रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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शिवजी से प्रताप से हुआ है । अतः मैं इस गौ के बदले में अपने शरीर को तुम्हें देकर इसकी रक्षा करना आवश्यक समझता हूँ । इस प्रकार तुम्हारी भूख भी मिट जायेगी और गुरुजी का होम आदि कार्य भी चलता रहेगा । आप स्वयं पराधीन हो, पराधीनों की बान जानते ही हो, रक्षणीय वस्तु को नष्ट कर सेवक स्वयं कुछ भी आघात न पाकर स्वामी के सामने संकोच के मारे जा नहीं सकता । मुझपर दया करो, मुझे प्राण का मोह नहीं है, क्योंकि मेरे जैसे यशस्वी व्यक्ति को इस अवश्य विनाशशील शरीर पर आस्था नहीं होती । अपना शरीर समर्पित कर गौ की रक्षा करना परम धर्म है । यही मैं चाहता हूँ । विद्वान् कहते हैं—बातचीत से भी मित्रता हो जाती है । इस प्रकार हम दोनों की मित्रता हो चुकी । अतः मित्र होकर तुम मेरी प्रार्थना भंग न करो । यह सुन शेर के स्वीकार कर लेने के बाद राजा का बाहुस्तम्भन शिथिल हो गया, उन्होंने अस्त्र त्यागकर अपने शरीर को मांसपिण्ड के समान शेर के सामने भेंट कर दिया । नीचे मुख किये सिंह के भयंकर आक्रमण की प्रतीक्षा करते हुए दिलीप के ऊपर आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और नन्दिनी बोल उठी—पुत्र ! उठो । नन्दिनी के इस अमृतमय वचन को सुनकर उठने पर राजा ने केवल दयालु माता के समान नन्दिनी को देखा, पर शेर को नहीं । इससे उनको बड़ा आश्चर्य हुआ । तब उस विस्मयापन्न राजा से नन्दिनी ने कहा—वत्स ! ऋषि के प्रभाव से मेरा यमराज भी कुछ नहीं कर सकते हैं, तो दूसरे जन्तुओं की क्या बात है ? मैंने तो माया से शेर बनाकर तुम्हारी परीक्षा की है । तेरी गुरुभक्ति और जीवदया से मैं प्रसन्न हूँ, वर मांगों, क्या चाहते हो ? मुझे केवल दूध देने वाली गौ न समझो, अपितु प्रसन्न कामधेनु समझो । यह सुन राजा ने हाथ जोड़कर सुदक्षिणा में वंश को चलानेवाला पुत्र मांगा । नन्दिनी ने 'तथास्तु' कहकर वरदान दिया और पत्ते के दोने में दूहकर दूध पीने के लिए आदेश भी दे दिया, किन्तु राजा ने कहा—माँ, बछड़े के पीने और गुरुजी के होम के बाद मैं दूध पीऊँगा । बाद प्रसन्न हुई गौ के साथ कन्दरा से निकलकर राजा ने आश्रम पर पहुँचकर यह वृत्त वसिष्ठजी से निवेदन किया और बड़ी प्रसन्नता से अपनी पत्नी सुदक्षिणा से भी कह सुनाया । यद्यपि राजा की प्रसन्नता से उसका आभास उन्हें हो चुका था, बाद गुरुजी आज्ञा से बछड़े और हवन से बचे हुए दूध का पान किया । दूसरे दिन गोव्रत की पारणा के बाद गुरु से आशीर्वाद ले और गुरु, गुरुपत्नी तथा वत्स सहित नन्दिनी की प्रदक्षिणा करके उन्होंने