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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

चौदहवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०१४] * धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना * ३०१


तदनन्तर काशिराजने सन्ध्योपासना कर चुके उन बालक विनायकको दीपों तथा चँदोवासे सुशोभित और मनको अच्छे लगनेवाले पलंगपर सुलाया ॥ ४९ ॥ राजाने उस पलंगके पास बालककी रक्षा करनेके लिये जागरण करनेवाले चार अत्यन्त विश्वसनीय पुरुषोंको नियुक्त किया और स्वयं भी उन्होंने बालक विनायककी अनुमति प्राप्तकर अपनी भार्याके साथ शयन किया ॥ ५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'विनायकद्वारा किये गये विघण्ट आदि दैत्योंके वधका वर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना और विनायककी स्तुति करना, विनायकका धर्मदत्तके साथ उनके घरको प्रस्थान, मार्गमें आये काम-क्रोध नामक राक्षसोंका विनायकद्वारा वध, विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें मदोन्मत्त हाथीका वध, धर्मदत्तद्वारा सिद्धि तथा बुद्धि नामक दो कन्याओंको विनायकको सौंपना, विनायकद्वारा जृम्भा राक्षसीका वध, विनायकके बालचरितके श्रवणकी महिमा


**ब्रह्माजी बोले—**बालक विनायकने प्रातःकाल उठकर यथाविधि शौच आदि कृत्य करके स्नान किया, तदनन्तर विधिपूर्वक सन्ध्यावन्दन किया। तत्पश्चात् समिधाओंके द्वारा नित्य होम सम्पन्नकर विनायकने शुभ कृष्ण मृगचर्म और दण्डको एक स्थानपर रखकर बालकोंके साथ क्रीड़ा करना प्रारम्भ किया ॥ १-२ ॥

[तभी] वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता और धर्मदत्त नामसे विख्यात ब्राह्मण, जो वहाँ निवास करनेवाले थे, वे बालक विनायककी कीर्तिको सुनकर उन मुनि कश्यपजीके पुत्रके दर्शनकी इच्छासे नृपश्रेष्ठ काशिराजके भवनमें आये। राजासे भलीभाँति सम्मान प्राप्त किये उन ब्राह्मणने नृपश्रेष्ठसे पूछा— ॥ ३-४ ॥

मुझे बतलाइये कि महर्षि कश्यपका वह बलशाली पुत्र कहाँ है ? तब लोगोंने कहा कि वह बालकोंके साथ खेल रहा है। तदनन्तर वे ब्राह्मण धर्मदत्त उठे और उन्होंने बालक विनायकका हाथ पकड़कर उससे कहा—'आप मेरे मित्रके पुत्र हैं, मैंने आपकी कीर्ति सुन रखी है ॥ ५-६ ॥

इसलिये मैं आपको अपने घर ले जानेके लिये आया हूँ, इसमें कोई संशय नहीं है। आप अपने चरणोंकी धूलिसे हमें पवित्र करें और सभी मनोरथोंको पूर्ण करें। आप परब्रह्मस्वरूप हैं, परमात्मा हैं, परसे भी परे हैं, पृथ्‍वीके भारको हलका करनेके लिये आपने महर्षि कश्यपजीके घरमें जन्म लिया है ॥ ७-८ ॥

आप क्रीडा करनेके लिये मनुष्यरूपमें अवतरित हैं। हे बालक! मैं आपको यथार्थरूपसे जानता हूँ।' तदनन्तर बालक विनायकने उनसे कहा—'आपने क्यों यहाँ आनेका कष्ट किया ? हे तात ! मैं आपकी आज्ञा प्राप्त करते ही क्यों नहीं आपके पास आ जाता', ऐसा कहकर वे विनायक शीघ्र ही ब्राह्मण धर्मदत्तके साथ चल पड़े ॥ ९-१० ॥

उन पराक्रमी विनायकके पीछे-पीछे धूल उड़ाते हुए बालक चल रहे थे। मार्गमें जाते हुए उन विनायकके समीप असुर नरान्तकद्वारा भेजे हुए दो अधम राक्षस आये, जिनका नाम काम और क्रोध था। वे आपसमें [मायामय] युद्ध करते हुए उन बालक विनायकके वधकी इच्छासे आये थे ॥ ११-१२ ॥

गधेका रूप धारण किये हुए और दूषित मनोवृत्तिवाले वे दोनों मदोन्मत्त राक्षस आपसमें युद्ध करते हुए उसी प्रकार उन बालक विनायकके ऊपर गिरे, जैसे कि अग्निमें पतंगा गिर पड़ता है ॥ १३ ॥

