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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages
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अर्थ- अपनी बहुत भलाई चाहें तो पिता भाई पति और देवर भी (वस्त्रालंकारादि से) इनका पूजन (सत्कार) करें।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्सु न पूज्यन्ते सर्वासन्नाऽफलाः क्रियाः॥

मनु ३/५६

अर्थ- क्योंकि जिस कुल में स्त्रियाँ पूजी जाती हैं, वही देवता रमते हैं और जहाँ इनका पूजन सत्कार नहीं होता, वही सम्पूर्ण कर्म (यज्ञादि) निरर्थक हैं।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कूलम्।

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्थते तद्धि सर्वदा॥

मनु ३/५७

अर्थ- जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखित हो शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है, जहाँ ये शोक नहीं करतीं, वह कुल सर्वदा बढ़ता है।

स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।

तस्यां त्वरोचमानायां सर्वं मेव न रोचते॥

मनु ३/६२

अर्थ- स्त्री (वस्त्राभूषणादि से) शोभित हो तो सम्पूर्ण कुल की शोभा है और उसके मलीन होने से सम्पूर्ण कुल मलीन रहता है।

सन्तुष्टो भायाया भर्ता भर्ता तथैव च।

यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणां तत्रैव ध्रुवम्॥

मनु ३/६०

अर्थ- जिस कुल में नित्य स्त्री से पति और पति से स्त्री प्रसन्न रहती है। उस कुल में निश्चय कल्याण होता है।

यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रभोदयेत्।

अप्रभोदात् पुनः पुंसः प्रजनं प्रवर्तते॥

मनु ३/६२

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रखे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होकर सन्तान नहीं होती और यदि होती है तो दुष्ट होती है।

स्त्री पुरुष का मन से, वचन से और कर्म से कभी भी अपमानित न करे, इसी प्रकार पुरुष भी स्त्री का मन, वचन और कर्म से अपमानित न करे।

अनतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्यतिः।

सुखस्य नित्य दातेह परलोकं च योषितः॥

मनु ५/१५३

अर्थ- मन्त्र संस्कार (विवाह) करने वाला पति ऋतु और अनुतु में सुख देने वाला है, उसकी सेवा से यहाँ और परलोक में भी सुख प्राप्त होता है।

न दानैः शुध्यते नारी नोपवासशत्रैरपि।

न तीर्थं सेवया तद्भ्यदतुः पादोदकैर्यथा॥

चाणक्य नीति १७/१०

अर्थ- न दानों से, न सैकड़ों उपवासों से न तीर्थ के सेवन से, स्त्री वैसी शुद्ध होती है, जैसी स्वामी के चरण सेवा से अर्थात् पति सेवा से।

अशीलः कामवृत्ता वा गुणैर्वा परिर्वजितः।

उपचर्यः स्त्रिया साध्या सतत देववत्पतिः॥

मनु ५/१५४

अर्थ- पति शील रहित कामी तथा विद्यादि गुणों से हीन भी हो तथापित अच्छी स्त्री को देववत् आराधन योग्य है।

नास्ति स्त्रीणां पृथयज्ञो न व्रत नाप्यपोषिताम्।

पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गं महीयते॥

मनु ५/१५५

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- स्त्रियों का अलग कोई यज्ञ नहीं, न व्रत न उपवास केवल एक पति की शुश्रूषा से स्वर्ग में पूज्य हो जाती है।

पाणिग्रहस्थ साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा।

पतिलोकम भीष्मन्ती नाचरेतिकञ्चदप्रियम्॥

मनु ५/१५६

अर्थ- पति की इच्छा करने वाली स्त्री जीवित या मृत पति को अप्रिय कोई कर्म न करे।

जिस समय श्री रामचन्द्र जी बन जा रहे थे उस समय उनकी माता कौशिल्या ने भी साथ बन चलने को कहा उस समय यह उपदेश रामचन्द्र जी ने अपनी माता को दिया था।

भर्तृः किल परित्राया नृशंसः केवलं स्त्रियाः।

स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विग्रहितः॥

वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड २०/१२

अर्थ- स्त्री के लिये पति का त्याग करना बड़ा निन्दित कर्म है, वह निन्दित कर्म आपको मन में भी नहीं लाना चाहिये।

यावज्जीवति काकृत्यस्थः पिता मे जगतीपतिः।

शुश्रूषा क्रियतां तावत्स हि धर्मः सनातनः॥

बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/१३

अर्थ- जब तक मेरे पिता जीवित हैं तब तक आप उनकी सेवा करती रहें, यही प्राचीन धर्म है।

जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता देवतं प्रभुरेव च॥

बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२१

अर्थ- स्त्री के जीते जी उसका पति ही उसका देवता और स्वामी है।

ब्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥

भर्तारं नानुवर्तत सातु पापगतिर्भवतु।

भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमृतम्॥

बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२५, २६

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- कोई स्त्री कितनी श्रेष्ठ हो और चाहे नाना प्रकार के व्रत एवं उपवास करती हो, किन्तु यदि वह अपने पति की सेवा करती हुई उसकी अनुयायिनी नहीं होती तो वह नरक में जाती है। पति की सेवा से स्त्री उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करती है।

