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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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( २ )

थे। जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल खींचते हैं वैसे ही राजा दिलीप भी प्रजाओं से जितना कर लेते थे वह सब प्रजा की भलाई में लगा देते थे। राजा दिलीप न तो अपने मन का भेद किसी को बताते थे, न किसी को जानने देते थे। जब कार्य सम्पन्न हो जाता था तभी कोई जान पाता था। वे निडर होकर अपनी रक्षा करते थे तथा धीरज के साथ अपनी प्रजा और धर्म की रक्षा किया करते थे। अपना जीवन वे धर्मकार्यों के अनुष्ठानों में बिताते रहते थे।

राजा दिलीप जो प्रजा से कर लेते थे वह इन्द्र को प्रसन्न कर वर्षा बरसाने के निमित्त यज्ञों में लगा देते थे। इस प्रकार राजा दिलीप और देवराज इन्द्र दोनों एक-दूसरे की सहायता करके स्वर्ग और पृथ्वी का पालन करते थे। ब्रह्मा ने निश्चय ही राजा दिलीप को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश इन पाँच तत्त्वों से ही बनाया है, क्योंकि पाँचों तत्त्व हमेशा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द गुणों से सारी सृष्टि की सेवा करते रहते हैं। दिलीप के गुणों से ही दूसरों का उपकार होता था। जैसे यज्ञ की पत्नी दक्षिणा प्रसिद्ध है वैसे ही मगधवंश में उत्पन्न सुदक्षिणा उनकी धर्मपत्नी थीं। उनकी बड़ी इच्छा थी कि मेरी प्यारी पत्नी सुदक्षिणा से मेरे जैसा सत्पुत्र उत्पन्न हो। अतः उन्होंने अपने राज्य का भार संभालने के लिए मन्त्रियों पर सौंपकर सुदक्षिणा के साथ रथ पर सवार होकर वे अपने कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रम की ओर चल पड़े। उन्होंने अपने साथ अधिक सेवकों को नहीं लिया, क्योंकि उनकी भीड़-भाड़ से आश्रम के कार्यों में बाधा पड़ेगी। मार्ग में साल की गोंद की गन्ध को, फूलों के पराग को और वन के वृक्षों के पत्तों को धीरे-धीरे कँपाता हुआ पवन उनको सुख देता हुआ चल रहा था।

सन्ध्या के समय दिलीप अपनी पत्नी के साथ वसिष्ठजी के आश्रम पर पहुँचकर देखते हैं कि अग्निहोत्र का धुआँ पवन के कारण चारों ओर फैलकर अतिथियों को पवित्र कर रहा है। तब राजा दिलीप ने आश्रम के पहले ही सारथी द्वारा रथ खड़ा कराकर सहारा देकर पहले सुदक्षिणा को रथ से उतारा बाद स्वयं उतर पड़े। यह समाचार सुनकर सभ्य-संयमी मुनियों ने अपने रक्षक राजा का सपत्नीक सम्मान के साथ स्वागत किया। जब सन्ध्याकालीन क्रियाएँ समाप्त हो चुकीं तब उन्होंने वसिष्ठजी के पास उन्हें पहुँचाया। तब राजा दिलीप ने उन तपस्वी महामुनि अपने कुलगुरु वसिष्ठजी का दर्शन किया जिनके पीछे पतिव्रता अरुन्धतीजी उसी प्रकार बैठी थीं जैसे अग्नि के पीछे स्वाहा