तब साथमें आये सभी बालक दसों दिशाओंकी ओर भाग चले। तदनन्तर विनायकने बलपूर्वक उन

३०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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दोनोंके पैरोंको पकड़कर बहुत बार घुमाया और फिर
जमीनपर पटक दिया। तब लोगोंने देखा कि जमीनपर
गिरे हुए उन दोनोंके प्राण निकल चुके हैं॥ १४-१५॥
उस समय उनके देहपातद्वारा हुई ध्वनिसे तीनों
लोक प्रकम्पित हो उठे। उन विनायकके महान् पराक्रमको
आज प्रत्यक्ष देखकर महामुनि धर्मदत्तको लोकमें प्रचलित
विनायककी प्रसिद्धिकी वार्ताके विषयमें पूर्ण विश्वास हो
गया। तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायकके
साथ आगे बढ़े। उसी समय उन्होंने छद्मवेश धारण
करनेवाले एक मदोन्मत्त महान् बलशाली हाथी (-के
रूपवाले कुण्ड नामक दैत्य)-को देखा, जो इधर-उधर
भागते हुए लोगोंको मारनेके लिये उद्यत हो रहा
था॥ १६-१८॥
महान् वीर भी उस हाथीको देखकर इधर-उधर
भागने लगे। वहाँ उस समय दौड़ते हुए लोगोंका महान्
कोलाहल व्याप्त हो गया॥ १९॥
सर्वत्र धूल उसी प्रकार छा गयी, जैसे कि कोहरेके
द्वारा पर्वत ढक दिये जाते हैं। तदनन्तर वह महाबलशाली
हाथी राजाके मदोन्मत्त हाथियोंको मारने चल पड़ा॥ २०॥
महलके भीतर निवास करनेवाले लोगोंने हाथियोंके
उस अत्यन्त भयंकर युद्धको देखा। वहाँ बँधे हुए
घोड़ोंको देखकर उन हाथियोंने अश्वशालाको भी तहस-
नहस कर दिया॥ २१॥
बन्धनमुक्त हुए घोड़े तथा हाथी दसों दिशाओंमें
भाग चले। ब्राह्मण धर्मदत्त उन बालक विनायकको साथ
लेकर ज्यों-ही घरके अन्दर जानेको उद्यत हुए, उसी
समय बालक विनायकने उस हाथीकी सूँड़को मरोड़
डाला और वे बलपूर्वक उसके ऊपर आरूढ़ हो गये।
बालक विनायकने अंकुशके द्वारा उस हाथीके गण्डस्थलको
बार-बार वेध डाला॥ २२-२३॥
[उसके कारण] चारों ओर रक्त बहने लगा और
वह हाथी सभी लोगोंको भयभीत करनेवाली चिंघाड़की
ध्वनि करते हुए भूमितलपर गिर पड़ा॥ २४॥
विशाल शरीरवाले उस हाथीके गिरनेसे सभी
सामानोंसहित असंख्य संख्यामें वहाँके भवन टूट गये॥ २५॥
पर्वतों, वनों तथा खानोंसहित सारी पृथ्वी काँप
उठी। धूलके छा जानेसे हुए अन्धकारके छँट जानेपर
नगरमें निवास करनेवाले लोग वहाँ आये। महान् भयंकर
आकृतिवाले उस हाथीको मरा हुआ देखकर वे भयसे
व्याकुल हो उठे। कुछ बलशाली पुरुष उसके पास गये
और उन्होंने बलपूर्वक उस हाथीसे बालकको नीचे
उतारा॥ २६-२७॥
ब्राह्मण धर्मदत्तने बालक विनायकको पुनः अपनी
गोदमें ले लिया। फिरसे कोई नया उत्पात न हो जाय,
इस शंकासे वे शीघ्र ही बालकको घरके अन्दर ले गये।
उस अपशकुनके शान्त हो जानेपर ब्राह्मण धर्मदत्तने
ब्राह्मणोंको धन प्रदान किया और पृथक्-पृथक् उपचारोंके
द्वारा बालक विनायककी पूजा की॥ २८-२९॥
उन्होंने वस्त्र, अलंकार एवं पुष्पोंसे पूजन किया
और विविध प्रकारके एकत्रित नैवेद्योंका उन्हें भोग
लगाया। दक्षिणाके निमित्त धर्मदत्तने सिद्धि तथा बुद्धि
नामक अपनी दो कन्याएँ उन्हें समर्पित कीं और
भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया, तदनन्तर प्रसन्न
मनवाले ब्राह्मण धर्मदत्तने आनन्दातिरेकसे गद्गद वाणीमें
कहा-॥ ३०-३१॥
आज मेरा भाग्य सफल हो गया है, जो कि मैंने
आपके चरणाम्बुजका दर्शन किया। आप जगत्के स्वामी
हैं, जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, जगत्के साक्षीरूप हैं।
समस्त जगत्के गुरु हैं, आप मेरे कहनेसे मेरे पूर्वजोंका
उद्धार करनेके लिये यहाँ आये हैं। ऐसा कहते हुए उन
मुनि धर्मदत्तको विनायकदेवने एक उत्तम आसनपर
बैठाया और [अपने पिता कश्यपजीके मित्र होनेके
कारण पितृभावसे स्वयं भी] अत्यन्त भक्तिपूर्वक मुनिकी
पूजा की॥ ३२-३३१/२॥
सिद्धि तथा बुद्धिसे समन्वित वे बालक विनायक
देवी गंगा तथा पार्वतीसे युक्त, त्रिशूल हाथमें धारण
करनेवाले त्रिनेत्र भगवान् शिवके समान अत्यन्त सुशोभित
हो रहे थे। उसी समय एक जृम्भा नामक सुन्दरी वहाँ

