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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

Page 12 of 735

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Page 12

( ५ )

उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं त्रयोऽप्येकैकतोऽधिकाः ॥

कालिदास की उपमाएँ एक से एक बढ़कर हैं। उन्होंने नई-नई उपमाओं की उद्भावना की है। इनकी उपमाओं के विशेष चमत्कार का कारण यह है कि प्रायः इनकी उपमाएँ अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् दोनों से ली गई हैं। इन्होंने उपमाओं में उपमान तथा उपमेय के वचन और लिंग तक का भी विचार किया है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर में उपस्थित राजाओं की दशा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिम्बरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥

इस श्लोक में इन्दुमती की उपमा स्त्रीवाची दीपशिखा शब्द से दी गई है। और राजा की उपमा पुंलिङ्ग अट्ट शब्द से दी गई है। लिंग की समता के साथ-साथ वचन की समता भी दर्शनीय है।

रघुवंश के द्वितीय सर्ग में जब दिलीप वसिष्ठजी की लाल नन्दिनी को चराकर लौटते हैं तो सुदक्षिणा उनकी प्रतीक्षा करती हुई स्वागत करने के लिए खड़ी हैं, दोनों के बीच में नन्दिनी की शोभा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या ॥

यहाँ राजा की उपमा दिन से, सुदक्षिणा की उपमा रात्रि से और लाल नन्दिनी की उपमा लाल सन्ध्या से दी गई है। और भी देखिए—

शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डुना ।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥

शरीर की दुर्बलता के कारण कुछ ही आभूषण पहनी हुई उस सुदक्षिणा की लोध्रपुष्प सदृश पीले मुख से ऐसी शोभा हुई जैसे प्रातःकाल टिमटिमाते हुए ताराओं से युक्त रात की शोभा पीले वर्ण के चन्द्रमा से होती है। यह भाव व्यक्त करने के लिए कवि ने लोध्रपाण्डु मुख से चन्द्रमा की एवं एकाध तारा युक्त प्रभातकल्पशर्वरी से सुदक्षिणा की उपमा देते हुए कितने सुन्दर ढङ्ग से पूर्णोपमा व्यक्त की है। इस प्रकार कालिदास की कविता में स्थल-स्थल पर अनूठी उपमा का चमत्कार मिलता है। इनकी उपमाओं में स्वाभाविकता का उत्कर्ष है जिससे पाठक का हृदय सहसा चमत्कृत हो उठता है।

कालिदास का समय

संस्कृतसाहित्य जगत् के देदीप्यमान मणि कविवर कालिदास के समय के सम्बन्ध में विद्वानों का महान् मतभेद है, क्योंकि कालिदास ने तो अपने सम्बन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है। विभिन्न विद्वानों ने आन्तरिक एवं बाह्य प्रमाणों के आधार पर कालिदास का अस्तित्व