श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सड़सठवाँ अध्याय
२०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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सड़सठवाँ अध्याय
दूर्वाङ्कुरकी महिमाके प्रति संशयग्रस्त आश्रयाको कौण्डिन्यमुनिका इन्द्रके पास दूर्वाङ्कुरके
भारके बराबर स्वर्ण लानेके लिये भेजना और एक दूर्वाङ्कुरपर
त्रैलोक्यकी सम्पदाका भी न्यून होना
[गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो!]
उन मुनि कौण्डिन्यके द्वारा आज्ञा दिये जानेपर अपने
अभिप्रायकी सिद्धिके लिये आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर
इन्द्रके पास गयी और उनसे कहा—‘हे शक्र! हे
सुरेश्वर! मैं अपने पतिकी आज्ञासे तुम्हारे पास याचना
करने आयी हूँ; मुझे शुद्ध स्वर्ण प्रदान कीजिये’॥ १-२॥
इन्द्र बोले—[हे साध्वि!] तुम यहाँ क्यों आयी
हो? तुम्हारे पतिकी जो आज्ञा थी, उसे तुम मुझे प्रेषित
कर देती तो मैं अपनी शक्तिके अनुसार तुमको स्वर्ण
भिजवा देता॥ ३॥
आश्रया बोली—हे देव! हे शचीपते! मैं [इस]
दूर्वाङ्कुरकी तौलभर ही स्वर्ण लूँगी, न उससे कम और
न ही उससे अधिक॥ ४॥
इन्द्र बोले—हे दूत! तुम इन्हें शीघ्र ही कुबेरके
भवनमें ले जाओ। वे [इस] दूर्वाङ्कुरके परिमाणभर शुद्ध
स्वर्ण दे देंगे॥ ५॥
[गणेशजीके] गण बोले—तदनन्तर देवराज
इन्द्रकी आज्ञासे वह देवदूत आश्रयाके साथ कुबेरके
भवन गया॥ ६॥
दूत बोला—[हे धनाधिपति!] इन साध्वी
मुनिपत्नीको इन्द्रने मेरे साथ भेजा है, मैंने इन्हें आपके
भवन पहुँचा दिया। इन्हें आप [इस] दूर्वांकुरके परिमाणभर
स्वर्ण प्रदान कर दें। हे देव! आपको नमस्कार है, अब
मैं जाता हूँ॥ ७१/२॥
कुबेर बोले—[हे दूत!] मैं अत्यन्त आश्चर्यमें पड़
गया हूँ कि मुनि कौण्डिन्य, इन्द्र तथा आश्रया भी अज्ञानके
वशीभूत हो गये; वे यह नहीं जानते कि दूर्वांकुरका
परिमाण कितना होगा? उतने सोनेमें क्या होगा? उन्होंने
अधिक स्वर्णकी माँग क्यों नहीं की?॥ ८-९॥
[गणेशजीके] गण बोले—[इस प्रकार कहकर]
कुबेरने उसे बहुत-सा स्वर्ण दे दिया, परंतु आश्रयाने
पतिके भयसे उस स्वर्णको ग्रहण नहीं किया; क्योंकि
उसे शंका थी कि यह सुवर्ण [दूर्वांकुरके परिमाणसे]
कम या अधिक हो सकता है॥ १०॥
उसने [उस] दूर्वांकुरको स्वर्णकारकी तुलापर
रखा, परंतु [कुबेरप्रदत्त] वह स्वर्ण उसके तौलके बराबर
न हुआ। तदनन्तर वणिक्-तुला लायी गयी, फिर भी
[स्वर्ण और दूर्वांकुरकी] समतुल्यता नहीं हुई। तब
तैलकारकी तुलाद्वारा तोलनेका कार्य किया गया, परंतु
फिर भी स्वर्ण और दूर्वांकुरकी समतुल्यता नहीं हो
सकी॥ ११-१२॥
तत्पश्चात् वहाँ धट (बड़ा तराजू) बाँधा गया।
उसके एक पलड़ेमें स्वर्ण रखा गया और दूसरे पलड़ेपर
दूर्वांकुर रखा गया। यहाँपर भी दूर्वांकुरवाला पलड़ा भारी
होनेके कारण नीचे चला गया। तब कुबेरने अन्य बहुत-
सा स्वर्ण [स्वर्णवाले पलड़ेपर] रखा, परंतु वह भी उस
दूर्वांकुरके समतुल्य नहीं हो पाया॥ १३-१४॥
तब उन्होंने अपने कोशका पर्वतराज हिमालयकी
भाँति [बृहदाकार] सम्पूर्ण द्रव्य दे दिया, फिर भी उस
द्रव्यसे दूर्वांकुरकी समता न हो सकी॥ १५॥
तदनन्तर आश्चर्यचकित कुबेरने पत्नीको बुलाया
और उनसे कहा कि हे शुभ्रु! मेरे आदेशसे पहले तुम
इस धट [-के पलड़े]-पर चढ़ो, यदि तब भी यह
दूर्वांकुरके समतुल्य नहीं हुआ, तो अपने सत्त्वकी रक्षाके
लिये मैं भी इसपर आरूढ़ हो जाऊँगा। तब वह पतिव्रता
पतिकी आज्ञासे उस धट [-के पलड़े]-पर चढ़
गयी॥ १६-१७॥
जब वह भी उस दूर्वांकुरकी समतुल्यता न कर
सकी, तो कुबेरने स्वयंसहित अपनी सम्पूर्ण (अलका)-
पुरीको उस धटके (पलड़ेके) मध्यमें रखवा दिया, परंतु
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उ०ख०-अ०६७ ] * दूर्वांकुरकी महिमा * २०७
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[बायाँ स्तम्भ]
फिर भी वह दूर्वांकुरवाला पलड़ा ऊपर न उठा ॥ १८ ॥
[इस आश्चर्यमयी घटनाका] दूतके मुखसे वृत्तान्त
सुनकर इन्द्र गजारूढ़ हो वहाँपर आये और अपने
द्रव्यसहित स्वयं भी घट [-के पलड़े]-पर चढ़ गये ॥ १९ ॥
तब भी वह दूर्वांकुर ऊपरकी ओर नहीं उठा। [यह
देख] इन्द्र यह सोचते हुए कि यह क्या हो रहा है ?