अपि या निर्गमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।

शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥

वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२७

अर्थ- वह चाहे किसी पूज्य को नमस्कार भी न करे और चाहे किसी देवता की पूजा तक भी न करे। अपने पति के प्रिय तथा हितकारी कार्य में तत्पर स्त्री स्वामी की सेवा ही करती रहे।

एषधर्मः पुरा दृष्टो लोके वेदे श्रुतः स्मृतः।

अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः॥

वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२८

अर्थ- स्त्रियों का यही धर्म प्राचीन काल से चला आ रहा है। यही वेद विहित है और यही लोक में प्रचलित है। हे माता जी! आप यहाँ मन लगा कर अग्निहोत्रादि, विद्वान् तथा व्रतशील ब्राह्मणों की सेवा करती रहें।

एक सन्यासी जंगल में तप कर रहे थे। एक दिन उनके ऊपर चिड़िया ने बीट कर दी सन्यासी ने क्रोधित हो चिड़िया की ओर देखा, देखते ही चिड़िया भस्म होकर भूमि पर गिर पड़ी। सन्यासी ने समझा कि अब मेरा तप पूर्ण हो गया। वह जब नगर में भिक्षा मांगने गये तो एक गृह पर जाकर भिक्षा माँगी, अन्दर से स्त्री ने कहा अभी आती है, कुछ देर बाद सन्यासी ने पुनः पुकारा तो अन्दर से ध्वनि आई अभी आती है, जब अन्दर से कोई नहीं आया तो सन्यासी ने पुनः पुकारा और अन्दर से ध्वनि आई, आती है, तत्काल एक स्त्री अन्दर से आटा लेकर आई, सन्यासी ने क्रोध की दृष्टि से स्त्री को देखा। स्त्री सन्यासी को क्रोधित देखकर कहने लगी, महाराज मैं वन की चिड़िया नहीं

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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हूँ जो भस्म हो जाऊँ। सन््यासी ने चकित होकर स्त्री से पूछा, देवी तुम्हें कौन-सी शक्ति प्राप्त है जिससे तुमने यह जान लिया कि मैंने वन में चिड़िया को भस्म किया था। स्त्री ने कहा महाराज यह शक्ति मुझे पति सेवा से प्राप्त हुई है। जब आपने भिक्षा माँगी थी उस समय मैं अपने पति की सेवा कर रही थी, जब सेवा से निवृत्त हुई तभी आपके लिए आटा लाई हूँ।

महाभारत

पति यानाभिचरति मनो वाग्देहसंयता।
सामर्तूलोकमाप्नोति सधिदः साध्वीतिचोच्यते॥

मनु ५/१६५

अर्थ- मन वाणी देह से जो पति को दुःख नहीं देती वह पति लोक को प्राप्त होती है और अच्छे पुरुष उसको साध्वी कहते हैं।

पुरुषों को पर स्त्री गमन नहीं करना चाहिए और स्त्रियों को पर पुरुष गमन नहीं करना चाहिए। क्योंकि इस कर्म के करने से स्त्री पुरुष दोनों को ही इस पाप कर्म का फल भोगना होता है।

न ही दूशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते।

यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्॥

मनु ४/१३४

अर्थ- इस प्रकार का आयुक्षय करने वाला संसार में दूसरा कोई कर्म नहीं है (जैसा मनुष्य की आयु घटाने वाला) दूसरे की स्त्री का सेवन है।

परदारान् गच्छेच्च मनसापि कथञ्चन।

किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवधानिम्॥

विष्णु पुराण ३/१२/१२३

अर्थ- पर स्त्री से तो वाणी से क्या मन से भी प्रसंग न करे, क्योंकि उनसे मैथुन करने वालों को अस्थि बन्धन भी नहीं होता अर्थात् उन्हें अस्थि शून्य कीटादि होना पड़ता है।

इस लिये स्त्रियों पतिव्रता और पुरुष पत्नीव्रत धर्म का पालन करें।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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साभार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता।
सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

षाणव्य नीति ४/१३

अर्थ- भार्या वही है जो पवित्र और चतुर हो, भार्या वही है जो पतिव्रता है, भार्या वही है जो पति से प्रीति रखती है भार्या वही है जो सत्य बोलती है।

पिता रक्षति कोमारे भर्ता रक्षति यौवन।

रक्षन्ति स्थिरिरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥

मनु १/३

अर्थ- बाल्याऽवस्था में पिता रक्षा करता है। यौवन में पति रक्षा करता है। बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करते हैं। स्त्री स्वातन्त्रता के योग्य नहीं।

तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ।

यथा नाभिचरेतां तौ विमुक्वावितरेतरम्॥

मनु १/१०२

अर्थ- विवाह वाले स्त्री पुरुषों को सदा ऐसा यत्न करना चाहिये जिसमें कभी आपस में जुदाई न हो।

