रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
by महाकवि कालिदास
Source: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (origin)
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बैठी हो। राजा दिलीप तथा उनकी धर्मपत्नी मगधराजकुमारी सुदक्षिणा ने श्रद्धापूर्वक चरण स्पर्श कर उन्हें वन्दना की और गुरु तथा गुरुपत्नी ने बड़े प्रेम से आशीर्वाद देकर उनका सत्कार किया। बाद महर्षि ने उस राजर्षि से पूछा कि आपके राज्य में सब कुशल तो है न ? तब उत्तर में उन्होंने कहा—आपकी कृपा से राज्य में राजा, मन्त्री, मित्र, राजकोष, राज्य, दुर्ग और सेना ये सातों अंग भरपूर हैं। अग्नि जल, महामारी और अकाल मृत्यु इन दैवी आपत्तियों तथा चोर, डाकू, शत्रु आदि मानुषी आपत्तियों को दूर करने वाले तो आप बैठे ही हैं। आपके मन्त्रों के प्रभाव से मेरे राज्य में कोई कष्ट नहीं है। आपके ब्रह्मतेज के बल से मेरी प्रजा में कोई भी न तो अल्पायु है, न किसी को किसी प्रकार ईतियों या विपत्तियों का डर रहता है। जब आप स्वयं ब्रह्मा के पुत्र ही हमारे कुलगुरु होकर हमारे कल्याण की बातें सोचते हैं तो हमारा राज्य निर्विघ्न क्यों न रहे।
पर महाराज ! आपकी इस पुत्रवधू सुदक्षिणा को सन्ततिहीन देखकर सप्त-द्वीपा यह पृथ्वी मुझे अच्छी नहीं लगती। अब तो मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मेरे पीछे कोई मुझे पिण्ड देने वाला भी नहीं रह जायेगा। इसी दुःख से मेरे पितर मेरे दिये हुए श्राद्ध के अन्न को न खाकर रोने लगते हैं और सोचने लगते हैं कि मेरे पीछे इनको कौन तर्पण आदि करेगा। इसलिए प्रभो ! अब कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे पुत्ररत्न हो और मैं पितृऋण से मुक्त हो जाऊँ क्योंकि इक्ष्वाकुवंशी राजाओं की सभी कठिनाइयाँ आपकी कृपा से सदा दूर हो जाती रही हैं। राजा की बात सुनकर वसिष्ठजी ने आँखें बन्द कर क्षणभर के लिए योगबल से ध्यान लगाकर सन्तति-निरोध का रहस्य जानकर राजा से कहा—राजन् ! एक बार जब तुम देवासुर-संग्राम में इन्द्र की सहायता कर पृथ्वी को लौट रहे थे तब मार्ग में कल्पवृक्ष की छाया में कामधेनु बैठी हुई थी। उस समय तुम्हारी धर्मपत्नी इस सुदक्षिणा ने रजस्वला होने पर स्नान किया था। उसके पास पहुँचने की त्वरा के कारण तुमने कामधेनु की ओर ध्यान नहीं दिया। उस समय तुमने उसकी प्रदक्षिणा न कर गलती कर दी। अतः उसने क्रुद्ध होकर शाप दे दिया कि जब तक तुम मेरी सन्तति की सेवा न करोगे तब तक तुम्हें पुत्र नहीं होगा। उस समय बड़े-बड़े मतवाले दिग्गज आकाशगंगा में खेलते हुए चिग्घाड़ कर रहे थे, इसलिए उस शाप को न तो तुम ही सुन सके, न तुम्हारा सारथि ही।