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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

Hitopadesha (with Hindi Translation)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

कथा ९

१३२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १२३-
कथा ९
[ सिंह और बूढे गीदड़की कहानी ९ ]
‘अस्ति मन्दरनाम्नि पर्वते दुर्दान्तो नाम सिंहः । स च सर्वदा
पशूनां वधं कुर्वन्नास्ते । ततः सर्वैः पशुभिर्मिलित्वा स सिंहो
विज्ञप्तः—‘मृगेन्द्र ! किमर्थमेकदा बहुपशुघातः क्रियते ? यदि
प्रसादो भवति तदा वयमेव भवदाहाराय प्रत्यहमेकैकं पशुमुप-
ढौकयामः ।’ ततः सिंहेनोक्तम्—‘यद्येतदभिमतं भवतां तर्हि
भवतु तत् । ततः प्रभृत्येकैकं पशुमुपकल्पितं भक्षयन्नास्ते । अथ
कदाचिद्वृद्धशशकस्य वारः समायातः ।
‘मन्दर नाम पर्वत पर दुर्दान्त नाम एक सिंह रहता था और वह सदा
पशुओंका वध करता रहता था. तब सब पशुओंने मिल कर उस सिंहसे बिनति
की ‘सिंह ! एकसाथ बहुतसे पशुओंकी क्यों हत्या करते हो ? जो प्रसन्न हो तो
हमही तुम्हारे भोजनके लिये नित्य एक एक पशुको भिजवा दिया करेंगे ।’
फिर सिंहने कहा—‘जो यह तुमको इष्ट है तो योंही सही.’ उस दिनसे निश्चित
किये हुए एक एक पशुको खाया करता था । फिर एक दिन एक बूढ़े शशक
( खरगोश-) की बारी आई.
सोऽचिन्तयत्—
‘त्रासहेतोर्विनीतिस्तु क्रियते जीविताशया ।
पञ्चत्वं चेद्गमिष्यामि किं सिंहानुनयेन मे ? ॥ १२३ ॥
वह सोचने लगा—‘जीनेकी आशासे भयके कारणकी अर्थात् मारने वालेकी
विनय की जाती है और जब मरनाही ठहरा, फिर मुझे सिंहकी बिनतीसे क्या
काम है ? ॥ १२३ ॥
तन्मन्दं मन्दं गच्छामि ।' ततः सिंहोऽपि क्षुधापीडितः कोपात्त-
मुवाच—‘कुतस्त्वं विलम्ब्य समागतोऽसि ?’ । शशकोऽब्रवीत्—
‘देव ! नाहमपराधी । आगच्छन्पथि सिंहान्तरेण बलाद्धृतः ।
तस्याग्रे पुनरागमनाय शपथं कृत्वा स्वामिनं निवेदयितु-
मत्रागतोऽस्मि ।’ सिंहः सकोपमाह—‘सत्वरं गत्वा दुरात्मानं
दर्शय, क्व स दुरात्मा तिष्ठति ? ।’ ततः शशकस्तं गृहीत्वा