आदर्श नारी के छः रूप

परामर्श में है मन्त्री सी, सेवा में नित दासी है।

भोजन में है माता सम, शयन-समय रंभा-सी है॥

धर्म-कर्म में सदा सगिनी, रोष-सहिष्णु धरा-सी है।

छः आदर्श गुणों से शोभित नारि पुण्य की राशि है॥

अधिकोश देखा गया है विवाह से पूर्व माता पुत्र में प्रेम, स्नेह बना होता है और विवाह के पश्चात् यह बात नहीं रहती। कहीं माता रुष्ट होती है कहीं पुत्र। विवाह से पूर्व पुत्र का पूरा प्रेम माता पर ही रहता है। विवाह के पश्चात् वह प्रेम अपनी पत्नी की ओर स्वभावता खिंचकर माता की ओर से कम हो जाता है।

इच्छानुसार सन्तान

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यह प्राकृतिक बात है। परन्तु मातायें उसको यह समझ बैठती हैं कि वह ने घर में आते ही लड़के को भड़का कर मुझसे बोलना कम करा दिया। बस यहीं सास वह, माता पुत्र के बीच अज्ञानता के कारण वैमनस्य की दीवार खड़ी हो जाती है। जब माता वह को, चेत कर बुरा भला कहती है तो पुत्र समझता है कि माता को हमारे प्रेम से चिढ़ है और माता सोचती है वह ने पुत्र को मेरे विरुद्ध कर दिया। परन्तु ना तो माता दाम्पत्य प्रेम से चिढ़ती है और न वह पुत्र को माता के विरुद्ध करती है। यह दोनों की अज्ञानता का कारण है।

“प्रेम विकसित नहीं सीमित है।”

जो प्रेम विवाह से पूर्व माता-पिता भाई बहिनों आदि में विभक्त रहता है वही प्रेम विवाह के पश्चात् सब ओर से खिंचकर पत्नी में केन्द्रित होने लगता है। यही कारण है कि विवाह के पश्चात् माता-पिता आदि से प्रेम का कुछ अंश में कम हो जाना।

स्त्री प्रेम की प्रतिमा है वह प्रेम चाहती है। चाहे वह प्रेम माता का हो, सास का हो, पुत्र का हो या पति का हो। चूड़्यावस्था में माता को पुत्र के प्रेम की आशा होती है यदि वह उस प्रेम को कम करके विवाह के पश्चात् पत्नी को दे देता है तो उससे माता को स्वाभाविक ठेस पहुँचोगी। परन्तु वह माता यह नहीं सोचती कि यदि पुत्र ने अपने प्रेम का मेरा अंश कम करके अपनी पत्नी को दे दिया तो क्या हो गया। क्या वह अपने माता-पिता के भाग का प्रेम का अंश मुझे नहीं देगी? वह अपने माता-पिता का प्रेम सास ससुर को देती है और यदि पुत्र वधू को सास का भी प्रेम प्राप्त हो जाय तो उसके हृदय में जितना सास का प्रेम स्थान ले चुका है उतना कम स्थान पति का प्रेम लेगा। क्यों?

“जिस प्रकार प्रेम सीमित है उसी प्रकार प्रेम का स्थान भी सीमित है।”

फिर पुत्र का बचा हुआ प्रेम पुनः माता की ओर खिंचेगा

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और माता पुत्र के प्रेम को पुनः प्राप्त करेगी।

यह मनोवैज्ञानिक बात है यदि इस पर पूर्ण विवेचना के साथ मनन किया जाय तो माता पुत्र, सास बहु का क्लेश समाप्त होकर सुख और शान्ति का जीवन व्यतीत होने लगे। माता को पुत्र वधू पर अपने प्रेम द्वारा इतना प्रभाव डालना चाहिये कि वह सास को अपनी माता ही समझने लगे। बालक माता से ही अपनी सारी व्यथा कह सकता है अन्य से नहीं। इसलिये पुत्र वधू और अपनी पुत्री को माता एक ही समान समझे।

सास भली, निज कन्या-पुत्र वधू को करती है सम प्यार।
सास-बुरी, कर वधू अनाहत, करती कन्या का सत्कार।।

यं माता पितरौ क्लेश सहेते सम्भवे नृणाम्।।
न तस्यनिष्कृतिःशक्या कर्तुं वर्षशतैरपि।।

मनु २/२२७

अर्थ- मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन में जो क्लेश माता पिता सहते हैं उस क्लेश का बदला सौ वर्ष में भी नहीं हो सकता।

तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।

तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते।।

मनु २/२२८

अर्थ- माता-पिता और गुरु का सर्व कार्य में नित्य प्रिय करे। इन तीनों की ही प्रसन्नता होने पर सम्पूर्ण तप पूरा होता है।