क्री०ख०-अ०१४] * धर्मदत्त नामक ब्राह्मणका काशिराजके यहाँ आना * ३०३
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आयी ॥ ३४-३५ ॥
वह पीले रंगके वस्त्र धारण की हुई थी, उसने
सुन्दर कंकण तथा मनोहर आभूषण पहन रखे थे। वह
धूम्राक्ष नामक राक्षसकी पत्नी थी और अत्यन्त दुष्ट
मनोभाव रखनेवाली थी ॥ ३६ ॥
वह अत्यन्त मधुरवाणीमें बोली—'यह उत्तम निधान
है। यहाँ बहुतसे अरिष्ट हो रहे हैं, उन्हें प्रयत्न करके
नष्ट किया जा सकता है। ऐसी स्थितिमें इस बालकको
तथा इसके माता-पिताको कैसे सुखभोग हो सकता
है?', सभी स्त्रियोंसे ऐसा कहकर वह बालक विनायकसे
कहने लगी ॥ ३७-३८ ॥
हे विभो! यह मेरा महान् भाग्य है, जो कि मुझे
आपका दर्शन प्राप्त हुआ। हे देवेश्वर! बहुतसे दुष्टोंका
वध करते-करते आप थक गये हैं। अतः हे महामते!
इस सुगन्धित तैलका उबटन लगाइये। मैं तुम्हारे अंगोंकी
मालिश कर दूँगी तथा तेल और उबटन भी लगा दूँगी।
तब बालक विनायकके द्वारा 'ठीक है'—ऐसा कहे
जानेपर हाथमें विष ली हुई उस स्त्रीने विषके प्रभावकी
उत्कटताका वर्धन करनेवाले उस तेलको उनके चरणोंमें
लगाया ॥ ३९–४१॥
जँभाई लेती हुई वह जृम्भा उस तेलके द्वारा बालक
विनायककी मालिश करने लगी। वहाँ उपस्थित लोगोंने
उसे भली स्त्री माना। वह दुष्ट भाववाली स्त्री जृम्भा
बालक विनायककी उसी प्रकार सेवा करने लगी, जैसे
शुभ भाववाली स्त्री अपने पतिकी सेवा करती है ॥ ४२ ॥
तदनन्तर उस विषमिश्रित तेलके प्रभावसे बालक
विनायकके शरीरमें अत्यधिक जलन होने लगी। तब
विनायकने ज्ञानयोगके बलपर यह जान लिया कि यह
तो दूषित मनोवृत्तिवाली राक्षसी है ॥ ४३ ॥
तब शीघ्र ही विनायकने एक नारियलके फलसे
उसके मस्तकपर प्रहार किया, जिससे वह जमीनपर गिर
पड़ी और अपने वास्तविक निशाचरीरूपमें आ गयी।
अपने शरीरसे बहनेवाले रक्तके मध्यमें वह दो योजन
दूरतक फैल गयी। उस समय वे ब्राह्मण धर्मदत्त तथा
अन्य सभी उपस्थित लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हो
गये ॥ ४४-४५ ॥
तदनन्तर ब्राह्मण धर्मदत्तने बालक विनायककी
विधिवत् पूजा की और उन्हें छः रसोंसे समन्वित अत्यन्त
स्वादुपूर्ण विविध प्रकारके पक्वान्नोंका भोजन कराया ॥ ४६ ॥
उस अवसरपर देवताओंने पुष्पोंकी वर्षा की तथा
स्त्रियोंने उनकी पूजा की, आरती की और लाजाओंकी
उनपर वर्षा की ॥ ४७ ॥
तदनन्तर वे काशीनरेश उन विनायकको ले जानेके
लिये वहाँ आये और उन्होंने उन्हें रथपर बैठाया।
तदुपरान्त विविध वाद्योंकी ध्वनि, गन्धर्वोंके गायन तथा
अप्सराओंके द्वारा आगे-आगे किये जाते हुए नृत्यके
साथ राजा उन विनायकको सकुशल अपने भवनमें ले
गये ॥ ४८-४९ ॥
अनेक वीरोंसे घिरे हुए तथा काशिराजके रथपर
विराजमान वे बालक विनायक उसी प्रकार प्रतीत हो रहे
थे, मानो सिंहपर आरूढ़ और हाथमें शस्त्र धारण किये
हुए एवं देवताओंसे घिरे हुए इन्द्र हों ॥ ५० ॥
उस समय सिद्धि तथा बुद्धिसे समन्वित वे विनायक
उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे कि गंगा तथा
पार्वतीसे समन्वित शिव सुशोभित होते हैं। अनेक
बन्दीजनोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए उन विनायकने
राजाके भवनमें प्रवेश किया। जगदीश्वर विनायकके इस
प्रकारके बालचरित्रोंका जो श्रवण करेगा, वह सभी
प्रकारके मनोरथोंको प्राप्त कर लेगा और कभी भी
शत्रुओंके द्वारा प्रपीड़ित नहीं होगा ॥ ५१-५२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'काम-क्रोध आदि दैत्योंके
वधका वर्णन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४॥