-१२३ ] छोटेसे शशककी युक्तिसे बलिष्ठ सिंहकी मृत्यु १३३
गभीरकूपं दर्शयितुं गतः। तत्रागत्य 'स्वयमेव पश्यतु स्वामी'
इत्युक्त्वा तस्मिन्कूपजले तस्य सिंहस्यैव प्रतिबिम्बं दर्शितवान् ,
ततोऽसौ क्रोधाध्मातो दर्पात्तस्योपर्यात्मानं निक्षिप्य पञ्चत्वं
गतः। अतोऽहं ब्रवीमि- "बुद्धिर्यस्य" इत्यादि' ॥ वायस्याह-
'श्रुतं मया सर्वम्। संप्रति यथा कर्तव्यं तद्ब्रूहि ।' वायसोऽ-
वदत् - 'अत्रासन्ने सरसि राजपुत्रः प्रत्यहमागत्य स्नाति ।
स्नानसमये तदङ्गादवतारितं तीर्थशिलानिहितं कनकसूत्रं चञ्च्वा
विधृत्यानीयास्मिन्कोटरे धारयिष्यसि ।' अथ कदाचित्स्नातुं
जलं प्रविष्टे राजपुत्रे वायस्या तदनुष्ठितम् । अथ कनक-
सूत्रानुसरणप्रवृत्तै राजपुरुषैस्तत्र तरुकोटरे कृष्णसर्पो दृष्टो
व्यापादितश्च । अतोऽहं ब्रवीमि- "उपायेन हि यच्छक्यम्"
इत्यादि ॥' करटको ब्रूते-'यद्येवं तर्हि गच्छ । शिवास्ते सन्तु
पन्थानः ।' ततो दमनकः पिङ्गलकसमीपं गत्वा प्रणम्योवाच-
'देव ! आत्ययिकं किमपि महाभयकारि कार्यं मन्यमानः समा-
गतोऽस्मि।
इसलिये धीरे धीरे चलता हूं. पीछे सिंहभी भूखके मारे झुंझला कर उससे
बोला-'तू किसलिये देर करके आया है ? शशक बोला-'महाराज ! मैं अपराधी
नहीं हूं, मार्गमें आते हुए मुझको दूसरे सिंहने बलसे पकड लिया था । उसके
सामने फिर लौट आनेकी सौगन्द खा कर स्वामीको जतानेके लिये यहां आया हूं.'
सिंह क्रोधयुक्त हो कर बोला-'शीघ्र चल कर दुष्टको दिखला कि वह दुष्ट कहां
बैठा है.' फिर शशक उसे साथ ले कर एक गहरा कुआ दिखलानेको ले गया ।
वहां पहुंच कर "स्वामी ! आपही देख लीजिये" यह कह कर उस कुएके जलमें
उसी सिंहकी परछांही दिखला दी. फिर वह क्रोधसे दहाड़ कर घमंडसे उसके
ऊपर अपनेको गिरा कर मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"जिसकी बुद्धि है"
इत्यादि ।' कागली बोली-'मैंने सब सुन लिया. अब जो करना है सो कहो ।'
फिर काग बोला-'यहां पासही सरोवरमें राजपुत्र नित्य आ कर स्नान करता है ।
स्नानके समय उसके अंगसे उतार कर घाट पर धरे हुए सोनेके हारको
चोंचसे पकड़ इस बिलेमें ला कर धर दीजियो ।' पीछे एक दिन राजपुत्रके
नहानेके लिये जलमें उतरने पर कागलीने वही किया. फिर सोनेके हारके पीछे

१३४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १२४-
ढूंढ खखोल करने वाले राजाके पुरुषोंने उस वृक्षके बिलमें काले सांपको देखा
और मार डाला. इसलिये मैं कहता हूं-“उपायसे जो हो सकता है” इत्यादि-’
करटक बोला-‘जो ऐसा है तो चले जाओ, तुम्हारे मार्ग कल्याणकारी हो ।’
पीछे दमनक पिंगलकके पास जा कर प्रणाम करके बोला-‘महाराज ! नाशकारी
और बड़े भयके करने वाले किसी कामको जान कर आया हूं.
यतः,—
आपद्युन्मार्गमने कार्यकालात्ययेषु च ।
कल्याणवचनं ब्रूयादपृष्टोऽपि हितो नरः ॥ १२४ ॥
क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्गसे जाने पर, कामका समय बीतनेमें हितकारी
मनुष्यको बिना पूछेभी कल्याणकारी बात कह देना चाहिये ॥ १२४ ॥
अन्यच्च,—
भोगस्य भाजनं राजा, न राजा कार्यभाजनम् ।
राजकार्यपरिध्वंसी मन्त्री दोषेण लिप्यते ॥ १२५ ॥
और दूसरे-राजा भोगका पात्र है अर्थात् सुख भोगनेके लिये है, कुछ काम
करनेके लिये नहीं है, राजाके कार्यको नाश करने ( बिगाडने ) वाला मंत्रीही
दोषभागी होता है ॥ १२५ ॥
तथा हि पश्य । अमात्यानामेष क्रमः,—
और देखो, मंत्रियोंकी यह रीति है,—
वरं प्राणपरित्यागः शिरसो वापि कर्तनम् ।
न तु स्वामिपदावाप्तिपातकेच्छोरुपेक्षणम्’ ॥ १२६ ॥
प्राणका त्याग और शिरका कट जानाभी अच्छा है परन्तु राजाको राज्य-
हरणरूपी पातक करने वालेको दंड न देना अच्छा नहीं है ॥ १२६ ॥
पिङ्गलकः सादरमाह—‘अथ भवान् किं वक्तुमिच्छति ?’। दम-
नको ब्रूते—‘देव ! संजीवकस्त्वोपर्यसदृशव्यवहारीव लक्ष्यते ।
तथा चास्मत्संनिधाने श्रीमद्देवपादानां शक्तित्रयनिन्दां कृत्वा
राज्यमेवाभिलषति ।’ एतच्छ्रुत्वा पिङ्गलकः सभयं साश्चर्यं मत्वा
तूष्णीं स्थितः । दमनकः पुनराह—‘देव ! सर्वामात्यपरित्यागं
कृत्वैक एवायं यत्त्वया सर्वाधिकारी कृतः स एव दोषः ।