चिन्तित हो गये। उन्होंने [लज्जित होकर] अपना मुख
नीचे कर लिया ॥ २० ॥
उन्होंने उस तराजूके पलड़ेपर चढ़नेके लिये विष्णु
और शिवका स्मरण किया। तब वे दोनों [महान् देवता]
भी अपने-अपने नगरोंसहित वहाँ आ गये और उन
दोनोंने भी उस घटपर आरोहण किया ॥ २१ ॥
परंतु तब भी वह दूर्वांकुर स्पष्ट रूपसे ऊपर नहीं
उठा। तब वे—शिव, विष्णु, धनाधिपति कुबेर, वरुण,
इन्द्र, अग्नि और वायु आदि देवता उस घटसे उतर आये
तथा कौण्डिन्यमुनिके पास गये। सभी देवता, देवर्षि,
सिद्धगण, विद्याधर और नाग उन मुनिके पास वैसे ही
पहुँचे, जैसे दिनकी समाप्तिपर सायंकालमें पक्षी अपने
घोंसलेमें पहुँच जाते हैं। [तदनन्तर] उद्विग्न चित्तवाले
उन सबने मुनिको नमस्कारकर कहा— ॥ २२-२४ ॥
सभी [देवता, ऋषि आदि] बोले— हे मुने !
हमारे पूर्वजन्मोंके पुण्योंका उदय हुआ है, जो आपका
दर्शन हुआ। इससे हमारे सारे पाप नष्ट हो गये और अब
हमारा कल्याण हो जायगा ॥ २५ ॥
आपकी पत्नीने हम सबके सत्त्व (बल)-का आज
हरण कर लिया है—यह स्पष्ट रूपसे प्रकट है।
दूर्वांकुरकी उत्पत्ति और उसकी महिमाको हम नहीं
जानते ॥ २६ ॥
आपके द्वारा भक्तिपूर्वक समर्पित और गणेशजीके
सिरपर स्थित एक ही दूर्वांकुरकी समतुल्यता तीनों लोक
भी नहीं कर सकते ॥ २७ ॥
दूर्वांकुरकी महिमाको सम्यक् रूपसे कौन जान
सकता है; यज्ञ, दान, व्रत, तप और स्वाध्याय भी उसकी
समता नहीं कर सकते ॥ २८ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
निरन्तर जप और तपमें लीन रहनेवाले गजानन
गणेशजीके एकनिष्ठ भक्त आपकी भी महिमाको सम्पूर्ण
प्राणियोंमें भला कौन जान सकता है ? ॥ २९ ॥
इस प्रकार कहकर उन सबने पहले गणेशजीका
पूजनकर तदनन्तर भार्यासहित मुनिका गीत, नृत्य और
स्तवन [आदि]-से पूजन किया ॥ ३० ॥
[तदनन्तर गणेशजीका स्तवन करते हुए उन सबने
कहा—] हे देव ! आपका स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञात
है, आपकी महिमाको ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वायु,
अग्नि, सूर्य, यम, शेष, सम्पूर्ण (षोडश) कलाओंसे युक्त
चन्द्रमा, वरुण, अश्विनीकुमारद्वय, बृहस्पति, गरुड़, यक्षराज
कुबेर और देवी सरस्वती भी नहीं जानते हैं ॥ ३१ ॥
इस प्रकार देवाधिदेव गजानन गणेशजीका स्तवनकर
उन सबने मुनि कौण्डिन्यकी आज्ञा लेकर अपने-अपने
निवास-स्थानके लिये प्रस्थान किया ॥ ३२ ॥
तदनन्तर आश्रया भी दूर्वाके उत्तम माहात्म्यको
जानकर पतिके वचनोंके प्रति विश्वस्त होकर उन
विघ्नेश्वर गणेशजीका पूजन करने लगी, जो सभी
देवताओंके भी देवता हैं और सभीके द्वारा दूर्वांकुरोंसे
अर्चित हैं। अत्यन्त निर्मल चित्तसे उसने अपने पति
कौण्डिन्यमुनिको प्रणाम किया और अपने-आपकी अत्यन्त
निन्दा करते हुए कहने लगी— ॥ ३३-३४१/२ ॥
आश्रया बोली— हे स्वामिन् ! मुझ-जैसी कोई
दुष्टा नहीं है, जिसने आपके भी वचनोंपर संशय किया।
आप विशेष ज्ञानवालोंसे भी अधिक विशेष ज्ञानवाले हैं।
सम्पूर्ण प्राणियोंपर दयाभाव रखनेवाले हे प्रभो ! आपने
उचित ही किया। [मैंने जो आपके वचनोंपर अविश्वास
किया,] मेरे उस अपराधको अब आप क्षमा करें। मैं
आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ३५-३६१/२ ॥
तदनन्तर दूर्वाके उत्तम माहात्म्यको जानकर उन
दोनोंने प्रातःकाल शीघ्र उठकर और दूर्वा लाकर स्नान
करके सम्यक् प्रकारसे गणेशजीका पूजनकर अनन्य
भक्तिभावसे दूर्वांकुरका अर्पण किया ॥ ३७-३८ ॥
वे दोनों यज्ञ, व्रत, दान आदिका त्याग करके