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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

बासठवाँ अध्याय

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं सटीक लिप्यंतरण (Transcription) दिया गया है:

१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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बासठवाँ अध्याय
भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन

[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
कृतवीर्यके पिताने पूछा—[हे ब्रह्मन्!] 'भाद्रपद
मासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको चन्द्रमाके उदय
होनेपर ही गणेशजीकी पूजा क्यों की जाती है'—यह
मैंने आपसे पूछा था, जिसे आपने निरूपित किया। अब
मैं उन गणेशजीको दूर्वांकुरके अर्पणका कारण सुनना
चाहता हूँ, बताइये कि गणेशजीको दूर्वांकुर क्यों प्रिय
हैं?॥ १-२॥
ब्रह्माजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजीको दूर्वांकुर-
समर्पणका जो फल होता है, उसे कहता हूँ, सुनो॥ ३॥
दक्षिण देशमें जाम्ब नामकी एक नगरी थी, वहाँ
सुलभ नामका क्षत्रिय रहता था, जो अत्यन्त गुणवान्,
दानशील, धनवान्, बलशाली, विवेकसमपन्न, सम्मान्य
जनोंका सम्मान करनेवाला, शान्त, इन्द्रियजित्, सम्पूर्ण
शास्त्रोंके तात्त्विक अर्थको जाननेवाला और सभी वेदोंके
तत्त्वार्थका ज्ञाता था॥ ४-५॥
वह विकट नामवाले गणेशजीके प्रति नित्य भक्तिमान्
और स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुतिमें रत रहता था। उसकी
पत्नी सुमुद्रा नामसे अत्यन्त विख्यात थी॥ ६॥
वह अत्यन्त सुन्दरी और पतिव्रता थी। उसने अपने
रूप-सौन्दर्यसे अप्सराओंको भी पराभूत कर दिया था।
वह देवताओं, ब्राह्मणों और अतिथियोंकी सेवामें रत
रहनेवाली और पतिके मनोभावोंके अनुकूल आचरण
करनेवाली थी॥ ७॥
हे नृप! वह सम्पूर्ण पतिव्रताओंमें सर्वमान्य और
श्रेष्ठतम थी। एक दिन वे दोनों दम्पती स्नानसे निर्मल
हो जब पुराणार्थकी विवेचनामें मन लगाये बैठे थे, तभी
मधूसूदन नामक एक ब्राह्मण वहाँ आया॥ ८-९॥
निरन्तर परमेश्वरका चिन्तन करते रहनेवाला वह
भिक्षाका अभिलाषी था। दारिद्र्यके कारण उसने मलिन
वस्त्र धारण कर रखे थे। वस्त्र धारण किये होनेपर भी
वह प्रायः दिगम्बर ही था॥ १०॥
सुलभने उसे देखकर प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार किया,

[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
तत्पश्चात् उन [मलिन वस्त्रधारी] श्रेष्ठ द्विजको देखकर
वह सहसा अज्ञानवश हँस पड़ा॥ ११॥
[यह देखकर] उन मुनिके नेत्र क्रोधसे लाल हो
उठे, ऐसा लगता था, मानो वे तीनों लोकोंको जला
डालेंगे। उन्होंने अत्यन्त क्षुब्ध होकर उसे शाप देते हुए
कहा—'हे दुर्बुद्धि! तुम दाँत निकालकर मुझपर हँस रहे
थे, अतः प्रतिदिन हलमें जोते-जानेवाले बैल हो जाओ
और नित्य दुखी रहो'॥ १२-१३॥
पतिके प्रति दिये गये शापको सुनकर सुमुद्रा क्रोधसे
मूर्च्छित हो गयी। पदाघातसे घायल सर्पिणीकी भाँति क्रुद्ध
होकर उसने उस ब्राह्मणको शाप दिया—हे दुष्ट ब्राह्मण!
तुमने जो अविवेकपूर्ण ढंगसे मेरे पतिको शाप दिया है,
अतः तुम भी विष्ठाको भोजनरूपमें ग्रहण करनेवाले,
गाड़ीका बोझ ढोनेवाले गधे बनोगे॥ १४-१५॥
इस प्रकार दिये गये क्रूर शापको सुनकर उस
ब्राह्मणने भी उसे शाप दिया कि स्त्री होनेपर भी तुमने
मुझे शाप दिया, अतः तुम चाण्डाली होओगी; साथ ही
तुम दरिद्र, अनेक दोषोंसे युक्त, मल-मूत्रका भोजन
करनेवाली और अशुभ कार्य करनेवाली होगी। इस
प्रकार परस्पर शाप देकर उन्होंने अपने अतिदुर्लभ
शरीरोंका त्याग कर दिया॥ १६-१७॥
[तदनन्तर] सुलभ वृषभके रूपमें उत्पन्न हुआ
और हल खींचनेका दुःख भोगता रहा। ब्राह्मणके शापके
कारण उसे एक क्षणके लिये भी विश्राम नहीं मिलता
था। वह ब्राह्मण मधूसूदन भी गर्दभयोनिमें उत्पन्न हुआ
और सुमुद्रा प्राणियोंकी हिंसा करनेवाली दुष्ट चाण्डाली
हुई॥ १८-१९॥
[वह] पिशाचवृत्तिवाली, दरिद्र, विष्ठा और मूत्रका
भक्षण करनेवाली, अत्यन्त शुष्क शरीरवाली, बाहर
निकले दाँतोंसे युक्त विकराल मुखवाली थी। किसी समय
भ्रमण करते हुए उसने नगरके दक्षिण भागमें स्थित
गणेशजीके परम अद्भुत मन्दिरको देखा॥ २०-२१॥

उ०ख०-अ०६२ ] * भाद्र शुक्ल चतुर्थीव्रतके अन्तर्गत गणेशजीको दूर्वार्पणके माहात्म्यका वर्णन * १९७

