हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १२४-
ढूंढ खखोल करने वाले राजाके पुरुषोंने उस वृक्षके बिलमें काले सांपको देखा
और मार डाला. इसलिये मैं कहता हूं-“उपायसे जो हो सकता है” इत्यादि-’
करटक बोला-‘जो ऐसा है तो चले जाओ, तुम्हारे मार्ग कल्याणकारी हो ।’
पीछे दमनक पिंगलकके पास जा कर प्रणाम करके बोला-‘महाराज ! नाशकारी
और बड़े भयके करने वाले किसी कामको जान कर आया हूं.
यतः,—
आपद्युन्मार्गमने कार्यकालात्ययेषु च ।
कल्याणवचनं ब्रूयादपृष्टोऽपि हितो नरः ॥ १२४ ॥
क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्गसे जाने पर, कामका समय बीतनेमें हितकारी
मनुष्यको बिना पूछेभी कल्याणकारी बात कह देना चाहिये ॥ १२४ ॥
अन्यच्च,—
भोगस्य भाजनं राजा, न राजा कार्यभाजनम् ।
राजकार्यपरिध्वंसी मन्त्री दोषेण लिप्यते ॥ १२५ ॥
और दूसरे-राजा भोगका पात्र है अर्थात् सुख भोगनेके लिये है, कुछ काम
करनेके लिये नहीं है, राजाके कार्यको नाश करने ( बिगाडने ) वाला मंत्रीही
दोषभागी होता है ॥ १२५ ॥
तथा हि पश्य । अमात्यानामेष क्रमः,—
और देखो, मंत्रियोंकी यह रीति है,—
वरं प्राणपरित्यागः शिरसो वापि कर्तनम् ।
न तु स्वामिपदावाप्तिपातकेच्छोरुपेक्षणम्’ ॥ १२६ ॥
प्राणका त्याग और शिरका कट जानाभी अच्छा है परन्तु राजाको राज्य-
हरणरूपी पातक करने वालेको दंड न देना अच्छा नहीं है ॥ १२६ ॥
पिङ्गलकः सादरमाह—‘अथ भवान् किं वक्तुमिच्छति ?’। दम-
नको ब्रूते—‘देव ! संजीवकस्त्वोपर्यसदृशव्यवहारीव लक्ष्यते ।
तथा चास्मत्संनिधाने श्रीमद्देवपादानां शक्तित्रयनिन्दां कृत्वा
राज्यमेवाभिलषति ।’ एतच्छ्रुत्वा पिङ्गलकः सभयं साश्चर्यं मत्वा
तूष्णीं स्थितः । दमनकः पुनराह—‘देव ! सर्वामात्यपरित्यागं
कृत्वैक एवायं यत्त्वया सर्वाधिकारी कृतः स एव दोषः ।