रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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साहित्यजगत के समालोचक शेक्सपियर को अन्तर्जगत का तथा कालिदास को बाह्यजगत का कलाकार कवि कहते हैं। प्रकृति के मनोरम चित्रण में कालिदास अद्वितीय हैं। इनके प्रकृतिचित्रण रमणीयता, भव्यता, सजीवता तथा स्वाभाविकता से ओत-प्रोत हैं।
प्रकृति के साथ कालिदास की अपूर्व सहानुभूति है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन जैसा इन्होंने किया है वैसा संस्कृत जगत् का कोई अन्य कवि नहीं कर पाया है। इन्होंने प्रकृति के अनुपम दृश्यों का सच्चा चित्र खींचा है। ये कोमल रूप के उपासक हैं, भवभूति के समान उग्र रूप में इनका प्रेम नहीं है। ये प्रायः शान्त तपोवन, नदीतट, उपवन, प्रासाद, भ्रमर, मृग तथा कोकिल आदि के वर्णन करने में अपना सौभाग्य समझते हैं। इन्हें विन्ध्याचल पर्वत की अपेक्षा हिमालय से अधिक प्रेम है। इन्होंने अपने कुमार-सम्भव में हिमालय का सजीव वर्णन किया है। इन्हें ६ ऋतुओं में ग्रीष्म और बसन्तऋतु बहुत प्रिय हैं।
जहाँ पाश्चात्य कवियों के प्रकृतिवर्णन नग्न होते हैं वहाँ भारतीय कवियों का प्रकृति-वर्णन अलंकृत होता है। पाश्चात्य कवि बिना किसी आवरण के प्रकृति को उसके असली रूप में उपस्थित कर देते हैं, परन्तु भारतीय कवि प्रकृति को मनोरम मुग्धकारी विविध आभूषणों से सुसज्जित कर पाठकों के समक्ष उपस्थित करते हैं। महाकवि कालिदास में इस अलंकृत वर्णनशैली की ही निपुणता है। इतना ही नहीं इनके प्रकृति-वर्णन में वैज्ञानिक ज्ञान का पर्याप्त परिचय मिलता है।
रघुवंश के नवम सर्ग में वायु से हिलाई गई लता को लक्ष्य कर वसन्त ऋतु का कैसा मनोरञ्जक वर्णन है—
श्रुतिसुखभ्रमरस्वनगीतयः कुसुमकोमलदन्तरुचो बभुः।
उपवनान्तलताः पवनाहतैः किसलयैः सलयैरिव पाणिभिः ॥
स्त्री और पुरुषों के विविध मनोभावों का इन्हें पूर्ण ज्ञान है; उसे व्यक्त करने के लिए इन्होंने अभिधाशक्ति का प्रयोग न कर व्यंजनाशक्ति से ही काम लिया है। इससे इनकी कविता में और भी चमत्कार आ जाता है।
जब अङ्गिरा ऋषि हिमालय के पास आकर कहने लगे कि अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान् सदाशिव के साथ कर दीजिए। उस समय पार्वती का वर्णन करते हुए अन्तर्जगत के पारखी कालिदास कहते हैं कि—अङ्गिरा ऋषि के इस प्रकार कहते समय अपने पिता हिमालय के पास खड़ी हुई पार्वती लज्जावश मुँह नीचे करके हाथ में लिए लीलाकमल के पत्तों को गिनने लगीं—
एवं वादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी।
लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ॥
इस श्लोक में कवि ने लज्जा शब्द का प्रयोग नहीं किया है; किन्तु लज्जा के उद्भव होने पर पार्वती ने जो कार्य किया है, उसी का वर्णन किया है, वही कार्य हृदयगत लज्जाभाव को व्यक्त कर देता है।