वह अनेक प्रकारके वृक्षों और लताजालोंसे आच्छादित | श्रवणकर निद्रामें लीन लोग भी जग गये। सावधान
तथा अनेक प्रकारके पक्षिसमूहोंसे युक्त था। वहाँपर कुछ | होकर उन्होंने दण्ड, मुष्टिका और कुहनीका प्रहारकर
योगीश्वर सदा अनुष्ठानमें रत रहते थे॥ २२॥ | उन्हें बाहर भगा दिया॥ ३३-३४॥
वहाँ गणेशजीकी उपासना करनेवाले लोग [शास्त्रोक्त] | भागनेके लिये तत्पर उस चाण्डालीपर भी लोगोंने
नियमोंका पालन करते हुए निवास कर रहे थे। [उनमेंसे] | कंकड़-पत्थरोंसे प्रहार किया। चाण्डाली और गधेद्वारा
कुछ मनोरथपूर्तिकी इच्छावाले और कुछ पुत्र, कुछ मोक्ष | [गणेशप्रतिमाके] स्पर्शकी शंकासे आकुल लोगोंने
और कुछ धनप्राप्तिकी इच्छावाले थे। किसी समय | अभिमन्त्रित तीर्थजलसे गजानन गणेशजीको स्नान कराया
भाद्रपदमासकी चतुर्थी तिथिको उस नगरके प्रत्येक घरमें | तथा अनेक प्रकारके द्रव्योंसे उनका अनेक बार पूजन
गणेश-महोत्सवका आयोजन हो रहा था॥ २३-२४॥ | किया॥ ३५-३६॥
उसी समय महाप्रलयकी-सी सूचना देनेवाली | उस अत्यन्त दुष्टा चाण्डाली और गर्दभ एवं
अतिवृष्टि प्रारम्भ हो गयी, वह चाण्डाली भी उस वृष्टिसे | वृषभको लोगोंने पुनः लाठी, कुहनी और थप्पड़ोंसे
भयभीत होकर जिस-जिस घरमें जाती, वहीं-से लोगोंद्वारा | पीटा। मन्दिरका द्वार बन्द होनेसे वे भागकर बाहर भी
मार-पीटकर भगा दी जाती, तब वह हाथमें अग्नि लेकर | नहीं जा सकते थे। दौड़ते और दारुण स्वरमें क्रन्दन करते
मन्दिरके अन्दर चली गयी॥ २५-२६॥ | उन तीनोंके स्वरसे देवाधिदेव गणेशजीका मन उनकी
तब वहाँ भी कुछ लोग उसे मारने-पीटने लगे, परंतु | ओर आकृष्ट हो गया॥ ३७-३८ १/२॥
योगियोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। तब वह | [गणेशजी सोचा कि अहो!] इन्हीं (चाण्डाली,
चाण्डाली [दूबके] तिनकोंको अग्निमें जलाकर उससे | वृषभ और गर्दभ)-के कारण मेरी पुनः पूजा हुई है।
अपने शरीरको सेंकने लगी॥ २७॥ | इन्होंने दूर्वांकुरोंद्वारा मेरी एक बार पूजा भी कर दी।
अकस्मात् वायुके वेगसे उड़ा हुआ एक दूर्वांकुर | यद्यपि ये तीनों दुष्ट हैं, फिर भी इन्होंने मेरी बहुत-सी
दैवयोगसे गणनायक गणेशजीके मस्तकपर गिर पड़ा॥ २८॥ | प्रदक्षिणा भी कर ली। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थी
उसी समय वह गर्दभ भी शीतसे भयातुर होकर | तिथिको जो मुझे एक भी दूर्वा समर्पित करता है और
उस देवालयमें चला आया। तत्पश्चात् वह वृषभ भी | मेरी प्रदक्षिणा करता है, वह मेरे लिये मान्य और पूज्य
हलसे मुक्त होकर दैवयोगसे वहीं गणेशजीके मन्दिरमें | होता है॥ ३९-४१॥
भावीवश चला आया और उन दोनोंने उस चाण्डालीके | इसलिये मैं इन सबको विमानसे अपने धामको भेज
तृणोंका भक्षण कर लिया॥ २९-३०॥ | देता हूँ, ऐसा सोचकर उन्होंने एक विमान भेजा, जो
वहाँ लोगोंके सो जानेपर गजानन गणेशजीके | उनके गणोंसे युक्त था। वे गण गणेशजीके जैसे
समीप ही उन दोनों (वृषभ और रासभ)-में सींग और | स्वरूपवाले थे और गन्धर्वों एवं अप्सराओंके समूहसे
पाद-प्रहारसे युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ३१॥ | घिरे हुए थे। वह विमान विविध वाद्ययन्त्रों एवं
उस समय उन दोनोंके मुखसे निकलकर दूर्वाके | परागसमन्वित पुष्पोंसे युक्त था॥ ४२-४३॥
अंकुर गणेशजीकी सूँड़ तथा उनके पैरपर गिर गये, | वह विमान दिव्य भोगोंसे परिपूर्ण और ध्वज-
जिससे गजानन गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ३२॥ | पताकाओंसे शोभायमान था। गणेशजीके स्वरूपवाले वे
तदनन्तर वह चाण्डाली लाठी लेकर गणेशजीकी | गण दिव्य देहसम्पन्न और प्रसन्न मनवाले उन (तीनों)-
प्रतिमाके समीप आयी और उसने गर्दभ एवं वृषभको | को उस विमानमें बैठाकर गजानन गणेशजीकी आज्ञासे
खूब पीटा तथा पूजामें अर्पित नैवेद्यको स्वयं खा गयी। | उनके धामको शीघ्रतापूर्वक ले गये॥ ४४-४५॥
उन दोनों [गर्दभ और वृषभ]-के खुरोंके शब्दोंको | यह घटना सब लोगोंके देखते-देखते घटित हुई,

१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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इससे सभीके हृदयमें आश्चर्यका भाव भर गया। वे लोग | प्राप्त हुई-यह हमसे बतलाइये ॥ ४८ ॥
कहने लगे कि इन (तीनों)-को [न जाने किस] | हम सब भी अपने अनुष्ठानका त्याग करके शीघ्र
पूर्वपुण्यसे इस प्रकारकी गति प्राप्त हुई ॥ ४६ ॥ | ही उसका आचरण करेंगे; क्योंकि असंख्य कालावधि
तब कुछ योगीश्वर ध्यानका त्यागकर गणोंके पास | बीत जानेपर भी हमें उन देवाधिदेवका दर्शन नहीं
गये और उनसे पूछा कि इन तीनोंकी ऐसी पुण्यमयी ध्रुव | हुआ ॥ ४९ ॥
सद्गति कैसे हुई-यह बतलाइये ॥ ४७ ॥ | केवल वायुका भक्षणकर अनुष्ठानमें लगे रहनेवाले
हे निष्पाप गणो! इन अत्यन्त पापियोंका लेशमात्र | हम विरक्तजनोंको गणेशजीके धामकी प्राप्ति कब
भी पुण्य नहीं था, फिर यह अत्यन्त दुर्लभ गति इन्हें कैसे | होगी ?-यह हमें बतलाइये ॥ ५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वोपाख्यान' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६२ ॥

