हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः १३०-
और-विषयुक्त अन्नको, हिलते हुए दांतको, और दुष्ट मंत्रीको जड़से उखाड
डालनाही सुख है ॥ १२९ ॥
किंच,-
यः कुर्यात्सचिवायत्तां श्रियं तद्व्यसने सति ।
सोऽन्धवज्जगतीपालः सीदेत् संचारकैर्विना ॥ १३० ॥
और जो राजा, लक्ष्मीको मंत्रीके आधीन कर देता है वह राजा उस
मन्त्रीके मरण आदि विपत्तिमें गिरने पर चलाने वालेके बिना, अंधेके समान दुःख
पाता है ॥ १३० ॥
सर्वकार्येषु स्वेच्छातः प्रवर्तते । तदत्र प्रमाणं स्वामी । एतच्च
जानाति ।
और सब कार्योंमें अपनी इच्छापूर्वक करता है, इसलिये इसमें स्वामी
प्रमाण हैं अर्थात् रुचे सो कीजिये, और आप यह जानते हैं—
न सोऽस्ति पुरुषो लोके यो न कामयते श्रियम् ।
परस्य युवतीं रम्यां सादरं नेक्षतेऽत्र कः ?' ॥ १३१ ॥
संसारमें ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीको न चाहता हो, पराई जवान
और सुन्दर स्त्रीको चावसे, कौन नहीं देखता है ? अर्थात् सब देखते हैं॥१३१॥
सिंहो विमृश्याह—'भद्र ! यद्यप्येवं तथापि संजीवक्रेन सह
मम महान् स्नेहः ।
सिंहने विचार कर कहा—'हे शुभचिंतक ! जो ऐसाभी है तोभी संजीवकके
साथ मेरा अत्यन्त स्नेह है ।
पश्य,—
कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः ।
अशेषदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः ? ॥ १३२ ॥
देख—बुराइयां करता हुआभी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे बहु-
तसे दोषोंसे दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है ? ॥ १३२ ॥
अन्यच्च,—
अप्रियाण्यपि कुर्वाणो यः प्रियः प्रिय एव सः ।
दग्धमन्दिरसारेऽपि कस्य वह्नावनादरः ?' ॥ १३३ ॥