यावत्त्रयस्ते जीवेषुस्तावन्नानांन्यं समाचदेत।

तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात्प्रियहिते रतः।।

मनु २/२३५

अर्थ- इस कारण उनकी प्रीति और हित में परायण होता हुआ जब तक वे जीवें तब तक चाहे और कुछ न करे, किन्तु उनकी नित्य शुश्रूषा करे।

इच्छानुसार सन्तान

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आकाशशास्त्रविज्ञो

बालवृद्धकृशातुरा।

प्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्राःस्वकान्तुः॥

मनु ४/१८४

अर्थ- बालक, वृद्ध, कृश, आतुर ये आकाश के स्वामी (निराधार) हैं और ज्येष्ठ प्राता पिता के तुल्य है। भार्या और पुत्र अपने शरीर के तुल्य हैं। इससे विवाद करना उचित नहीं।

देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्च यः।

न निर्वपति पञ्चानामुक्छवसन्न स जीवति।

मनु ३/७२

अर्थ- देवता, अतिथि, भृत्य, माता-पिता आदि और आत्मा इन पाँचों को अन्न न दे तो जीता हुआ भी मरे के तुल्य है।

देवता का अन्न यज्ञ और वलिवैश्य अर्थात् यज्ञ करना और अन्न की दस आहुति देना। अतिथि सत्कार, माता-पिता की शुश्रूषा और भोजन से सत्कार करना, आत्मा का भोजन अन्न तथा वेदादि धर्म ग्रन्थों का स्वाध्याय करना है।

पितेव पालयेत्पुत्रान्न्येष्टो प्रातुन् यवीयसः।

पुत्रवच्चापिवर्तैर्न ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः॥

मनु ९/१०८

अर्थ- ज्येष्ठ प्राता छोटे भाइयों का पिता पुत्र के समान पालन करे और छोटे भाई भी बड़े भाई को धर्म से पिता के समान मानें।

लालयेत् पञ्च वर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।

प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥

षाणवयनीति ३/१८

अर्थ- पुत्र को पाँच वर्ष की आयु तक प्यार करे, फिर दस वर्ष तक ताड़ना करे अर्थात् १५ वर्ष तक और सोलहवर्षे वर्ष की प्राप्ति होने पर उसके साथ मित्र के समान आचरण करे।

हृच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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लालनाद् पहवदोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रव्य शिष्यव्य ताडयेन्न तु लालयेत्॥

चाणक्य नीति २/१२

अर्थ- लाड़ करने से बहुत दोष होते हैं और ताड़ना देने से बहुत गुण, इसलिए पुत्र और शिष्य को ताड़ना देता रहे, लाड़ न करे।

अति प्रत्येक कार्य में हानिप्रद होती है। बच्चों को अति प्यार करना अर्थात् स्नेह के कारण उन्होंने जो भी कार्य उचित अनुचित किया उससे कुछ न कहा, या अति क्रोध अर्थात् बच्चों ने कोई किञ्चित भी कार्य नहीं किया या बिगाड़ दिया तो उसे अति दण्ड दिया। यह दोनों ही बातें बच्चों को बिगाड़ देती हैं। परन्तु बिगाड़ ही नहीं देतीं वरन् इस कारण बच्चे अपने हाथों से भी निकल जाते हैं। इसलिए बच्चों को समयानुसार प्यार और ताड़ना दोनों ही करने चाहिये। जिसका व्यवहार क्रम चाणक्य ने कहा है।

पुत्र औ पुत्रियां में कोई भेद माता-पिता को नहीं रखना चाहिए दोनों के साथ समान व्यवहार करना उचित है। वे दोनों ही आत्मज हैं।

माता भली, पुत्र-कन्या का पालन करती एक समान।

माता बुरी, डांटती कन्या को, सुत का करती सम्मान॥

गाय अपने बच्चे को कितनी ममता प्यार से पालती है। वह अपना दूध पिलाकर उसे प्रसन्न देखना चाहती है, जब बच्चा कहीं चला जाता है तो गाय डकरा डकरा कर उसे पुकारती है। हालाँकि मनुष्य शरीर में स्त्री भी इसी प्रकार बच्चे का पोषण करती है परन्तु अन्तर इतना ही है कि वह गाय निस्वार्थ बच्चे का पोषण करती है। वह यह विचार कर बच्चे को नहीं पालती कि जब बड़ा हो जायगा तो वह मेरे लिए जंगल से हरी-हरी घास लाकर देगा या मुझे ठण्डा जल लाकर पिलायेगा, मेरी सेवा करेगा वह

इच्छानुसार सन्तान

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यह कुछ नहीं चाहती परन्तु अपने सब कार्य पहले की भाँति वैसे ही स्वयं करती रहती है। परन्तु मनुष्य स्वार्थ के साथ बच्चे का पोषण करते हैं, कि वह हमारी बुढ़ापे में सेवा करेगा और जब वह सेवा नहीं करता तो दुःख होता है। क्यों! क्योंकि स्वार्थ पूर्ण पोषण किया गया था। परन्तु गाय को कभी इस बात का कष्ट नहीं होता, क्योंकि वह निःस्वार्थ बच्चे को पालती है इसी प्रकार हम मनुष्यों को गाय से शिक्षा लेनी चाहिए कि हम अपनी सन्तान का निःस्वार्थ भाव से पोषण करें और जब बालक योग्य हो जाये तो उससे अपनी सेवा न लेकर स्वयं वानप्रस्थ आश्रम में चले जायें।