तिरसठवाँ अध्याय
गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन

गणेशजीके गण बोले-हे योगिजनो! आप | मुनि बोले-[हे देवेन्द्र !] उत्तम दूर्वा-माहात्म्य
सभी अपने चंचल मनको स्थिरकर श्रवण करें। | जैसा मुझे ज्ञात है, वह मैं कहता हूँ। पूर्वकालमें स्थावर
[गणेशजीकी] जिस महिमाका कथन करनेमें [सहस्रमुख] | नामक नगरमें कौण्डिन्य नामवाले एक महामुनि हुए थे। वे
शेष तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, उसका | गणेशजीके उपासक और तपोबलसे सम्पन्न थे। नगरके
वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है, फिर भी हम | दक्षिण भागमें उन मुनिका अत्यन्त रमणीय महान् आश्रम
शक्तिके अनुसार उसका वर्णन करते हैं ॥ १ १/२ ॥ | था, जो लताओं और वृक्षोंसे समन्वित था ॥ ८-१० ॥
ब्रह्मा और शिव आदि जिनका सर्वदा स्तवन करते | उसमें अत्यन्त विशाल सरोवर थे, जो पुष्पित
हैं, उन गणनांथ गणेशजीकी महिमाका स्पष्ट वर्णन कौन | कमलोंसे युक्त थे, उनपर भ्रमर बैठे रहते थे तथा [उन
कर सकता है ? तथापि हे निष्पाप [योगिजन !] उनकी | सरोवरोंमें] हंस, बत्तख, चकवा, बगुला, कच्छप और
इस प्रकारकी लीलाका श्रवण करो ॥ २-३॥ | जलमुर्गे क्रीडा करते थे। वहाँ उन कौण्डिन्यमुनिने उत्कट
दूर्वांकुरोंकी महिमा मुनियों और देवताओंको भी | तप करना प्रारम्भ किया ॥ ११-१२ ॥
ज्ञात नहीं है। [देवाधिदेव गणेशजीको दूर्वादिसे अर्चनका | वे अपने सम्मुख गणेशजीकी चतुर्भुज स्वरूपवाली,
जो पुण्य प्राप्त होता है;] वह यज्ञ, दान, तप, व्रत और | अत्यन्त प्रसन्न मुखमुद्रावाली, सुन्दर, वरद मुद्रावाली,
हवनसे भी नहीं प्राप्त होता। इस विषयमें यहाँ एक | दूर्वासे युक्त और सुपूजित महामूर्तिकी स्थापनाकर भगवान्
प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें इन्द्र | गणेशजीको प्रसन्नता प्रदान करनेवाले षडक्षर परम
और महात्मा नारदके संवादका वर्णन है ॥ ४-५ ॥ | मन्त्रका जप करने लगे। तब उनकी आश्रया नामवाली
एक बार नारदजी इन्द्रको देखनेकी इच्छासे | पत्नीने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा- ॥ १३-१४॥
[स्वर्गलोकमें] आये। वहाँ [उनके द्वारा] परम भक्तिसे | आश्रया बोली-हे स्वामिन् ! आप भगवान्
पूजित होकर आसन ग्रहण कर लेनेपर बलसूदन इन्द्रने | गजाननको दूर्वाका भार क्यों चढ़ाते हो ? क्योंकि घासके
आदरपूर्वक मुनिसे दूर्वाका माहात्म्य पूछा ॥ ६ १/२ ॥ | तिनकोंसे तो कोई प्रसन्न होता नहीं। यदि इससे कोई
इन्द्र बोले-हे ब्रह्मन् ! हे मुने ! यह बतलाइये कि | पुण्य होता हो तो आप कृपया मुझसे कहिये ॥ १५ १/२ ॥
देवाधिदेव महात्मा गणेशजीको दूर्वांकुर विशेष रूपसे | कौण्डिन्य बोले-हे प्रिये ! सुनो, मैं दूर्वाके उत्तम
क्यों प्रिय हैं ? ॥ ७ १/२ ॥ | माहात्म्यको कहता हूँ ॥ १६ ॥

उ०ख०-अ०६३ ] * गणेश-पूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके आतंकका वर्णन * १९९
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[बायाँ स्तम्भ]
पूर्वकालकी बात है, धर्मराजके नगरमें एक उत्तम
उत्सव हो रहा था। उसमें सभी देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ,
सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, यक्ष और राक्षस आमन्त्रित
किये गये थे। वहाँ नृत्य करती हुई तिलोत्तमाका उत्तरीय
भूमिपर गिर पड़ा, [जिससे] यमने उसके सुन्दर और
विशाल स्तनयुगलको देख लिया। [इससे] वे काम-
सन्तप्त, बेचैन और लज्जाहीन-से हो गये॥ १७-१९॥
उन्होंने उसके आलिंगन आदिकी इच्छा की।
तदनन्तर [बोध होनेपर] वे धर्मराज लज्जासे मुख नीचे
करके सभासे बाहर निकल गये। जाते समय उनका तेज
स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा; उससे एक विकृत
मुखवाला पुरुष उत्पन्न हुआ, जो ज्वालामालाओंसे युक्त
था। वह अपने क्रूर दंष्ट्रारव (दाँत पीसनेकी आवाज)-
से तीनों लोकोंको भयभीत कर रहा था, सम्पूर्ण पृथ्वीको
जलाये डाल रहा था तथा अपनी जटाओंसे आकाशका
स्पर्श कर रहा था॥ २०-२२॥
उसके [भयंकर] नादसे तीनों लोकोंके प्राणियोंके
मन अत्यन्त कम्पित हो उठे, तब सभी सभासद्
[भगवान्] विष्णुके पास गये। उन सबने अपनी-अपनी
मतिके अनुसार अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे उनका स्तवन
किया और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे
उनकी प्रार्थना की॥ २३-२४॥
[तब] वे भगवान् विष्णु उन सबके साथ अनामय
गणेशजीके पास गये। उस (यमपुत्र)-की मृत्यु उन्हींके
हाथसे जानकर उन सबने उन्हें प्रसन्न किया॥ २५॥
देवता और मुनि बोले-आप विघ्नस्वरूपके
लिये नमस्कार है, आप विघ्नहारीके लिये नमस्कार है,
आप सर्वरूपके लिये नमस्कार है; हे सर्वसाक्षी! आपको
नमस्कार है। महान् देवताके लिये नमस्कार है, जगत्के
आदि कारण आपके लिये नमस्कार है; हे कृपानिधान!
आप जगत्का पालन करनेवाले हैं, आपके लिये नमस्कार
है॥ २६-२७॥
पूर्ण तमोगुणारूप आपको नमस्कार है, आप
सर्वसंहारकारीको नमस्कार है, हे भक्तवरद! आपको
नमस्कार है, सर्वदाताके लिये बारम्बार नमस्कार है॥ २८॥

[दायाँ स्तम्भ]
हे अनन्यशरण! हे समस्त कामनाओंको परिपूर्ण
करनेवाले! आपको नमस्कार है। वेदके ज्ञाता आपको
नमस्कार है, वेदके कर्ता आपको नमस्कार है॥ २९॥
[आपको छोड़कर] हम किस दूसरेकी शरणमें
जायें? कौन दूसरा हमारे भयको दूर कर सकता है?
[आपकी] प्रजा [हम सब]-पर अकालमें ही प्रलय
कैसे आ गयी ? हा देवेश्वर गजानन ! हा विघ्नहर ! हा
अव्यय ! हम सब मृत्युको प्राप्त होने जा रहे हैं, आप
हमारी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?॥ ३०-३१॥
उनका इस प्रकारका वचन सुनकर शत्रुभयका नाश
करनेवाले करुणासागर भगवान् गजानन उन सबके
सम्मुख शिशुरूपमें प्रकट हो गये॥ ३२॥
उनके नेत्र कमलके समान थे तथा उनके मुखकी
आभा सैकड़ों चन्द्रमाओंकी आभाके समान थी। उनके
श्रीविग्रहकी आभा करोड़ों सूर्योंके आभासमूहके समतुल्य
थी तथा उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यको
पराभूत करनेवाला था॥ ३३॥
उनके दाँत कुन्दकी कलीकी और अधर बिम्बाफलकी
शोभाको जीतनेवाले थे। उनकी नासिका उन्नत, भृकुटी
और नेत्र सुन्दर तथा कण्ठ शंखके समान था॥ ३४॥
उनका वक्षःस्थल विशाल था, दोनों भुजाएँ घुटनोंतक
विस्तृत थीं, उदरप्रदेश गम्भीर नाभिसे सुशोभित था,
उनका कटिप्रदेश अत्यन्त सुन्दर था तथा वे बलशाली
थे। उनकी स्थूल जंघाएँ केलेके तनेकी शोभासे प्रतिस्पर्धा
कर रही थीं। सुन्दर घुटनों, जंघा और एड़ीसे उनके
चरण-कमल सुशोभित हो रहे थे॥ ३५-३६॥
वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित और
महामूल्यवान् वस्त्र धारण किये हुए थे। इस प्रकारके
[रूप-सौन्दर्यवाले] उन भगवान् गणेशको अपने सम्मुख
उस नगरकी भूमिपर प्रकट हुआ देखकर देवता और
मुनिगण जय-जयकार करते हुए उठकर खड़े हो गये।
तदनन्तर उन सबने उनको वैसे ही भूमिपर लेटकर
दण्डवत् प्रणाम किया, जैसे देवगण इन्द्रको प्रणाम करते
हैं॥ ३७-३८॥
देवता और ऋषि बोले-हे विभो! आप कौन