-१२९ ] दमनकका धूर्ततायुक्त भाषण १३५
पिंगलकने आदरसे कहा-'तू क्या कहना चाहता है?' दमनकने कहा-'यह
संजीवक तुम्हारे ऊपर अयोग्य काम करने वाला-सा दीखता है और मेरे सामने
महाराजकी तीनों १शक्तियोंकी निन्दा करके राज्यकोही छीनना चाहता है ॥ यह
सुन कर पिंगलक भय और आश्चर्यसे मान कर चुप हो गया ॥ दमनक फिर
बोला-'महाराज ! सब मंत्रियोंको छोड़ कर एक इसीको जो तुमने सर्वाधिकारी
(सब कामका अधिकारी ) बना रक्खा है वही दोष है ॥
यतः,—
अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च
विष्टभ्य पादावुपतिष्ठते श्रीः ।
सा स्त्रीस्वभावादसहा भरस्य
तयोर्द्वयोरेकतरं जहाति ॥ १२७ ॥
क्योंकि—राजलक्ष्मी राजाके तथा मंत्रीके अधिक उन्नति पाने पर चरणोंमें
गिर कर (दोनोंकी) सेवा करती है और फिर स्त्रीके स्वभावसे उन दोनोंके भारको
नहीं सहन करती हुई दोनोंमेंसे एकको छोड़ देती है ॥ १२७ ॥
अपरं च,—
एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा
तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदालस्येन निर्भिद्यते ।
निर्भिन्नस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा
स्वातन्त्र्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणान्तिकं द्रुह्यति ॥१२८॥
और दूसरे-जब राजा राज्य पर एक मंत्रीको (सब कामका अधिकारी)
मुखिया कर देता है तब उसे अभिमानसे मद हो जाता है और मदान्धताके
आलस्यसे आपसमें फूट हो जाती है और फिर फूट होनेसे उसके हृदयमें
स्वतन्त्रताका अभिलाष होता है, अर्थात् सर्वश्रेष्ठ होना चाहता है, और फिर
स्वातन्त्र्यके लाभकी इच्छासे वह मंत्री राजाके प्राण लेने तक की शत्रुता करता
है ॥ १२८ ॥
अन्यच्च,—
विषदिग्धस्य भक्तस्य दन्तस्य चलितस्य च ।
अमात्यस्य च दुष्टस्य मूलादुद्धरणं सुखम् ॥ १२९ ॥
१ प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति और उत्साहशक्ति.

