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रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

by महाकवि कालिदास

Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)

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DevanagariHindipublished735 pages

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पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, छन्दों में मन्दाक्रान्ता, अलङ्कारों में उपमा, रसों में शृङ्गार और ऋतुओं में वसन्त कालिदास को परम प्रिय थे।

संस्कृत साहित्य के लक्षणकार आचार्यों ने गौडी, पाञ्चाली, वैदर्भी और लाटी नाम की चार रीतियाँ तथा माधुर्य, ओज और प्रसाद ये ३ गुण माने हैं। गौडी रीति में बड़े-बड़े समास तथा पाञ्चाली में छोटे-छोटे समास होते हैं। वैदर्भी रीति में समास प्रायः नहीं के बराबर होते हैं। गौडी में ओज गुण, पाञ्चाली में माधुर्य गुण और वैदर्भी में प्रसाद गुण की प्रधानता होती है।

कालिदास की कविता वैदर्भी रीति और प्रसाद गुण से ओतप्रोत है। प्रसाद गुण के प्राधान्य होने के कारण कालिदास की कविता शीघ्र ही समझ में आ जाती है।

कालिदास का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। इनकी भाषा व्याकरण से परिष्कृत सरल, सरस एवं सुबोध होती है। ये—'च, तु, हि, वै, किल, खलु' आदि का प्रयोग केवल पाद की पूर्ति के लिए नहीं करते हैं; किन्तु उनका जहाँ प्रयोग करते हैं वहाँ वे सार्थक होते हैं। इनके शब्द नपे-तुले होते हैं और इनके वाक्यों में क्रियापद प्रायः स्पष्ट होते हैं। ये किसी बात को घुमा-फिरा कर कहने की अपेक्षा सीधे कह देना अधिक पसन्द करते हैं। थोड़े शब्दों में अधिक अर्थ व्यक्त करने की प्रवृत्ति इनमें विशेष रूप से दीख पड़ती है।

जैसे भिन्न-भिन्न वर्गों के उच्चारण के लिए भिन्न-भिन्न कण्ठ-ताल्वादि के आघातों के भेद हैं और भिन्न-भिन्न वर्ण, भिन्न-भिन्न रस, भाव एवं अलङ्कारों के व्यञ्जक हैं, वैसे ही विभिन्न रसों को व्यक्त करने के लिए विभिन्न छन्द भी हैं। शृङ्गार रस के व्यञ्जक वर्णों के द्वारा ही शृङ्गार रस की पुष्टि तथा वीर रस के व्यञ्जक वर्णों से वीर रस की पुष्टि हो सकती है, अन्य वर्णों से नहीं। अतः केवल शब्द-योजना ही काव्य में रस सिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है, उसके लिए छन्द की योजना भी अपेक्षित है। क्षेमेन्द्र ने अपने सुवृत्ततिलक में कहा है कि काव्य में रस तथा वर्णनीय वस्तु के अनुसार छन्दों का विनियोग करना चाहिए—

काव्ये रसानुसारेण वर्णनानुगुणेन च।
कुर्वीतसर्ववृत्तानां विनियोगं विभाववित् ॥

कालिदास का छन्द-विषयक ज्ञान भी गम्भीर और पूर्ण है। उन्होंने अपने काव्यों में प्रायः सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्दों का चुनाव रस और वर्ण्य-वस्तु के अनुकूल ही करते हैं। कालिदास मन्दाक्रान्ता छन्द के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं। इन्होंने अपने खण्डकाव्य मेघदूत को केवल मन्दाक्रान्ता छन्द में ही लिखा है—

सुवशा कालिदासस्य मन्दाक्रान्ता प्रवल्गति ।
सदश्वस्य दमस्येव कम्बोजतुरगाङ्गना ॥

प्रत्येक कवियों में किसी न किसी विषय की खास विशेषता रहती है। कविवर कालिदास उपमा अलंकार के आचार्य माने जाते हैं। तत्तव कवियों की विशेषता व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने बहुत ही ठीक कहा है—