐ है वैसे ही राजाओं में सबसे प्रथम सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु हुए जिनका समादार बड़े-बड़े तपस्वी, विद्वान् एवं महात्मा लोग किया करते हैं। उन्हीं वैवस्वत मनु के वंश में चन्द्रमा के समान सबको सुख देनेवाले तथा शुद्ध चरित्रवाले राजा दिलीप ने जन्म लिया था, उनका रूप अत्यन्त सुन्दर था। जैसा सुन्दर उनका रूप था वैसी ही उनकी बुद्धि भी बड़ी तीव्र थी। अल्पकाल में ही उन्होंने सारी विद्याएँ पढ़ लीं। वे न्याय में बड़े कठोर, पक्षपातरहित और अत्यन्त दयालु थे। उनके राज्य में सभी लोग नियमों पर चलते थे और आश्रमों के नियमों के अनुसार ही अपने धर्म का पालन करते

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थे। जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल खींचते हैं वैसे ही राजा दिलीप भी प्रजाओं से जितना कर लेते थे वह सब प्रजा की भलाई में लगा देते थे। राजा दिलीप न तो अपने मन का भेद किसी को बताते थे, न किसी को जानने देते थे। जब कार्य सम्पन्न हो जाता था तभी कोई जान पाता था। वे निडर होकर अपनी रक्षा करते थे तथा धीरज के साथ अपनी प्रजा और धर्म की रक्षा किया करते थे। अपना जीवन वे धर्मकार्यों के अनुष्ठानों में बिताते रहते थे।

राजा दिलीप जो प्रजा से कर लेते थे वह इन्द्र को प्रसन्न कर वर्षा बरसाने के निमित्त यज्ञों में लगा देते थे। इस प्रकार राजा दिलीप और देवराज इन्द्र दोनों एक-दूसरे की सहायता करके स्वर्ग और पृथ्वी का पालन करते थे। ब्रह्मा ने निश्चय ही राजा दिलीप को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से ही बनाया है, क्योंकि पाँचों तत्त्व हमेशा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द गुणों से सारी सृष्टि की सेवा करते रहते हैं। दिलीप के गुणों से ही दूसरों का उपकार होता था। जैसे यज्ञ की पत्नी दक्षिणा प्रसिद्ध है वैसे ही मगधवंश में उत्पन्न सुदक्षिणा उनकी धर्मपत्नी थीं। उनकी बड़ी इच्छा थी कि मेरी प्यारी पत्नी सुदक्षिणा से मेरे जैसा सत्पुत्र उत्पन्न हो। अतः उन्होंने अपने राज्य का भार संभालने के लिए मन्त्रियों पर सौंपकर सुदक्षिणा के साथ रथ पर सवार होकर वे अपने कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रम की ओर चल पड़े। उन्होंने अपने साथ अधिक सेवकों को नहीं लिया, क्योंकि उनकी भीड़-भाड़ से आश्रम के कार्यों में बाधा पड़ेगी। मार्ग में साल की गोंद की गन्ध को, फूलों के पराग को और वन के वृक्षों के पत्तों को धीरे-धीरे कँपाता हुआ पवन उनको सुख देता हुआ चल रहा था।

सन्ध्या के समय दिलीप अपनी पत्नी के साथ वसिष्ठजी के आश्रम पर पहुँचकर देखते हैं कि अग्निहोत्र का धुआँ पवन के कारण चारों ओर फैलकर अतिथियों को पवित्र कर रहा है। तब राजा दिलीप ने आश्रम के पहले ही सारथी द्वारा रथ खड़ा कराकर सहारा देकर पहले सुदक्षिणा को रथ से उतारा बाद स्वयं उतर पड़े। यह समाचार सुनकर सभ्य-संयमी मुनियों ने अपने रक्षक राजा का सपत्नीक सम्मान के साथ स्वागत किया। जब सन्ध्याकालीन क्रियाएँ समाप्त हो चुकीं तब उन्होंने वसिष्ठजी के पास उन्हें पहुँचाया। तब राजा दिलीप ने उन तपस्वी महामुनि अपने कुलगुरु वसिष्ठजी का दर्शन किया जिनके पीछे पतिव्रता अरुन्धतीजी उसी प्रकार बैठी थीं जैसे अग्नि के पीछे स्वाहा

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बैठी हो। राजा दिलीप तथा उनकी धर्मपत्नी मगधराजकुमारी सुदक्षिणा ने श्रद्धापूर्वक चरण स्पर्श कर उन्हें वन्दना की और गुरु तथा गुरुपत्नी ने बड़े प्रेम से आशीर्वाद देकर उनका सत्कार किया। बाद महर्षि ने उस राजर्षि से पूछा कि आपके राज्य में सब कुशल तो है न ? तब उत्तर में उन्होंने कहा—आपकी कृपा से राज्य में राजा, मन्त्री, मित्र, राजकोष, राज्य, दुर्ग और सेना ये सातों अंग भरपूर हैं। अग्नि जल, महामारी और अकाल मृत्यु इन दैवी आपत्तियों तथा चोर, डाकू, शत्रु आदि मानुषी आपत्तियों को दूर करने वाले तो आप बैठे ही हैं। आपके मन्त्रों के प्रभाव से मेरे राज्य में कोई कष्ट नहीं है। आपके ब्रह्मतेज के बल से मेरी प्रजा में कोई भी न तो अल्पायु है, न किसी को किसी प्रकार ईतियों या विपत्तियों का डर रहता है। जब आप स्वयं ब्रह्मा के पुत्र ही हमारे कुलगुरु होकर हमारे कल्याण की बातें सोचते हैं तो हमारा राज्य निर्विघ्न क्यों न रहे।