१३६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३०-
और-विषयुक्त अन्नको, हिलते हुए दांतको, और दुष्ट मंत्रीको जड़से उखाड
डालनाही सुख है ॥ १२९ ॥
किंच,-
यः कुर्यात्सचिवायत्तां श्रियं तद्व्यसने सति ।
सोऽन्धवज्जगतीपालः सीदेत् संचारकैर्विना ॥ १३० ॥
और जो राजा, लक्ष्मीको मंत्रीके आधीन कर देता है वह राजा उस
मन्त्रीके मरण आदि विपत्तिमें गिरने पर चलाने वालेके बिना, अंधेके समान दुःख
पाता है ॥ १३० ॥
सर्वकार्येषु स्वेच्छातः प्रवर्तते । तदत्र प्रमाणं स्वामी । एतच्च
जानाति ।
और सब कार्योंमें अपनी इच्छापूर्वक करता है, इसलिये इसमें स्वामी
प्रमाण हैं अर्थात् रुचे सो कीजिये, और आप यह जानते हैं—
न सोऽस्ति पुरुषो लोके यो न कामयते श्रियम् ।
परस्य युवतीं रम्यां सादरं नेक्षतेऽत्र कः ?' ॥ १३१ ॥
संसारमें ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीको न चाहता हो, पराई जवान
और सुन्दर स्त्रीको चावसे, कौन नहीं देखता है ? अर्थात् सब देखते हैं॥१३१॥
सिंहो विमृश्याह—'भद्र ! यद्यप्येवं तथापि संजीवक्रेन सह
मम महान् स्नेहः ।
सिंहने विचार कर कहा—'हे शुभचिंतक ! जो ऐसाभी है तोभी संजीवकके
साथ मेरा अत्यन्त स्नेह है ।
पश्य,—
कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः ।
अशेषदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः ? ॥ १३२ ॥
देख—बुराइयां करता हुआभी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे बहु-
तसे दोषोंसे दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है ? ॥ १३२ ॥
अन्यच्च,—
अप्रियाण्यपि कुर्वाणो यः प्रियः प्रिय एव सः ।
दग्धमन्दिरसारेऽपि कस्य वह्नावनादरः ?' ॥ १३३ ॥

-१३६ ] पुराने सेवकको छोड़ नयेको सत्कार अनुचित १३७
और दूसरे—अप्रिय करने वाला भी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे
सुन्दर मन्दिरको जलाने वाली भी अग्निमें किसका आदर नहीं होता है?' १३३
दमनकः पुनरेवाह—'देव ! स एवातिदोषः ।
दमनक फिरभी कहने लगा—'हे महाराज ! वही अधिक दोष है;
यतः,—
यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोहयति पार्थिवः ।
सुतेऽमात्येऽप्युदासीने स लक्ष्म्याश्रीयते जनः ॥ १३४ ॥
क्योंकि—पुत्र, मंत्री तथा साधारण मनुष्य इनमेंसे जिसके ऊपर राजा
अधिक दृष्टि करता है लक्ष्मी उसी पुरुषकी सेवा करती है ॥ १३४ ॥
शृणु देव !—
महाराज ! सुनिये,—
अप्रियस्यापि पथ्यस्य परिणामः सुखावहः ।
वक्ता श्रोता च यत्रास्ति रमन्ते तत्र संपदः ॥ १३५ ॥
अप्रियभी, हितकारी वस्तुका परिणाम अच्छा होता है, और जहां अच्छा
उपदेशक और अच्छे उपदेशका सुनने वाला हो वहां सब संपत्तियां रमण
करती हैं ॥ १३५ ॥
त्वया च मूलभूत्यानपास्यायमागन्तुकः पुरस्कृतः । एतच्चानु-
चितं कृतम् ।
और आपने पुराने सेवकोंको छोड़ कर इस नये आये हुएका सत्कार किया,
यहभी अनुचित किया.
यतः,—
मूलभूत्यान्परित्यज्य नागन्तून्प्रति मानयेत् ।
नातः परतरो दोषो राज्यभेदकरो यतः' ॥ १३६ ॥
क्योंकि—पुराने सेवकोंको छोड़ कर नये आये हुओंका सत्कार नहीं करना
चाहिये, क्योंकि इससे बढ़ कर कोई दोष राज्यमें फूट करने वाला नहीं है.’ १३६
सिंहो ब्रूते—'महदाश्चर्यम् । मया यदभयवाचं दत्त्वानीतः संव-
र्धितश्च । तत्कथं मह्यं द्रुह्यति ? ।'
सिंह बोला-'बड़ा आश्चर्य है ! मैं जिसे अभय वाचा दे कर लाया और उसको
बढ़ाया सो मुझसे क्यों वैर करता है ?'