अभिवादन शीलस्य नित्य वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुविद्यायशोबलं॥

मनु २।२२२

अर्थ- जो प्रतिदिन वृद्धों की सेवा करता है और अभिवादन (नमस्ते) करने के स्वभाव वाला है, उसकी चार वस्तु बढ़ती हैं। आयु, विद्या यश और बल।

मात्रा स्वस्वा दुहित्रा वा विवकासनोभवैत्।

बल वानिन्द्रयग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥

मनु २।२२५

अर्थ- माँ या बहिन या लड़की के साथ एकान्त स्थान में न बैठे, क्योंकि अति बलवान् इन्द्रियों का गुण विद्वान् पुरुष को भी खींच सकता है।

सुवासिनी कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीः स्त्रियः।

अतिथिभ्योऽग्रवैतान्मोजयेद विचारयन्॥

मनु ३।१२४

अर्थ- सुवासिनी (जिनका अभी विवाह हुआ हो) कुमारी, रोगी व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री इनको अतिथि के पहले ही बिना विचार भोजन करा देवे।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सदा प्रहृष्टया भाव्यां गृहकार्येषु दक्षया।
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥

मनु ५/१५०

अर्थ- सर्वदा प्रसन्न चित्त और घर के कामों में चतुर तथा घर के बर्तन भीड़े ठीक रखे और व्यय करने में स्त्री सर्वदा हाथ सिकोड़े रहे।

यत्कर्म कुर्वातोऽस्य स्यात्परितोषोन्तरात्मनः।

तत्प्रयत्ने कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्॥ मनु ४/१६१

अर्थ- जिस कर्म के करने से कर्म करने वाले पुरुष का अन्तरात्मा प्रसन्न हो, वे कर्म यत्न पूर्वक करे और इसके विपरीत कर्मों को छोड़ दे।

धन धान्य प्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च।

आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥

षाणक्य नीति ७/२

अर्थ- धन धान्य के व्यापार में, विद्या के संग्रह करने में और आहार व्यवहार में जो पुरुष संकोच न करेगा, वही सुखी होगा।

संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने।

त्रिषु चैध न कर्त्तव्योऽध्ययने जपदानयोः॥

षाणक्य नीति ७/४

अर्थ- अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में सदैव सन्तोष करना चाहिये, परन्तु अध्ययन (पढ़ना) जप और दान इन तीनों में कभी सन्तोष न करना चाहिए।

पादाभ्याम् न स्पृशेदग्निं गुरु ब्राह्मणमेव च।

नैव गां न कुमारी च न वृद्धं न शिशुं तथा॥

षाणक्य नीति ७/६

अर्थ-अग्नि, गुरु और ब्राह्मण इनको पैर से कभी नहीं छूना चाहिए, और न गौ को, न कुमारी को, न वृद्ध को और न बालक को ही।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वां पश्य वनस्थलीम्।

छिद्यन्ते सरलास्तत्रकृष्णस्तिष्ठन्ति पादपाः॥

चाणक्य नीति ७/१२

अर्थ- अत्यन्त सीधे स्वभाव का नहीं होना चाहिए वन में जाकर देखो, वहाँ सीधे वृक्ष काट डाले जाते हैं, और टेढ़े खड़े रहते हैं।

वित्तं देहि गुणान्विते षु मतिमन्वान्यत्र देहि कृचित्।

प्राप्तं वारिनिधेर्जलं धनमुखे माधुर्ययुक्तं सदा॥

जीवान्स्थावर जगमांश्च सकलान्सञ्जीव्य भूमण्डलं।

भूयः पश्य तदेव कोटिगुणित गच्छेत् मम्प्यनिधिम्॥

चाणक्य नीति ८/४

अर्थ- हे मतिमान्! गुणियों को धन दो, अन्यत्र कहाँ भी न दो क्योंकि समुद्र का जल बादल के मुख में प्राप्त होकर सदा मीठा हो जाता है। देखो वही जल भूमण्डल के सब चराचर जीवों को जिलाकर फिर कोटि गुणा होकर उसी समुद्र में चला जाता है।

यत्किंचिदपि दातव्यं याचितेनाऽनुसूयया ।

उत्पश्यते हि तत्प्राप्तं यत्तारयति सर्वतः॥

मनु ४/२२८

अर्थ- दोष न लगाकर कोई अपने से कुछ माँगो तो यथा शक्ति कुछ न कुछ देवे ही, क्योंकि देने वाले को वह पात्र भी कभी मिल जावेगा जो कि सबसे तार देगा।