पर महाराज ! आपकी इस पुत्रवधू सुदक्षिणा को सन्ततिहीन देखकर सप्त-द्वीपा यह पृथ्वी मुझे अच्छी नहीं लगती। अब तो मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मेरे पीछे कोई मुझे पिण्ड देने वाला भी नहीं रह जायेगा। इसी दुःख से मेरे पितर मेरे दिये हुए श्राद्ध के अन्न को न खाकर रोने लगते हैं और सोचने लगते हैं कि मेरे पीछे इनको कौन तर्पण आदि करेगा। इसलिए प्रभो ! अब कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे पुत्ररत्न हो और मैं पितृऋण से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की सभी कठिनाइयाँ आपकी कृपा से सदा दूर हो जाती रही हैं। राजा की बात सुनकर वसिष्ठजी ने आँखें बन्द कर क्षणभर के लिए योगबल से ध्यान लगाकर सन्तति-निरोध का रहस्य जानकर राजा से कहा—राजन् ! एक बार जब तुम देवासुर-संग्राम में इन्द्र की सहायता कर पृथ्वी को लौट रहे थे तब मार्ग में कल्पवृक्ष की छाया में कामधेनु बैठी हुई थी। उस समय तुम्हारी धर्मपत्नी इस सुदक्षिणा ने रजस्वला होने पर स्नान किया था। उसके पास पहुँचने की त्वरा के कारण तुमने कामधेनु की ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय तुमने उसकी प्रदक्षिणा न कर गलती कर दी। अतः उसने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया कि जब तक तुम मेरी सन्तति की सेवा न करोगे तब तक तुम्हें पुत्र नहीं होगा। उस समय बड़े-बड़े मतवाले दिग्गज आकाशगंगा में खेलते हुए चिग्घाड़ कर रहे थे, इसलिए उस शाप को न तो तुम ही सुन सके, न तुम्हारा सारथि ही।

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अब इस समय तो कामधेनु पाताल में वरुणदेव के यज्ञ में आहुति की सामग्री देने के लिए गयी है। उस लोक के द्वारों पर बड़े-बड़े विषधर सर्प रखवाली कर रहे हैं। अतः इस समय उसका दर्शन दुर्लभ है। अतः तुम उसकी पुत्री नन्दिनी गौ को ही उसकी प्रतिनिधि समझकर रानी के साथ शुद्ध मन से सेवा करो। इधर वसिष्ठजी यह कह ही रहे थे कि सुलक्षणा नन्दिनी वन से लौटकर आ पहुँची। अपना बछड़ा देखते ही उसके स्तनों से गरम-गरम दूध टपकने लगा। नन्दिनी के खुर से उड़ी धूल के लगने से राजा वैसे ही पवित्र हो गये जैसे किसी तीर्थ में स्नान करके लौटे हों। शकुन के जानने वाले वसिष्ठ जी दिलीप से बोले—राजन्, तुम्हारा मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा क्योंकि यह नन्दिनी नाम लेते ही आ पहुँची है। तुम कन्द, मूल, फल खाते हुए इसकी सेवा करो—जब यह चले तब तुम भी इसके पीछे-पीछे चलना, जब खड़ी हो जाय तब तुम भी खड़े हो जाना, जब यह बैठे तब तुम भी बैठ जाना और जब यह पानी पीने लगे तभी तुम भी पानी पीना। तुम्हारी वधू सुदक्षिणा को चाहिए कि वह नित्य प्रातःकाल बड़ी भक्ति से इसकी पूजा किया करे और जब यह वन को जाने लगे तब यह तपोवन के बाड़े तक उसके पीछे-पीछे जाय और सायंकाल लौटते समय वहीं से अगवानी करके उसे आश्रम में ले आये। जब तक यह गौ प्रसन्न न हो जाय तब तक तुम इसकी इसी प्रकार सेवा करते रहो। ईश्वर करे तुम्हें कोई बाधा न हो और जिस प्रकार तुम अपने पिता के सुयोग्य पुत्र हो वैसे ही तुम्हें भी सुयोग्य पुत्र प्राप्त हो। राजा ने बड़ी नम्रता से वसिष्ठजी से कहा कि हम ऐसा ही करेंगे। अनन्तर उन्होंने तथा उनकी पत्नी ने गुरुजी से इस व्रतपालन की आज्ञा ली। रात अधिक हो चली थी अतः वसिष्ठजी ने राजा के व्रत के योग्य कन्द-मूल के भोजन और कुश की चटाई का प्रबन्ध किया। वसिष्ठजी ने जो पर्णकुटी बनायी उसी में राजा दिलीप ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रानी सुदक्षिणा के साथ कुश की चटाई पर सोकर रात बितायी।

द्वितीय सर्ग

रात में पर्णशाला के अन्दर विश्राम कर लेने के बाद प्रातःकाल प्रजापालक राजा दिलीप ने वसिष्ठजी की नवप्रसूता उस नन्दिनी गौ को वन में चराने के लिए बन्धन से खोल दिया, जिसकी पूजा रानी सुदक्षिणा ने चन्दन एवं माला से

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( ५ )

