रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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सुदक्षिणा के साथ रथ से अपनी राजधानी को प्रस्थान किया। अयोध्या पहुँचने पर प्रजाओं ने बड़ी उत्कण्ठा से उनका स्वागत किया। बाद मन्त्रियों से राज्य-भार लेकर वे धर्मपूर्वक प्रजापालन करने लगे। अनन्तर जिस प्रकार आकाश-स्थली अत्रि मुनि के नेत्र से निर्गत चन्द्रमा को धारण करती है और देवनदी गङ्गा ने अग्नि से प्रक्षिप्त स्कन्द को उत्पन्न करनेवाले शिवजी के तेज को धारण किया था उसी प्रकार सुदक्षिणा ने दिलीप के वंशवर्द्धक गर्भ को धारण किया, जिसमें लोकपालों का अंश भी सम्मिलित था।
तृतीय सर्ग
गर्भधारण के बाद राजा दिलीप की पत्नी सुदक्षिणा ने पति को, प्रिय सखियों को आनन्दप्रद और इक्ष्वाकुवंश की वृद्धि के लिए कारणभूत गर्भ के चिह्नों को धारण करना आरम्भ किया। उनका शरीर दुबला होने लगा, मुख पीला पड़ गया, उन्होंने अधिक आभूषणों को उतार दिया तथा मिट्टी खाना शुरू कर दिया। यह देखकर परम प्रसन्न राजा ने उनकी सखियों से गर्भिणीमनोरथ को पूछ-पूछकर तदनुकूल सारी व्यवस्थाएँ कर दीं। धीरे-धीरे उनके गर्भ का कष्ट कम होने लगा और उनका शरीर पुष्ट होने लगा, उनका कुचाग्र भाग काला हो गया। राजा दिलीप ने उन्हें गर्भवती समझकर पत्नीप्रेम और अपनी सम्पत्ति के अनुरूप पुंसवन आदि वैदिक संस्कारों को सम्पन्न किया और प्रवीण वैद्यों द्वारा गर्भ के भरण पोषण की व्यवस्था कर दी। दसवें महीने में सुदक्षिणा को पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ। राजा ने उदारतापूर्वक दान दिया और कुलगुरु वसिष्ठजी को तपोवन से बुलाकर विधिवत् जातकर्म संस्कार कराया तथा उस बालक का नाम रघु रख दिया।
धाई के वचनों को तोतली बोली में दुहराता हुआ वह बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा, बाद उपयोगी विद्याओं का अध्ययन कर सुशिक्षित हो गया। राजा दिलीप ने उसका यज्ञोपवीत संस्कार तथा विवाह करके उसे युवराज बना दिया। रघु के युवराज होते ही राजा दिलीप शत्रुओं के लिए असह्य हो गये। बाद युवराज रघु को घोड़े की रक्षा के निमित्त नियुक्त कर ९९ अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर लिये। सौवाँ अश्वमेध करने के हेतु राजा ने जब घोड़ा छोड़ा, तब देवराज इन्द्र को सहन नहीं हुआ। वे घोड़े को चुराकर अदृश्य हो गये। घोड़े को न