अपने अथवा अपनी सन्तान के जीवन को इतना अधिक महंगा न बनाओ, जिसकी पूर्ति के लिये अनीति से धन अर्जित करने को बाध्य होना पड़े।

अन्यायोपासितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।

प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति॥

चाणक्य १५/६

इच्छानुसार सन्तान

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अर्थ- अनीति से अर्जित धन दस वर्ष पर्यन्त ठहरता है, और ग्यारहवें वर्ष के प्राप्त होने पर मूल सहित नष्ट हो जाता है। अर्थात् अन्याय का धन थोड़े ही दिन रहता है।

बिना श्रम किये कुछ भी खाना महान पाप है।

बिना श्रम अथवा बिना मूल्य की मिली खीर से अपने श्रम का रूखा - सूखा टुकड़ा अति श्रेष्ठ है।

अनावश्यक वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा रखना पाप है।

द्वारम्भसि निवेष्ट व्योगले वृद्धा दृढां शिलाम्।

धनवन्त मदातारम् दरिद्रव्या तपस्विनम्॥

बिदुर

अर्थ- दो व्यक्तियों को गले में भारी शिला बाँध कर पानी में डुबो देना चाहिये। १- जो धनवान होकर दानी नहीं है। २- जो गरीब होकर तपस्वी अर्थात् दुःख सहन करने की सामर्थ्य नहीं रखता और पुरुषार्थी भी नहीं।

नमस्या मो देवान् ननु हत विधेस्तेऽपि वशगा,

विधि वन्धीः सोऽपि किं प्रति नियत कर्मैक फलदः।

फलं कार्यायत यदि किं म मरैः किं च विधिना,

न मस्तु कर्मभ्यो विधि-रपिन मेभ्यः प्रभवति॥

भर्तहरि

अर्थ- हम देवताओं को नमन क्यों करें। किन्तु वह भी कठोर विधि के हाथ में हैं। तो विधि को वन्दना करनी चाहिये, किन्तु विधि भी हमारे नियत कर्म के अनुसार फल देती है। यदि फल कर्मों के अधीन है तो फिर क्या देवताओं से क्या विधि से प्रयोजन, इस लिये हम इन कर्मों को ही नमन करते हैं जिन पर विधि का कोई प्रभाव नहीं है अर्थात् कर्म स्वतन्त्र है।

एकं हन्यानवां हन्यात् इषुर्मुक्तो धनुष्यता।

बुद्धि बुद्धिमतोत्सृष्टा राष्ट्रं हन्यात्स राजकम्।

इच्छानुसार सन्तान

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सन्तति निरोध

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अर्थ- धनुषारी से चलाया गया वाण एक को भी मारे या न मारे। किन्तु बुद्धिमान से बुद्धि में चुक करने पर बुद्धि राजा के साथ राष्ट्र को भी ध्वस्त कर देती है।

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।

लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्॥

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा।

न्यायात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥

भर्तृहरि नीति शतक ८५

अर्थ- नीति में पारंगत चाहे प्रशंसा करे या निन्दा, धन अपने पास आये या जाय, आज मरे या कल्यान्त में, परन्तु धीर पुरुष न्याय के मार्ग से एक पग भी विचलित नहीं होते।

वृत्तं यत्नैन संरक्षेत, वितभायति याति च।

अक्षीणो वित्ततः क्षीणः, वृत्ततस्तु हतो हतः॥

अर्थ- चरित्र को यत्न से रक्षित करना चाहिये, द्रव्य आता है और जाता है। धन से रहित व्यक्ति क्षीण नहीं होता, चरित्र से हीन व्यक्ति नष्ट हो जाता है।

शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्।

लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजते॥

महाभारत

अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़ कर स्नान करना चाहिये। लाख काम छोड़ कर दान और करोड़ों कार्यों को त्याग कर प्रभु भजन अर्थात् सन्ध्योपासनादि यज्ञकर्म करना।

एकेन तत् समर्ज्यैव, द्वाभ्यां शत गुणं भवेत्।

त्रीभिः शत सहस्रं च, अनन्तं तज्जनैः सह॥

व्याघ्रपाद स्मृति

अर्थ- जो अकेला बैठ कर उपासना करता है उसे एक का फल मिलता है, जो दो मिलकर उपासना करते हैं उन्हें सौ

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गुना फल मिलता है, जो तीन मिलकर उपासना करते हैं उन्हें हजार गुना फल मिलता है, और जो इससे अधिक मिलकर उपासना करते हैं उनको अनन्त फल मिलता है।

गोलडसटकर साहब पैरिस अर्थात् फ्रांस देश निवासी अपनी (वायविल इन इण्डिया) में लिखते हैं । सब विद्या और भलाई का भण्डार आर्यावर्त देश है। और विद्या तथा मत इस देश से फैले हैं। और परमात्मा की प्रार्थना करते हैं कि हे परमेश्वर ! जैसी उन्नति आर्यावर्त देश की पूर्व काल में थी वैसीही हमारे देश की कीजिये।

