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सर्वकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 918 में से

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पृष्ठ 216
१३२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) पिण्डक्वाथधूमसहमविरागि योगानुविधायि च। चन्दनागरुवच्च तेषां गुणाः।
(२) कान्तनावकं प्रैयकं चोत्तरपर्वतकं चर्म। कान्तनावकं मयूर-ग्रीवाभम्। प्रैयकं नीलं पीतं श्वेतं लेखाविन्दुचित्रम्। तदुभयमष्टाङ्गुला-यामम्।
(३) बिसी महाबिसी च द्वादशग्रामीये। अव्यक्तरूपा दुहिलिका चित्र वा बिसी। परुषा श्वेतप्राया महाबिसी। द्वादशाङ्गुलायाममुभयम्।
(४) श्यामिका कालिका कदली चन्द्रोत्तरा शाकुला चारोहजाः। कपिला बिन्दुचित्रा वा श्यामिका। कालिका कपिला कपोतवर्णा वा। तदुभयमष्टाङ्गुलायाम। परुषा कदली हस्तायता। सैव चन्द्रचित्रा चन्द्रो-त्तरा। कदलीत्रिभागा शाकुला कोठमण्डलचित्रा कृतकर्णिकाजिनचित्रा चेति।


(१) तैलपर्णिक, भद्रश्रीय और कालेयक, इन तीनों में पीसने पर, पकाने पर, आग में जलाने पर किसी प्रकार का विकार पैदा न होना, दूसरी वस्तु के साथ मिलाने पर तथा देर तक रखे रहने पर उनकी गन्ध में किसी प्रकार का फर्क न आना, ये गुण पाये जाते हैं। पूर्वोक्त चन्दनों में जो गुण बताये गए हैं, वे भी इन तीनों में पाये जाते हैं।

(२) फल्गु पदार्थों में पहिला स्थान चमड़े का है, जिसकी लगभग पन्द्रह जातियाँ होती है, १. कान्तनावक और २. प्रैयक दोनों का चमड़ा हिमालय में पैदा होता है। उनमें कान्तनावक मयूरग्रीवा का कान्ति वाला और प्रैयक नीले-पीले तथा सफेद रेखाओं अथवा दागों से युक्त होता है। इन दोनों का विस्तार आठ अंगुल होता है।

(३) हिमालय में स्थित म्लेच्छों के बारह गावों में ३. बिसी और ४. महा-बिसी नामक चमड़ा पैदा होता है। बिसी बहुरङ्ग, बालों वाला एवं चितकबरा, और महाबिसी कठोर तथा श्वेत होता है। इन दोनों का विस्तार बारह-बारह अंगुल होता है।

(४) हिमालय के आरोह नामक स्थान में पैदा होने वाला चमड़ा पाँच प्रकार का होता है : ५. श्यामिका, ६. कालिका ७, कदली ८ चन्दोत्तरा और ९. शाकुला। कपिल और चितकबरे रङ्ग का चमड़ा श्यामिका है। कपिल अथवा कबूतरी रङ्ग का चमड़ा कालिका कहलाता है। इन दोनों का विस्तार आठ-आठ अंगुल होता है। कदली नामक चमड़ा कठोर तथा खुरदुरा होता है, जिसकी लम्बाई एक हाथ मानी गई है। कदली नामक चमड़े पर यदि चन्द्रबिन्दु अंकित हों तो वह चन्द्रोत्तरा कह-लाता है। रङ्ग में ये दोनों कालिका के समान होते हैं। कदली से तीन गुणा बढ़ा