कर दी थी और दूध पी चुकने के बाद जिसका बछड़ा बांध दिया गया था। पतिव्रताओं में अग्रगण्य दिलीप की पत्नी सुदक्षिणा ने नन्दिनी के खुरों के रखने से पवित्र धूलिवाले मार्ग का उसी प्रकार अनुगमन किया जैसे मनुस्मृति श्रुति का अनुगमन करती है। दयालु राजा दिलीप सुकुमारी सुदक्षिणा एवं नौकरों को वापस लौटाकर दूधभरे स्तनों के भार से धीरे-धीरे चलनेवाली नन्दिनी की सेवा स्वयं करने लगे। राजा नन्दिनी के इच्छानुसार रुकने पर रुकते थे, चलने पर चलते थे, बैठने पर बैठते थे, पानी पीने पर पानी पीते थे—इस प्रकार उन्होंने छाया की भाँति उस नन्दिनी का अनुसरण किया। छत्र-चामर-मुकुट आदि राजचिह्नों से रहित होने पर भी वे अपने असाधारण तेज से राजा प्रतीत होते थे और प्रत्यञ्चा चढ़े हुए धनुष को लिये वसिष्ठजी की होमधेनु नन्दिनी की रक्षा के बहाने दुष्ट जङ्गली जानवरों को मानों दण्ड देने के लिए वन में घूम रहे थे। बगल के वृक्षों ने मतवाले पक्षियों के शब्दों से उनका जयकार किया; लताओं ने उनके ऊपर फूल बिखेरा, हरिणों ने निडर होकर उन्हें देखते हुए अपने विशाल नेत्रका फल पा लिया, मन्द, सुगन्ध एवं शीतल वायु ने उनकी सेवा की और उनके वन में प्रवेश करते ही वनाग्नि शान्त हो गयी।

शाम हो जाने पर नन्दिनी अपने संचार से वनभूमि को पवित्र कर आश्रम पर जाने लगी। दिलीप भी वन का दृश्य देखते हुए उसके पीछे-पीछे चले। आश्रम के पास पीछे राजा, मध्य में नन्दिनी, आगे अगवानी करने आयी हुई सुदक्षिणा हो गयी। इस प्रकार दिलीप सुदक्षिणा के बीच नन्दिनी की शोभा रात-दिन के मध्य में वर्तमान सन्ध्या के समान हो गयी। सुदक्षिणा ने नन्दिनी की पुनः पूजा की। बछड़े के लिए उत्कण्ठित होने पर भी उसने उसे स्वीकार कर लिया। अतः वे दोनों बड़े प्रसन्न हुए। गुरु एवं गुरुपत्नी की प्रणाम कर सन्ध्याविधि के समाप्त होने पर दिलीप दूध दुह लेने के बाद बैठी हुई नन्दिनी की पुनः सेवा करने लगे। नन्दिनी के पास दीपक तथा उसके भोज्य पदार्थ रखे हुए थे, उसके सो जाने पर राजा और सुदक्षिणा भी सो जाते थे और जगने पर जग जाते थे। इस प्रकार स्त्री के साथ नन्दिनी की सेवा करते हुए दिलीप के इक्कीस दिन बीत गये।

बाईसवें दिन जब राजा पर्वतीय दृश्य देखने लगे कि नन्दिनी भी राजा के हृदय को जानने के लिए हिमालय की एक कन्दरा में घुस गयी और शेर ने उस पर आक्रमण कर दिया। उसका करुण क्रन्दन सुनकर अन्दर जाने पर

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( ६ )

राजा ने देखा कि उसके ऊपर शेर बैठा है और नन्दिनी कातर होकर उसकी ओर देख रही है। यह देखते ही राजा ने शेर को मारने के लिए तरकस से बाण निकालकर उसपर प्रहार करना ही चाहा कि उनका हाथ रुक गया और वे चित्रलिखित से निःस्तब्ध हो गये। बाद अपने पुरुषार्थ को व्यर्थ समझकर आश्चर्य में पड़े हुए और मन्त्र एवं औषध के बल से शक्तिक्षीण सांप के समान भीतर ही भीतर छटपटाते हुए राजा को देखकर मनुष्य की वाणी में शेर ने हँसते हुए कहा—राजन् ! मुझे मारने के लिए तेरा प्रयास व्यर्थ है, मैं भगवान् शङ्कर का सेवक हूँ, जो तुम्हारे भी मान्य हैं। एक बार जङ्गली हाथियों ने इन देवदारु वृक्षों के वल्कल को खुजली शान्त करने के अपने कपोलस्थल की रगड़ से छुड़ा दिया था, जिसे देखकर पार्वतीजी को बड़ा ही दुःख हुआ, क्योंकि उन्होंने इन्हें अपने पुत्र के समान पाला था। उसी समय से शिवाजी ने मुझे इसकी रखवारी के लिए नियुक्त कर आदेश दिया कि जो जन्तु तुम्हारे समीप आ जाय, उसे खाकर तुम अपना निर्वाह करना। अतः मैं इसे खाऊँगा। तुम लाज छोड़कर लौट जाओ, तुमने गुरुभक्ति का प्रदर्शन कर दिया, जो कार्य अशक्य है, उसमें किसी का दोष नहीं। यह सुनकर राजा ने अपनी अपमान भावना को ढीला कर दिया और वे बोले—हे मृगेन्द्र ! शिवजी तो मेरे मान्य हैं ही, पर गुरु की यह गाय भी उपेक्षणीय नहीं है, इसका छोटा बछड़ा दूध पीने के लिए उत्सुक होगा। अतः मुझे आप खाकर अपनी क्षुधानिवृत्ति कीजिए और इसे छोड़ दीजिए।

