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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

Page 13 of 735

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ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक माना है। कालिदास ने प्रथमशती के शुङ्गवंशी नरेश अग्निमित्र को अपने मालविकाग्निमित्र नामक नाटक का नायक बनाया है तथा छठी शताब्दी के महाराज हर्षवर्द्धन के दरबारी महाकवि बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित में कालिदास की कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अतः कालिदास का समय ई० पू० प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी के बीच में कहीं होना चाहिए। इस आधार पर इनके विषय में मुख्य रूप से तीन मत उपस्थित होते हैं—

( १ ) कालिदास की सत्ता छठी शताब्दी में मानना आवश्यक है।
( २ ) कालिदास जैसे उत्तम कवि गुप्तनरेशों के स्वर्णयुग में ही हो सकते हैं।
( ३ ) कालिदास ई० पू० प्रथम शताब्दी के महाकवि हैं।

प्रथम मत—डॉ० हार्नली मानते हैं कि यशोधर्धन् ने बलादित्य नरसिंह गुप्त की सहायता से कारूर के युद्ध में हूणवंश के प्रतापी राजा मिहिरकूल को हराकर विक्रमादित्य की उपाधि प्राप्त की और अपनी इस बड़ी विजय के उपलक्ष्य में उसने विक्रम नाम का एक नया संवत् चलाया, जिसे प्राचीन सिद्ध करने के लिए उसे छः सौ वर्ष पूर्व से ही प्रचारित कर दिया।

समीक्षा—यशोधर्धन द्वारा ६०० सौ वर्ष पहले से विक्रम संवत् का चलाना इतिहास विरुद्ध है, क्योंकि यह प्रसिद्ध है कि मालव संवत् के नाम से जो संवत् चला आता था, शकारि विक्रमादित्य ने शकों की विजय के उपलक्ष्य में उसी का नाम विक्रम संवत् रख दिया। हूणों के विजेता यशोधर्धन हूणारि कहे जा सकते हैं, शकारि नहीं, और उनके शिलालेखों में विक्रम संवत् की स्थापना की चर्चा कहीं भी नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि ४७३ ई० में कुमारगुप्त की प्रशस्ति के लेखक वत्सभट्टिकवि ने अपने ग्रन्थ में कालिदास के अनेक पद्यों का अनुकरण किया है। अतः कालिदास पञ्चम शताब्दी के बाद नहीं हो सकते हैं। यह मत अब अनेकों प्रमाणों में अमान्य एवं अग्राह्य हो चुका है।

दूसरा मत—बहुत से विद्वानों ने सर्वतः समृद्ध एवं शान्तिमय गुप्त नरेशों के स्वर्णयुग में कालिदास की सत्ता मानी है। इनमें पूना के प्रो० के० पी० पाठक का मत है कि कालिदास गुप्तनरेशों के समकालीन थे, क्योंकि रघुवंश के चतुर्थ सर्ग में वर्णित रघु के दिग्विजय से समुद्रगुप्त के दिग्विजय में अधिक समानता है, किन्तु डा० स्मिथ, कीथ, मेकडानल, रा० कृ० भण्डारकर, पं० रामावतार शर्मा आदि बहुसंख्यक विद्वान् मानते हैं कि कालिदास के आश्रयदाता गुप्तनरेशों में सबसे अधिक प्रभावशाली चन्द्रगुप्त द्वितीय थे, क्योंकि शकों को भारत से बाहर निकाल देने वाले विक्रमादित्य उपाधिधारी इन्हीं के राज्य-काल में हर तरह से शान्ति थी तथा भारतीय कलाकौशल की उन्नति चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी। कालिदास के ग्रन्थों के समान गम्भीर विचार के ग्रन्थ ऐसे ही शान्तिमय समय में स्थिर चित्त से लिखे जा सकते हैं।

समीक्षा—कालिदास को गुप्तकाल के स्वर्णयुग का कवि मानना ठीक नहीं, क्योंकि केवल चन्द्रगुप्त द्वितीय ही विक्रमादित्य नहीं थे, किन्तु इनसे पूर्व मालवा में राज्य करनेवाले विक्रमादित्य का भी पता इतिहास को है। दूसरी बात यह है कि यदि कालिदास गुप्तकाल में