२०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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हैं ? कहाँसे आये हैं ? क्या कार्य है ? हमसे कहिये। हम पराक्रमको नहीं जानते हैं ॥ ४४-४५ ॥
लोग तो यही जान रहे हैं कि बालकका रूप धारण किये क्या ईश्वरने ही इसका वध करनेके लिये और
आप दुष्टसंहारक परम ब्रह्म परमात्मा हैं, जो अनलासुरके पीड़ित तीनों लोकोंकी रक्षा करनेके लिये बालकके रूपमें
सन्त्राससे अपने कर्मोंका त्यागकर बैठे हुए हम लोगोंको अवतार लिया है ? ऐसा कहकर उन सबने उन्हें सादर
त्राण देनेके निमित्त प्रकट हुए हैं ॥ ३९-४० ॥ प्रणाम किया। उसी समय कालानलका स्वरूप धारण
उनके इस प्रकारके वचन सुनकर शिशुरूपधारी किये वह अनलासुर दसों दिशाओंको जलाता हुआ,
गजानन गणेशजीने प्रसन्नमुख होकर हँसते हुए उन मनुष्य-लोकका भक्षण करता हुआ वहाँ आया। उस
देवताओं और मुनियोंसे इस प्रकार कहा - ॥ ४१ ॥ समय वहाँ क्रन्दन करते हुए मनुष्योंका महान् कोलाहल
बालक [ -रूपधारी गणेशजी ]-ने कहा- हे व्याप्त हो गया ॥ ४६-४८ ॥
देवताओ एवं ऋषियो! आप लोग ज्ञानसम्पन्न हैं। आप उसे देखते ही सभी मुनिगण भागनेको उद्यत हो
लोगोंने जो कहा, वह सत्य ही है। मैं उस परपीडाकारी गये। उन सबने बालरूपधारी उन गणेशजीसे भी कहा
(दूसरोंको कष्ट देनेवाले) दुष्टके वधके लिये अपनी कि 'शीघ्र पलायन करो, नहीं तो यह अत्यन्त प्रचण्ड
इच्छासे बालकका रूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक आया अनलासुर निश्चित ही आज वैसे ही तुम्हारी हिंसा कर
हूँ। हे पुण्यात्माओ ! मैं उसके वधका जो उपाय बताता देगा, जैसे तिमिंगल नामक मत्स्य छोटी मछलियोंकी
हूँ, तुम लोग उसे करो ॥ ४२-४३ ॥ और गरुड़ सर्पोंकी [हिंसा कर देते हैं] ॥ ४९-५० ॥
उसे देखकर आप सब मुझे प्रयत्नपूर्वक प्रेरित उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर बालकरूपधारी
करना, तब उसके और मेरे महान् आचरणको कौतुकपूर्वक परमात्मा गजानन गणेशजी हिमालयपर्वतकी भाँति अचल
देखियेगा। उनके इस प्रकारके कृपापूर्ण वाक्य सुनकर वे होकर वहाँ खड़े हो गये। देवता और ऋषि उन
सब हर्षमें भरकर आपसमें कहने लगे कि हम सब इनके बालरूपधारी गणेशजीको वहीं छोड़कर दूर चले गये ॥ ५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वांकुरमाहात्म्यके अन्तर्गत अनलासुरोत्पत्ति'
नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥
चौंसठवाँ अध्याय
गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा
आश्रया बोली- हे महामुनि! देवताओं और सहित चलायमान हो गयी ॥ ३-४ ॥
ऋषियोंके पलायन कर जानेपर जब बालकरूपधारी आकाशमें बादलोंके गरजनेके समान ध्वनि होने
गणेशजी पर्वतके समान स्थित रहे, तब उस बालक और लगी। वृक्षोंकी शाखाओंसे पक्षियोंके समूह भूतलपर गिर
अनलासुरके मध्य कौन-सी आश्चर्यजनक घटना घटित पड़े। समुद्र जलहीन हो गये, वृक्ष जड़से उखड़ गये।
हुई; उसे मुझसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये ? ॥ १ १/२ ॥ कम्पनकी प्रबलताके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा
नारदजी बोले- हे शचीपति ! उसके इस प्रकार रहा था ॥ ५-६ ॥
प्रश्न करनेपर मुनिश्रेष्ठ कौण्डिन्यने जो कहा, वह मैं उसी क्षण बालकरूपधारी भगवान् गजाननने उस
बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २१/२॥ अनलरूप धारण किये दैत्यको मायाबलसे पकड़ लिया
बालरूपधारी गजाननके पृथ्वीपर पर्वतकी भाँति और सबके देखते-देखते उसे वैसे ही निगल गये, जैसे
स्थिर हो जानेपर वह अनलासुर दुर्दमनीय कालाग्निकी अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया था। तदनन्तर उन
भाँति वहाँ आया; उस समय अचला पृथ्वी भी पर्वतों परमात्मा गणेशजीने विचार किया कि यदि यह दैत्य मेरे

