इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)
Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)
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Read in contextअर्थ- धनुषारी से चलाया गया वाण एक को भी मारे या न मारे। किन्तु बुद्धिमान से बुद्धि में चुक करने पर बुद्धि राजा के साथ राष्ट्र को भी ध्वस्त कर देती है।
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु।
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्॥
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा।
न्यायात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥
भर्तृहरि नीति शतक ८५
अर्थ- नीति में पारंगत चाहे प्रशंसा करे या निन्दा, धन अपने पास आये या जाय, आज मरे या कल्यान्त में, परन्तु धीर पुरुष न्याय के मार्ग से एक पग भी विचलित नहीं होते।
वृत्तं यत्नैन संरक्षेत, वितभायति याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणः, वृत्ततस्तु हतो हतः॥
अर्थ- चरित्र को यत्न से रक्षित करना चाहिये, द्रव्य आता है और जाता है। धन से रहित व्यक्ति क्षीण नहीं होता, चरित्र से हीन व्यक्ति नष्ट हो जाता है।
शतं विहाय भोक्तव्यं, सहस्रं स्नान माचरेत्।
लक्षं विहाय दातव्यं, कोटिं त्यक्त्वा हरि भजते॥
महाभारत
अर्थ- सौ काम छोड़कर भोजन करना, हजार काम छोड़ कर स्नान करना चाहिये। लाख काम छोड़ कर दान और करोड़ों कार्यों को त्याग कर प्रभु भजन अर्थात् सन्ध्योपासनादि यज्ञकर्म करना।
एकेन तत् समर्ज्यैव, द्वाभ्यां शत गुणं भवेत्।
त्रीभिः शत सहस्रं च, अनन्तं तज्जनैः सह॥
व्याघ्रपाद स्मृति
अर्थ- जो अकेला बैठ कर उपासना करता है उसे एक का फल मिलता है, जो दो मिलकर उपासना करते हैं उन्हें सौ
इच्छानुसार सन्तान
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वीरेन्द्र गुप्तः
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