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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 302 में से

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पृष्ठ 158

१३८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३७-
दमनको ब्रूते—'देव !
दुर्जनो नार्जवं याति सेव्यमानोऽपि नित्यशः ।
स्वेदनाभ्यञ्जनोपायैः श्वपुच्छमिव नामितम् ॥ १३७ ॥
दमनक बोला-'महाराज ! जैसे मली गई और तैल आदि लगानेसे सीधी
करी गई कुत्तेकी पूंछ सीधी नहीं होती है वैसेही दुर्जन नित्य आदर करनेसेभी
सीधा नहीं होता है ॥ १३७ ॥
अपरं च,—
स्वेदितो मर्दितश्चैव रज्जुभिः परिवेष्टितः ।
मुक्तो द्वादशभिर्वर्षैः श्वपुच्छः प्रकृतिं गतः ॥ १३८ ॥
और दूसरे—तपाई गई, मली गई, डोरीसे लपेटी गई और बारह बरसके
बाद खोली गई कुत्तेकी पूंछ टेढ़ीही रहती है ॥ १३८ ॥
अन्यच्च,—
वर्धनं वाथ सन्मानं खलानां प्रीतये कुतः ? ।
फलन्त्यमृतसेकेऽपि न पथ्यानि विषद्रुमाः ॥ १३९ ॥
( और धन आदि दे कर ) बढ़ाना अथवा सन्मान करना दुष्टोंकी प्रसन्नताके
लिये कहां हो सकता है ? अर्थात् उपकार करने पर भी वे बुराईही करेंगे ! जैसे
विषके वृक्ष अमृतसे सीचनेसेभी मीठे फल नहीं देते हैं ॥ १३९ ॥
अतोऽहं ब्रवीमि—
अपृष्टोऽपि हितं ब्रूयाद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ।
एष एव सतां धर्मो विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १४० ॥
इस लिये मैं कहता हूं कि-जिसके पराजयकी इच्छा न करे उसके बिना
पूछेभी हितकारक वचन कहना चाहिये, क्योंकि यही सज्जनोंका धर्म है और
इसके विपरीत अधर्म है ॥ १४० ॥
तथा चोक्तम्,—
स स्निग्धोऽकुशलान्निवारयति यस्तत्कर्म यन्निर्मलं
सा स्त्री याऽनुविधायिनी स मतिमान् यः सद्द्भिरभ्यर्च्यते ।
सा श्रीर्या न मदं करोति स सुखी यस्तृष्णया मुच्यते
तन्मित्रं यदकृत्रिमं स पुरुषो यः खिद्यते नेन्द्रियैः ॥ १४१ ॥