उ०ख०-अ०६४ ] * गणेशपूजनमें दूर्वांकुरके माहात्म्यके प्रसंगमें अनलासुरके शमनकी कथा * २०९
उदरमें चला गया तो मेरे उदरमें स्थित तीनों भुवनोंको
जला डालेगा, जिनका कि मैंने रक्षण किया है। [इसके
कारण] सभी ब्रह्माण्डोंका नाश हो जायगा, इसलिये मैं
इसको कण्ठमें ही रख लेता हूँ। इसी बीचमें देवाधिदेव
गणपति की परमाश्चर्यमयी लीलाको देखनेके लिये अग्नि,
इन्द्र आदि देवगण वहाँ आ पहुँचे। तब इन्द्रने उस अग्नि
(-रूप असुरके दाह)-को शान्त करनेके लिये चन्द्रमाको
उन्हें प्रदान किया॥ ७-१०॥
तब उस चन्द्रमाको मस्तकपर धारण किये हुए
भगवान् गणेशका देवताओं और मुनियोंने भी 'भालचन्द्र'
इस नामसे स्तवन किया, परंतु फिर भी कण्ठके मध्य
भागमें स्थित वह अग्नि शान्त नहीं हुई॥ ११॥
तदनन्तर ब्रह्माजीने उनको सिद्धि-बुद्धि नामवाली
दो मानस कन्याएँ प्रदान कीं। वे केलेके सदृश जंघावाली,
कमलनयनी, शैवलसदृश सघन केशोंवाली, चन्द्रमुखी,
अमृतसदृश मधुरभाषिणी, कूपसदृश गम्भीर नाभिवाली,
सरिताओंसदृश त्रिवलीसे युक्त, कमलनालसदृश
मध्यभागवाली (कटिप्रदेशवाली), प्रवालके सदृश अरुणम
आभासे युक्त हाथोंवाली और [उत्तापको] शीतल
करनेमें समर्थ थीं ॥ १२-१३॥
तदनन्तर ब्रह्माजीने [गणेशजीसे] कहा कि इन
दोनोंका सम्यक् रूपसे आलिंगन करनेसे तुम्हारे कण्ठमें
स्थित अग्नि शान्त हो जायगी। परंतु उन दोनोंका
आलिंगन करनेपर भी गणेशजीकी कण्ठस्थित अग्नि
कुछ ही शान्त हुई। तत्पश्चात् कमलापति भगवान्
विष्णुने उन्हें एक अत्यन्त कोमल कमल पुष्प प्रदान
किया। तबसे वे [भगवान् गजानन] देवताओं और
मनुष्योंद्वारा 'पद्मपाणि' कहे जाने लगे॥ १४-१५॥
तब भी अग्निके शान्त न होनेपर वरुणने शीतल
जलसे उनको सिंचित किया और गिरिशायी भगवान्
शंकरने उन्हें सहस्र फणवाला नाग प्रदान किया॥ १६॥
उससे उदरको बाँधनेके कारण वे 'व्यालबद्धोदर'
नामवाले हुए, परंतु तब भी उनका अग्नियुक्त कण्ठ
शीतल नहीं हुआ ॥ १७॥
तदनन्तर अठ्ठासी सहस्र मुनिजन उनके समीप
आये और उनमेंसे प्रत्येकने इक्कीस-इक्कीस दूर्वाएँ
उनके मस्तकपर रखीं, जो अमृतके तुल्य [गुणकारी]
थीं। इससे उनके कण्ठमें स्थित अग्नि शान्त हो गयी।
तब दूर्वांकुरोंके भारसे अर्चित वे परमात्मा गणेशजी भी
प्रसन्न हो गये॥ १८-१९॥
[गणेशजी दूर्वांकुरसे प्रसन्न होते हैं—] ऐसा
जानकर उन सभी [देवताओं और मुनियों]-ने अनेक
दूर्वांकुरोंसे उन गजानन गणेशजीका पूजन किया, जिससे
वे गजानन हर्षित हुए ॥ २० ॥
उन्होंने देवताओं और मुनियोंसे कहा कि भक्तिपूर्वक
की गयी मेरी पूजा चाहे अल्प हो या महान्, किंतु वह
दूर्वांकुरोंके बिना व्यर्थ है ॥ २१ ॥
बिना दूर्वांकुरोंके की गयी पूजाका फल किसीको
भी नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिये मेरे भक्तको उषाकालमें
की गयी पूजामें एक या इक्कीस दूर्वा चढ़ानी चाहिये ॥ २२ ॥
भक्तिपूर्वक समर्पित की गयी दूर्वा जो महान् फल
देती है, [वह फल] सैकड़ों यज्ञों, दानों, व्रतों और
अनुष्ठानसमूहोंसे नहीं प्राप्त हो सकता॥ २३ ॥
हे देवताओ और मुनिगण! करोड़ों जन्मोंतक की
गयी उग्र तपस्या और नियम-पालनसे भी उतना पुण्य
फल नहीं उपार्जित होता, जितना कि दूर्वा समर्पित
करनेसे प्राप्त होता है॥ २४॥
[मुनि] कौण्डिन्य बोले—[हे प्रिये!] गणेशजीके
इस प्रकारके वचन सुनकर देवताओंने देवाधिदेव परमात्मा
गजाननका पुनः दूर्वांकुरोंसे अर्चन किया॥ २५॥
तब उन गणेशजीने पृथ्वी और आकाशको निनादित
करते हुए उच्च स्वरसे आनन्दयुक्त गर्जन किया। तदनन्तर
हर्षित हुए सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों और मनुष्योंको भी
अनेक वरदान देकर वे बालरूपधारी गणेशजी अन्तर्हित
हो गये। तब उन सभीने उन गणेशजीका 'कालानल-
प्रशमन'—यह नाम रखा। [तत्पश्चात्] उन सबने वहाँ
मन्दिरका निर्माणकर उसमें गजानन गणेशजीकी मूर्तिकी
स्थापना की और देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका
'विघ्नहर्ता'—यह नाम रखा ॥ २६-२८ ॥
इन विघ्नहर्ता गणेशजीकी कृपासे वहाँ किये हुए

२०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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स्नान, दान, तप और अनुष्ठानसे अनन्त पुण्यफलकी
प्राप्ति होती है ॥ २९ ॥
वहाँपर गणेशजीने [कालानलपर] विजय प्राप्त
की थी, इसलिये वह नगर विजयनगर नामसे प्रसिद्ध
हुआ और वहाँपर [गणेशजीने] सभीके विघ्नोंका नाश
किया था, इसलिये वे [स्वयं] 'विघ्नहर्ता' नामसे
विख्यात हुए ॥ ३० ॥
[मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे प्रिये ! दूर्वाके
उत्तम माहात्म्यसे सम्बन्धित यह सारा प्रसंग मैंने तुमसे
कह दिया; इसके श्रवण और पठनसे सम्पूर्ण पापोंका
क्षय हो जाता है। अब मैं एक अन्य पुरातन इतिहासका
वर्णन कर रहा हूँ, उसका श्रवण करो ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वामाहात्म्यवर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥

पैंसठवाँ अध्याय
गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन

[मुनि] कौण्डिन्य बोले—हे देवि ! किसी समय
गजानन गणेशजी सुखासनमें बैठे हुए थे। [उसी समय]
नारदमुनि उनका दर्शन करनेके लिये आये। वे बहुत
दिनोंके पश्चात् उनके पास आये थे ॥ १ ॥
उन्होंने [उन्हें] साष्टांग प्रणामकर कहा—'हे
गजानन ! हमारा जन्म सफल हो गया, जो पुण्य-समूहों
[-के उदय] -के फलस्वरूप आपका दर्शन हुआ है ॥ २ ॥
ऐसा कहकर मुनि हाथ जोड़कर उनके सम्मुख
स्थित हो गये, तब महाभाग गजाननने उन महान्
भाग्यशाली महामुनि नारदजीका हाथ पकड़कर आसनपर
बैठाया। गणेशजीद्वारा किये हुए उस सत्कारसे मुनिश्रेष्ठ
नारदजी भी प्रसन्न हो गये ॥ ३-४ ॥
तदनन्तर नारदजीने उन गणाधिपति गणेशजीसे
कहा कि 'मेरे हृदयमें जो आश्चर्य व्याप्त है, उसे निवेदन
करनेके लिये मैं आया हूँ, तत्पश्चात् आपको प्रणामकर
मैं पुनः चला जाऊँगा ॥ ५ ॥
गजानन बोले— [हे मुनिवर !] तुमने कौन-सा
आश्चर्य देखा है ? तुम्हारे हृदयमें क्या है ? उसे तुम विशेष
रूपसे बतलाओ; तदनन्तर अपने आश्रमको चले जाना ॥ ६ ॥
नारदजी बोले—हे देव ! मिथिलापुरीमें जनक
नामके एक श्रेष्ठ राजा हैं; वे अत्यन्त प्रतिष्ठासम्पन्न,
दानी तथा वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् हैं ॥ ७ ॥
वे नित्य अन्नदानमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंका
अनेक प्रकारके अलंकारों, वस्त्रों और दक्षिणाओंसे पूजन
करते हैं। वे दीन-दुखियों, अन्धों और दरिद्रोंको बहुत-
सा धन प्रदान करते हैं। याचक उनसे जो-जो माँगते हैं,
वे वह सब कुछ उनको प्रदान करते हैं ॥ ८-९ ॥
फिर भी उन महान् आत्मावाले [राजा]-का धन
समाप्त नहीं होता ! क्या गजानन गणेशजीकी कृपासे ही
उनका धन बढ़ रहा है ? इस महान् आश्चर्यको देखनेके
लिये मैं उनके राजभवन गया, [परंतु] उन्होंने ब्रह्मज्ञानके
अभिमानसे मेरा अपमान किया ॥ १०-११ ॥
मैंने उनसे इस प्रकार कहा कि हे नृपश्रेष्ठ ! तुम
धन्य हो, [तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर] भगवान्
गजानन तुम्हारे द्वारा चिन्तित वस्तुको तुम्हें प्रदान करते
हैं। तब उन्होंने गर्वसे कहा—'हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं ही
त्रिलोकीका ईश्वर हूँ। मैं ही दान देनेवाला और मैं ही
दान दिलानेवाला हूँ; मैं ही भोक्ता तथा मैं ही पालनकर्ता
हूँ। मेरे स्वरूपसे [मुझसे] अतिरिक्त त्रिभुवनमें दूसरा
कुछ है ही नहीं। कर्ता, कारण और कार्यका साधनस्वरूप-
सब कुछ मैं ही हूँ' ॥ १२-१४ ॥
नारदजी बोले—[हे गजानन !] मैंने उनके इस
प्रकारके वचन सुनकर क्रोधपूर्वक कहा—'ईश्वरके अतिरिक्त
जगत्‌का कर्ता अन्य कोई नहीं है ॥ १५ ॥
हे राजन् ! तुम यह धर्मका दम्भपूर्ण आचरण क्यों
कर रहे हो? हे पुण्यात्मन् ! थोड़े ही समयमें मैं तुम्हें
इसका प्रमाण दिखला दूँगा।' हे गजानन ! उनसे इस
प्रकार कहकर मैं आपके पास चला आया ॥ १६१/२ ॥

उ०ख०-अ०६५ ] * गणेशजीद्वारा राजा जनकके दानशीलताजनित अभिमानका मर्दन * २०३
[मुनि] कौण्डिन्य बोले- [हे प्रिये !] नारद
मुनिके इस प्रकारके वचन सुनकर उन परमात्मा गणेशजीने
अर्घ्य, अलंकार और चन्दनसहित दिव्य पुष्पोंसे उनका
पूजन किया। मुनि भी उनसे आज्ञा लेकर वैकुण्ठमें
भगवान् विष्णुके पास चले आये ॥ १७-१८ ॥
[उधर] गजानन गणेशजी सर्वज्ञ होते हुए भी
राजा जनककी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये निन्दनीय
वेश धारणकर मिथिला गये। उनका अमांगलिक शरीर
अनेक प्रकारके घावोंसे संयुक्त था और उनमेंसे रक्तस्राव
हो रहा था। वे मक्खियोंके समूहसे आक्रान्त, दन्तहीन
और अत्यन्त आतुर प्रतीत हो रहे थे ॥ १९-२० ॥
उन्हें मार्गमें जाते देखकर कुछ लोग नाक दबा
लेते थे, कुछ लोग कपड़ेसे मुख ढक लेते थे और
कुछ लोग इधर-उधर थूकने लगते थे ॥ २१ ॥
[इस प्रकार] लड़खड़ाते, गिरते-पड़ते, मूर्च्छित
होते तथा पुनः उठकर चलते हुए वे [कुत्सित वेशधारी
गणेशजी] बालकोंकी टोलियोंके साथ राजभवनके द्वारपर
पहुँचकर द्वारपालोंसे बोले- हे दूतो ! राजासे जाकर
निवेदन करो कि मैं वृद्ध भूखा ब्राह्मण अतिथि इच्छानुकूल
भोजनकी आकांक्षासे आया हूँ ॥ २२-२३ ॥
तब उन दूतोंने उनके इस तरहके वचनको सुनकर
राजा जनकके पास जाकर उन वचनोंको वैसे ही कह
सुनाया। तब वे राजा जनक [दूतोंसे] बोले- 'हे दूतो !
उन्हें ले आओ, मैं उन कौतुकी ब्राह्मणको देखना चाहता
हूँ।' तब उन दूतोंने उस मलिन वस्त्रधारी और मलिन
शरीरवाले ब्राह्मणको राजा जनकके पास पहुँचा दिया।
राजाने दूरसे ही देखा कि वह मक्खियोंसे घिरा हुआ
काँप रहा है ॥ २४-२५ ॥
पसीनेसे भीगे और घावोंसे रक्त स्रवित होते वृद्ध
ब्राह्मणको देखकर राजा जनकने मनमें विचार किया कि
क्या ये स्वयं परमात्मा ही हैं, जो मुझे छलनेके लिये ऐसा
रूप धारण करके आये हैं। यदि मेरा पुण्य होगा तो मैं
इनका मनोवांछित समाधान करूँगा, नहीं तो जो कुछ भविष्यमें
होनेवाला है, वह अन्यथा नहीं होता ॥ २६-२७ ॥
नृपश्रेष्ठ जनकजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि
उन्होंने द्वारपालोंके साथ उस ब्राह्मणको अपने सम्मुख
[कक्षमें] प्रवेश करते देखा ॥ २८ ॥
ब्राह्मण बोला- हे राजन् ! चन्द्रमाकी किरणोंके
सदृश तुम्हारी उज्ज्वल कीर्ति सुनकर मैं यहाँ आया हूँ।
मुझे भोजन प्रदान कीजिये, मैं चिरकालसे अत्यन्त क्षुधित
हूँ। हे नरेश्वर ! जबतक मेरी तृप्ति न हो जाय, तबतक
अन्न प्रदान करते रहिये, इससे तुम्हें सौ यज्ञ करनेका
पुण्यफल प्राप्त होगा ॥ २९-३० ॥
[मुनि] कौण्डिन्य बोले- उन ब्राह्मणदेवताके
इस प्रकारके वचन सुनकर राजाने उन्हें अपने राजभवनके
भीतर ले जाकर उनका सम्यक् प्रकारसे विधिवत्
पूजनकर [उनके लिये] स्वादिष्ट अन्नका परिवेषण
किया ॥ ३१ ॥
उनके द्वारा दिया गया [वह अन्न] वे तत्काल
उनके सम्मुख ही भक्षण कर गये। [तब] असंख्य
पात्रोंमें [उन ब्राह्मणरूपी गजाननके भोजनार्थ] पकनेके
लिये उत्तम प्रकारके चावल डाले गये ॥ ३२ ॥
[इस प्रकार] जो भी पका हुआ चावल उनके
सामने परिवेषित किया गया, उस सबका वे [ब्राह्मण
देवता] भक्षण कर जाते। तब प्रजाजनोंने राजासे कहा-
[हे राजन्!] यह तो राक्षस प्रतीत होता है। इसे इतना
अधिक [अन्न] क्यों दिया जा रहा है? [क्योंकि]
राक्षसोंको [अन्नादि] प्रदान करनेसे किंचिन्मात्रकी भी
पुण्यप्राप्ति नहीं होती ॥ ३३-३४ ॥
कुछ लोगोंने कहा- हे राजन्! त्रैलोक्यका भक्षण
कर लेनेपर भी इसकी परम तृप्ति नहीं हो सकती।
इसलिये इसे अब धान्य* (अनाज) प्रदान करें ॥ ३५ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण ग्रामों और नगरोंसे, घरों तथा
भूमिके नीचे दबाकर रखे गये समस्त धान्यको उस
सर्वभक्षी द्विजरूपधारी अतिथि-पुरुषके सम्मुख लाकर
डाल दिया गया, परंतु उन धान्योंको खा लेनेपर भी उसे