यह सुनकर वह शेर मुस्कराकर दिलीप से पुनः कहा—राजन् ! तुम मेरे विचार से बड़े विवेकशून्य मालूम पड़ते हो, क्योंकि एक क्षुद्र गौ के लिए इतना बड़ा साम्राज्य, नयी अवस्था एवं सुन्दर शरीर का त्याग करना चाहते हो। तुम्हारी कृपा से एक नन्दिनी मात्र का कल्याण होगा, यदि तुम जीते रहोगे तो अनेक प्रजाओं का पिता के समान निरन्तर पालन करते रहोगे। यदि गुरु से डरते हो तो अधिक दूध देनेवाली अनेक गौओं को देकर उनका क्रोध शान्त कर सकते हो। अतः अपने शरीर का त्याग न करो, इस पार्थिव स्वर्ग का भोग भोगो। यह कहकर सिंह के मौन हो जाने पर दिलीप ने कहा—मृगराज ! नाश से रक्षा करना क्षत्रिय का प्रमुख कर्त्तव्य है, उसके विरुद्ध प्राण धारण से क्या लाभ है ? गुरुजी के क्रोध की शान्ति, अन्य गायों के दान से सम्भव नहीं, इस नन्दिनी को कामधेनु के समान समझो, इस पर तो तुम्हारा आक्रमण

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( ७ )

शिवजी से प्रताप से हुआ है । अतः मैं इस गौ के बदले में अपने शरीर को तुम्हें देकर इसकी रक्षा करना आवश्यक समझता हूँ । इस प्रकार तुम्हारी भूख भी मिट जायेगी और गुरुजी का होम आदि कार्य भी चलता रहेगा । आप स्वयं पराधीन हो, पराधीनों की बान जानते ही हो, रक्षणीय वस्तु को नष्ट कर सेवक स्वयं कुछ भी आघात न पाकर स्वामी के सामने संकोच के मारे जा नहीं सकता । मुझपर दया करो, मुझे प्राण का मोह नहीं है, क्योंकि मेरे जैसे यशस्वी व्यक्ति को इस अवश्य विनाशशील शरीर पर आस्था नहीं होती । अपना शरीर समर्पित कर गौ की रक्षा करना परम धर्म है । यही मैं चाहता हूँ । विद्वान् कहते हैं—बातचीत से भी मित्रता हो जाती है । इस प्रकार हम दोनों की मित्रता हो चुकी । अतः मित्र होकर तुम मेरी प्रार्थना भंग न करो । यह सुन शेर के स्वीकार कर लेने के बाद राजा का बाहुस्तम्भन शिथिल हो गया, उन्होंने अस्त्र त्यागकर अपने शरीर को मांसपिण्ड के समान शेर के सामने भेंट कर दिया । नीचे मुख किये सिंह के भयंकर आक्रमण की प्रतीक्षा करते हुए दिलीप के ऊपर आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और नन्दिनी बोल उठी—पुत्र ! उठो । नन्दिनी के इस अमृतमय वचन को सुनकर उठने पर राजा ने केवल दयालु माता के समान नन्दिनी को देखा, पर शेर को नहीं । इससे उनको बड़ा आश्चर्य हुआ । तब उस विस्मयापन्न राजा से नन्दिनी ने कहा—वत्स ! ऋषि के प्रभाव से मेरा यमराज भी कुछ नहीं कर सकते हैं, तो दूसरे जन्तुओं की क्या बात है ? मैंने तो माया से शेर बनाकर तुम्हारी परीक्षा की है । तेरी गुरुभक्ति और जीवदया से मैं प्रसन्न हूँ, वर मांगों, क्या चाहते हो ? मुझे केवल दूध देने वाली गौ न समझो, अपितु प्रसन्न कामधेनु समझो । यह सुन राजा ने हाथ जोड़कर सुदक्षिणा में वंश को चलानेवाला पुत्र मांगा । नन्दिनी ने 'तथास्तु' कहकर वरदान दिया और पत्ते के दोने में दूहकर दूध पीने के लिए आदेश भी दे दिया, किन्तु राजा ने कहा—माँ, बछड़े के पीने और गुरुजी के होम के बाद मैं दूध पीऊँगा । बाद प्रसन्न हुई गौ के साथ कन्दरा से निकलकर राजा ने आश्रम पर पहुँचकर यह वृत्त वसिष्ठजी से निवेदन किया और बड़ी प्रसन्नता से अपनी पत्नी सुदक्षिणा से भी कह सुनाया । यद्यपि राजा की प्रसन्नता से उसका आभास उन्हें हो चुका था, बाद गुरुजी आज्ञा से बछड़े और हवन से बचे हुए दूध का पान किया । दूसरे दिन गोव्रत की पारणा के बाद गुरु से आशीर्वाद ले और गुरु, गुरुपत्नी तथा वत्स सहित नन्दिनी की प्रदक्षिणा करके उन्होंने

तृतीय सर्ग

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( ८ )

सुदक्षिणा के साथ रथ से अपनी राजधानी को प्रस्थान किया। अयोध्या पहुँचने पर प्रजाओं ने बड़ी उत्कण्ठा से उनका स्वागत किया। बाद मन्त्रियों से राज्य-भार लेकर वे धर्मपूर्वक प्रजापालन करने लगे। अनन्तर जिस प्रकार आकाश-स्थली अत्रि मुनि के नेत्र से निर्गत चन्द्रमा को धारण करती है और देवनदी गङ्गा ने अग्नि से प्रक्षिप्त स्कन्द को उत्पन्न करनेवाले शिवजी के तेज को धारण किया था उसी प्रकार सुदक्षिणा ने दिलीप के वंशवर्द्धक गर्भ को धारण किया, जिसमें लोकपालों का अंश भी सम्मिलित था।

