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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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इन्द्रपुरी की ओर प्रस्थान किया। इधर युवराज रघु भी विजयी होने पर भी घोड़े के न प्राप्त होने के कारण विशेष प्रसन्न न होते हुए राजा दिलीप के यज्ञ-मण्डप की ओर लौट पड़े।

रघु और इन्द्र के वृत्तान्त को राजा दिलीप इन्द्रदूत के मुख से पहले ही सुनकर परम प्रसन्न हो चुके थे। अतः रघु के आने पर इन्द्र के वज्र के आर्द्र घाव से चिह्नित शरीर पर हर्ष से शिथिल हाथ को धीरे-धीरे फेरते हुए उन्होंने उसका अभिनन्दन किया। इस प्रकार दिलीप ने ९९ अश्वमेध यज्ञ कर जीवन-लीला के बाद स्वर्ग जाने के लिए ९९ सीढ़ियों की पंक्ति बनाकर अपने युवक पुत्र रघु को राज्य देकर वानप्रस्थाश्रम में रहकर तपस्या करने के लिए तपोवन में प्रस्थान कर दिया, क्योंकि इक्ष्वाकु कुल के राजाओं का यही कुल-नियम था।

चतुर्थ सर्ग

महाराज रघु अपने पिता राजा दिलीप द्वारा दिये गये अयोध्या के राज्य सिंहासन को प्राप्त कर उस प्रकार अधिक सुशोभित हुए जिस प्रकार सन्ध्या के समय भगवान् भास्कर के द्वारा निहित तेज को पाकर पावक अधिक तेजस्वी हो जाता है। प्रजाओं ने रघु के अभ्युदय से प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिनन्दन किया। उस समय नीतिविशारद मन्त्रियों ने रघु के समक्ष धर्मपक्ष एवं अधर्म-पक्ष दोनों ही रखे, किन्तु रघु ने सद्धर्म को ही स्वीकार किया। अतः रघु ने न्याय से प्रजापालन करते हुए पराक्रम से शत्रुओं को भी अपने वश में कर लिया।

रघु को सिंहासनासीन देखकर लक्ष्मी अदृश्य रूप से तथा सरस्वती समय-समय पर बन्दियों के स्तुतिगान से उनकी सेवा करने लगी। यद्यपि मनु आदि राजाओं ने पहले पृथ्वी का उपभोग कर लिया था, फिर भी रघु को पाकर पृथ्वी अनुप भुक्ता सुन्दरी के समान उनमें अनुरक्त हो गयी। जिस प्रकार मनुष्य आम का फल पाकर उसकी बौर की प्रतीक्षा नहीं रखता है उसी प्रकार प्रजाएँ रघु के गुणों से सन्तुष्ट होकर राजा दिलीप को भूलने लग गयीं। समस्त राज्य अभिनव आनन्द का अनुभव करने लगा। प्रजावर्ग में अनुराग उत्पन्न करने के कारण रघु वास्तविक रूप से राजा कहे जाने लगे। रघु के नये राजा होने पर सारी वस्तुएँ नवीन सी दिखाई देने लगीं।

राज्यासन प्राप्त करने के बाद रघु ने अपने राज्य में शान्ति स्थापित की, शरद्ऋतु का आगमन इस प्रकार हुआ मानो कमलधारिणी साक्षात् लक्ष्मी आ