  • शस्यं क्षेत्रगतं प्राहुः सतुषं धान्यमुच्यते । आमान्नं वितुषं प्रोक्तं सिद्धमन्नं प्रकीर्तितम् ॥
    अर्थात् खेतमें जो भी तैयार फसल खड़ी है, उसे शस्य कहते हैं। तुष (छिलका)-युक्त अनाजको धान्य कहते हैं। छिलकारहित अनाजको
    आमान्न (कच्चा अन्न) तथा आगमें पके हुए अनाजको सिद्ध अन्न कहते हैं।
    Kalyana Visheshank 2021_Section_8_1_Front

२०४ * पुराणे हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
तृप्तिकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ ३६-३७ ॥
तत्पश्चात् दूतोंने राजासे कहा कि [ हे राजन् !]
धान्य भी कहीं नहीं प्राप्त हो रहा है। दूतोंके इस प्रकारके
वचन सुनकर राजा जनकके मुखके नीचे कर लेनेपर वे
ब्राह्मणदेवता 'स्वस्ति' कहकर वहाँसे चले गये। वे तृप्त
नहीं हुए थे, अतः घर-घर जाकर 'अन्न दीजिये'—ऐसा
लोगोंसे कहने लगे। इसपर लोगोंने उनसे कहा— 'हे ब्रह्मन् !
हम सबके घरका सारा धान्य राजाने मँगवा लिया और
उस सम्पूर्ण धान्यका आपने भक्षण कर लिया, इसलिये अब
आपकी जहाँ रुचि हो, वहाँ आप जायें' ॥ ३८-४० ॥
ब्राह्मण बोले—मैंने लोगोंसे इस राजाकी इस
प्रकारकी कीर्ति सुनी थी कि 'राजा जनकसे श्रेष्ठ दानी
कोई नहीं है।' अतः तृप्तिकी कामनासे मैं यहाँ आया
हूँ, बिना तृप्त हुए कैसे चला जाऊँ ? ॥ ४१ ॥
[ कौण्डिन्य बोले— हे प्रिये ! ]— लोगोंके मौन हो
जानेपर भ्रमण करते हुए उन द्विजश्रेष्ठने विरोचना और
त्रिशिरा नामक ब्राह्मण-दम्पतीके सुन्दर भवनको देखा ॥ ४२ ॥
[ गणेशजीके गणोंने कहा— ] हे श्रेष्ठ
[योगिजनो!] [तदनन्तर] वे [द्विजरूपधारी भगवान्
गजानन] सभी प्रकारके गृहोपकरणोंसे रहित और
धातुपात्रोंसे हीन उस भवनमें गृहस्वामीकी भाँति प्रविष्ट
हुए ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'जनकके सत्त्वका हरण' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना और उनके द्वारा
भक्तिपूर्वक प्रदत्त दूर्वाङ्कुरमात्रसे तृप्त होना
कौण्डिन्य बोले— [हे प्रिये !] उन दोनों
(द्विजदम्पती)-के लिये पृथ्वी ही आसन (बिछावन)
और आकाश ही ओढ़ना था। सभी प्रकारकी धातुओंके
स्पर्शतकसे रहित उन दोनोंके लिये दिशाएँ ही वस्त्र थीं।
द्विजरूपधारी [गजानन]-ने देखा कि वे दोनों अन्तःकरणकी
शुद्धिके लिये बिना याचनाके जो मिल जाय, वही
खानेवाले और जलमात्रसे ही सभी धार्मिक क्रियाओंको
सम्पन्न करनेवाले थे ॥ १-२ ॥
उनका घर चारों ओरसे मच्छर और मक्खियोंके
समूहोंसे भरा हुआ था। उन्होंने देखा कि उन दोनों
(द्विजदम्पती)-के द्वारा अनन्य भक्तिभावसे गणेशजीकी
मूर्तिकी पुष्पों और पल्लवोंसे पूजा की गयी है तथा वे
दोनों उनकी भक्तिमें निरत हैं। तब उन्होंने उन दोनोंसे
कहा— 'हे निष्पाप [द्विज-दम्पती !] जो बात मैं कह
रहा हूँ, उसे सुनो ॥ ३-४ ॥
मिथिलाधिपति [महाराज जनक]-की [दान-
विषयक] कीर्ति सुनकर मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित होनेके
कारण तृप्तिकी कामनासे यहाँ आया था, किंतु उन्होंने
मुझे तृप्त नहीं किया। दम्भपूर्ण कार्योंसे सत्त्व (धर्म)-
की रक्षा नहीं होती। तुम्हारे घरमें मेरे लिये कुछ तृप्तिकर
हो तो दो' ॥ ५-६ ॥
[ द्विज-] दम्पती बोले— [राजा जनक] जो
चक्रवर्ती सम्राट् थे, जब वे आपकी तृप्ति न कर सके
तो हम दोनों दरिद्र आपको तृप्तिकारक क्या दे सकेंगे ? ॥ ७ ॥
जो समुद्र असंख्य नदियों और नदोंके जलसे भी
पूर्ण नहीं होता, भला बताओ कि वह बिन्दुमात्र जलसे
कैसे पूर्ण होगा ? ॥ ८ ॥
द्विज [-रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक
दिया हुआ अत्यन्त अल्प पदार्थ भी मुझे बहुत तृप्ति
प्रदान करनेवाला होता है, जबकि बिना भक्तिके अथवा
दिखावेके लिये बहुत अधिक मात्रामें दिया हुआ भी
व्यर्थ होता है ॥ ९ ॥
उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे द्विज-
श्रेष्ठ ! हम शपथपूर्वक कहते हैं कि हमारे घरमें कुछ
भी नहीं है। गणेशजीकी पूजाके लिये हम लोग
प्रातःकाल दूर्वांकुर लाये थे। हमने उनसे गणेशजीकी पूजा
की थी। उन्हींमेंसे एक दूर्वा बची हुई है ॥ १० १/२ ॥
द्विज [ रूपधारी गणेशजी ] बोले—भक्तिपूर्वक
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उ०ख०-अ०६६ ] * कुष्ठी ब्राह्मणके वेशमें गणेशजीका अपने भक्त द्विज-दम्पतीके यहाँ जाना * २०५
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[बायाँ स्तम्भ]