तृतीय सर्ग

गर्भधारण के बाद राजा दिलीप की पत्नी सुदक्षिणा ने पति को, प्रिय सखियों को आनन्दप्रद और इक्ष्वाकुवंश की वृद्धि के लिए कारणभूत गर्भ के चिह्नों को धारण करना आरम्भ किया। उनका शरीर दुबला होने लगा, मुख पीला पड़ गया, उन्होंने अधिक आभूषणों को उतार दिया तथा मिट्टी खाना शुरू कर दिया। यह देखकर परम प्रसन्न राजा ने उनकी सखियों से गर्भिणीमनोरथ को पूछ-पूछकर तदनुकूल सारी व्यवस्थाएँ कर दीं। धीरे-धीरे उनके गर्भ का कष्ट कम होने लगा और उनका शरीर पुष्ट होने लगा, उनका कुचाग्र भाग काला हो गया। राजा दिलीप ने उन्हें गर्भवती समझकर पत्नीप्रेम और अपनी सम्पत्ति के अनुरूप पुंसवन आदि वैदिक संस्कारों को सम्पन्न किया और प्रवीण वैद्यों द्वारा गर्भ के भरण पोषण की व्यवस्था कर दी। दसवें महीने में सुदक्षिणा को पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ। राजा ने उदारतापूर्वक दान दिया और कुलगुरु वसिष्ठजी को तपोवन से बुलाकर विधिवत् जातकर्म संस्कार कराया तथा उस बालक का नाम रघु रख दिया।

धाई के वचनों को तोतली बोली में दुहराता हुआ वह बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा, बाद उपयोगी विद्याओं का अध्ययन कर सुशिक्षित हो गया। राजा दिलीप ने उसका यज्ञोपवीत संस्कार तथा विवाह करके उसे युवराज बना दिया। रघु के युवराज होते ही राजा दिलीप शत्रुओं के लिए असह्य हो गये। बाद युवराज रघु को घोड़े की रक्षा के निमित्त नियुक्त कर ९९ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये। सौवाँ अश्वमेध करने के हेतु राजा ने जब घोड़ा छोड़ा, तब देवराज इन्द्र को सहन नहीं हुआ। वे घोड़े को चुराकर अदृश्य हो गये। घोड़े को न

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( ९ )

देख सेनासहित रघु किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये। इतने में ही वशिष्ठजी को कामधेनु गौ नन्दिनी दिखाई पड़ी, जिसका प्रभाव उन्होंने पहले ही सुन रखा था। तत्काल उसके मूत्र को अपनी आंखों में लगाकर देखा कि इन्द्र घोड़े को चुराकर ले जा रहे हैं। यह दृश्य देखते ही रघु ने इन्द्र को ललकारते हुए कहा—देवराज ! आप यज्ञों के रक्षक होकर स्वयं ऐसा करेंगे, तो यज्ञ कैसे हो सकेगा ? तब इन्द्र ने कहा—राजकुमार ! तेरा कहना सत्य है, फिर भी तुम्हारे पिता दिलीप सौवां अश्वमेध यज्ञ पूरा कर मेरा यश मिटा देना चाहते हैं, क्योंकि मैं ही एकमात्र शतक्रतु ( सौ यज्ञ पूरा करने वाला ) हूँ दूसरा कोई नहीं, इसलिए मैंने इस घोड़े का अपहरण कर लिया है, तुम लौट जाओ, नहीं तो राजा सगर की सन्तानों की तरह तुम्हारी भी दशा होगी।

इस पर रघु ने कहा—यदि आपका यही निश्चय है, तो अस्त्र उठाइए, मुझे बिना जीते आप घोड़े को नहीं ले जा सकते हैं। यह कहते हुए रघु ने इन्द्र की छाती पर एक बाण मारा। इन्द्र ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक बाण रघु की छाती में ऐसा मारा कि रुधिर की धारा बहने लगी। इस प्रकार दोनों में भयङ्कर युद्ध होने लगा। अन्त में रघु ने इन्द्र के रथ की ध्वजा को काट गिराया, जिससे अपना अत्यन्त अपमान समझकर इन्द्र ने अति क्रोध में आकर रघु को मार डालने के निमित्त अपने अमोघ अस्त्र वज्र का प्रहार किया, किन्तु जरा-सी मूर्च्छा का अनुभव कर रघु उठकर पुनः खड़े हो गये। इस प्रकार रघु को घोर महायुद्ध में अचल देखकर उनकी वीरता पर इन्द्र प्रसन्न हो गये और बोले—युवराज ! पर्वतों की पांख काटनेवाले मेरे. इस अमोघ वज्र के प्रहार को तुम्हारे अतिरिक्त आज तक किसी ने नहीं सहा है। तुम्हारे इस साहस एवं वीरता को देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। इस घोड़े को छोड़कर जो चाहो मांग लो।

यह सुनकर रघु ने कहा—देवराज ! यदि आप घोड़े को नहीं देना चाहते हैं, तो निरन्तर यज्ञ करनेवाले मेरे पूज्य पिताजी, इस आरब्ध सौवें अश्वमेध यज्ञ के पूर्ण फल को प्राप्त करें और शिवजी के अंश होने के कारण अत्यन्त दुरासद, सम्प्रति यज्ञशाला में विराजमान मेरे पिताजी इस हम लोगों के समाचार को आपके दूत के द्वारा ही जिस प्रकार सुन सकें आप कृपया वैसा ही प्रबन्ध कर दें। इन्द्र ने रघु की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और अपने सारथी मातलि के साथ जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से अपनी नगरी

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( १० )

इन्द्रपुरी की ओर प्रस्थान किया। इधर युवराज रघु भी विजयी होने पर भी घोड़े के न प्राप्त होने के कारण विशेष प्रसन्न न होते हुए राजा दिलीप के यज्ञ-मण्डप की ओर लौट पड़े।

