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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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गयी हों। मेघरहित सूर्य के तेज के समान रघु का प्रताप चारों दिशाओं में फैल गया। इन्द्र ने वर्षा सम्बन्धी धनुष उठाकर रख दिया और रघु ने दिग्विजयर्थ अपना धनुष उठा लिया।' क्योंकि ये दोनों वारी-बारी से प्रजा का कार्य सिद्ध करने के लिए धनुर्धारण में तत्पर रहते थे। वर्षाकाल की समाप्ति तथा शरद् के आगमन से सर्वत्र प्रसन्नता छा गयी। ईख की छाया में बैठकर क्षेत्ररक्षक कृषकों की कन्याएँ प्रजावर्ग की रक्षा करने वाले रघु का गुणगान करने लगीं। अगस्त्य के उदय होने से जल में निर्मलता आ गयी। हृष्ट-पुष्ट मतवाले वृषभ रघु का अनुकरण करते हुए नदी के तटों को तोड़ने लगे। शरद् ऋतु आ जाने पर कीचड़ सूख गये तथा मार्ग प्रशस्त हो गये। इस प्रकार वर्षऋतु समाप्त हो जाने के बाद शरद्ऋतु ने रघु को विजययात्रा के लिए प्रोत्साहित किया, उन्होंने विधिपूर्वक नीराजनाविधि नामक शान्ति कर्म और राजधानी की रक्षा का प्रबन्ध करके षड्विध सेना के साथ शुभ मुहूर्त में दिग्विजय के लिए प्रस्थान कर दिया।

इन्द्र के समान पराक्रमी राजा रघु पहले पूर्व दिशा की ओर बढ़े। रघु के सेना के रथ एवं घोड़ों की टापों से उड़ी धूलि से तथा मेघों के तुल्य हाथियों से पृथ्वी एवं आकाश एक सा होता जा रहा था। आगे-आगे रघु का प्रताप, बाद सेना का कोलाहल, उसके पीछे धूलि, अन्त में सेना चल रही थी। रघु अपने प्रभाव से निर्जल प्रदेश को जलमय बनाते हुए, नदियों पर पुल बंधाते हुए, घने जङ्गलों को काटकर प्रकाशमय मार्ग बनाते हुए आगे बढ़ते जाते थे। रघु दिग्विजय के निमित्त अपनी सेना को पूर्व सागर की ओर ले जाते हुए इस प्रकार लग रहे थे मानों राजा भगीरथ शिवजी के जटाजूट से निकली हुई गङ्गाजी को गङ्गासागर की ओर ले जाते हों।

रघु जिन-जिन राजाओं को जीत लेते थे, उन्हें पुनः वहीं का राजा बना देते थे। जिस प्रकार धान का बीज उखाड़कर पुनः रोप देने पर अधिक फल देते हैं वैसे उन राजाओं ने उन्हें अधिक उपायन दिया। इस प्रकार रघु का मार्ग भलीभाँति निष्कण्टक होता गया।

पूर्वी राजाओं को जीतते हुए जब रघु ताल के वनों से सुशोभित समुद्री तट पर पहुँचे तब सुह्म देश के राजा ने युद्ध के बिना ही वैतसी वृत्ति का आश्रय कर उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। वहाँ से आगे बढ़कर रघु ने नौका-साधनवाले बंगाली राजाओं को जीतने के बाद गङ्गासागर के द्वीपों में अपना जयस्तम्भ गाड़ दिया। पुनः हाथियों का पुल बनाकर कपिशा नदी को पार कर