जो उन्नति करना चाहो तो 'आर्य समाज' के साथ मिलकर उसके उद्देश्यानुसार आचरण करना स्वीकार कीजिये नहीं तो कुछ हाथ न लगेगा। क्योंकि हम और आपको अति उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे भी होगा, उसकी उन्नति तन, मन, धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें। इसलिये जैसा आर्य समाज आर्यवर्त देश की उन्नति का कारण है वैसा दूसरा नहीं हो सकता।

सत्यार्थ प्रकाश एकादशसमुल्लास
सब प्रकार से अपनी उन्नति करना चाहो तो आर्य समाज के सत्संगों में अवश्य जाया करो।

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इच्छानुसार सन्तान

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सन्तति निरोध

वर्तमान समय में कई कारणों से सन्तति निरोध का प्रश्न छिड़ा हुआ है। जो कुछ अंशों में आवश्यक भी जान पड़ता है। मैं इससे पूर्व यह स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ कि यह सन्तति निरोध किस आयु में और कितनी सन्तानों के पश्चात् करना उचित है।

एक दम्पति को अधिक से अधिक ३५ या ४० वर्ष की आयु तक ही सन्तान उत्पन्न करनी चाहिये और अधिक से अधिक ३ बच्चे जिसमें २ पुत्र और एक पुत्री।

आप प्रश्न करेंगे कि, ४० वर्ष की ही आयु तक क्यों सन्तान को जन्म दें, और आगे को क्यों नहीं?

इसका उत्तर यह है कि आज संसार में जो मनोवृत्ति, भाई-भाई, तथा भाई-बहिन के मध्य चल रही है। उस दृष्टि से ३५ या ४० वर्ष तक ही सन्तान को जन्म देना उचित है। हर मनुष्य की प्रवृत्ति होती है कि जब मैं धनोपार्जन करता हूँ तो उससे मैं क्यों ना सुख उठाऊँ? वह यह नहीं चाहता कि यदि उसका पिता मर गया है और उसके २ या ३ और छोटे भाई हैं तो वह अपनी आय से माता तथा भाइयों का पोषण करे। हीं करते भी हैं, परन्तु वह सौ में से १,२ इसलिये कम से कम सन्तान, और कम आयु हीं में सन्तान को जन्म दें, ताकि वह अपने ही सामने पढ़ लिखकर सब के सब अपने पैरों पर खड़े हो सकें, ताकि किसी का भार किसी पर न पड़ सके। मान लीजिये आपने अन्तिम बच्चे को ४० वर्ष की आयु में जन्म दिया और आप

इच्छानुसार सन्तान

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आश्रम व्यवस्था में पूर्ण आस्था रखते हैं। तो आप ५५ वर्ष की आयु में वानप्रस्थ लेंगे तो उस समय आपका सबसे छोटा बच्चा १५ वर्ष का होगा, जो हर प्रकार अपने को संभाल सकता है और यदि कहीं आपने ४८ या ५० वर्ष की आयु में किसी बच्चे को जन्म दिया तो आप स्वयं ही समझ लें कि उस बच्चे की क्या दशा होगी। मेरे स्वयं देखने में आया है कि पुरुषों ने ६५ वर्ष की आयु में कन्या को जन्म दिया और जन्म देने के पश्चात् उनका स्वास्थ्य इतना थक गया कि वह धनोपार्जन नहीं कर सकते। यह उनका उस कन्या के प्रति अन्याय नहीं तो और क्या है। ६६ वर्ष के आप हैं कन्या १ वर्ष की है वह किसके आसरे पलेगी, कौन उसे शिक्षा दिलायेगा और कौन उसका विवाह करेगा। आज पुत्र सर्विस कर रहा है और आपको भी कुछ धन दे रहा है, यदि कल को उसके भी २,३ बच्चे हो गये तो वह आपको देगा या अपने परिवार का पोषण करेगा। उस समय आप सोचेंगे कि मैंने काम के वशीभूत होकर यह क्या किया। इसीलिये सन्तान को ४० वर्ष की आयु के पश्चात् कभी जन्म न दें।

आज जो सन्तति निरोध का प्रश्न उठा है वह भारत की निर्धनता, अन्न की कमी या भूमि की कमी के कारण नहीं परन्तु इन इन्द्रियों में लिप्त कामी, विषयी पुरुषों के कारण उठा है। जब भारतवर्ष में सन्तति के सम्बन्ध में पूरा ध्यान रखा जाता था उस समय दस मास बच्चे के गर्भ में रहने के, दस मास बच्चे के दूध पीने के और दस मास स्त्री को अपना स्वास्थ्य ठीक करने के लिये छोड़ते थे अर्थात् २१। वर्ष के पश्चात् जब स्त्री पुरुष पुष्ट होते थे तो दूसरी सन्तान के लिए समागम करते थे।