रघु और इन्द्र के वृत्तान्त को राजा दिलीप इन्द्रदूत के मुख से पहले ही सुनकर परम प्रसन्न हो चुके थे। अतः रघु के आने पर इन्द्र के वज्र के आर्द्र घाव से चिह्नित शरीर पर हर्ष से शिथिल हाथ को धीरे-धीरे फेरते हुए उन्होंने उसका अभिनन्दन किया। इस प्रकार दिलीप ने ९९ अश्वमेध यज्ञ कर जीवन-लीला के बाद स्वर्ग जाने के लिए ९९ सीढ़ियों की पंक्ति बनाकर अपने युवक पुत्र रघु को राज्य देकर वानप्रस्थाश्रम में रहकर तपस्या करने के लिए तपोवन में प्रस्थान कर दिया, क्योंकि इक्ष्वाकु कुल के राजाओं का यही कुल-नियम था।

चतुर्थ सर्ग

महाराज रघु अपने पिता राजा दिलीप द्वारा दिये गये अयोध्या के राज्य सिंहासन को प्राप्त कर उस प्रकार अधिक सुशोभित हुए जिस प्रकार सन्ध्या के समय भगवान् भास्कर के द्वारा निहित तेज को पाकर पावक अधिक तेजस्वी हो जाता है। प्रजाओं ने रघु के अभ्युदय से प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिनन्दन किया। उस समय नीतिविशारद मन्त्रियों ने रघु के समक्ष धर्मपक्ष एवं अधर्म-पक्ष दोनों ही रखे, किन्तु रघु ने सद्धर्म को ही स्वीकार किया। अतः रघु ने न्याय से प्रजापालन करते हुए पराक्रम से शत्रुओं को भी अपने वश में कर लिया।

रघु को सिंहासनासीन देखकर लक्ष्मी अदृश्य रूप से तथा सरस्वती समय-समय पर बन्दियों के स्तुतिगान से उनकी सेवा करने लगी। यद्यपि मनु आदि राजाओं ने पहले पृथ्वी का उपभोग कर लिया था, फिर भी रघु को पाकर पृथ्वी अनुप भुक्ता सुन्दरी के समान उनमें अनुरक्त हो गयी। जिस प्रकार मनुष्य आम का फल पाकर उसकी बौर की प्रतीक्षा नहीं रखता है उसी प्रकार प्रजाएँ रघु के गुणों से सन्तुष्ट होकर राजा दिलीप को भूलने लग गयीं। समस्त राज्य अभिनव आनन्द का अनुभव करने लगा। प्रजावर्ग में अनुराग उत्पन्न करने के कारण रघु वास्तविक रूप से राजा कहे जाने लगे। रघु के नये राजा होने पर सारी वस्तुएँ नवीन सी दिखाई देने लगीं।

राज्यासन प्राप्त करने के बाद रघु ने अपने राज्य में शान्ति स्थापित की, शरद्ऋतु का आगमन इस प्रकार हुआ मानो कमलधारिणी साक्षात् लक्ष्मी आ

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( ११ )

गयी हों। मेघरहित सूर्य के तेज के समान रघु का प्रताप चारों दिशाओं में फैल गया। इन्द्र ने वर्षा सम्बन्धी धनुष उठाकर रख दिया और रघु ने दिग्विजयर्थ अपना धनुष उठा लिया।' क्योंकि ये दोनों वारी-बारी से प्रजा का कार्य सिद्ध करने के लिए धनुर्धारण में तत्पर रहते थे। वर्षाकाल की समाप्ति तथा शरद् के आगमन से सर्वत्र प्रसन्नता छा गयी। ईख की छाया में बैठकर क्षेत्ररक्षक कृषकों की कन्याएँ प्रजावर्ग की रक्षा करने वाले रघु का गुणगान करने लगीं। अगस्त्य के उदय होने से जल में निर्मलता आ गयी। हृष्ट-पुष्ट मतवाले वृषभ रघु का अनुकरण करते हुए नदी के तटों को तोड़ने लगे। शरद् ऋतु आ जाने पर कीचड़ सूख गये तथा मार्ग प्रशस्त हो गये। इस प्रकार वर्षऋतु समाप्त हो जाने के बाद शरद्ऋतु ने रघु को विजययात्रा के लिए प्रोत्साहित किया, उन्होंने विधिपूर्वक नीराजनाविधि नामक शान्ति कर्म और राजधानी की रक्षा का प्रबन्ध करके षड्विध सेना के साथ शुभ मुहूर्त में दिग्विजय के लिए प्रस्थान कर दिया।

इन्द्र के समान पराक्रमी राजा रघु पहले पूर्व दिशा की ओर बढ़े। रघु के सेना के रथ एवं घोड़ों की टापों से उड़ी धूलि से तथा मेघों के तुल्य हाथियों से पृथ्वी एवं आकाश एक सा होता जा रहा था। आगे-आगे रघु का प्रताप, बाद सेना का कोलाहल, उसके पीछे धूलि, अन्त में सेना चल रही थी। रघु अपने प्रभाव से निर्जल प्रदेश को जलमय बनाते हुए, नदियों पर पुल बंधाते हुए, घने जङ्गलों को काटकर प्रकाशमय मार्ग बनाते हुए आगे बढ़ते जाते थे। रघु दिग्विजय के निमित्त अपनी सेना को पूर्व सागर की ओर ले जाते हुए इस प्रकार लग रहे थे मानों राजा भगीरथ शिवजी के जटाजूट से निकली हुई गङ्गाजी को गङ्गासागर की ओर ले जाते हों।