१३८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३७-
दमनको ब्रूते—'देव !
दुर्जनो नार्जवं याति सेव्यमानोऽपि नित्यशः ।
स्वेदनाभ्यञ्जनोपायैः श्वपुच्छमिव नामितम् ॥ १३७ ॥
दमनक बोला-'महाराज ! जैसे मली गई और तैल आदि लगानेसे सीधी
करी गई कुत्तेकी पूंछ सीधी नहीं होती है वैसेही दुर्जन नित्य आदर करनेसेभी
सीधा नहीं होता है ॥ १३७ ॥
अपरं च,—
स्वेदितो मर्दितश्चैव रज्जुभिः परिवेष्टितः ।
मुक्तो द्वादशभिर्वर्षैः श्वपुच्छः प्रकृतिं गतः ॥ १३८ ॥
और दूसरे—तपाई गई, मली गई, डोरीसे लपेटी गई और बारह बरसके
बाद खोली गई कुत्तेकी पूंछ टेढ़ीही रहती है ॥ १३८ ॥
अन्यच्च,—
वर्धनं वाथ सन्मानं खलानां प्रीतये कुतः ? ।
फलन्त्यमृतसेकेऽपि न पथ्यानि विषद्रुमाः ॥ १३९ ॥
( और धन आदि दे कर ) बढ़ाना अथवा सन्मान करना दुष्टोंकी प्रसन्नताके
लिये कहां हो सकता है ? अर्थात् उपकार करने पर भी वे बुराईही करेंगे ! जैसे
विषके वृक्ष अमृतसे सीचनेसेभी मीठे फल नहीं देते हैं ॥ १३९ ॥
अतोऽहं ब्रवीमि—
अपृष्टोऽपि हितं ब्रूयाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ।
एष एव सतां धर्मो विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १४० ॥
इस लिये मैं कहता हूं कि-जिसके पराजयकी इच्छा न करे उसके बिना
पूछेभी हितकारक वचन कहना चाहिये, क्योंकि यही सज्जनोंका धर्म है और
इसके विपरीत अधर्म है ॥ १४० ॥
तथा चोक्तम्,—
स स्निग्धोऽकुशलान्निवारयति यस्तत्कर्म यन्निर्मलं
सा स्त्री याऽनुविधायिनी स मतिमान् यः सद्द्भिरभ्यर्च्यते ।
सा श्रीर्या न मदं करोति स सुखी यस्तृष्णया मुच्यते
तन्मित्रं यदकृत्रिमं स पुरुषो यः खिद्यते नेन्द्रियैः ॥ १४१ ॥

