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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

Page 24 of 735

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देख सेनासहित रघु किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये। इतने में ही वशिष्ठजी को कामधेनु गौ नन्दिनी दिखाई पड़ी, जिसका प्रभाव उन्होंने पहले ही सुन रखा था। तत्काल उसके मूत्र को अपनी आंखों में लगाकर देखा कि इन्द्र घोड़े को चुराकर ले जा रहे हैं। यह दृश्य देखते ही रघु ने इन्द्र को ललकारते हुए कहा—देवराज ! आप यज्ञों के रक्षक होकर स्वयं ऐसा करेंगे, तो यज्ञ कैसे हो सकेगा ? तब इन्द्र ने कहा—राजकुमार ! तेरा कहना सत्य है, फिर भी तुम्हारे पिता दिलीप सौवां अश्वमेध यज्ञ पूरा कर मेरा यश मिटा देना चाहते हैं, क्योंकि मैं ही एकमात्र शतक्रतु ( सौ यज्ञ पूरा करने वाला ) हूँ दूसरा कोई नहीं, इसलिए मैंने इस घोड़े का अपहरण कर लिया है, तुम लौट जाओ, नहीं तो राजा सगर की सन्तानों की तरह तुम्हारी भी दशा होगी।

इस पर रघु ने कहा—यदि आपका यही निश्चय है, तो अस्त्र उठाइए, मुझे बिना जीते आप घोड़े को नहीं ले जा सकते हैं। यह कहते हुए रघु ने इन्द्र की छाती पर एक बाण मारा। इन्द्र ने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर एक बाण रघु की छाती में ऐसा मारा कि रुधिर की धारा बहने लगी। इस प्रकार दोनों में भयङ्कर युद्ध होने लगा। अन्त में रघु ने इन्द्र के रथ की ध्वजा को काट गिराया, जिससे अपना अत्यन्त अपमान समझकर इन्द्र ने अति क्रोध में आकर रघु को मार डालने के निमित्त अपने अमोघ अस्त्र वज्र का प्रहार किया, किन्तु जरा-सी मूर्च्छा का अनुभव कर रघु उठकर पुनः खड़े हो गये। इस प्रकार रघु को घोर महायुद्ध में अचल देखकर उनकी वीरता पर इन्द्र प्रसन्न हो गये और बोले—युवराज ! पर्वतों की पांख काटनेवाले मेरे. इस अमोघ वज्र के प्रहार को तुम्हारे अतिरिक्त आज तक किसी ने नहीं सहा है। तुम्हारे इस साहस एवं वीरता को देखकर मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। इस घोड़े को छोड़कर जो चाहो मांग लो।

यह सुनकर रघु ने कहा—देवराज ! यदि आप घोड़े को नहीं देना चाहते हैं, तो निरन्तर यज्ञ करनेवाले मेरे पूज्य पिताजी, इस आरब्ध सौवें अश्वमेध यज्ञ के पूर्ण फल को प्राप्त करें और शिवजी के अंश होने के कारण अत्यन्त दुरासद, सम्प्रति यज्ञशाला में विराजमान मेरे पिताजी इस हम लोगों के समाचार को आपके दूत के द्वारा ही जिस प्रकार सुन सकें आप कृपया वैसा ही प्रबन्ध कर दें। इन्द्र ने रघु की इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और अपने सारथी मातलि के साथ जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से अपनी नगरी