जो वीर्य २१। वर्ष तक शरीर के मध्य समस्त इन्द्रियों द्वारा तप्त होकर कूटनमय बन जाता था, तब उस वीर्य से जो सन्तान होती थी वह भी अनुपम होती थी।

इच्छानुसार सन्तान

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सन्तति निरोध के लिये ३५ वर्ष की आयु के पश्चात् ही उपाय करना चाहिए। परन्तु आजकल इसका उलटा हो रहा है। और इस कृत्रिम सन्तति निरोध ने व्यभिचार को इतना बढ़ा दिया है कि जिसकी सीमा नहीं रही।

महात्मा गांधी ने एक लेख में लिखा था—

“इन कृत्रिम साधनों से ऐसे-ऐसे कुपरिणाम आये हैं, जिनसे लोग बहुत कम परिचित हैं। स्कूली लड़के और लड़कियों के गुप्त व्यभिचार ने क्या तूफान मचाया है, यह मैं जानता हूँ। मैं जानता हूँ, स्कूलों में कालिजों में ऐसी अविवाहिता जवान लड़कियाँ भी हैं जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ कृत्रिम सन्तति निग्रह का साहित्य और मासिक पत्र बड़े चाव से पढ़ती रहती हैं और कृत्रिम साधनों को अपने पास रखती हैं। इन साधनों को विवाहित स्त्रियों तक ही सीमित रखना असम्भव है और विवाह की पवित्रता तो तभी लोप हो जाती है जब कि उसके स्वभाविक परिणाम सन्तानोत्पत्ति को छोड़ कर महज अपनी पाशविक विषय वासना की पूर्ति ही उसका सबसे बड़ा उपयोग मान लिया जाता है।”

इससे यह सिद्ध हो जाता है कि मनुष्यों के हृदय में कृत्रिम सन्तति निग्रह के इस आन्दोलन से पवित्रता के स्थान पर किस प्रकार निम्न कोर्ट की कामुकता का आधिपत्य हो रहा है और किस प्रकार हमारे अपरिपक्व मति बालक और बालिकायें इसके शिकार होकर अपना सर्वनाश कर रहे हैं।

सन्तति निरोध का सबसे बढ़िया साधन एक मात्र इन्द्रिय संयम है।

हम पिछले पृष्ठों में लिख आये हैं कि स्त्री के मासिक धर्म से १६ दिन तक ही समागम करने पर गर्भ स्थित हो सकता है, इसके पश्चात् नहीं, इसलिये मासिक धर्म के दिन से १८ दिन तक स्त्री समागम न करे। और अन्त में मासिक धर्म प्रारम्भ होने

इच्छानुसार सन्तान

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से २ दिन पूर्व भी रति न करे। ऐसा करने से उस मास में गर्भ स्थित नहीं होगा।

आपके समक्ष कुछ अभूतपूर्व एवं नवीनतम अनुसन्धानात्मक प्राकृतिक गर्भ निरोधक साधनों पर प्रकाश डालते हैं, जो अत्यन्त उपयोगी, सुलभ एवं वान्छित फल के दाता हैं, साथ में स्वास्थ्य पर किञ्चित मात्र भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं होने देते अपितु आंशिक रूप से ब्रह्मचर्य के पथ पर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध हैं।

प्रथम साधन- हमने अपने पूर्व के साहित्य में अंकित किया है कि स्वर्गों की साधना द्वारा अपनी इच्छा के अनुरूप पुत्र एवं पुत्री को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि शरीर के साथ-साथ वीर्य पर भी स्वर्गों का सीधा प्रभाव पड़ता है।

आप सभी जानते हैं कि बिजली को उपयोग में लाने के लिए दो प्रकार के तारों का प्रयोग होता है। 'निगेटिव और पोजिटिव' एक गर्म तार और दूसरा ठण्डा तार। प्रकाश करने अथवा बिजली के यन्त्र को क्रिया में लाने के लिये इन दोनों ही तारों का प्रयोग होता है। यह असम्भव है कि दोनों तार गर्म हों और प्रकाश हो जाये। इसी प्रकार दोनों तार ठण्डे होने पर भी प्रकाश नहीं हो सकेगा। प्रकाश तो तभी होगा जब एक तार गर्म और दूसरा तार ठण्डा हो।

चुम्बक पत्थर (मैग्नेट) के दो ध्रुव होते हैं। पहला उत्तरी ध्रुव दूसरा दक्षिणी ध्रुव। आप दो चुम्बक पत्थर ले लीजिए, इन दोनों के उत्तरी ध्रुवों को आपस में मिलायें आप देखेंगे की दोनों आपस में मिलने की अपेक्षा दूर भागते हैं। इसी प्रकार दोनों के दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने पर भी दूर भागेंगे। यह दोनों आपस में तब मिलेंगे जब एक के उत्तरी ध्रुव और दूसरे के दक्षिणी ध्रुव को मिलाया जाय तब आप देखेंगे कि वह पीछे भागने की अपेक्षा आपस में दौड़कर मिलेंगे।

इच्छानुसार सन्तान

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