रघु जिन-जिन राजाओं को जीत लेते थे, उन्हें पुनः वहीं का राजा बना देते थे। जिस प्रकार धान का बीज उखाड़कर पुनः रोप देने पर अधिक फल देते हैं वैसे उन राजाओं ने उन्हें अधिक उपायन दिया। इस प्रकार रघु का मार्ग भलीभाँति निष्कण्टक होता गया।

पूर्वी राजाओं को जीतते हुए जब रघु ताल के वनों से सुशोभित समुद्री तट पर पहुँचे तब सुह्म देश के राजा ने युद्ध के बिना ही वैतसी वृत्ति का आश्रय कर उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। वहाँ से आगे बढ़कर रघु ने नौका-साधनवाले बंगाली राजाओं को जीतने के बाद गङ्गासागर के द्वीपों में अपना जयस्तम्भ गाड़ दिया। पुनः हाथियों का पुल बनाकर कपिशा नदी को पार कर

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( १२ )

उत्कल प्रदेश में गये, जहाँ के लोगों ने आगे बढ़ने के लिए कलिंग देश का मार्ग बता दिया। तदनुसार वहाँ पहुँचकर युद्ध करनेवाले कलिङ्ग राजा को पराजित कर महेन्द्र पर्वत के ऊपर अपना दुःसह प्रताप स्थापित कर दिया। वहाँ उनके सैनिकों ने नारियल के पत्तों में शत्रुओं के यश के समान नारियल का रस पीकर अपना परिश्रम दूर करते हुए विश्राम किया।

बाद वहाँ से समुद्र के किनारे-किनारे दक्षिण की ओर बढ़े। कावेरी नदी को पार कर मलयागिरि की तराई से आगे बढ़ते हुए ताम्रपर्णी नदी एवं समुद्र के सङ्गम पर वर्तमान पाण्ड्य वंश के राजा को युद्ध में हराया। जिस दक्षिण दिशा में सूर्य का तेज भी मन्द पड़ जाता है वहीं के राजे रघु का प्रताप नहीं सह पाये। पाण्ड्यनरेश ने नम्र होकर भेंट के रूप में रघु को मोतियों का हार दिया। वहाँ से चलकर सह्यपर्वत को लाँघता हुआ केरल को जीतने के बाद केरल की मुरला नदी के वायु से उड़ाये हुए केतकी के पराग रघु के सैनिकों पर पड़े और रघु के घोड़ों पर कवचों की ध्वनि ने तालवृक्ष ध्वनि को फीका कर दिया। जिस समुद्र से प्रार्थना करने के बाद परशुरामजी को स्थान प्राप्त हुआ था उसी से प्रार्थना के बिना वहाँ के राजाओं के व्याज से पर्याप्त धन प्राप्त हुआ। रघु ने केरल में उस त्रिकूट पर्वत को ही अपना विजय-स्तम्भ बना दिया जिसपर उनके हाथियों के दाँतों के प्रहार का चिह्न पड़ा था।

बाद स्थलमार्ग से पारस में जाकर रघु ने उन यवनों से युद्ध किया जिनकी स्त्रियों के मुख से मदिरा की गन्ध निकलती थी। धूलि से आच्छन्न रणाङ्गण में केवल धनुष टङ्कार से ही योद्धाओं का ज्ञान हो पाता था। रघु ने भल्ला से पारसी राजाओं के दाढ़ीवाले मस्तकों को काट-काटकर पृथ्वी को इस प्रकार ढक दिया जैसे वह मधुमक्खियों के छाते से ढकी हों। मरने से बचे पारसी यवनों ने अपने-अपने टोपों को उतार रघु की शरण ले ली।

अनन्तर हूणों को जीतकर वहाँ से उत्तर दिया की ओर कम्बोजों को जीतते हुए हिमालय पर पहुँचकर पहाड़ी राजाओं से घमासान युद्ध किया। हिमालय पर्वत पर राजा रघु का उत्सव-संकेत नामक गणों के साथ घोर युद्ध हुआ जिसमें प्रयोग किये गये बाणों, भिन्दिपालों एवं पत्थरों के पारस्परिक संघर्ष से आग उत्पन्न हो जाती थी। रघु ने उनको जीतकर हर्षोत्सव में अपने पराक्रम का गुणगान गन्धर्वों से कराया। हारे हुए उत्सव-संकेतों ने रघु को इतना पर्याप्त ऐश्वर्य दिया, जिससे रघु ने हिमालय के ऐश्वर्य का पता लगा लिया और हिमालयवासियों ने राजा रघु के पराक्रम को जान लिया।

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( १३ )

बाद रघु हिमालय पर अपना स्थिर यश स्थापित करके कैलास पर्वत पर इस संकोच से नहीं गये कि इसे तो रावण ने ही उठा लिया था। पश्चात् लौहित्य नदी को पार कर रघु ने कामरूपेश्वर के हृदय में कम्प पैदा कर दिया। क्योंकि वह तो सूर्य को भी ढक देनेवाली रघु की सेना की धूलि को ही नहीं सह सका तो सेना को कैसे सह सकता था। कामरूप के राजा ने इन्द्र से भी अधिक पराक्रमी रघु को उन हाथियों को भी भेंट के रूप उपस्थित कर दिया, जिनसे वह शत्रुओं को जीता करता था। उस कामरूप के राजा ने रघु को पर्याप्त रत्नों का उपहार देकर उनका सम्मान किया।

इस प्रकार चारों दिशाओं को जीतकर रघु पराजित राजाओं के छत्र-रहित शिरों को अपनी चतुरङ्गिणी अजेय सेना की धूलि से धूसरित करते हुए दिग्विजययात्रा से अपनी राजधानी अयोध्या में सकुशल लौट आये।