-१४४ ] गुण-दोषको जानकरही दंड देना १३९
जैसा कहा है कि-जो विपत्तिसे बचाता है वही स्नेही है, जो निर्मल अर्थात्
दोषरहित है वही कर्म है, जो (पतिकी) आज्ञामें चले वही स्त्री है, जिसका सज्जन
आदर करे वही बुद्धिमान् है, जो अहंकारको उत्पन्न न करे वही संपत्ति है, जो
तृष्णाके रहित है वही सुखी है, जो निष्कपट है वही मित्र है और जो इन्द्रियोंके
वशमें नहीं है वही पुरुष है ॥ १४१ ॥
यदि संजीवकव्यसनार्दितो विज्ञापितोऽपि स्वामी न निवर्तते
तदीदृशि भृत्ये न दोषः ।
और जो संजीवकके स्नेहमें फँसे हुए स्वामी जताने पर भी न मानें तो मुझसे
सेवक पर दोष नहीं है ॥
तथा च,—
नृपः कामासक्तो गणयति न कार्यं न च हितं
यथेष्टं स्वच्छन्दः प्रविचरति मत्तो गज इव ।
ततो मानध्मातः स पतति यदा शोकगहने
तदा भृत्ये दोषान्क्षिपति न निजं वेत्त्यविनयम्' ॥ १४२ ॥
और भी कहा है कि-भोगमें आसक्त राजा कार्यको और हितकारी वचनको
नहीं गिनता है और मत वाले हाथीकी तरह अपनी इच्छानुसार जो अच्छा
लगता है सो करता है; और फिर घमंडके मारे जब शोकमें अर्थात् भारी
आपत्तिमें गिरता है तब सेवक पर दोष पटकता है और अपने बुरे आचरणको
नहीं जानता है ॥ १४२ ॥
पिङ्गलकः ( स्वगतम् ),—
'न परस्यापराधेन परेषां दण्डमाचरेत् ।
आत्मनावगतं कृत्वा बध्नीयात्पूजयेच्च वा ॥ १४३ ॥
पिंगलक ( अपने मनमें सोचने लगा ) कि, 'किसीके बहकानेसे दूसरोंको दंड
न देना चाहिये परन्तु अपने आप जान कर उसे मारे या सन्मान करे ॥१४३॥
तथा चोक्तम्,—
गुणदोषावनिश्चित्य विधिर्न ग्रहनिग्रहे ।
स्वनाशाय यथा न्यस्तो दर्पात्सर्पमुखे करः’ ॥ १४४ ॥
जैसा कहा है कि-घमंडसे अपने नाशके लिये सर्पके मुखमें उंगली देनेके
समान गुण और दोषको बिना निश्चय करे आदर करनेकी अथवा दंड देनेकी
रीति नहीं है' ॥ १४४ ॥

१४० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १४५-
प्रकाशं ब्रूते—'तदा संजीवकः किं प्रत्यादिश्यताम् ?'। दमनकः
ससंभ्रममाह—'देव ! मा मैवम् । एतावता मन्त्रभेदो जायते ।
( प्रकट बोला ) तो संजीवकको क्या उपदेश करना चाहिये ?' दमनकने
घबरा कर कहा-'महाराज ! ऐसा नहीं; इससे गुप्त बात खुल जाती है ॥
तथा ह्युक्तम्,—
मन्त्रबीजमिदं गुप्तं रक्षणीयं यथा तथा ।
मनागपि न भिद्येत तद्भिन्नं न प्ररोहति ॥ १४५ ॥
औरभी कहा है—इस गुप्त मंत्ररूपी बीजकी जिस किसी प्रकारसे रक्षा करे
और थोड़ाभी न फूटने दे, क्योंकि वह फूटा हुआ नहीं उगता है, अर्थात् रहस्यको
गुप्त रक्खे; क्योंकि वह खोलनेसे सफल ( कार्य-साधक ) नहीं होता है ॥१४५॥
किंच,—
आदेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः ।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम् ॥ १४६ ॥
और लेना देना और करनेका काम ये शीघ्र नहीं किये जायँ तो इनका रस
समय पी लेता है, अर्थात् समय पर चूक जानेसे काम बिगाड़ जाता है ॥१४६॥
तदवश्यं समारब्धं महता प्रयत्नेन संपादनीयम् ।
इसलिये अवश्य आरंभ किये हुए कामको बड़े यत्नसे सिद्ध करना चाहिये.
किंच,—
मन्त्रो योध इवाधीरः सर्वाङ्गैः संवृतैरपि ।
चिरं न सहते स्थातुं परेभ्यो भेदशङ्कया ॥ १४७ ॥
क्योंकि,—जैसे कवच आदिसे ढंके हुए अंग वाला भी डरपोक योद्धा पराजयके
भयसे युद्धमें बहुत देर तक नहीं ठहर सकता है वैसेही उपाय आदि सब अंगोंसे
गुप्त विचार भी दूसरे शत्रुओंके भेदकी शंकासे बहुत काल तक गुप्त नहीं
रहता है, अर्थात् प्रकट हो जाता है, और रहस्यके खुल जाने पर कार्यहानि
होती है ॥ १४७ ॥
यद्यसौ दृष्टदोषोऽपि दोषान्निवर्त्य संधातव्यस्तदतीवानुचितम् ।
जो इसका दोष देख लेने पर भी दोषको दूर कर फिर मेल करना तो
औरभी अनुचित है;