दिया हुआ एक दूर्वांकुर भी मेरे लिये तृप्तिकारक होगा,
अतः उसे ही दे दीजिये ॥ ११ ॥
कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] तब
[द्विजपत्नी] विरोचनाने उनके इस कथनको सुनकर उस
एक दूर्वांकुरको उनको भक्तिपूर्वक प्रदान कर दिया,
जिससे वे द्विज तृप्त हो गये ॥ १२ ॥
विरोचनाने उस दूर्वांकुरमें शालि चावल और
गोदुग्धसे निर्मित खीर, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, व्यंजनों
तथा चाटकर एवं चूसकर खाये जानेवाले विभिन्न भोज्य
पदार्थोंकी भावना करके उन्हें उसे दिया था, उसे ग्रहण
करके उन ब्राह्मण [-श्रेष्ठ]-ने उसका परम प्रसन्नतासे
भक्षण किया ॥ १३-१४॥
[विरोचनाके द्वारा] भक्तिपूर्वक दिये हुए उस एक
दूर्वांकुरसे उन द्विज [श्रेष्ठ]-की जठराग्नि तत्क्षण शान्त
हो गयी। उन्हें तत्काल परम शान्तिकी प्राप्ति हो गयी।
तदनन्तर तृप्त हुए उन द्विजने हर्षपूर्वक त्रिशिराको गले
लगा लिया ॥ १५-१६॥
[तत्पश्चात्] उन द्विजने अपना वह कुत्सित रूप
त्याग दिया और गजानन गणेशजीके रूपमें प्रकट हो
गये। उनका वह स्वरूप चार भुजाओंसे युक्त, कमलके
समान नेत्रवाला और दण्डसदृश सूँड़से सुशोभित था ॥ १७ ॥
उन्होंने अपने हाथोंमें कमल, परशु, माला और दाँत
धारण कर रखा था। उनके सिरपर महामूल्यवान् मुकुट
सुशोभित हो रहा था और उनके कान स्वर्ण-कुण्डलोंसे
अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और
उनका श्रीविग्रह दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त था। प्रसन्न
मनवाले उन गजानन गणेशजीने उन दोनों द्विजदम्पतीसे
कहा कि 'जो-जो तुम्हारे मनमें इच्छित कामनाएँ हों,
उनके लिये शीघ्र वर माँग लो' ॥ १८-१९ १/२ ॥
उन दोनों (द्विज-दम्पती)-ने कहा—हे देव!
हम दोनोंका जहाँ भी जन्म हो, वहाँ [हमारी] आपमें दृढ़
भक्ति बनी रहे अथवा हमें इस अत्यन्त दुस्तर संसार-
सागरसे मुक्ति प्रदान कर दीजिये। हे गजानन ! हम दोनोंके


[दायाँ स्तम्भ]

मनमें अन्य किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं है ॥ २०-२१॥
कौण्डिन्य [मुनि] बोले—[हे प्रिये !] उन द्विज-
दम्पतीके इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने
'तथास्तु' कहा और प्रसन्नतापूर्वक [अपने] भक्त
त्रिशिराका पुनः आलिंगन करके अन्तर्धान हो गये ॥ २२ ॥
हे आश्रये ! असंख्य व्यंजनोंका भक्षण करनेपर भी
जो परमात्मा तृप्त नहीं हुए, उन्हें एक दूर्वांकुरमात्रसे
परम तृप्तिकी प्राप्ति हो गयी। इसी कारणसे मेरे द्वारा
गणेशजीको दूर्वाका भार (इक्कीस दूर्वांकुर) अर्पित
किया जाता है। इस प्रकार मैंने दूर्वांकुरसमर्पण-सम्बन्धी
मंगलमयी महिमाका तुमसे सम्यक् रूपसे वर्णन कर
दिया, जिसका श्रवण सम्पूर्ण मनोभिलषितोंको प्रदान
करनेवाला है। जो इस आख्यानको भक्तिपूर्वक सुनता या
सुनाता है, वह इहलोकमें पुत्र, धन एवं मनोभिलषित
वस्तुओंकी प्राप्ति करता है और परलोकमें भी आनन्दित
रहता है तथा गणेशजीकी भक्ति प्राप्त करता है। निष्काम
भक्त मुक्तिकी प्राप्ति करता है ॥ २३-२६ ॥
[गणेशजीके] गण बोले—[हे योगीश्वरो !]
इस आख्यानका श्रवण करनेपर भी आश्रयाके हृदयमें पुनः
सन्देह उत्पन्न हुआ, जिसे जानकर [मुनिवर] कौण्डिन्यने
पुनः कहा—हे आश्रये ! अपने सन्देहका निवारण करनेहेतु
मेरे कथनका श्रवण करो। हे निष्पाप [प्रिये !] तुम्हारे
हृदयमें जो [संशय] स्थित है, वह मुझे ज्ञात है, उसीके
[निराकरणके] विषयमें कहता हूँ—एक दूर्वांकुर लेकर
तुम शीघ्र इन्द्रके पास चली जाओ। पहले तुम उन्हें आशीर्वाद
दो, तत्पश्चात् उनसे सुवर्णकी याचना करो ॥ २७-२९ ॥
दूर्वांकुरसे तौलकर उस स्वर्णको ग्रहणकर यहाँ ले
आओ। हे शुभानने ! उस (दूर्वांकुर)-के भारसे न तो
कम और न ही अधिक सुवर्ण ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥
[गणेशजीके] गणोंने कहा—[हे योगीश्वरो !]
तदनन्तर मुनिवर कौण्डिन्यके इस कथनका श्रवणकर
पतिके वचनका पालन करनेवाली आश्रया एक दूर्वांकुर
लेकर शतक्रतु इन्द्रके पास गयी ॥ ३१ ॥


[पाद-टिप्पणी / समापन]

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वाके माहात्म्यका वर्णन'
नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥

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