दिग्विजय के अनन्तर राजा रघु ने उस विश्वजित् नामक यज्ञ का आरम्भ किया जिसमें सम्पूर्ण धन ही दक्षिणा के रूप में दे दिया जाता है। ठीक है, जिस प्रकार मेघ समुद्र से जलग्रहण कर वृष्टि के द्वारा जनता का हित करते हैं वैसे ही सज्जनों का द्रव्यसंचय भी परोपकार के लिए होता है। रघु ने यज्ञ सम्पन्न करने के बाद मन्त्रियों की अनुमति से सत्कार करके उन राजाओं को अपने-अपने स्थानों को लौटने के लिए विदा कर दिया, जिनकी रानियां अधिक दिन हो जाने से उत्कण्ठित थीं। अपने-अपने नगरों को जाने की अनुमति प्राप्त कर राजा लोग प्रस्थानकालिक नमस्कारों के द्वारा रघु के चरणकमलों को अपने मस्तकों से स्पर्श करने लगे, जिससे उनके मुकुटों की मालाओं से गिरने वाले पुष्परस तथा पराग से रघु के पैर की अंगुलियां लाल हो उठीं।

पञ्चम सर्ग

जब राजा ने विश्वजित् नामक यज्ञ में दक्षिणा के रूप में अपना सर्वस्व दे डाला तब वरतन्तु महर्षि के शिष्य कौत्समुनि सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़कर गुरुदक्षिणा देने के लिए धनप्राप्ति की इच्छा से रघु के पास आये। अतिथिसेवा में निपुण राजा रघु ने सोने के पात्रों के न रहने से मिट्टी के पात्र में पूजा-सामग्री लेकर उपस्थित हो शास्त्रोक्त विधि से कौत्स की पूजा की ओर हाथ जोड़कर पूछा—भगवन्, सूर्य के समान तेजस्वी आपके गुरुजी प्रसन्न तो हैं न?
२ २० भू०

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उनकी तपस्या निर्विघ्न तो चल रही है न ? पुत्र के समान पालित तपोवन के छायादार वृक्षों को वायु एवं वनाग्नि से कोई बाधा तो नहीं है ? जिनके जल से आप लोगों के स्नान, तर्पण, देवपूजन आदि नित्यकृत्य होते हैं—उन नदी आदि के जल में कोई उपद्रव तो नहीं है न ? गाँवों के गाय, भैंस आदि आप लोगों के नीवार आदि धान को तो नहीं खा जाते हैं न ? आपके केवल दर्शनमात्र से ही मेरी तृप्ति नहीं हो रही है, क्योंकि आपकी आज्ञा का पालन करने की मुझे उत्कट उत्कण्ठा हो रही है। क्या गुरुजी की आज्ञा से, या स्वयं ही मेरे ऊपर कृपा करने के निमित्त आप आश्रम से पधारे हैं ?

मिट्टी के पात्र में पूजा-सामग्री को देखकर ही अपने गनोरथ की पूर्ति में हताश होकर कौत्स राजा से बोले—राजन् ! हमारे आश्रम में सब कुशल है, आपके रहते भला दुःख कैसा ? सूर्य के रहते क्या अन्धकार हो सकता है ? पूज्य वर्ग में भक्ति तो आपके कुल की परम्परा ही है, पर मैं ही कुछ देर से आया हूँ, यही मुझे खेद है। राजन् ! जैसे नीवार की फली तोड़लेने पर केवल डण्ठल रह जाता है वैसे ही याचकों को सर्वस्व देकर आप शोभित हो रहे हैं दान में खजाने को खर्च कर आप देव एवं पितरों के द्वारा अमृत पान कर लेने के बाद क्षीण चन्द्रमा के समान शोभित हैं। राजन् ! आप चिन्ता न करें, मैं और किसी दूसरे से गुरुदक्षिणार्थ धन लेने का प्रयास करूँगा। यह कहकर जाने के लिए उद्यत कौत्स से राजा ने पूछा—ब्रह्मन् ! आप गुरुदक्षिणा में क्या और कितना देना चाहते हैं ? यह सुनकर मुनि ने सदाचारी एव विनयी राजा से कहा—मैंने जब विद्या समाप्त कर गुरुजी से गुरुदक्षिणा स्वीकार करने की प्रार्थना की तो उन्होंने मेरी दृढ़ गुरु-भक्ति को ही दक्षिणा से बड़ा समझकर कुछ माँगना अस्वीकार किया, बार-बार प्रार्थना करने से नाराज होकर वे बोले—१४ विद्याओं की दक्षिणा १४ करोड़ लाओ। पर, पूजा-सामग्री से आपकी दशा जानकर मैं आपको कष्ट नहीं देना चाहता। ऐसा सुन राजा ने उनसे कहा—भगवन् ! मेरी यज्ञशाला में दो-तीन दिन ठहरिए तब तक मैं आपकी इच्छा पूर्ण करने का प्रयास करता हूँ। आपके चले जाने से मेरा बहुत बड़ा अपयश होगा।

वसिष्ठजी के प्रभाव से रघु का रथ सर्वत्र जा सकता था, उन्होंने कुबेर को जीतकर धन लाने की इच्छा से रथ सजाकर प्रातःकाल यात्रा करने के निमित्त शयन किया। सबेरे खजाने के अधिकारियों ने खजाने में हुई स्वर्ण-वृष्टि की सूचना राजा को दी, राजा ने सब सोना कौत्स को देना चाहा, पर उन्होंने